अर्पण कुमार की रचनाएँ

जागना

कोई तड़के सुबह तो कोई
दिन चढ़े जगा है
मगर जगा हर कोई है
हर घर, हर मुहल्ला जगा है
हर गाँव, हर शहर जगा है

हर झील, हर तालाब जगा है
हर नदी, हर समुद्र जगा है
रात बिताकर
सिर्फ हम ही नहीं जगे
अपने अन्धेरे की चादर
और इत उत
फैली अपनी सिलवटों
को तह करती
जोगन तो कभी
विरहन बनी
छोटी तो कहीं
लम्बी हर रात जगी है

कोई अकेले तो
कोई किसी के साथ जगा है
विशालकाय व्हेल और
कृशकाय चेरा जगा है
अपनी आँखें मलते
कोई स्वप्न जगा है
तो अपनी पलकों पर
नींद के शहद संभाले
कोई कचास जगी है

कोई पूरी नींद सोकर
हवा की मानिन्द हल्का होकर
तसल्ली में जगा है
तो कोई फिर से सो
जाने की आस में
जगा बैठा है

उदासियों में डूबा था शब भर
आज सुबह वह खुशियों
के परों पर हो सवार जगा है
बीती रात कोई
मंज़िल मिली थी
मगर आज फिर सफ़र के
असबाब के साथ जगा है

दूब की नोक पर जमे ओस में
सूरज की किरण जगी है
नदी के पानी से बाहर आ
तट की सैर को निकला
घोंघा जागा है, बरामदे के छज्जे पर पर बने
घोंसले की सरहद से
बाहर की असीमित दुनिया को
हसरत भरी निगाहों से देखता
उन्हें अपने पंखों में समेट लेने
के अपने निर्दोष उतावलेपन के साथ
नवजात कबूतर जगा है

मुहल्ले की महिलाओं की चकल्लस
और उसके कहीं गहरे भीतर पैठी
सदियों से स्याह रंग में दिखती आई
गुलाबी उदासी जगी है
सूखे कुएँ के मुण्डेर का सूनापन और
कभी चुहल से हर पल आबाद
और गुलजार रहनेवाली पनघट
की साँय-साँय करती
और वीराने में कोई बेसुरा राग बजाती
हवा जगी है
रसोई से बैठकखाने तक
अपने गुप्त और अलक्षित रास्तों से
आवाजाही करती
छिपकली जगी है
हालाँकि उसके जागने और
सोने के समय का
ठीक-ठीक अन्दाज़ा
नहीं लगाया जा सकता

कनस्तरों में बन्द
अनाज के दाने जगे हैं
गई रात भरपेट माछ-भात खाए
और सुबह-सुबह
अपने पेट पर हाथ फेरते
नीचे भूतल पर रहनेवाले
घोष बाबू जाग गए हैं
तो पूरे इलाके में मशहूर
कच्ची बस्ती में रहनेवाला और
हड़ियाभर माड़ पीनेवाला
रामशरण मुसहर
जाग गया है

साँकल को खटखटाता
घर का आलस्य जगा है
एक और सुबह जगे रह
जाने के उन्माद में
फुटपाथ पर फटे
और धूल-धूसरित कम्बल में
लिपटी ज़िन्दगी जगी है;
जंगल में आवारा चिलबिल[1]
और घर में
घर-भर का लाडला
भाभी का चिलबिल्ला[2]
जगा है

सीधे-सादे दिखते लोगों की सयानी
और कैशौर्य की दहलीज पर
खड़ी जवानी जगी है
बीते शब उदासियों के
मयखाने में डूबी आशा
अपने हैंगओवर में
डगमगाते कदम जगी है;

बरगद की जड़ से लेकर शाखों तक
धमाचौकड़ी करनेवाला चिखुरा[3]
जाग चुका है
ऐसे कि कभी सोता हुआ
दिखा ही न हो
और सदा की भाँति अपने पैने दाँतों
को और पैना करने के अपने कारोबार में
तल्लीनता से जुट गया है

शहर के बाहरी हिस्से में
हाल ही में बने नए पुलिस पोस्ट पर
इधर कुछ दिनों से
रोज खड़ी दिखती
भिखारिन के
कटोरे में इक्के-दुक्के
चिल्लर जगे हैं
तो पुराने शहर में
स्थित चुंगीख़ाने में
बड़े बाबू का
कभी न सोनेवाला लालच
एक बार फिर जगा है

त्रिपिटक से निकल
बाहर
बुद्ध उठे हैं तो
बीजक से उठकर कबीर के
पद जाग गए हैं
गाँव के परनाले के किनारे
एक बच्चे द्वारा चूस कर
फेंक दिए गए आम
की गुठली से
बीजांकुर जाग उठे हैं

ग़ज़ल की रदीफ़ और
क़ाफ़िए की बंदिश से
बाहर आ ‘बुत’ जाग गया है
तो अपने काँपते हाथों में
छेनी-हथौड़ा थामे,
सुबह-सुबह नमक
और गर्म पानी के घोल से
गरारे करते
शहर के सबसे वृद्ध
और नामी बुततराश जग्गू मियाँ
जाग गए हैं
वहीं दूसरी तरफ
अफ़ग़ानिस्तान के
तालीबानी बुतशिकनों की
जमात भी जागी हुई है, जो
अपने विनाशकारी मंसूबों को
दुनिया भर में
अंज़ाम देने की
नापाक कोशिश में है
और जो,
जग्गू मियाँ जैसे
कलाकारों की साधना को
मिट्टी में मिला देना चाहती है
शिल्प-इतिहास के
गौरवशाली पृष्ठों को
कोरा कर देना चाहती है;

बरसों से छापे जा रहे
झूठे घोषणापत्रों से उठकर
उन्हें वापस कोरा करने की
अपनी अनूठी जिद लिए
इस सुबह
कुछ सच्चे शब्द जगे हैं,
ताश के पत्तों से उठ
बेगम जाग गई है
विशाल कौरव-सभा में
चौपड़ की बिसात पर
लगा दी गई द्रौपदी की
हुंकार और उसका विद्रोह जगा है

अब तक हजारों रोटियाँ
बेल चुकी
और सैकड़ों बार
दर्जनों लोगों की
जठराग्नि बुझा चुकी
अपनी चिकनी और श्रमशील
काष्ठ-त्वचा को
स्वयं ही निहारती
रसोई में पड़ी बेलन जगी है
और लुढ़कती हुई आ गई है
बाहर ताक-झाँक करने
डायनिंग स्पेस तक

अरसे से लोगों को
स्वस्थ रखने में
अपने तईं सहयोग
करती और
अपने काँटों के साथ
हरदम तनी दिखती
भटकटैया जाग चुकी है,
हिन्दी व्याकरण की किताब से
बाहर निकल और
रोज़मर्रा की दुनियादारी में
आकर पसर
सारी भाववाचक संज्ञाएँ
आज एक बार फिर जगी हैं
जाग उठे हैं
उपसर्ग और प्रत्यय उनके साथ

सप्ताहान्त के आलस्य को
फटकारता
सोमवार जाग उठा है
मकतब और मकतल
जाग उठे हैं
कारखाने का बज़र
और कारतूस में बन्द बारूद
जागे हैं
मछलियों का चपल झुण्ड और
मछुआरिन का
अनथक संकल्प जगा है
एक-दूजे से बनते
और एक-दूजे को बदलते
मिथक और इतिहास
जाग गए हैं
एक-दूजे को तकते हैरानी से
तो कभी परस्पर मुस्कुराते
पलकों ही पलकों में

देर रात नवयौवना
की हथेली में रची गई
मेंहदी अपनी खुशबू और
अपने अरमानों के संग
जाग उठी है
तो जीवन के उत्तरार्द्ध में
वृद्धा की गठिया की पीड़ा और
वृद्ध के गलसुए की सूजन
जाग उठी हैं

अपने गर्दो-गुबार को झाड़
अदालत का परिसर जगा है
डरे-सहमे नए गवाह
और उन्हें तोते की तरह
उनका बयान रटाते
मँजे-मँजाए पुराने वकील
जाग उठे हैं
इंसानों को अपना हुनर सिखाते
झाड़ियों में जमे
गिरगिट जाग गए हैं

गली की धूल
और चबूतरे की धूप
जाग उठी है
कुनमुनाती हुई
सच से लिपटा झूठ
और झूठ में पैठा सच
जाग उठा है
अपने अपने आवरणों से
आकर बाहर
डैम का टरबाइन
शराबखाने की वाइन
जेल की टावर
और तेल के टैंकर
जाग गए हैं
अपने उन्माद, नशे, ऐंठन
और रफ़्तार में
डाकख़ाने की चिट्ठी
डाकबँगले की गिटपिट
जाग उठी है
ख़ाकी थैले से
बाहर आती और
अपने ऊपर की
गर्द झाड़ती हुई

दर्शक बनता दृश्य और
दृश्य बनते दर्शक जाग उठे हैं
गो कि दुनियादारी के
तमाम रंग-ढंग
एक-दूजे की आवाजाही में
एक-दूजे की चादर ओढ़े
जाग उठे हैं
अनन्त ब्रहाण्ड के
अनन्त जीव और पदार्थ
अपनी स्थानिकता से
आगे बढ़ दो क़दम
अपनी व्यापकता की
हुमक और धमक के साथ
जगे हैं
राजपरिवार की विलासिता को
तुच्छ समझता
कोई तथागत जगा है
तो विगत के कन्धे पर उचकता
हमारा आगत जगा है

यह सब देखता और सोचता
कैसे सोया रहा होता
भला मैं
जगा है मेरे भीतर का
अधबना कवि
अधमरा, अधटूटा और
अधजला इंसान जगा है
मेरा अनावृत्त सौन्दर्यबोध,
मेरी अधढँकी वासना जगी है
असहिष्णुता और अमर्यादा जगी है
जागने को लेकर बेमौसम उपजे
मेरी ही हालात जैसे टूटे-फूटे,
और कुछ बिखरे-बिखरे से
मेरे ये विचार जगे हैं
जगा है स्वयं मेरा आत्म,
मेरा बाह्य
मेरा रहस्य,
मेरा आत्मबोध
मेरी आत्मविस्मृति
और मेरा अनावरण
मेरी साँस-साँस जगी है
मेरे भीतर सोई
कोई आस जगी है
जगा है मेरा जुनून,
मेरा औघड़,
मेरी कपोल-कल्पना
जगी है,

जो इस कविता में नहीं आ पाए
वे सब भी तो आखिर जाग गए हैं
सोई हुई हर चीज जाग गई है
मुझसे लक्षित या अलक्षित
क्या फ़र्क पड़ता है
बस उनका जागना
और सही मायनों में जागना
महत्वपूर्ण है
कुछ यूँ कि फिर
किन्हीं मतलबपरस्त
सत्ता-लोलुप जनों
की चिकनी-चुपड़ी
बातों में वे न आ जाएं
कि उनका जागना
कोरे समीकरणबाजों
की नींद उड़ा दे
कि वे सिर्फ़
अपनी आँखों से ही नहीं
अपनी सोच और
अपने दर्शन से भी जागृत रहें
और रखॆं दूसरों को भी,
कुछ ऐसे जगें वे कि
उनके जागने से
उनके चारों ओर
सही मायनों में और
स्थायी रूप से
अँजोरा फैल सके
कि उनका जागना
उनके परिवेश का
जागना बन जाए

दुनिया की सारी
भाषाओं और बोलियों में
जागने के लिए बेशक
अलग-अलग शब्द हैं
मगर जागना सब जगह
एक जैसा है
जैसे भाँति-भाँति रंग-रूप के इंसान
इंसानियत की तुला पर
एक जैसे दिखते हैं
वैसे ही जागने की चमक
हरेक आँख में एक सी है
शुरू में उनींदी और अलसाई
और फिर खूब तुर्श और तेज-तर्रार

जागना दुनिया की एक
सबसे ख़ूबसूरत क्रिया है।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें एक प्रकार का जंगली वृक्ष / बरसाती पौधा ।
  2. ऊपर जायें नटखट और शोख
  3. ऊपर जायें नर गिलहरी

शासको, तुम हार रहे हो

आख़िर कब तक तुम हमें ठगते
और कोई कब तक चुप और निष्क्रिय
रह सकता है
किसी के ख़ौफ़नाक चेहरे से डरकर
या फिर किसी के देवत्व की
महिमा तले दबकर

शासको,
बेशक तुम हमारे मालिक हो
और हम तुम्हारी प्रजा
सदियों से
तुम्हारी और हमारी पीढ़ियों के बीच
यही सम्बन्ध रहे हैं
मगर अब हमारी आवाज़ से
तुम्हारी अकड़ी हुई कुर्सी और
सत्ता के तुम्हारे गलियारे
दोनों कंपायमान हैं
तुमने फटी बाँसुरी सी
हमारी बेसुरी आवाज़ को सुनना
पसन्द तो ख़ैर कभी नहीं किया
मगर हम दरिद्र-नारायण
जन्म-जन्मान्तर से भूखी
अपनी अन्तड़ियों को पकड़कर
तुम्हारे आश्वासन का कौर
कब तक खा सकते हैं
और तुम्हारी प्रशंसा में
नतमस्तक हो
विरुदावली कब तक गा सकते हैं

तुमने बड़ी चतुराई से
आज़ादी की लड़ाई में
हमारी संख्या का
इस्तेमाल किया
हर मोर्चे पर हमें आगे रखा
मरवाया और कटवाया
मगर स्वतन्त्रता के
सुख और अधिकार से
हमें दूर ही रखा
हाँ, मतदान का
झुनझुना पकड़ाकर
हमें सरकार के चुनाव में
भागीदार होने का
एक आत्म-भ्रम ज़रूर दिया
जिससे उबरते और निकलते
हमें साठ साल से अधिक लग गए
और आज भी हम
तुम्हारी इस मृग-मरीचिका से
पूरी तरह बाहर निकल पाए हों
इसमें हमें संदेह ही है

और फिर तुम जादूगर भी तो
बड़े और पुराने हो
एक से बढकर एक
तिलिस्म गढने में माहिर
हम भोली-भाली जनता चाहे अपने को
जितना होशियार समझ लें
मगर हमारी ज़िन्दगी
तुम्हारे रचे रहस्यों में
फँसने, उसे समझने और
उससे निकल बाहर आने में ही
बीत जाती है
बावजूद इसके हम
अपने हक़ों के लिए
अब किसी मुकाम तक
जाने को तैयार हैं
‘सड़क से संसद तक’
कहीं भी धावा बोलने का
हौसला लिए सर तान खड़े हैं

बहरी और मदान्ध दीवारों से
टकराकर लौट आती
हमारी आवाज़
अब अनसुनी नहीं रह पाएगी
क्योंकि तुम्हारी दीवारें
अब दरकने लगी हैं
मजबूरी में या कहें
वक्त की नज़ाकत को समझते हुए
तुमने हमारी माँगों के पुलिन्दों को
अपनी मेज़ पर जगह दी है
उस पर चर्चा करना स्वीकार किया है
अब भी तुम्हारी हेकड़ी जाने में
ख़ैर काफ़ी वक़्त है
मगर तुम्हारे हारने की
शुरूआत हो चुकी है
हम जनता-जनार्दन के लिए
यह भी कम नहीं है कि
हमारी सामुदायिकता और एकजुटता
तुम्हारी पेशानी पर
पसीना चुहचुहा देने
के लिए काफ़ी है
यह भी हमारे लिए
किसी जीत से कम नहीं कि
तुम राजनेताओं या नौकरशाहों
के आगे अगर
सचमुच का कोई जननेता
या जनसेवक आ जाए
तो तुम्हारी घिग्घी बँधने में
देर नहीं लगती
क्योंकि चाहे जितने
‘ऐट्टीच्यूड’ दिखला लो
चाहे जितनी पीढ़ियाँ
शासन कर लो
चाहे जितनी बड़ी गाड़ी में घूम लो
चाहे जितने झक सफेद कपड़े पहन लो
तुम भी आखिर
एक जन-प्रतिनिधि ही हो
तुम्हें हम ही चुनते हैं
चाहे डरकर,
प्रलोभन में आकर या फिर
गुमराह होकर
तुम्हारी सत्ता की चाबी
हमारे ही हाथों में रहती है
अब हमें भी अपनी इस ताक़त का
तर्कपूर्ण उपयोग करना आ गया है
हमें भी अपनी शर्तों के साथ
तुम्हारे समर्थन में या
फिर तुम्हारे विरोध में
खड़ा होना है

शासको,
हम अपने जीवन की
बेहतरी के लिए
अब जायज़ बातों को
कहने से नहीं चूकेंगे
और तुम्हारे साथ
हमारा सम्बन्ध भी सशर्त होगा
तुम भी हमारे इस निश्चय को
अब जान चुके हो
और डरने लगे हो
शासको, तुम जानते हो
अब तुम हार रहे हो।

बीमारी और उसके बाद 

कितना कुछ टूट्ने लगता है
शरीर और मन के अन्दर
घर में और घर के बाहर
जब घर का अकेला कमाऊ मुखिया
बीमार पड़ता है
वक़्त ठहर जाता है
खिड़की और बरामदे से
आकाश पूर्ववत दिखता है
मगर गृहस्वामिनी के हृदय के ऊपर
सूर्य-ग्रहण और चन्द्रग्रहण दोनों
कुछ यूँ छाया रहता है कि
दिन मटमैला और
उदास दिखता है
और इस मन्थर गति से
गुज़रता है
मानों किसी
अनहोनी के इन्तज़ार में
रूका खड़ा हो
रात निष्ठुर और
अपशकुन से भरी
बीते नहीं बीतती
मानो शरीर में चढ़े
विषैले साँप का ज़हर
उतारे नहीं उतरता

बीमारी का निवास तो
किसी व्यक्ति-विशेष
के शरीर में होता है
मगर उसकी मनहूसियत
पूरे घर पर छायी रहती है
बच्चों की किलकारी से
हरदम गूँजनेवाला घर
दमघोंटू खाँसी से भर जाता है
गले की जिस रोबीली
आवाज़ की मिसाल
पूरा पड़ोस दिया करता था
आज उसकी पूरी ताक़त
आँत को उलटकर रख देने वाले
वमन करने में लगी हुई है
बीमारी एक चपल शरीर को
चार बाई छह की चारपाई तक
स्थावर कर देती है
घर की पूरी दिनचर्या
डॉक्टर की बमुश्किल
समझ आनेवाली पर्ची
और विभिन्न रंगों की दवाइयों
के बीच झूलती रहती है
स्कूल से अधिक
अस्पताल की और
पढ़ाई से अधिक
स्वास्थ्य की चर्चा होने
लगती है
खट्टे हो गए सम्बन्ध
कुछ दिनों के लिए ही सही
मोबाइल पर
मधु-वर्षा करने लगते हैं
बुखार में तपते शरीर की ऐंठन
कुछ यूँ मरोड़ देती है कि
मन में कहीं गहरे जमी अकड़
जाने कहाँ हवा हो जाती है
बीमारी शरीर को दुःख देती है
और अपने तईं
मन को विरेचित भी करती है
छोटे और सुखी परिवार की
आदर्शवादी संकल्पना की
आड़ में जीते मनुष्य को
सहसा अपना परिवार
काफ़ी छोटा लगने लगता है
बच्चों को हरदम
अपनी छाती से चिपटाए
रखने वाले दयालु पिता के कन्धे
जब झुकने और चटकने लगते हैं
तब हमेशा सातवें
आसमान पर रहने वाला
उसका गर्वोन्मत्त पारा
एक झटके में यूँ गिरता है
कि वह सँयुक्त परिवार की
ऊष्मा तले ही
किसी तरह सुरक्षित
रहना चाहता है
नाभिकीय-परिवार की
आयातित व्यावहारिकता
तब किसी लूज-मोशन का रूप धर
क़तरा-क़तरा बाहर निकल जाती है

बीमारी के बाद
शरीर और सम्बन्ध दोनों कुछ
नए रूप में निखरकर
सामने आता है
रोज़मर्रा के कामों में
मन पूर्ववत रमने लगता है
आत्मविश्वास लौटने लगता है
दिन की उजास भली और
रात की चाँदनी मीठी
लगने लगती है
घर भर पर छाया
बुरे वक़्त का ग्रहण
छँटने लगता है
और फिर आस-पड़ोस के
हँसते-खेलते माहौल में
अपनी ओर से भी कुछ ठहाके
जोड़ने का मन करता है
बच्चों को उनके स्कूल-बस तक
छोड़ने का सिलसिला
उसी उत्साह और मनोयोग से
पुनः शुरू हो जाता है
पत्नी के साथ
बना अछूत सा सम्बन्ध
अपनी पुरानी रूमानियत में
आकर टूटने लगता है
और कुछ नए रंग
और तेवर के साथ
गृहस्थ-जीवन सजने
और सँवरने लगता है

बीमारी के कष्टदायक दिनों में
मन्थर हुआ समय
एक बार पुनः अपनी पूरी रफ़्तार से
उड़न-छू होने लगता है
मन-बावरा ठगा‌ ठिठका
उसे चुपचाप देखता
चला जाता है
इस अहसास के साथ कि
वह अपने वक़्त पर
लाख चाहकर भी
कोई नियन्त्रण नहीं रख सकता
अच्छे और बुरे वक़्त को
स्वीकार करने
और उसके साथ
चलते जाने के सिवा
उसके पास कोई चारा नहीं है

बीमारी व्यक्ति को
उसका क़द दिखलाती है
और समय से डरने को
कहे ना कहे
समय का आदर करने को
ज़रूर कहती है।

कराहता कनॉट प्लेस

कनॉट प्लेस भीग रहा था
फ़रवरी के दूसरे सप्ताह की रिमझिम में
उसके गलियारे गमक रहे थे
बारिश में अधभीगे प्रेमी युगलो की
पारस्परिक नशीली चुहलबाज़ी से
पूरा बाज़ार महमह कर रहा था

सड़कों पर
हाथ में हाथ लिए प्रेमी युगल
एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक तक
दौड़ते तो कभी क़दम-ताल करते
आ-जा रहे थे
वैलेण्टाइन डे के दिन
कुछ अधिक धुला-धुला कनॉट प्लेस
अपनी ऐसी क़िस्मत
और अधगीले-अधसूखे प्यार के
जगह-जगह लगी रँगीन जमघटों पर
इतराता चला जा रहा था

रात के दस बज रहे थे
सड़कों पर लैम्प-पोस्ट और दुकानों से आती
रोशनी की छरहरी परछाइयाँ
कनॉट प्लेस की नसों में पैवस्त हो रही थीं
सुगन्धित गलियारों में चहलकदमी करते
हर उम्र की युवा धड़कनों को

एक ख़ास से नशे में डुबो रही थी

नवयुवतियों की कजरारी आँखों में
प्यार के कई सुनहले सपने तैर रहे थे
जो अकेले तो कहीं समूह में
अपने-अपने आशिकों की किश्तियों में सवार थीं
मुहब्बत के अपने-अपने दरिया को पार करने
आधे सच्चे, आधे झूठे वायदों को ढोते शब्द
हल्की-फुल्की फुसफुसाहट के साथ
एक दूसरे के कन्धे थपथपा रहे थे
बारिश और भाषा में
कहीं कोई मूक प्रतियोगिता चल रही थी
कौन कितने धीमे से
मानव मन को गीला कर सकता है !
फुहारों में भीगती लड़कियों की आँखों का काजल
कुछ ज़्यादा फैल गया था
उनकी आँखें कुछ अधिक बड़ी दिख रही थीं
मानो इन ख़ूबसूरत पलों के पूरे उपवन को
वे स्वयं में समेट लेना चाह रही हों

पानी में गीले हुए युवतियों के बाल
उनके सिर से चिपककर
दिनभर के मुरझाए उनके चेहरों को
तरोताज़ा करने का प्रयत्न कर रहे थे
घुटनों से ऊपर जँघा तक
रोम-रहित, गीले, माँसल,चुस्त,
स्वस्थ, धुले-धुले कमनीय पैर
कनॉट प्लेस की बूढ़ी दीवारों के ईमान को
गोया भटका रहे थे
कनॉट प्लेस की दीवारें तरल हो आई थीं

घड़ी की सुई
अपने हिसाब से घूमती चली जा रही थी
रात गहराने लगी थी
वैलेण्टाइन डे पर एक दूसरे को फूल देते
प्रेमी-युगल
एक दूसरे से गले मिल
एक दूसरे को अलविदा कह रहे थे
कुछ अपने घरों की ओर
तो कुछ रेस्टोरेण्ट की ओर बढ़ने लगे थे
दिल्ली मेट्रो में दिल्ली की रँगीनी चढ़ आई थी
आसपास के रेस्टोरेण्ट कुछ अधिक युवा हो आए थे
उस रात

प्यार का नशा चारों ओर तारी था
सड़कें अलसाई थीं, ट्रैफिक सुस्त था
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दिनों की सख़्त दीवारें
कभी कुछ पलों के लिए अतीत में चली जातीं
आज़ाद और जश्न मनाते इन भारतीयों के
पूर्वज़ों ने ऐसे स्वतन्त्र-दिवसों के लिए
अपने पैरों में बेड़ियाँ बन्धवाईं…
अपनी आँखें मलतीं सहसा
वे पुनः वर्तमान में आ जातीं
जहाँ, अभी भी बहुतेरे सताए जा रहे थे
अभी भी कुछ लोग
क्षण भर की अपनी भूख को मिटाने के लिए
कोई भी हद पार कर सकते थे

लड़की की जिस कराह से
रातभर अपना सिर धुनता रहा कनॉट प्लेस

अगली सुबह का अख़बार रक्तरँजित था
वहाँ हुए उस पाशविक कृत्य से
नशे में गुमराह हुई एक लड़की
सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई थी

कनॉट प्लेस
उस लड़की के लिए लोगों से मदद माँगता रहा,
चिल्लाता रहा
मगर गूँगी दीवारों की चीख़
लौट-लौट कर उसी के पास आती रही
मदद को कोई हाथ आगे नहीं आया

मनुष्यों के पल-पल बदलते रूपों को
कनॉट प्लेस समझ नही पाता
उनकी यान्त्रिक भीड़ में वह कहीं अकुलाने लगता है
आह ! कि पन्द्रह फरवरी की तेज़ धूप में
चौदह फरवरी की बारिश का
अब कोई नामोनिशान नहीं था ।

मौत की आहट

समय के साथ
सब-कुछ खत्म हो जाता है
हमारी लोलुप-दृष्टि,
हमारी कुंठा
हमारी संग्रह-प्रवृत्ति,
हमारी सौंदर्य-दृष्टि
समय के साथ
कहाँ बच पता है कुछ भी
खत्म हो जाता है सब-कुछ

हमारी सोच,
हमारी आदतें,
नाते-रिश्तेदारों,
दोस्तों-पड़ोसियों से
हमारे गिले-शिकवे
हमारा भ्रमण,
हमारा क्रंदन
हमारा कसरती तन,
हमारा संकल्पित मन
समय के साथ ये सब
विलोपित हो जाते हैं जाने कहाँ

हमारी सहज अर्जित मातृभाषा
परिश्रम से उपार्जित
कोई विदेशी भाषा
हमारा व्याकरण
हमारी मासूमियत
हमारी वक्रता

हमारा व्यंग्य-कौशल
समय के साथ
कहाँ बचता है कुछ भी

सुबह और शाम पर हमारी चर्चाएं
झरनों, तालाबों, नदियों
और समंदर को
एकटक देखती आई
हमारी आँखें
हमारे अंदर का स्रष्टा,
हुंकार भरता हमारा वक्ता
समय के समुद्र में
बिला जाते हैं ये सभी
मानों ये सब
कागज के शेर भर थे

मौत की आहट को
जीवन की खोखली हँसी में
डुबोता हमारा भीरु मन
एक दिन आ जाता है
आखिरकार उस पड़ाव पर
जब वह
विदा करता है अंतिम बार
इस नश्वर और रंगीन दुनिया को
जहाँ उसने आँखें खोली थी
कितने अरमानों की
पालकी पर सवार होकर
और जहाँ वह आँखें बंद कर रहा है
हमेशा हमेशा के लिए
अपने धँसे और मलिन बिस्तर पर से
जिसे उसके जाने के साथ ही
तत्काल उठाकर
बाहर फेंक दिया जाएगा घर में निर्धारित
उसकी चिर-परिचित जगह से

उठना पड़ता है आखिरकार
एक भरे पूरे शरीर और
अतृप्त रह गए एक मन को
संसार के इस रंगमंच से

दुनिया की रंगीनी
बदस्तूर जारी रहती है
आगे आनेवाले पात्रों के लिए
और शरीर की नश्वरता
जीत जाती है आखिरकार
अमरता की हमारी
दबी-छिपी शाश्वत आकांक्षा से।

तारीख़ों में क़ैद ज़िन्दगी

इन दिनों
मेरी उदास और हताश आँखें
उठ जाती हैं
कैलेण्डर की ओर
बार-बार
प्लास्टर-उखड़ी और मटमैली
हो चुकी दीवार पर
टँगा कैलेण्डर
क्या कुछ अन्दाज़
लगा पाता होगा
मेरी बेबसी और छटपटाहट का
तिथियों की गुहा-शृंखलाओं में
भटकते-फिरते
कभी खत्म न होनेवाले
मेरे इन्तज़ार का

कैलेण्डर भी कदाचित
फड़फड़ाकर रह
जाता होगा चुपचाप
अपने दर्जन भर पृष्ठों में
उलझा, बेबस
इस निर्रथक कोशिश में
कि आख़िर कैसे जल्दी से
ले आए वह
महीने की 30 या
फिर 31 तारीख़
जब मुझे मिल पाए
कुछ रुपए
मेरी पगार के
अत्यल्प ही सही
‘चटकल’ में
पटसन से भाँति-भाँति
की वस्तुएँ बनाता हूँ जूट की
मगर चटकल-मालिक
आखिर पगार देता ही है कितना
हम मज़दूरों को

मेरी ओर देखकर
कनखियों से
शामिल होकर मेरे दुःख में
समानुभूति दिखाता मुझसे
और अपने पृष्ठ-चित्रों से
मेरे मन-बहलाव की
विफल कोशिश करता
मेरे छोटे से कमरे की
पुरानी दीवार पर टँगा
वर्तमान वर्ष का
यह कैलेण्डर ही
एकमात्र ऐसा दृश्य-साधन है
जो मेरे ज़ेहन और
मेरे कमरे को
एक साथ
अपने तईं
(जितना ही सही)
नवीनता का
एहसास कराता है

मालिको !
कैलेण्डर
मगर
कोई जादूगर नहीं
जो अपनी
ख़ाली हथेली को
बन्द कर
कुछ देर
चन्द सिक्के बना दे
न उसकी जेब में
कोई ‘सरकार’ है
जो मेरे पसीने का
सही मोल तय कर सके
मगर फिर भी,
शाम को थका-मान्दा
घर आया मैं
मुमकिन है
कुछ देर के लिए
अपनी पत्नी या
अपने बच्चों की ओर
न देख पाऊँ
(निहारकर उनके चेहरे को
उनको अभाव की
ज़िन्दगी देने का दर्द
कुछ अधिक ही
सालता है मुझे)
मगर
देनदारियों के बोझ से
दबा मैं
पसीने में भीगे
अपने छीजे कपड़ों को
अपने शरीर से उतारते हुए
और निढाल होकर
गिरते हुए बिस्तर पर
(ज्यों कोई परकटा असहाय कबूतर)
मन ही मन
गुणा भाग करता
और हिसाब लगाता
अपनी वित्तीय सीमाओं का
जाने कितनी बार
देख चुका होता हूँ
कैलेण्डर को
इन पाँच-दस मिनटों में
इस बीच
पत्नी के हाथों दिया
पानी का गिलास
मेरी प्यास को
तृप्त कर देता है
मगर,
मेरे अन्दर की तपिश को
पानी की कोई धार
कितना कम कर सकती है
आखिरकार !
और फिर जल्द ही
मेरे होठों पर
मटमैली, सूखी पपड़ी
अपनी जगह
बना लेती है पूर्ववत

कैलेण्डर ही सच्चा गवाह है
मेरे अन्तहीन दर्द का
अनिद्रा और
सम्भावित किसी अनिष्ट से
चिन्तातुर मेरी
जागती रातों का
मगर जब
लेनदारों को अपने पैसे
समय पर नहीं मिलेंगे
तब क्या वे
मेरे साथ रात भर जागते
और फड़फड़ाते रहनेवाले
मेरे सहकक्ष
इस कैलेण्डर की गवाही को
स्वीकार करेंगे
कि मैंने कितनी ईमानदारी से
हिसाब-किताब लगाकर
तय-तिथि पर
अपनी देनदारी
चुकाने की
हरसम्भव कोशिश की थी,
बच्चों की सेहत से जुड़ी
कई अनिवार्य ज़रूरतों पर
कैंची भी चलाई थी
अनिच्छा से,
निर्ममतापूर्वक
मगर चन्द रुपयों को
महीने भर खींचकरा
किसी तरह घर चलाते हुए
देनदारी चुकाने की
मेरी जुगत की सीमा भी तो
अपनी जगह
कहीं-न-कहीं
मुझे बाँध ही देती है

कैलेण्डर !
दुनिया
तुम्हारी गवाही क्यों नहीं मानती !

मोक्ष धाम से गुजरते हुए

दिवंगतो,
मुझे माफ करो
मैं इस समय
गुलाबी नगरी के
बीचों-बीच स्थित
राज्य विधान सभा परिसर के
ठीक पार्श्व में स्थित
‘मोक्ष-धाम’ से होकर गुजर रहा हूँ
पैदल मार्च करता हुआ
सुनसान सड़क पर
रात्रि के सवा बारह बजे

लोकप्रचलित धारणा ऐसी है कि
इन रास्तों से होकर गुजरने को
खासकर देर रात में कुछ
इस संशय से देखा जाता है
कि जाने कब कौन सा अनिष्ट
हमारे आसन्न है!
जबकि आप लोगों में से कइयों
की अंतिम यात्रा में
मैं आया हूँ यहाँ तक
करुणापूरित अश्रु-कणों को
अपनी डबडबाती आँखों में भरकर

दिवंगतो,
जब तुम जीवित थे
और गुजरते होगे इस रास्ते से
संभव है
तुम भी ,
अपने ऐसे ही कुछ
मनोभावों के वशीभूत
अपना सफ़र ज़ारी
रखते होगे,
तुममें से कितनों को
यहाँ पर जलाया गया है
और खुद के दाह से पूर्व
तुममें से कितने लोग
अपने-अपने परिजनों को लेकर
यहाँ पहले भी आए होंगे कई बार
तुममें से भी बहुतेरे कदाचित
मेरे जैसे ही स्व-प्रेमी
और भीरु रहे होंगे
अपने जीवन में

दिवंगतो,
मुझे माफ करो
मैं अभी जीवित हूँ
और तुम्हारे बारे में यूँ
सोचता हुआ डर रहा हूँ
जबकि कायदे से तुम्हें लेकर
कुछ अच्छे ख्याल लाए
जा सकते थे
और अपनी इस यात्रा को
किसी और रूप में
बदला जा सकता था

दिवंगतो,
देर रात
इधर से गुजरते हुए
एक अपरिभाषित सा
डर सत्ताता है
जबकि मन को
बार-बार समझाता हूँ
कि आप सभी तो
हमारे स्वजन ही थे
फिर भय कैसा
मगर मन है कि
कोई तर्क स्वीकारता ही नहीं
यह क्या हो जाता है कि
जिनके साथ
हम कभी इतने आत्मीय थे
उनके ख्याल मात्र से
हम इस कदर
डरने लगते हैं!

सोच रहा हूँ
एक दिन जब मैं स्वयं
दिवंगत हो जाऊँगा
तो क्या
मेरे परवर्ती भी
मेरे ख्याल मात्र से
यूँ ही कतराएंगे
मेरे पूर्वज!
ज़रा बतलाना
मैं डरता हूँ
आप दिवंगतों से या
स्वयं के दिवंगत हो जाने से !!

जीवित रहते हुए
मौत के बारे में सोचना
जीवन को
अहंकारमुक्त और
लिप्सारहित
होकर जीना है
मगर मैं यहाँ
अपनी मौत की आशंका में
घिरे होने से अधिक
जीवन की लिप्सा में
पड़ा हुआ हूँ
तुम मृत जनों के
किसी खामख्याली
प्रेत के साए का
मेरे जीवन पर पड़नेवाले
बुरे प्रभाव की अतार्किकता
से घबरा रहा हूँ
जबकि मैं जानता हूँ
इससे ज़िंदगी और मौत
दोनों का ही अपमान
हो रहा है

दिवंगतो,
मैं चाहता हूँ
इतना निडर और निर्द्वन्द्व होना
कि बच सकूँ
ऐसी कायर प्रवृत्तियों से
मुझसे न हो सके
किसी का अपमान
और मैं न गिर पाऊँ
अपनी ही नज़रों में

दिवंगतो,
मुझे साहस दो इतना
कि मैं रात-बेरात किसी समय
निःशंक भाव से
आ-जा सकूँ कहीं भी
किसी अमराई में,
किसी श्मशान किनारे
या चल सकूँ
ऐसे किसी मोक्षधाम से होकर
और इनसे गुजरते हुए
रह सकूँ शांत, अविचलित
और कदाचित स्वीकार कर सकूँ
मृत्यु के सच को
पूर्वाग्रहमुक्त होकर
रहकर बाहर
स्व-प्रेम से
सच्चे मन से भी ।

यात्रा

किसी से मिलने या
किसी के यहाँ जाना
महज़ किसी टिकट के मिलने और
न मिलने पर ही निर्भर नहीं करता है
वह तो एक आवश्यक साधन ही है
अपनी खोह से
निकल बाहर आने के लिए
मगर इससे भी अधिक ज़रूरी है
व्यक्ति के अंदर
बाहर निकलने का उत्साह
अपने किसी प्रियजन को देखने और
उसके साथ वक़्त गुज़ारने
की विकलता
या फिर मन के भीतर
कहीं बहुत गहरे
किसी अनजान जगह को
लेकर सदियों से पनपा
कोई आदिम आकर्षण
जिसे देख लेने की उत्कंठा
अब दबाए दब न रही हो
और हाँ समय न निकाल पाने का भी
कुछ विशेष अर्थ नहीं है
क्योंकि व्यस्त रहना भी
आखिरकार एक बहाना ही है
किसी से भेंट कर लेने की गुंजाइश
बेशक थोड़े समय के लिए ही सही
कभी किसी समय
निकाली जा सकती है
हाँ, किसी को कम तो किसी को
ज़्यादा मशक्कत करने के उपरांत
देखा जाए अगर तो इसका संबंध
उम्र और स्वास्थ्य से भी नहीं है
क्योंकि बूढे और अशक्त लोग भी
कभी तीर्थाटन तो
कभी दूर बसे अपने बच्चों से
मिलने के लिए
जहाँ-जहाँ चले जाते हैं
उनकी तुलना में कई बार जवान लोग
ऐसा कोई क़दम नहीं उठा पाते
ऐसी हिम्मत नहीं कर पाते

यात्रा करना
अपने यथास्थितिवाद से विद्रोह है
किसी पर्वत की चढाई,
किसी चैनल को तैरकर पार करना,
किसी गुफा या सुरंग की यात्रा,
किसी क्रूज़ पर समय बिताना या
किसी टापू का रुख करना—
जितना रोमांचक
और हैरतअंगेज हो सकता है
उससे ज़रा भी कम रोचक नहीं होतीं
वे यात्राएं
जो अक्सरहाँ छोटी और स्थलीय होती हैं
और जिन्हें हम
कदाचित उल्लेखनीय भी नहीं समझते
मगर ग़ौर से देखिए तो…….
क्या कोई ऐसी एक भी यात्रा है
जो घटनाविहीन हो
व्यक्ति स्थावर हो चलायमान
उसके साथ कुछ-न-कुछ घटता ही रहता है
जब वह महज साँस ले रहा होता है
तब उसके शरीर के अंदर
सिर्फ उपापचय की क्रिया
नहीं हो रही होती
बल्कि उसका उसके परिवेश के साथ
एक विशेष प्रकार का समायोजन भी
चल रहा होता है
मनुष्य और प्रकृति के बीच
एक साहचर्य भी विकसित होता है
दोनों के बीच एक विनिमय-व्यापार भी
चालित होता है
एक-दूसरे की उपस्थिति में दोनों के साथ
कुछ-न-कुछ घट रहा होता है
देखा जाए तो जीव-मात्र का अस्तित्व ही
अपने-आप में घटना-बहुल है
कह सकते हैं कि
मनुष्य-मात्र का स्थानांतरण ही
अपने आप में कई कथा-सूत्रों का वाहक है
जिस तरह हमारे द्वारा गृहीत
हर अगली साँस
नई और अनोखी होती है
ठीक वैसे ही
चिर-परिचित स्थानों पर जाकर हर बार
कई नई घटनाएं घटती हैं
बार-बार देखी हुई चीजें भी
हमें हर बार नई दिखती हैं
कण-कण में,
दृश्य-दृश्य में रचे-बसे होते हैं
रहस्य तमाम तरह के,
प्रसंग किस्म-किस्म के
इसलिए ज़रूरी है घूमना हर दिशा में,
ज़रूरी है निकलना
बीच-बीच में चारदीवारी से
ज़रूरी है उठना
अपनी पुरानी, गुद्गुदी गद्दी से
हवा, तूफान और बारिश के थपेड़ों से
जूझना ज़रूरी है
विस्तृत आकाश तले
निर्द्वंद्व और निर्भय
विचरना ज़रूरी है
बंद कमरे की
शांत और थकी हवा के
बोझिल घूर्णन से
निकल बाहर आकर
यह देखना भी
कितना आह्लादकारी हो सकता है कि
मुक्त और स्वछंद हवा की चोट
हमारे शरीर के साथ कैसा संगीत रचती है
हमारा मज़ाक उड़ाती आने वाली
या बमुशिक्ल हमारी प्रशंसा में
दो-चार शब्द कहने में भी
हिचकिचा जाने वाली ज़ुबान
आजकल कौन सी भाषा बोल रही है
हमारे सामने जन्में और
बड़े हुए बच्चों का
इन दिनों कैसा रंग-ढंग है
गाँव से शहर आते हुए
रास्ते भर
जो हरे-भरे खेत मिला करते थे
उनमें से कितनों पर
कांक्रीट के जंगल उग आए हैं
और कितनों पर
उसकी तैयारी चल रही है

अंग्रेज़ों के ज़माने में तैयार हुए
और हमारे साथ ही बूढ़े होते
लकड़ी और लोहे के
पुराने, विशालकाय पुलों को
ट्रेन में बैठकर पार करने में मन
आज भी जाने
किन ख़्यालों में डूब जाता है…

सच, यात्रा में व्यक्ति
महज़ जगहों से कहाँ गुजरता है
बल्कि इतिहास के सीने में
कील की तरह धँसे
पुराने साम्राज्यों के
विभिन्न चिह्नों को भी
पार करता जाता है
यात्रा में वह अपने ही देश-समाज की
विभिन्न छवियों को स्वयं में
धारण करता है
वह उन्हें बार-बार देखता है
उनके अस्तित्व का हिस्सा बनता है
उनके बीच जाकर और
उनसे संस्कारित भी तो होता है

यात्रा के दौरान
व्यक्ति जगहों और लोगों से
ही नहीं मिलता
वह अपने आप से भी मिलता है
वह जिन लोगों के साथ रहता है
उनके नए रूपों से भी अवगत होता है

कहा जा सकता है कि
समय के तल को उत्खनित करता
यात्रा एक अनुसंधान है
जहाँ हम हमारे नए रूप से
हमारे परिवेश के अबतक अनछुए रहे
कुछ बिंदुओं से
और हमारे युग के अनबीते
कुछ काल-खंडों से मिलते हैं।

दिल्लगी 

सावन यूँ ही
दिल्लगी कर रहा था
………………..
लहलहाती फसल चौपट हो गई ।

कसती हथेली

हथेली
जो महसूस हो रही है तुम्हें
कन्धे पर अपने
कभी भी बन सकती है मुट्ठी
और कस सकती है
तुम्हारे गले के चारों ओर
…..
चौंको मत
उँगलियों के दबाव से
बदल जाती है दुनिया
प्रेम के शब्द
गढ़ लेते हैं परिभाषा
हिंसा की ।

पोले झुनझुने

यह जो कई बार तुम सबको
मेरे अंदर जो बड़बोलापन दिखता था
वह व्यवस्था के प्रति मेरे आक्रोश
की अभिव्यक्ति भी हो सकती है
यह कहाँ देखा तुमलोगों ने
तुम देखते भी तो कैसे
तुम तो अपनी आँखों से भी वही
देखते आए हो
जो तथाकथित तुम्हारे ‘देवता’
तुम्हें दिखाते आए हैं
तुम तो जन्म-जन्मांतर से मानों
जागती आँखों में
सम्मोहित और निस्तेज पड़े हो
आपको तो वही दिखता है न
जो आपको दिखाया जाता है
जिसे व्यवस्था ने विद्रोही करार दिया
आप तो उसके ऐसे निरे भक्त है कि
आपको वह विद्रोही के अलावा कुछ और
कैसे दिख सकता है!

व्यवस्था
हुँह
वही व्यवस्था
जिसने कोई एक चीज थमाकर
मुझसे मेरा बहुत कुछ ले लिया
वही व्यवस्था
जिसने मुझसे बार –बार कहा
यह जो एक झुनझुना
हमने तुम्हें पकड़ाया है
तुम उसे बजाते रहो और खुश रहो
खुश रहो कि इस व्यवस्था में तुम्हें
खुश रहने के मौके मिल रहे हैं
कि यह व्यवस्था
तुम्हें किसी व्यवस्थागत चुनौती से
निपटने के कैसे भी महत्त कार्य से
मुक्त रखी हुई है

मैं भी कुछ देर तक बहलता रहा
व्यवस्था के दिए इसे झुनझुने से
फिर जल्दी ही उसके पोले होने का
मुझे आभास हुआ और
मेरा मोहभंग हुआ
इस चमकती-दमकती व्यवस्था से
मैं चीख पड़ा
लेकिन मेरी चीख कहीं दब गई
उन हजारों-लाखों
झुनझुनों की आवाज में
जिसे मेरे ही जैसे कई लोगों ने
अपने-अपने हाथों में पकड़ रखा था
और जिन्हें करोड़ों हाथ
लगातार बजाए जा रहे थे
…………………………

यह व्यवस्था की चाल थी
जिसमें वह अरसे से
कामयाब होती चली जा रही थी
उसकी हरदम यही कोशिश रही है
अव्वल तो कोई उसके
झुनझुने के भीतर के
खोखलेपन को
समझ न सके और भूले से कोई
मुझ जैसा सरफिरा
इसे समझ भी ले तो
उसके आस-पास
एक ऐसा शोर रच दो कि
उसकी आवाज
उसके ही परिवेश में
उसके अपने ही लोगों के बीच
दबकर रह जाए
और फिर उसे एक दिन
उसके किए की समुचित सज़ा देकर
उसे जलावतन कर दो
लोग व्यवस्था की
हाँ में हाँ मिलाते रहें और कहें
बड़ा ढीठ था …..
व्यवस्था से लड़ने चला था
अरे उसकी तो यह हालत होनी ही थी
मौके की नज़ाकत समझे बगैर
कहीं भी शुरू हो जाता था
जाने क्या खाता था
हर समय ज़ोर-ज़ोर से बोलने की
उसकी आदत हो गई थी
पंचायत से लेकर प्रखंड तक
अनुमंडल से लेकर जिले तक
जाने कहाँ-कहाँ
उसके झगड़े चल रहे थे
वह आदमी नहीं था भाई
मेले का कोई भोंपू था
जो चीख-चीखकर कुर्सी पर
काबिज हर सत्तासीन को
कभी किसका
तो कभी किसका एजेंट
बताया करता था
बड़ा शोर करता था वह आदमी
जाने कहाँ से भेदिया खबरें
इकट्ठा करता था
और उन्हें परचे में
आकर्षक अंदाज़ में
लिख-लिखकर बाँटा करता था
सरकार भी भला कबतक बर्दाश्त करती
ऐसे सरफिरे को
…………………………..

थोड़ा देकर बहुत
कुछ अपने पास रख लेने की
व्यवस्था की इस अनंत काल से
चलती आई चालाकी पर से परदा नहीं
उठना चाहिए
इसलिए सरकारें
किसी पार्टी, पक्ष, पंथ और
विचारधारा की हों
वे जनकल्याणकारी
घोषणाएँ करती हैं,
सस्ते अनाज बेचती हैं,
चुनाव-पूर्व लोगों के घरों में
शराब पहुँचाती है,
टी.वी. सेट मुहैया कराती हैं
महिलाओं को साड़ियाँ और
लड़कियों को साइकिल बाँटती हैं
स्कूलों में पढ़ने आए नौनिहालों को
‘मिड-डे-मील’ देती हैं
फिर इस आपाधापी में
लोग एक-दूसरे से छीना-झपटी करें और
दूसरों के सिर पर
अपने पाँव दिए आगे बढ़ जाएं,
जहरीले शराब से मर जाएं या फिर
लोगों की रसोई में सड़े अनाज खुदबुदाए
और देश के भावी कर्णधारों के उदर में
विषाक्त भोजन जाए ….
क्या फर्क पड़ता है!
आज साड़ियाँ बाँटनेवाले हाथ
कल दुःशासन बन जाएँ
और किशोर लड़कियों के हाथों में
साइकिल पकड़ानेवाले चमकते हाथ
अपनी सत्ता को अनंत काल तक
सुरक्षित रखने की जुगत में
तरह-तरह के हथकंडों को अंजाम देते रहे
और मासूम किशोरियों की निर्मल हँसी का
चतुराई पूर्वक अपने पक्ष में सौदा करते रहें
क्या फर्क पड़ता है!

सचमुच व्यवस्था को इन सबसे
कोई फर्क नहीं पड़ता
उलटे व्यवस्था यह चाहती है कि
बीच-बीच में ऐसा कुछ होता रहे
जिससे कि उसके नुमाइंदे
घायलों को और मृतजनों
के परिवारों के लिए
फिर कुछ नई घोषनाएँ कर सके
अस्पतालों में कराहते लोगों के साथ
उनका सहानुभूतिपूर्ण चेहरा
अगले दिन के अखबारों में
पूरी देश-दुनिया देख सके
व्यवस्था के नियंता
आमफहम और भोली-भाली जनता को
ऐसे ही झुनझुने पकड़ाते रहेंगे
और इन झुनझुनों को पोला बतानेवाले लोग
देशद्रोही करार दिए जाएंगे
और ऐसे तो अपनी
सरहदों पर हर ऐरे-गैरे के आगे
बिला-वजह झुक जानेवाली सरकार
ऐसे देशद्रोहियों को
माकूल सजा दिलाने में
और उनसे निपटने में
बड़ी मुस्तैद और सख्त नज़र आएगी

व्यवस्था में आखिर किसी विद्रोही स्वर की
कब कोई जगह रही है
व्यवस्था शुरू से मिमिआते गलों को
पसंद करती आई है
उसे अपने आगे जुड़े हुए हाथ ही
रास आते रहे हैं
अपने घुटनों पर बैठे भावशून्य
एक जैसे चेहरे वाले लोगों को
देखने की ही उसकी आदत रही है

वह कैसे चाहेगी
इस जनता-जनार्दन के बीच से
कोई बागी स्वर उठे
कोई फौलादी हाथ हवा में लहराए
व्यवस्था आपको शिष्ट रहने के लिए कहती है
शिष्ट मतलब सब-कुछ चुपचाप सहो
और कुछ शिकायत हो तो
उचित माध्यम से करो
फिर चाहे वह माध्यम खुद कहीं न पहुँचता हो
यह क्या कम है कि
तुम्हारी शिकायतों के लिए
ऐसे माध्यम बनाए गए हैं
तुम्हें कोई हल मिले न मिले
तुम इन माध्यमों से इतर न जाओ
नहीं तो …..
तुम बड़बोले और बलवा करनेवाले
करार दिए जाओगे!
……………………..

दोस्तो, इस देश के
एक तथाकथित सुधारपरस्त जेल की
काल कोठरी में बंद मैं
अपने खरे-खोटे शब्दों को
सरेआम अभिव्यक्त करने की
सजा काट रहा हूँ
मगर मेरी
जिस साफ-साफ की जानेवाली
बयान-बाजी को
मेरे अपने मेरा बड़बोलापन और
मेरा सनकीपन कह गए
उनके हित में और लड़ने
और उनके लिए
बिला-वज़ह शहीद होने से
अच्छा है कि मैं आजीवन
इस कोठरी में बंद रहूँ
और एक दिन
किसी लावारिस सा मर जाऊँ
एक ऐसा लावारिस
जिसके होने और न होने से
किसी को कुछ फर्क न पड़ता हो
इसके बावजूद मेरी वह मौत
मुझे कुछ राहत देगी कि
मैंने कभी तो
एक पोले को पोला कहा था
और मरते वक्त मेरे कानों में
झुनझुने की तारीफ करनेवाले
मिमियाते स्वर नहीं गूँज रहे थे ।

नींद की तैयारी 

सैंकड़ों चेहरों से
अटी-पड़ी आँखों को
पानी से धोकर रिक्त किया है
साबुन से रगड़-रगड़ कर
चेहरे से दिनभर की
खीझ और ऊब को
बड़ी और महान
शख्सियतों के समक्ष
सुबह से लेकर शाम
तक की जानेवाली
अपनी मिमियाहट को और
उनके आगे अक्सरहाँ
शुरू हो जानेवाली
अपनी हकलाहट को
हटाया है
इस जीवन में कभी पूरा न हो
सकनेवाले अपने सपनों के
गर्द-गुबार को झाड़कर
अपने शरीर को हल्का किया है

नए-पुराने सारे मुखौटों को
एक किनारे कर बिस्तर में
धँस गया हूँ
………………………….
अब मुझे सो जाना चाहिए
एक उद्वेग-रहित नींद की
पूरी तैयारी
कर ली है मैंने।

नदी बेक़सूर थी मगर उससे क़सूर हुए — 1-17

एक

नदी
मेरी पीठ पर लदी थी
और मैं
नदी की गोद में
खड़ा था
…..
ऐसे ही
किसी ‘संगम’ पर
कोई ‘सरस्वती’
अदृश्य हुई होगी
अपने दुर्दम्य साहस से
लजाती ख़ुद भी ।

दो

नदी निर्वसन
निहारती थी
ख़ुद को
मेरी आँखों में
नदी
काँपती थी
अपने ही लावण्य से
मेरे होंठों के पाटों बीच

सारा शहर अनभिज्ञ था
वह नदी
मेरे अन्दर बहती थी ।

तीन

मेरे हिस्से की रेत को
मैं खड़ा था
जिस पर
उफ़नती नदी ने
ले लिया
अपने अंक में

नदी उतर रही थी
और मैं
अडोल खड़ा था
वह जँगल की नदी थी
चढ़ना-उतरना
उसकी मर्ज़ी थी ।

चार

नदी जो बोलती
मैं टाँक देता
कविता में उसे
नदी परेशान…
उसका शब्दकोश
सूख रहा था

कहा — ‘विदा’
एक दिन
नदी ने
तरेर कर अपनी आँखें
और मेरी उँगलियों से
चुम्बक की तरह चिपकी क़लम
छूट पड़ी सहसा
नदी खिलखिला पड़ी
दोनों किनारों से

नदी जीत गई थी
उसकी धार
लौट रही थी
और क़ायम हो रहा था
आत्मविश्वास
नए सिरे से
वह ख़ुश थी
और उसे
मनोरँजन दरकार था
….
नदी मचल रही थी
किसी नई कविता के लिए
और मैं निःशब्द था
डूबते सूरज की मानिन्द
और ख़ामोशी
किसी विदा-गीत के
अन्तिम शब्द से उठकर
फैल रही थी

आकाश के पश्चिमी छोर पर
गहन अन्धेरे में
विलीन हो जाने के लिए
आख़िरकार ।

पाँच

मेरे साथ
नदी
मेरे कमरे में आई
और बाक़ी छुटभैये सामानों समेत
लील गई
मेरे बिखरे पन्नों के ढेर को भी
अपनी तेज़ धार में

मेरा इतिहास
नदी
नए सिरे से
लिखना चाहती है ।

छह

नदी बहती है
यह सब देखते थे
नदी किस मोड़ मुड़ती है
यह कुछ जानते थे
नदी किसकी खोज में है
यह कोई नहीं जानता था
नदी उसे कब मिलेगी
यह नदी को भी मालूम न था ।

सात

हर पास आने वाले को
प्यासा समझती है
नदी पहली आहट में

नदी
चौंकती है
पुलकती है
जब उसकी जलराशि बीच
खड़ा हो कोई
अर्घ्य देता है
सूरज को
उसके ही अंश से
प्रार्थना करता है
मन्त्रपूरित होंठों से

अपने अस्तित्व
और अस्तित्व की तरलता पर
ठिठकती है नदी
अपनी भूमिका और भूमिका के देय पर
गर्वित होती है नदी

नदी का पानी
कुछ अधिक उजला
दिखता है ।

आठ

मेरी आँखों में
उतर आती है नदी
मैं अपनी हथेली को
आँखों से छुआ कर
उसे चुल्लू बना कर
होंठों तक लाता हूँ

मैं कोई सागर नहीं
मगर एक पूरी नदी
पी जाता हूँ ।

नौ

अँकुराया था
मेरा पुरुष
जिस दिन पहली बार
एक नदी उतरी थी
मेरे अन्दर उस दिन
पूरे वेग से अपने

दुनिया की
सारी नदियों से तेज़
बह रही है
वह नदी
मेरी कविता में
तभी से ।

दस

नदी दुआ करती थी
और वह कम पड़ता था मुझे
मैंने नदी को ताबीज़ बना
बाँध लिया
अपनी बाज़ू पर

क़ुरआन के वरक पर
आयत की तरह
बिछ गई नदी ।

ग्यारह

नदी को मैंने
एक कविता सुनाई
उस दिन

कविता में नदी थी
या नदी में कविता
जाने क्या था
नदी की आँखों से
एक और नदी
बहने लगी !

बारह

नदी मेरी थी
और सबकी थी

मैं नदी का था
और किसी का न था ।

तेरह

रच रहा हूँ मैं कविता
नदी पर
पुरुषार्थ और समर्पण के साथ
और शहर के दूसरे हिस्से में
दूर मुझसे
किसी और के पथ में
बह रही होगी नदी
अपनी बाँहें फैलाए

कवि की सीमा कह लो
या इसे मर्यादा नाम दो
कविता तक ही ला सकता है
वह नदी को
और शायद तभी
नदी बन पाती है

कविता भी ।

चौदह

पाल रखे थे
कई जलचर
नदी ने
सार्थक सिद्ध करने के लिए
ख़ुद को
समय गुज़ारने के लिए अपना

साथ होता
कोई न कोई
तब भी
जब नदी
बहती दिखती अकेली ।

पन्द्रह

शहर की
अनन्त दीवारों के पीछे
ऐसी ही किसी गली में
(भटक रहा हूँ
जिसमें मैं इस समय)
नदी
बह रही होगी
अपने वेग से
पालन करती
अपनी दिनचर्या का
निष्ठापूर्वक
अनजान
मेरी किसी तृष्णा से

जब सारी गलियाँ

एक सी हैं
तो फिर
इतनी गलियाँ क्यों हैं
शहर में
कि कोई चाहे तो
नहीं ढूँढ़ सकता
एक नदी
लाख कोशिशों के बाद भी ।

सोलह

दिन भर के
तामझाम के बाद
गहराती शाम में
निकल बाहर
अन्दर की भीड़ से
चला आता हूँ
खुली छत पर
थोड़ी हवा
थोड़ा आकाश
और थोड़ा एकान्त
पाने के लिए
निढाल मन
एक भारी-भरकम वज़ूद को
भारहीन कर
खो जाता है

जाने किस शून्य में
अन्तरिक्ष के
कि वायु के उस स्पन्दित गोले में
साफ़-साफ़ महसूस की जाने वाली
कोई ठोस
रासायनिक प्रतिक्रिया होती है
और अलस आँखों की
कोर से
बहने लगती है
एक नदी
ख़ामोशी से
डूबती-उतराती
करुणा में
देर तलक

भला हो अन्धेरे का
कि बचा लेता है

एक पुरुष के स्याह रुदन को
प्रकट उपहास से
समाज के ।

सत्रह

नदी बेक़सूर थी
मगर उसका क़सूर
यह था कि
वह बहते-बहते
मेरे पास चली आई थी

नदी बेक़सूर थी
मगर उसका क़सूर
यह था कि
वह अब
आगे बहना नहीं चाहती थी

नदी बेक़सूर थी
मगर उससे क़सूर हुए ।

नदी की नियति मुझसे नहीं रास्ते से जुड़ी थी — 18-34

अट्ठारह

नदी का मिलना
रास्ते का
एक सुखद संयोग था

नदी का सानिध्य
रास्ते का
घना कोई साया था

नदी का बिछोह
रास्ते का मानो
एक निष्ठुर चरित्र था

नदी की नियति
मुझसे नहीं
रास्ते से जुड़ी थी ।

उन्नीस

एक खोलकर
दस राज़
फैला देती थी नदी
अपनी अखरोट आँखों से
मेरी गट्ठेदार हथेली पर
दवा की पुड़ियों की तरह
किसी पर
कोई नाम
लिखा न होता
और सभी पुड़ियाएँ
एक जैसी होतीं

मैं हैरान हाथों से
उन्हें उलटता-पलटता
और उजबक-सा देखता

नदी की आँखों में

किसी मँजे हक़ीम की मानिन्द
नदी हँस पड़ती
मेरी उत्सुक अधीरता पर
किस वक़्त
कौन सी पुड़िया खोलनी है
नदी जानती थी ।

बीस

नदी उदास नहीं थी
जैसा दिखता था
लोगों को
नदी
ख़ुश नहीं थी
जैसा मानता था मैं

नदी ने
दरअसल जी थी
एक मुकम्मल उम्र
बह चुके थे जिसमें
दुःख-सुख
सब-के-सब ।

इक्कीस

मैं ग़ाली बकता
नदी की बीहड़ और अपरिहार्य
उपस्थिति को
कोसता
उसके विध्वंसक उफ़ान को

बाढ़ के चढ़ते दिनों में
समग्र दिशाओं में
सिर्फ़ नदी और नदी दिखती
मेरे तमतमाते
चेहरे को अँगूठा दिखाती ।

बाईस

नदी विस्मित थी
यह कैसा पुरुष है

एक क़दम नहीं बढ़ाता
मेरी लहरदार करवटों की तरफ़
अँकबद्ध नहीं करता
सर्पीली देह को
मेरे आमन्त्रण की घरघराहट पर

भर नहीं देता
ख़ाली विस्तार को
मेरी रेतीली तृष्णा की
चमकती गोचरता में

नदी विस्मित थी

इस पुरुष से
क्यों चाह रही हूँ
मैं यह सब !

तेईस

नदी से
मेरा रिश्ता क्या है
मैं नहीं जानता

नदी मुझे
अच्छी क्यों लगती है
मैं नहीं जानता

नदी मुझे
याद क्यों आई है इतना
मैं नहीं जानता

नदी पूछती है
यह सब
और मैं नहीं जानता

वह क्यों पूछ रही है !

चौबीस

नदी के तल में
अनन्त शब्द-मछलियाँ थीं
मगर
आ पाती थीं
कुछ ही सतह पर
पल-दो-पल के लिए
असह्य हो जाती
अकुलाहट जब
घिरे रह कर
जल की दीवारों में

शब्दों को परवाह थी
नदी की
और वे जानते थे
कि उनके नाद ही से

नदी का बहना है
यह एहसास
तरँगित कर देता उन्हें
और वे
अपने फेफड़ों को
भर लेना चाहते
ताज़े ऑक्सीजन से
बाहर निकाल कर
अपने-अपने सिर
एक उचक्के की तरह
हैरान नदी
हँस भर देती
उनके कौतुक पर

किनारे बैठ कर
ठण्डी रेत पर
मैं निहारा करता घण्टों

नटी वाचाल मछलियों को
और मुझे आश्चर्य होता
समय की तेज़ फिसलन पर
नदी की अलसायी भाषा पर
भाषा के घनीभूत शब्दों पर
और शब्दों के
तरल, रहस्यमय, अन्तहीन आशय पर ।

पच्चीस

मैं
भटक रहा था
अपनी धुन में
पैरों के नीचे बजते
उदग्र कँकड़ों और
अलसाई रेतों के
कुरमुरे, गीले सँगीत से
अनसुना, बेपरवाह

मैं भटक रहा था
आँखें समेटे
आसपास के
विलासमय सौन्दर्य से
एक सख़्त और उदास
चेहरा लगाए

किसी आमन्त्रण-उत्सव पर
प्रतिक्रियाविहीन

मैं भटक रहा था
तब भी
जब मेरे पैरों के नीचे
एक नदी सदानीरा बह रही थी
शीतल जल का तत्पर भण्डार लिए ।

छब्बीस

नदियाँ हैं
कितनी सारी
क़िताबों में
भूगोल की
गहरी, लम्बी
एक से बढ़कर एक

क्यों होता है
मगर ऐसा
कि कोई एक नदी
भा जाती है
हमें इस क़दर
कि अँट नहीं पाती वह
क़िताब के पन्नों में

एक चौखटे में क़ैद
जँचती नहीं है
हमारी आँखों को
और हम
किंचित न्याय करने के लिए
उसके आकार के साथ
ले आते हैं
अपने कमरे में एक मानचित्र
बड़ा जितना मिल सकता है
टाँग देते हैं सिरहाने
अपने बिस्तर के
और फेरते हैं उँगलियाँ
नदी की
टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं पर
मानचित्र में

क्योंकर हो जाता है ऐसा

कि एक नदी
उतर कर
मानचित्र से
पसर आती है
हमारे बाज़ू में ।

सत्ताईस

नदी और मेरे बीच
कोई तीसरा उपस्थित न होता
तब भी
जब नदी बह रही होती
अपने पथ पर
लोककल्याण में
और मैं
अनुवाद कर रहा होता
उसकी लहरदार ध्वनि का
लोकरँजन में
लोकतत्व होकर भी
सुरक्षित बचा लेते दोनों
अपनी ज़िन्दगी की निजता
लोकनज़रों से

कोई तीसरा
उपस्थित न होता
मेरे और नदी बीच
समूह में
एकान्त में
कभी भी ।

अट्ठाईस

मैं टूटता हूँ
निरन्तरता में
अपनी ज़िद की
आत्मदीनता में
अपने शीघ्र समर्पण की

मैं टूटता हूँ
स्याह अन्धेरे में
असफलता के
एकाकी उपलब्धि में
सफलता की

मैं
याद करता हूँ तब
नदी को

और टूटता हूँ
अपरिहार्य अनुपस्थिति में भी
नदी की ।

उनतीस

लापरवाही से बताया
नदी ने
अपना जन्मदिन
उस दिन
चलताऊ अन्दाज़ में
मैंने मुबारक़बाद दिया उसे

फिर यह
क्योंकर हुआ
कि नदी का जन्मदिन
मेरा काव्योत्सव बन गया !

तीस

बाँट नहीं सकती है
नदी मेरा अकेलापन
हर नहीं सकती है
मेरी थकान

पोंछ नहीं सकता मैं
नदी के आँसू
भर नहीं सकता
उसकी उदासी
अपनी अँजुरी में

मगर मैं
नदी के लिए
और नदी मेरे लिए
नहीं हैं अनुपयोगी

फिर भी ।

इकतीस

एक वटवृक्ष विशाल
उख़ड़ गया था
अपनी जड़ से
मगर नदी के सम्मुख
शान्त, अविचलित खड़ा था
(जैसे कुछ हुआ ही न हो)

तूफ़ान ने
नदी पर
बरपाया था जो कहर
क्षत-विक्षत उसमें
डाल-डाल घायल
दिखाता भी
तो क्या दिखाता
वह नदी को !

धैर्य और आस्था का
यह कैसा दावानल था
जल चुका था जिसमें
शिखर
सपना और विस्तार
एक आकाँक्षा-वृक्ष का

और नदी
अनजान थी
प्रलयकारी भूमिका से अपनी
जिसमें एक आकार
सम्भावनायुक्त होकर भी
चूक गया था
महाकार बनने से ।

बत्तीस

ख़ूब छेड़ा मैंने नदी को
और नदी भी
अव्यक्त कहाँ रही

सम्वाद
अधिकार
और सहज प्रवाह की
सीधी, गोचर रेखा
फिर क्यों नहीं बनी
मेरे और नदी बीच ।

तैंतीस

अपनी छवि की
बेहद परवाह करती
आत्मसजग नदी के
मामूली और रोज़मर्रा के
दुःख-सुख भी
नहीं थे सार्वजनिक
प्रेम तो ख़ैर
माँग ही करता है
गोपनता की

पोर-पोर
सराबोर
रस-धारा में
नदी का एक किनारा
सँकेत तक

न मिलने देता
दूसरे किनारे को
अपनी तरँगित मदनोत्सव का
ज़रा भी ।

चौंतीस

एक पल की सँगति है
नदी
सदी भर की
स्मृति है ।

नदी इतना ख़ामोश क्यों बहती है — 35-51

पैंतीस

वह आएगा
नदी के तट पर
और मुख़ातिब नहीं होगी
नदी उसकी तरफ़
हवाला नहीं देगा वह
ताज़ा, नम स्मृतियों का
और रुककर कुछ देर
भटककर
इधर-उधर
चला जाएगा वह
किसी अन्धेरे में
कोई मोड़ मुड़ता
पराजित, थका-माँदा

नदी तब

घुटनों में सिर दिए अपना
रोएगी निःशब्द
और वह घिसटता
नदी का रुदन-राग सुनता
सम्भाल सकेगा
अपने लड़खड़ाते क़दमों को
किसी तरह
गीले इतिहास के तपते
अनन्त बालूका-पथ पर ।

छत्तीस

किन्हीं एक जोड़ी
ज्योति-सीपियों में
मेरा प्रतिबिम्ब होगा
सम्पूर्ण मेरा
सिर्फ़ मेरा प्रतिबिम्ब

ढूँढ़ने के लिए
उस नेत्र-युग्म को
मैं जाने
कितनी नदियों को
मथ चुका हूँ
डूब चुका हूँ
कितनी नदियों में
अब तक ।

सैंतीस

नदी
अलसाई पड़ी थे
रेत पर
मैं उसके पास गया
वह उठ कर बैठी नहीं
बस, थोड़ा सरककर
जगह बनाई
मेरे बैठने भर

सदियाँ गुज़र गईं
बैठे हुए इस मुद्रा में
नदी का आलस्य बड़ा है
या मेरा ही धैर्य
कुछ अधिक है ।

अड़तीस

नदी ने
अपने ऊपर
एक पुल बना लिया था
लोग उसपर से गुज़रते
और वह
उनकी परछाईंयाँ
ख़ुद में लेकर
उन्हें गिनकर
बहला लेती मन अपना

वह एक नदी थी
मगर उसे
अपने जल से छेड़-छाड़
मँज़ूर नहीं थी क़तई

वह शुष्क तो नहीं
मगर एक शोख़ नदी थी

अपनी शर्तों पर
नदी चाहती थी
दूसरों का प्यार
उसे अपनी सम्पदा के
आकर्षण पर
अटूट भरोसा था
एक-एक कर लोगों ने
उस पुल से
गुज़रना बन्द कर दिया

नदी बहुत बाद में समझी
अपने अभिमान के
ख़ालीपन को
प्रेम के भ्रम को

अनन्त मृगतृष्णा में
सूखती कोमलता को
और अनछुए धरोहर के
छीजते सत्य को

नदी सूख चुकी थी
और पुल वीरान था
किसी आवाजाही से
निस्पन्द ।

उनतालीस

मैं कोई जटाधारी नहीं
फिर
एक गहरी, लम्बी नदी को
क़ैद करने की
यह कैसी अमर्यादित
वैतालिक असम्भव चाह है ।

चालीस

एक दृष्टि-भ्रम
हृद्य-व्याधि
आत्मविस्मृति है नदी

नदी मगर
एक दिशा-सूचक
लेपन-औषधि और
सजग इतिहास भी तो है ।

इकतालीस

नदी एक देह है
कोई खिलौना नहीं

नदी एक रहस्य है
कोई काला जादू नहीं

नदी एक विरासत है
कोई सम्पत्ति नहीं

नदी एक प्रेरणा है
कोई शर्त नहीं

नदी एक आकर्षण है
कोई कौतुक नहीं

नदी एक विस्तार है
कोई बन्धन नहीं

नदी एक स्त्री है
कोई मादा नहीं ।

बयालीस

रत्नगर्भा नदी के
मन्थन से
निकलता है
विष भी
नदी को गहरे
जीने / अपनाने के लिए
ज़रूरी है
नीलकण्ठ होना भी ।

तैंतालीस

लिखी जा सकती है
एक अनन्त काव्य-शृँखला
नदी पर
अगर अनन्त समय हो
कवि के पास
अनन्त ऊर्जा हो
स्वतः स्फूर्त जीवन में
और अनन्त साथ हो
नदी का शब्द से

नदी पर
तब लिखी जा सकती है
एक काव्य-शृँखला
कभी भी
किसी के हाथों ।

चवालीस

मेरी उम्र है
नदी
मेरा चरम है

मेरी स्मृति है
नदी
मेरा दायरा है

मेरी जीवन-रेखा है
नदी
मेरा पथ है

मैं हूँ
क्योंकि नदी है ।

पैंतालीस

बस में
सहेली से बतियाती
चहकती लड़की की
धुली पीठ
हँस रही थी
और झीने कपड़े से
बाहर आती
उसकी रीढ़
चिहुँक रही थी
सँगत देती हुई
चमकते दाँतों की भरपूर

हुलसती नदी की
आभा सारी
एकत्रित हो गई थी

ग्रीवा से कटि तक जाती
उस पतली पगडण्डी पर

मैं गणित लगा रहा था
उसके चेहरे पर अभी
निर्दोषता और खिलखिलाहट के
कितने-कितने प्रतिशत होंगे

किसी कोण
किसी दिशा से देखो
पूरी दिखती है नदी ।

छियालीस

इतिहास में वर्णित
परम्परा-गर्वित
देवलोक से उतरी
पृथ्वी का उद्धार करती
पवित्र कोई नदी
मुझे नहीं चाहिए

पवित्र आँचल
अक्सरहाँ
निर्मम और सशँकित
होते हैं
किसी भटकाव को
ठौर देने में अक्षम
शिथिल पैरों ने
बताई है मुझे

अपनी कहानी
हर पथ की
वृतान्त समेत

मेरा भागीरथ
उतार लाएगा
एक बदनाम
मगर विश्रान्तक नदी
मेरे अन्दर
मेरी तृष्णा के लिए
मुझे भरोसा है ।

सैंतालीस

क़ैद है
वक़्त के गर्भ में
जाने कितनी और नदियाँ
गुज़रेंगी जो मेरे क़रीब से
मुझे बहाती हुई
अपने साथ
तलछट पर पटककर
आगे बढ़ती हुई
पूर्ववत्
इतिहास दुहराती
पिछली नदियों का ।

अड़तालीस

वह नदी
जिसका जल
सर्वाधिक मीठा था
और जिए
अँजुरी भर ग्रहण करने निमित्त
मैंने दुनिया की
सारी नदियों के
प्रगल्भ आमंत्रण को
तब ठुकरा दिया था
जब मेरी तृष्णा का चरम
रेगिस्तान के टीले में
सूखी टहनियों-सा
टूट रहा था

सच पूछो

तो उस नदी का
कहीं अस्तित्व ही नहीं था
और मैं परिचित था
इस सच से
उस वक़्त भी ।

उनचास

नदी
हँस रही थी
सिखाया गया था उसे
हँस कर जीता जा सकता है
मैदान जितना चाहो

नदी ने
हासिल कर ली थी
एक बहुत बड़ी दुनिया
हँसकर
पसरकर
बिखरकर
मगर अब वह
नहीं रही थी
एक नदी ।

पचास

मुझे किनारे पर लगे
बोर्ड नहीं पढ़ने
नहीं पालन करना
सुरक्षा का
एक भी निर्देश
उतरना चाहता हूँ गहरे
नदी में
बिना किसी पूर्व-तैयारी के
शुभ-अशुभ परिणाम की
चिन्ता से परे

मैं चाहता हूँ
नदी भी न रोके
ऐसा करने से मुझे ।

इक्यावन

एक-तिहाई से अधिक उम्र
जी चुकी थी
नदी
जिस बरस मैं आया

मै हँसाता
नदी को
और वह
ख़ुश हो
करने लगती हिसाब
अपनी क्षीण
उँगलियों पर
बीते हुए गुरुतर समय का

नदी
उदास हो जाती

वक़्त
ईश्वर और नदी से
मैं किंचित
असम्भव ज़िद करता
नदी के पास
बैठे रहने की
अगले दो-तिहाई
समय तक

वक़्त और ईश्वर की वही जाने
नदी खिलखिला पड़ती
मेरे इस हठ पर
अपनी पूरी देह से
बलखाती हुई भरपूर
और चुप हो जाती
एकदम से
अगले पल

अबोला कोई
दर्द छिपाए
सदियों का

नदी इतना
ख़ामोश क्यों बहती है !?

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