अलीम ‘अख्तर’ की रचनाएँ

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए
ज़िंदगी बे-मज़ा न हो जाए

इन तलव्वुन-मिज़ाजियों का शिकार
कोई मेरे सिवा न हो जाए

लज़्ज़त-ए-इंतिज़ार ही न रहे
कहीं वादा वफ़ा न हो जाए

तेरी रफ़्तार ऐ मआज़-अल्लाह
हश्र कोई बपा न हो जाए

कामयाबी ही कामयाबी हो
तो ये बंदा ख़ुदा न हो जाए

मेरी बे-ताबियों से घबरा कर
कोई मुझ से ख़फ़ा न हो जाए

कुछ तो अंदाज़-ए-जफ़ा कीजिए
दिल सितम-आशना न हो जाए

कहीं नाकामी-ए-असर आख़िर
मुद्दआ-ए-दुआ न हो जाए

वो निगाहें न फेर लें ‘अख़्तर’
इश्क़ बे-आसरा न हो जाए

दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना 

दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना न करें
आप इस अंदाज़-ए-नज़र से मुझे देखा न करें

यक-ब-यक लुत्फ़ ओ इनायत का इरादा न करें
आप यूँ अपनी जफ़ाओं को तमाशा न करें

उन को ये फ़िक्र है अब तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के
के हम अब पुर्सिश-ए-अहवाल करें या न करें

हाँ मेरे हाल पे हँसते हैं ज़माने वाले
आप तो वाक़िफ़-ए-हालात हैं ऐसा न करें

उन की दुज़-दीदा-निगाही का तक़ाज़ा है के अब
हम किसी और को क्या ख़ुद को भी देखा न करें

वो तअल्लुक़ है तेरे ग़म से के अल्लाह अल्लाह
हम को हासिल हो ख़ुशी भी तो गवारा न करें

इस में पोशीदा है पिंदार-ए-मोहब्बत की शिकस्त
आप मुझ से भी मेरे हाल को पूछा न करें

न रहा तेरी मोहब्बत से तअल्लुक़ न सही
निस्बत-ए-ग़म से भी क्या ख़ुद को पुकारा न करें

मैं के ख़ुद अपनी वफ़ाओं पे ख़जिल हूँ ‘अख़्तर’
वो तो लेकिन सितम ओ जौर से तौबा न करें

वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए

वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए मुझे
इक जज़्बा-ए-जुनून-ए-असर दे गए मुझे

हर सम्त देखती है जो उन के जमाल को
वो इक निगाह-ए-जलवा-नगर दे गए मुझे

हर-चंद कर्ब-ए-मर्ग है महसूस हर-नफ़स
लुत्फ़-ए-हयात-ए-इश्क़ मगर दे गए मुझे

तस्वीर-ए-हुज़्न-ओ-यास बना कर चले गए
लब-हा-ए-ख़ुश्क ओ दीदा-ए-तर दे गए मुझे

बेदार कर गए सहर-ओ-शाम-ए-ज़िंदगी
आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-शाम-ओ-सहर दे गए मुझे

जमती नहीं निगाह किसी चीज़ पर भी अब
इक ख़ीरगी-ए-ताब-ए-नज़र दे गए मुझे

अर्ज़-ए-हदीस-ए-शौक़ पे शरमा के रह गए
कितना हसीं जवाब मगर दे गए मुझे

मेरे सुकून-ए-क़ल्ब को ले कर चले गए
और इज़्तिराब-ए-दर्द-ए-जिगर दे गए मुझे

महरूम-ए-शश-जहात निगाहों को कर गए
बस इक निगाह-ए-जानिब-ए-दर दे गए मुझे

‘अख़्तर’ वो आए और चले भी गए मगर
इक लुत्फ़-ए-इज़्तिराब-ए-असर दे गए मुझे

निगाह-ए-लुत्फ़ क्या कम हो गई है

निगाह-ए-लुत्फ़ क्या कम हो गई है
मोहब्बत और महकम हो गई है

तबीअत कुश्त-ए-ग़म हो गई है
चराग़-ए-बज़्म-ए-मातम हो गई है

मआल-ए-ज़ब्त-ए-पैहम हो गई है
मुसर्रत हासिल-ए-ग़म हो गई है

तमन्ना जब बढ़ी है अपनी हद से
तो मायूसी का आलम हो गई है

न जाने क्यूँ अदावत ही अदावत है
सरिश्त-ए-इब्न-ए-आदम हो गई है

है महव-ए-रक़्स हर बर्ग-ए-चमन पर
बड़ी बे-बाक शबनम हो गई है

हँसी होंटों पर आते आते ‘अख़्तर’
पयाम-ए-गिर्य-ए-ग़म हो गई है

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मेरी रूह-ए-रवाँ

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मेरी रूह-ए-रवाँ होना
मुबारक हर नफ़स को इक हयात-ए-जावेदाँ होना

हमारे दिल को आए किस तरह फिर शादमाँ होना
तेरी नज़रों ने सीखा ही नहीं जब मेहर-बाँ होना

तेरे कूचे में होना उस पे तेरा आस्ताँ होना
मुबारक तेरे कूचे की ज़मीं को आसमाँ होना

ये हालत है के बे-दारी भी है इक ख़्वाब का आलम
मआज़-अल्लाह अपना ख़ूगर-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ होना

उसे ख़ुश कर सकेंगी क्या बहारें ज़िंदगानी की
चमन में जिस ने देखा हो बहारों का ख़िज़ाँ होना

जो बद-क़िस्मत तेरे ग़म की मुसर्रत से हैं ना-वाक़िफ़
वो क्या जानें किसे कहते हैं दिल का शादमाँ होना

मुझे आँखें दिखाएगी भला क्या गर्दिश-ए-दौराँ
मेरी नज़रों ने देखा है तेरा ना-मेहरबाँ होना

जबीं ओ आस्ताँ के दरमियाँ सजदे हों क्यूँ हाएल
जबीं को हो मयस्सर काश जज़्ब-ए-आस्ताँ होना

हवस-कारान-ए-इशरत आह क्या समझेंगे ऐ ‘अख़्तर’
बहुत दुश्वार है ज़ौक़-ए-अलम का राज़-दाँ होना

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए
सोज़ हम-रंग-ए-साज़ हो जाए

दिल जो आगाह-ए-राज़ हो जाए
हर हकीक़त मजाज़ हो जाए

लज़्ज़त-ए-ग़म का ये तक़ाज़ा है
मुद्दत-ए-ग़म दराज़ हो जाए

नग़मा-ए-इश्क़ छेड़ता हूँ मैं
ज़िंदगी नै-नवाज़ हो जाए

उस की बिगड़ी बने न क्यूँ ऐ इश्क़
जिस का तू कार-साज़ हो जाए

हुस्न मग़रूर है मगर तौबा
इश्क़ अगर बे-नियाज़ हो जाए

दर्द का फिर मज़ा है जब ‘अख़्तर’
दर्द ख़ुद चारा-साज़ हो जाए

Share