‘अर्श’ सिद्दीक़ी की रचनाएँ

बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का

बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का अंदाज़ा लगा
महमिल-ए-दिल से निकल सर को हवा ताज़ा लगा

देख रह जाए न तू ख़्वाहिश के गुम्बद में असीर
घर बनाता है तो सब से पहले दरवाज़ा लगा

हाँ समंदर में उतर लेकिन उभरने की भी सोच
डूबने से पहले गहराई का अंदाज़ा लगा

हर तरफ़ से आएगा तेरी सदाओं का जवाब
चुप के चंगुल से निकल और एक आवाज़ा लगा

सर उठा कर चलने की अब याद भी बाक़ी नहीं
मेरे झुकने से मेरी ज़िल्लत का अंदाज़ा लगा

लफ़्ज़ मानी से गुरेज़ाँ हैं तो उन में रंग भर
चेहरा है बे-नूर तो उस पर कोई ग़ाज़ा लगा

आज फिर वो आते आते रह गया और आज फिर
सर-ब-सर बिखरा हुआ हस्ती का शीराज़ा लगा

रहम खा कर ‘अर्श’ उस ने इस तरफ़ देखा मगर
ये भी दिल दे बैठने का मुझ को ख़मियाज़ा लगा

दरवाज़ा तेरे शहर का वा चाहिए

दरवाज़ा तेरे शहर का वा चाहिए मुझ को
जीना है मुझे ताज़ा हवा चाहिए मुझ को

आज़ार भी थे सब से ज़्यादा मेरी जाँ पर
अल्ताफ़ भी औरों से सिवा चाहिए मुझ को

वो गर्म हवाएँ हैं के खुलती नहीं आँखें
सहरा मैं हूँ बादल की रिदा चाहिए मुझ को

लब सी के मेरे तू ने दिए फ़ैसले सारे
इक बार तो बे-दर्द सुना चाहिए मुझ को

सब ख़त्म हुए चाह के और ख़ब्त के क़िस्से
अब पूछने आए हो के क्या चाहिए मुझ को

हाँ छूटा मेरे हाथ से इक़रार का दामन
हाँ जुर्म-ए-ज़ईफ़ी की सज़ा चाहिए मुझ को

महबूस है गुम्बद में कबूतर मेरी जाँ का
उड़ने को फ़लक-बोस फ़ज़ा चाहिए मुझ को

सम्तों के तिलिस्मात में गुम है मेरी ताईद
क़िबला तो है इक क़िबला-नुमा चाहिए मुझ को

मैं पैरवी-ए-अहल-ए-सियासत नहीं करता
इक रास्ता इन सब से जुदा चाहिए मुझ को

वो शोर था महफ़िल में के चिल्ला उठा ‘वाइज़’
इक जाम-ए-मय-ए-होश-रुबा चाहिए मुझ को

तक़सीर नहीं ‘अर्श’ कोई सामने फिर भी
जीता हूँ तो जीने की सज़ा चाहिए मुझ को

ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे 

ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे
तजर्बे आँसुओं में ढलते रहे

एक लम्हे को तुम मिले थे मगर
उम्र भर दिल को हम मसलते रहे

सुब्ह के डर से आँख लग न सकी
रात भर करवटें बदलते रहे

ज़हर था ज़िंदगी के कूज़े में
जानते थे मगर निगलते रहे

दिल रहा सर-ख़ुशी से बे-गाना
गरचे अरमाँ बहुत निकलते रहे

अपना अज़्म-ए-सफ़र न था अपना
हुक्म मिलता रहा तो चलते रहे

ज़िंदगी सर-ख़ुशी जुनूँ वहशत
मौत के नाम क्यूँ बदलते रहे

हो गए जिन पे कारवाँ पामाल
सब उन्ही रास्तों पे चलते रहे

दिल ही गर बाइस-ए-हलाकत था
रुख़ हवाओं के क्यूँ बदलते रहे

हो गए ख़ामोशी से हम रुख़्सत
सारे अहबाब हाथ मलते रहे

हर ख़ुशी ‘अर्श’ वजह-ए-दर्द बनी
फ़र्श-ए-शबनम पे पाँव जलते रहे

हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए

हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए
अब फ़रेब-ए-ख़याल से भी गए

दिल पे ताला ज़ुबान पर पहरा
यानी अब अर्ज़-ए-हाल से भी गए

जाम-ए-जम की तलाश ले डूबी
अपने जाम-ए-सिफ़ाल से भी गए

ख़ौफ़-ए-कम-माएगी बुरा हो तेरा
आरज़ू-ए-विसाल से भी गए

शोरिश-ए-ज़िंदगी तमाम हुई
गर्दिश-ए-माह-ओ-साल से भी गए

यूँ मिटे हम के अब ज़वाल नहीं
शौक़-ए-औज-ए-कमाल से भी गए

हम ने चाहा था तेरी चाल चलें
हाए हम अपनी चाल से भी गए

हुस्न-ए-फ़र्दा ख़याल ओ ख़्वाब रहा
और माज़ी ओ हाल से भी गए

हम तही-दस्त वक़्फ़-ए-ग़म हैं वही
तंग-ना-ए-सवाल से भी गए

सज्दा भी ‘अर्श’ उन को कर देखा
इस रह-ए-पाएमाल से भी गए

फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर

फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं
तुम ख़बर बे-ज़ार हो अहल-ए-नज़र जाता हूँ मैं

जेब में रख ली हैं क्यूँ तुम ने ज़ुबानें काट कर
किस से अब ये अजनबी पूछे किधर जाता हूँ मैं

हाँ मैं साया हूँ किसी शय का मगर ये भी तो देख
गर तआक़ुब में न हो सूरज तो मर जाता हूँ मैं

हाथ आँखों से उठा कर देख मुझ से कुछ न पूछ
क्यूँ उफ़ुक पर फैलती सुब्हों से डर जाता हूँ मैं

बस यूँही तनहा रहूँगा इस सफ़र में उम्र भर
जिस तरफ़ कोई नहीं जाता उधर जाता हूँ मैं

ख़ौफ़ की ये इंतिहा सदियों से आँखें बंद हैं
शौक़ की ये अब्लही बे-बाल-ओ-पर जाता हूँ मैं

‘अर्श’ रस्मों की पनह-गाहें भी अब सर पर नहीं
और वहशी रास्तों पर बे-सिपर जाता हूँ मैं

संग-ए-दर उस का हर इक दर पे

संग-ए-दर उस का हर इक दर पे लगा मिलता है
दिल को आवारा-मिज़ाजी का मज़ा मिलता है

जो भी गुल है वो किसी पैरहन-ए-गुल पर है
जो भी काँटा है किसी दिल में चुभा मिलता है

शौक़ वो दाम के जो रुख़्सत-ए-परवाज़ न दे
दिल वो ताएर के उसे यूँ भी मज़ा मिलता है

वो जो बैठे हैं बने नासेह-ए-मुश्फ़िक़ सर पर
कोई पूछे तो भला आप को क्या मिलता है

हम के मायूस नहीं हैं उन्हें पा ही लेंगे
लोग कहते हैं के ढूँडे से ख़ुदा मिलता है

दाम-ए-तज़वीर न हो शौक़ गुलू-गीर न हो
मय-कदा ‘अर्श’ हमें आज खुला मिलता है

वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा

वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया
क्यूँ न मुझ को भी तेरे दर से उठा कर ले गया

रात अपने चाहने वालों पे था वो मेहर-बाँ
मैं न जाता था मगर वो मुझ को आ कर ले गया

एक सैल-ए-बे-अमाँ जो आसियों को था सज़ा
नेक लोगों के घरों को भी बहा कर ले गया

मैं ने दरवाज़ा न रक्खा था के डरता था मगर
घर का सरमाया वो दीवारें गिरा कर ले गया

वो अयादत को तो आया था मगर जाते हुए
अपनी तस्वीरें भी कमरे से उठा कर ले गया

मैं जिसे बरसों की चाहत से न हासिल कर सका
एक हम-साया उसे कल वर्ग़ला कर ले गया

सज रही थी जिंस जो बाज़ार में इक उम्र से
कल उसे इक शख़्स पर्दों में छुपा कर ले गया

मैं खड़ा फ़ुट-पाठ पर करता रहा रिक्शा तलाश
मेरा दुश्मन उस को मोटर में बिठा कर ले गया

सो रहा हूँ में लिए ख़ाली लिफ़ाफ़ा हाथ में
उस में जो मज़मूँ था वो क़ासिद चुरा कर ले गया

रक़्स के वक़्फ़े में जब करने को था मैं अर्ज़-ए-शौक़
कोई उस को मेरे पहलू से उठा कर ले गया

ऐ अज़ाब-ए-दोस्ती मुझ को बता मेरे सिवा
कौन था जो तुझ को सीने से लगा कर ले गया

मेहर-बाँ कैसे कहूँ मैं ‘अर्श’ उस बे-दर्द को
नूर आँखों का जो इक जलवा दिखा कर ले गया

ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी

ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी
जारी है अभी गर्दिश-ए-पा सहमी हुई सी

दिल टूट तो जाता है पे गिर्या नहीं करता
क्या डर है के रहती है वफ़ा सहमी हुई सी

उठ जाए नज़र भूल के गर जानिब-ए-अफ़्लाक
होंटों से निकलती है दुआ सहमी हुई सी

हाँ हँस लो रफ़ीक़ो कभी देखी नहीं तुम ने
नम-नाक निगाहों में हया सहमी हुई सी

तक़सीर कोई हो तो सज़ा उम्र का रोना
मिट जाएँ वफ़ा में तो जज़ा सहमी हुई सी

हाँ हम ने भी पाया है सिला अपने हुनर का
लफ़्ज़ों के लिफ़ाफ़ों में बक़ा सहमी हुई सी

हर लुक़मे पे खटका है कहीं ये भी न छिन जाए
मेदे में उतरती है ग़िज़ा सहमी हुई सी

उठती तो है सौ बार पे मुझ तक नहीं आती
इस शहर में चलती है हवा सहमी हुई सी

है ‘अर्श’ वहाँ आज मुहीत एक ख़ामोशी
जिस राह से गुज़री थी क़ज़ा सहमी हुई सी

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