अली जव्वाद ‘ज़ैदी’ की रचनाएँ

आँख कुछ बे-सबब ही नम तो

आँख कुछ बे-सबब ही नम तो नहीं
ये कहीं आप का करम तो नहीं

हम ने माना के रौशनी कम है
फिर भी ये सुब्ह शाम-ए-ग़म तो नहीं

इश्क़ में बंदिशें हज़ार सही
बंदिश-ए-दाना-ओ-दिरम तो नहीं

था कहाँ इश्क़ को सलीक़ा-ए-ग़म
वो नज़र माइल-ए-करम तो नहीं

मोनिस-ए-शब रफ़ीक़-ए-तंहाई
दर्द-ए-दिल भी किसी से कम तो नहीं

वो कहाँ और कहाँ सितम-गारी
कुछ भी कहते हों लोग हम तो नहीं

शिकवे की बात और है वरना
लुत्फ़-ए-पैहम कोई सितम तो नहीं

देख ऐ क़िस्सा-गो-ए-रंज-ए-फ़िराक़
नोक-ए-मिज़गाँ-ए-यार नम तो नहीं

उन के दिल से सवाल करता है
ये तबस्सुम शरीक-ए-ग़म तो नहीं

आँखों में अश्क भर के मुझ से 

आँखों में अश्क भर के मुझ से नज़र मिला के
नीची निगाह उट्ठी फ़ित्ने नए जगा के

मैं राग छेड़ता हूँ ईमा-ए-हुस्न पा के
देखो तो मेरी जानिब इक बार मुस्कुरा के

दुनिया-ए-मसलेहत के ये बंद क्या थामेंगे
बढ़ जाएगा ज़माना तूफाँ नए उठा के

जब छेड़ती हैं उन को गुम-नाम आरज़ुएँ
वो मुझ को देखते हैं मेरी नज़र बचा के

दीदार की तमन्ना कल रात रख रही थी
ख़्वाबों की रह-गुज़र में शम्में जला जला के

दूरी ने लाख जलवे तख़लीक़ कर लिए थे
फिर दूर हो गए हम तेरे क़रीब आ के

शाम-ए-फ़िराक़ ऐसा महसूस हो रहा है
हर एक शय गँवा दी हर एक शय को पा के

आई है याद जिन की तूफ़ान-ए-दर्द बन के
वो ज़ख्म मैं ने अक्सर खाए हैं मुस्कुरा के

मेरी निगाह-ए-ग़म में शिकवे ही सब नहीं हैं
इक बार इधर तो देखो नीची नज़र उठा के

ये दुश्मनी है साक़ी या दोस्ती है साक़ी
औरों को जाम देना मुझ को दिखा दिखा के

दिल के क़रीब शायद तूफान उठ रहे हों
देखो तो शेर ज़ैदी इक रोज़ गुनगुना के

ऐश ही ऐश है न सब ग़म है

ऐश ही ऐश है न सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है

जाम में है जो मशअल-ए-गुल-रंग
तेरी आँखों का अक्स-ए-मुबहम है

ऐ ग़म-ए-दहर के गिरफ़्तारो
ऐश भी सर्नविश्त-ए-आदम है

नोक-ए-मिज़गाँ पे याद का आँसू
मौसम-ए-गुल की सर्द शबनम है

दर्द-ए-दिल में कमी हुई है कहीं
तुम ने पूछा तो कह दिया कम है

मिटती जाती है बनती जाती है
ज़िंदगी का अजीब आलम है

इक ज़रा मुस्कुरा के भी देखें
ग़म तो ये रोज़ रोज़ का ग़म है

पूछने वाले शुक्रिया तेरा
दर्द तो अब भी है मगर कम है

कह रहा था मैं अपना अफ़साना
क्यूँ तेरा दामन-ए-मिज़ा नाम है

ग़म की तारीकियों में ऐ ‘ज़ैदी’
रौशनी वो भी है जो मद्धम है

ग़ैर पूछें भी तो हम क्या अपना

ग़ैर पूछें भी तो हम क्या अपना अफ़साना कहें
अब तो हम वो हैं जिसे अपने भी बेगाना कहें

वो भी वक़्त आया के दिल में ये ख़याल आने लगा
आज उन से हम ग़म-ए-दौरा का अफ़साना कहें

क्या पुकारे जाएँगे हम ऐसे दीवाने वहाँ
होश-मंदों को भी जिस महफ़िल में दीवाना कहें

शब के आख़िर होते होते दोनों ही जब जल बुझे
किस को समझाएँ शम्मा-ए-महफ़िल किस को दीवाना कहें

और कुछ कहना तो गुस्ताख़ी है शान-ए-शेख़ में
हाँ मगर ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-मय-ख़ाना कहें

आज तनहाई में फिर आँखों से टपका है लहू
जी के बहलाने को आओ अपना अफ़साना कहें

उन से रौनक़ क़त्ल-गह की उन से गर्मी बज़्म की
कहने वाले अहल-ए-दिल को लाख दीवाना कहें

हैं बहम मौज-ए-शराब ओ सैल-ए-अश्क ओ जू-ए-ख़ूँ
लाइक़-ए-सजदा है जिस को ख़ाक-ए-मय-ख़ाना कहें

उन की इस चीन-ए-जबीं का कुछ तक़ाज़ा हो मगर
क्या ग़म-ए-दिल की हक़ीक़त को भी अफ़साना कहें

जवानी हरीफ़-ए-सितम है तो 

जवानी हरीफ़-ए-सितम है तो क्या ग़म
तग़य्युर ही अगला क़दम है तो क्या ग़म

हर इक शय है फ़ानी तो ये ग़म भी फ़ानी
मेरी आँख गर आज नाम है तो क्या ग़म

मेरे हाथ सुलझा ही लेंगे किसी दिन
अभी ज़ुल्फ़-ए-हस्ती में ख़म है तो क्या ग़म

ख़ुशी कुछ तेरे ही लिए तो नहीं है
अगर हक मेरा आज कम है तो क्या ग़म

मेरे ख़ूँ पसीने से गुलशन बनेंगे
तेरे बस में अब्र-ए-करम है तो क्या ग़म

मेरा कारवाँ बढ़ रहा है बढ़ेगा
अगर रुख़ पे गर्द-ए-आलम है तो क्या ग़म

ये माना के रह-बर नहीं है मिसाली
मगर अपने सीने में दम है तो क्या ग़म

मेरा कारवाँ आप रह-बर है अपना
ये शीराज़ा जब तक बहम है तो क्या ग़म

तेरे पास तबल ओ आलम हैं तो होंगे
मेरे पास ज़ोर-ए-क़लम है तो क्या ग़म

ज़ुल्मत-कदों में कल जो शुआ-ए-सहर गई 

ज़ुल्मत-कदों में कल जो शुआ-ए-सहर गई
तारीकी-ए-हयात यकायक उभर गई

नज़ारा-ए-जमाल की फ़ुर्सत कहाँ मिली
पहली नज़र नज़र की हदों से गुज़र गई

इज़हार-ए-इल्तिफ़ात के बाद उन की बे-रुख़ी
इक रंग और नक़्श-ए-तमन्ना में भर गई

ज़ौक़-ए-जुनून ओ जज़्बा-ए-बे-बाक क्या मिले
वीरान हो के भी मेरी दुनिया सँवर गई

अब दौर-ए-कारसाज़ी-ए-वहशत नहीं रहा
अब आरज़ू-ए-लज्ज़त-ए-रक़्स-ए-शरर गई

इक दाग़ भी जबीं पे मेरी आ गया तो क्या
शोख़ी तो उन के नक़्श-ए-क़दम की उभर गई

तारे से झिलमिलाते हैं मिज़गाँ-ए-यार पर
शायद निगाह-ए-यास भी कुछ काम कर गई

तुम ने तो इक करम ही किया हाल पूछ कर
अब जो गुज़र गई मेरे दिल पर गुज़र गई

जलवे हुए जो आम तो ताब-ए-नज़र न थी
परदे पड़े हुए थे जहाँ तक नज़र गई

सारा क़ुसूर उस निगह-ए-फ़ित्ना-जू का था
लेकिन बला निगाह-ए-तमन्ना के सर गई

शिकवे हम अपनी ज़बाँ पर कभी लाए 

शिकवे हम अपनी ज़बाँ पर कभी लाए तो नहीं
हाँ मगर अश्क जब उमड़े थे छुपाए तो नहीं

तेरी महफ़िल के भी आदाब के दिल डरता है
मेरी आँखों ने दुर-ए-अश्क लुटाए तो नहीं

छान ली ख़ाक बयाबानों की वीरानों की
फिर भी अंदाज़-ए-जुनूँ अक़्ल ने पाए तो नहीं

लाख पुर-वहशत ओ पुर-हौल सही शाम-ए-फ़िराक़
हम ने घबरा के दिए दिन से जलाए तो नहीं

अब तो इस बात पे भी सुलह सी कर ली है के वो
न बुलाए न सही दिल से भुलाए तो नहीं

हिज्र की रात ये हर डूबते तारे ने कहा
हम न कहते थे न आएँगे वो आए तो नहीं

इंकिलाब आते हैं रहते हैं जहाँ में लेकिन
जो बनाने का न हो अहल मिटाए तो नहीं

अपनी इस शोख़ी-ए-रफ़्तार का अंजाम न सोच
फ़ित्ने ख़ुद उठने लगे तू ने उठाए तो नहीं

मंज़िल-ए-दिल मिली कहाँ ख़त्म-ए-सफ़र 

मंज़िल-ए-दिल मिली कहाँ ख़त्म-ए-सफ़र के बाद भी
रह-गुज़र एक और थी राह-गुज़र के बाद भी

आज तेरे सवाल पर फिर मेरे लब ख़ामोश हैं
ऎसी ही कशमकश थी कुछ पहली नज़र के बाद भी

दिल में थे लाख वसवसे जलवा-ए-आफ़ताब तक
रह गई थी जो तीरगी नूर-ए-सहर के बाद भी

नासेह-ए-मसलहत-नवाज़ तुझ को बताऊँ क्या ये राज़
हौसला-ए-निगाह है ख़ून-ए-जिगर के बाद भी

हार के भी नहीं मिटी दिल से ख़लिश हयात की
कितने निज़ाम मिट गए जश्न-ए-ज़फ़र के बाद भी

कोई मेरा ही आशियाँ हासिल-ए-फ़स्ल-ए-गुल न था
हाँ ये बहार है बहार रक़्स-ए-शरर के बाद भी

एक तुम्हारी याद ने लाख दिए जलाए हैं
आमद-ए-शब के क़ब्ल भी ख़त्म-ए-सहर के बाद भी

तेरे हलके से तबस्सुम का इशारा भी

तेरे हलके से तबस्सुम का इशारा भी तो हो
ता सर-ए-दार पहुँचने का सहारा भी तो हो

शिकवा ओ तंज़ से भी काम निकल जाते हैं
ग़ैरत-ए-इश्क़ को लेकिन ये गवारा भी तो हो

मय-कशों में न सही तिश्ना-लबों में ही सही
कोई गोशा तेरी महफ़िल में हमारा भी तो हो

किस तरफ़ मोड़ दें टूटी हुई किश्ती अपनी
ऐसे तूफ़ाँ में कहीं कोई किनारा भी तो हो

है ग़म-ए-इश्क़ में इक लज़्ज़त-ए-जावेद मगर
इस ग़म-ए-दहर से ऐ दिल कोई चारा भी तो हो

मय-कदे भर पे तेरा हक़ है मगर पीर-ए-मुग़ाँ
इक किसी चीज़ पे रिन्दों का इजारा भी तो हो

अश्क-ए-ख़ूनीं से जो सींचे थे बयाबाँ हम ने
उन में अब लाला ओ नसरीं का नज़ारा भी तो हो

जाम उबल पड़ते हैं मय लुटती है ख़ुम टूटते हैं
निगह-ए-नाज़ का दर-पर्दा इशारा भी तो हो

पी तो लूँ आँखों में उमड़े हुए आँसू लेकिन
दिल पे क़ाबू भी तो हो ज़ब्त का यारा भी तो हो

आप इस वादी-ए-वीराँ में कहाँ आ पहुँचे
मैं गुनहगार मगर मैं ने पुकारा भी तो हो

नींद आ गई थी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ से

नींद आ गई थी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ से गुज़र के
चौंके हैं हम अब सरहद-ए-इसयाँ से गुज़र के

आँखों में लिए जलवा-ए-नैरंग-ए-तमाशा
आई है ख़िज़ाँ जश्न-ए-बहाराँ से गुज़र के

यादों के जवाँ क़ाफ़िले आते ही रहेंगे
सरमा के इसी बर्ग-ए-पुर-अफ़्शाँ से गुज़र के

काँटों को भी अब बाद-ए-सबा छेड़ रही है
फूलों के हसीं चाक गिरेबाँ से गुज़र के

वहशत की नई राह-गुज़र ढूँढ रहे हैं
हम अहल-ए-जुनूँ दश्त ओ बयाबाँ से गुज़र के

बन जाएगा तारा किसी मायूस ख़ला में
ये अश्क-ए-सहर गोशा-ए-दामाँ से गुज़र के

आवारगी-ए-फ़िक्र किधर ले के चली है
सर मंज़िल-ए-आज़ादी-ए-इंसान से गुज़र के

पाई है निगाहों ने तेरी बज़्म-ए-तमन्ना
रातों को चिनारों के चराग़ाँ से गुज़र के

इक गर्दिश-ए-चश्म-ए-करम इक मौज-ए-नज़ारा
कल शब को मिली गर्दिश-ए-दौरान से गुज़र के

मिलने को तो मिल जाए मगर लेगा भला कौन
साहिल का सुकूँ शोरिश-ए-तूफ़ान से गुज़र के

इक नश्तर-ए-ग़म और सही ऐ ग़म-ए-मंज़िल
आ देख तो इक रोज़ राग-ए-जान से गुज़र के

अब दर्द में वो कैफ़ियत-ए-दर्द नहीं है
आया हूँ जो उस बज़्म-ए-गुल-अफ़्शाँ से गुज़र के

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