अर्पित ‘अदब’ की रचनाएँ

वेदना के गीत पूरे हो रहे हैं

वेदना के गीत पूरे हो रहे हैं लग रहा है सुर सजाने आओगे तुम,
या कभी दो बात कहने तो नहीं पर कुछ नहीं तो मुस्कुराने आओगे तुम

मैं नहीं हूँ तुम नहीं हो तो यहाँ फिर आज किसकी आँख का जल में विलय है,
रो दिए हैं कुछ पुराने पत्र यानी ये हमारे प्रेम का अंतिम समय है
इस विरह की भी घड़ी में सोचता हूँ क्या मिलन के गीत गाने आओगे तुम
वेदना के गीत पूरे हो रहे हैं लग रहा है सुर सजाने आओगे तुम

ये ज़माने को पता है दूर हो पर ये किसे आभास है के तुम यहीं हो,
सिर्फ उतना याद है के मैं कहाँ हूँ और इतना याद है के तुम नहीं हो
ये बताओ तो सही मेरे नहीं पर गीत अपने गुनगुनाने आओगे तुम?
वेदना के गीत पूरे हो रहे हैं लग रहा है सुर सजाने आओगे तुम

तुम्हारे आने भर से

कुछ अपनों कुछ सपनों के मुस्काने भर से हैं
कितने सारे प्रश्न तुम्हारे आने भर से हैं

तुम आयीं तो होंठों ने खुशियों का गाल छुआ
तुम आयीं तो बातों ही बातों में हुई दुआ
तुम आयीं तो बारिश के पानी में गंध उठी
तुम आयीं तो कलियों का फूलों में बदल हुआ
तुम आयीं तो लगता है जैसे की मन के भय
मिलने की उत्सुकता में खो जाने भर से हैं
कितने सारे प्रश्न तुम्हारे आने भर से हैं

अपने पीछे दोहराने को यादें और करो
कुछ पल को आये हो मुझ से बातें और करो
आंखें गीली हो आयी हैं इन्द्रदेव सुन लो
अब के सावन में तुम भी बरसातें और करो
तुम बेहतर कर आयी हो अपने सारे मौसम
हम अपनी ऋतुओं को ये समझाने भर से हैं
कितने सारे प्रश्न तुम्हारे आने भर से हैं

ऐसे पानी के भीतर आंखों का रूप दिखा
तुम से मिलकर जैसे कोई खोया चांद मिला
जैसे उठकर गीतों के सब राजकुमार कहें
मन की पीड़ा पर अब के एक अच्छा गीत लिखा
हम ने भी पूछा है हम से तुम भी तो पूछो
इतने खुश क्या पीड़ाओं को पाने भर से हैं
कितने सारे प्रश्न तुम्हारे आने भर से हैं

जीत ओढ़े घर गए हैं

प्रेम में साक्षात मोहन
क्रोध में जैसे महेसर
जिनके आगे मृत्यु हारी
उनको कैसा कौन सा डर
वो की जिनकी वीरता से
दुश्मनों के सर गए हैं,
जीत ओढ़े घर गए हैं

कैसे कैसे युद्ध जीते
अनगिनत बिगड़े सुधारे
आज धरती के ये बेटे
बन गए नभ के सहारे
और लम्बी दूर राहों
के ये पैदल हैं मुसाफिर
तीव्र वायु से समय को भी
ये पीछे कर गए हैं,
जीत ओढ़े घर गए हैं

द्वार को थामे खड़ी है
वो की जिसका मीत छूटा
माँ के जिसके आंसुओं संग
प्रार्थना का गीत फूटा
और रिश्ते भाई बहनें
राह बैठे ताकते हैं
आज सन्नाटे से लिपटी
आहटों से डर गए हैं,
जीत ओढ़े घर गए हैं

मुक्तक 

तुम सा आकुल हम सा बेकल दुनिया में क्या है कोई
उसकी ज़ुल्फ़ों जैसा बादल दुनिया में क्या है कोई
अपनी-अपनी सब की हस्ती अपना-अपना सूनापन
तुम सा घायल हम सा पागल दुनिया में क्या है कोई

जिसे हो स्वर्ग की इच्छा वो चारों धाम तक जाए
बिरज में श्याम से लेकर अवध में राम तक जाए
हमें तो बस तमन्ना है की इस संसार का प्राणी
तुम्हारे नाम से होकर हमारे नाम तक जाए

इतने वर्षों में जो कुछ भी बीत गया वो आना है
तुम से वापस नही मिलेंगें ऐसा भी कब ठाना है
सारी दुनिया रूठी हम से हम दुनिया से रूठे हैं
तुम से भी रूठे हैं लेकिन ये हम ने अब माना है

जानबूझकर कह लो या फिर समझो की नादानी में
या रिश्तों की कहासुनी में रस्मों की मनमानी में
मैं भी कब से हाथ घुमाए फ़ेंक रहा हूँ इधर उधर
कब से ढूंढ रही हो तुम भी वही अंगूठी पानी मे

न तो उसके रहे खुद को भी हासिल हो नही पाये
वही किस्से वही वादे जो कामिल हो नही पाये
तुम्हें पाने की कोशिश में हुए तुम से मगर फिर हम
कई बरसों तलक खुद में ही शामिल हो नही पाये

फिर से रिश्ते जोड़ रहे हैं फिर से तेज उजाला है
शर्तों वाला हिस्सा अब की उसकी ओर उछाला है
दुनिया देख रही है मुझको हंसता गाता आज मगर
तुम ये देख रही हो मैंने कितना दर्द संभाला है

तुम्हारे खूबसूरत जिस्म के जितना नही समझा
मोहब्बत को अभी हम ने मगर इतना नही समझा
इसी बेकस इसी बेबस जमाने की तरह तुम ने
हमें बेशक बहुत समझा मगर उतना नही समझा

जब घर में तू ही न हो फिर किस मतलब का ये घर है
इन आँखों में सिर्फ मोहब्बत का धुंधला सा मंज़र है
और किसी से नही शिकायत खुद को खुद से शिकवा है
हर शख्स मुझे वो छोड़ गया जो तुझ सा मेरे अंदर है

कुछ टूटी कस्मों की यादें यादों का नज़राना है
उन भीगी आंखों से होकर इन आंखों तक आना है
जितने चेहरे उतनी बातें जितनी खुशियाँ उतने गम
बाहों में जीते आये थे आहों में मर जाना है

कहीं कहीं पर चुप रहते हैं कहीं कहीं कह जाते हैं
तुम से तुम तक सीमित है जो खोते हैं जो पाते हैं
नए मोड़ पर आज भूल से मिले तो बरसों बाद वही
नए पुराने शिकवे हैं और मैं हूँ तुम हो बाते हैं

कब आओगे

मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।

जिस दिन दूरी मुझ से तुम को खल जाएगी
दूरी नज़दीकी के हाथों ढल जाएगी
ढल जाएगी उम्र विरह के गानों वाली
और मिलन की माटी तन पर मल जाएगी
मेरी बात सुनाने वाले कब आओगे।
अपनी बात छुपाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

जिस दिन पहली बारिश मन का ताप हरेगी
ताप हरेगी और प्रीत का घाट भरेगी
घाट भरेगी याद तुम्हारी लाने वाला
और तुम्हारी बात हमारे साथ करेगी
ऊंचे जात घराने वाले कब आओगे।
नीचे नाम सुझाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

जिस दिन माँ के हाथ डायरी लगी तुम्हारी
हर पन्ने पर झलक किसी की मिली उतारी
मिली उतारी ज्यों मूरत जैसी वो सूरत
त्यों समझो मूरत मंदिर से गयी निकारी
हँसकर गीत सुनाने वाले कब आओगे।
रोकर गीत मिटाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

किसी बहाने दिन भर तेरा नाम सुनेगी
जाग जागकर आंख भिगोये रात गिनेगी
रात गिनेगी दिन भर धूप सेंकने वाली
धूप सेंककर फिर स्वेटर में शाम बुनेगी
मुझे देख शर्माने वाले कब आओगे।
देख देख हर्षाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

चाँदनी सी हो गयी

चाँदनी सी हो गयी हो रात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

नींद आंखों से बराबर खो रही हो
झूठ यह एहसास देकर सो रही हो
मेघदूतों से विरह का हाल पाकर
यक्ष की उन्मत्त अलका हो रही हो
दूरियों से पा गयीं आघात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

रात भर दोहराओगी झूठी कहानी
रात भर समझाओगी सच्ची कहानी
रोज़ की तरह ही लेकिन कल सुबह फिर
ख़त्म करना चाहोगी मीठी कहानी
दे रही हो आप ही को मात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

जो तुम्हारी ख्वाहिशों का था सहारा
खो गया ख़ुद में तुम्हारा पा सहारा
मृत्यु के देकर बहाने जानती हो
पा रही हो और जीने का सहारा
और स्याही चाहती हो रात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

है बहुत आसान रिश्ता तोड़ आना
राह में इक और रस्ता जोड़ आना
दूर तक तो साथ आने से रहीं तुम
द्वार तक ही आज मुझ को छोड़ आना
दे रही हो प्यार की सौगात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

लाडो! ऐसे गीत सुनाओ 

गीत हों कैसे पूछ रही हो
तो फिर सुन लो बिल्कुल वैसे
अतिश्योक्ति अलंकार से
कालिदास की उपमा जैसे
जिन को गाकर लाज ओढ़कर
मेरे काँधे पर सो जाओ
लाडो! ऐसे गीत सुनाओ

प्रेम निमंत्रण ठुकराए से
रात रात भर अकुलाए से
और तुम्हारे आलिंगन पर
थोड़े थोड़े शरमाए से
ऐसे शब्द गढ़ो तुम जैसे
अधरों पर लालिमा चढ़ाओ
लाडो!ऐसे गीत सुनाओ

बाहर बाहर मुस्काई हो
भीतर से पर भर आई हो
मैं ही केवल यहाँ उपस्थित
किस से जाने घबराई हो ?
ऐसा कर लो बाहें भर लो
और प्रेम के दीप जलाओ
लाडो!ऐसे गीत सुनाओ

तुम में वासे तन-मन मेरा
तुम से है आकर्षण मेरा
हँसकर बोल द्वारिका तेरी
कह दे वृन्दावन है मेरा
अच्छा लाडो यही सही पर
कुछ तो बरसाने का गाओ
लाडो!अब तो गीत सुनाओ
लाडो!तुम भी गीत सुनाओ

मैं रोया था 

मैं रोया था

द्वारे पर संदेशा आया
बरसाने से इक लड़की का
काम अधूरा छोड़ दिया फिर
मैंने उस दिन जो कुछ भी था
एक लिफाफा जिस के अंदर
मिला निमंत्रण था मिलने का
या तो खिलकर मुरझाने का
या फिर मुरझाकर खिलने का
उसी रोज़ हाँ शाम को पहली बार
मैं घंटों तक सोया था
मैं रोया था

नीली वाली शर्ट जचेगी
या फिर पीला कुर्ता पहनूँ
मन में उस की बातें रुक रुक
खुद ही अपने आप से कह लूँ
कब से उलझन काट रही है
उस को मिलकर क्या देना है
भाभी से बिंदी लेनी है
स्टेशन से सुरमा लेना है
रस्ते से जो पसंद उसे है
वही मिठाई ले जाऊँगा
जो कुछ मन में सोच रखा है
क्या मिलकर भी कह पाउँगा
लगता है कि मिल जाएगा
जो कुछ भी अब तक खोया था
मैं रोया था !

रोज़ तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं 

हम से अधिक मौन रातों में
शोर मचाते सन्नाटों में
तुम तक जाती राहों को बस
रोती आँखों से तकते हैं
रोज तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं.

रोज ग़मों का ताना-बाना
रोज दर्द की नई निशानी
रोज रात को रोज रात से
हम ने सीखी रात निभानी
ऐसा नही ख्याल नही है
तुम को लेकिन कम लिखते हैं,
रोज तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं.

रोज़ प्रेम की उम्र बढ़ेगी
और घटेंगें साल हमारे
यहाँ हमारे अधर जलेँगेँ
वहां जलेँगेँ गाल तुम्हारे
कुछ-कुछ जीवित अपनापन है
कुछ-कुछ तुम से भी दिखते हैं
रोज तुम्हारे ख़त पढ़ते हैं

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