अली मोहम्मद फ़र्शी की रचनाएँ

दाओ

फिर घुमाओ
आख़िरी दाओ लगाओ
क्या ख़बर इस बार आख़िर मिल ही जाए
बीस बिलियन साल की वो गुम-शुदा पूँजी मुझे

मैं
मैं किसी ऐसे ही लम्हे के किनारे
तुझ से बिछड़ा
वक़्त का चक्कर घुमा कर
तू ने जब तक़दीर से मिट्टी जुदा की
और मैं ने
अपनी मिट्टी से जुदाई
ये जुदाई
आँसुओं में गूँध कर
रक्खी हुई है चाक पर
इन बीस बिलियन साल में
इस चाक पर
मैं ने बनाई एक जन्नत
और इस जन्नत की रौनक़ एक औरत
घर में अब तक मंुतज़िर है
रात का पिछला पहर है
मैं जुआ-ख़ाने में तन्हा
ज़िंदगी का आख़िरी दाओ लगाने जा रहा हूँ

रोकना मत
तेरी जानिब आ रहा हूँ

ऐन

दूसरा कौन है
कौन है साथ मेरे
अंधेरे में जिस का वजूद
अपने होने के एहसास की लौ तेज़ रखते हुए
मेरे सहमे हुए साँस की रास थामे हुए चल रहा है
दिया एक उम्मीद का जल रहा है
कहीं आबशारों के पीछे
घनी नींद जैसे अंधेरों में
सहरा की ला-सम्त पहनाई में
पाँव धँसते हुए
साँस रूक रूक के चलते हुए
कितना बोझल है वो
जिस को सहरा की इक सम्त से दूसरी सम्त में
ले के जाने पे मामूर हूँ
मैं रूकूँ तो ज़माँ गर्दिशें रोक कर बैठ जाए
आसमाँ थक के सहरा के बिस्तर पे चित गिर पड़े
चल रहा हूँ
बहुत धीमे धीमे
क़सम
छे दिनों की
मुसलसल चलूँगा
मैं बुर्राक़ से क्या जलूँगा
बस इक सोच में धँस गया था
कि ये दूसरा कौन है
कोई हारून है
या कि हारूत है

गे बी 

ज़िंदगी मिथ नहीं
जो पुराने मआनी की
मय्या से लिपटी रहे

जैसे बेबी की तस्वीर के
कैप्शन में बताया गया है
उसे अपनी मा $ मा ने
इक और लड़की के एग से लिया
तीन मिलियन में सौदा हुआ

बाप उस का
बलडी बहुत लालची था
मगर ख़ूब-रू-नौजवाँ मशरिक़ी
काली आँखों के एजाज़ ने
दाम दुगना किया

मेज़बाँ
उस की माँ इक किराए की औरत
नय नोमा के नौ लाख माँगे
अदा कर दिए
ज़िंदगी मिथ नही हैं
पुराने मआनी की मय्या नहीं है
ये हव्वा नहीं है
ये लज़्बाई कल्चर की बेबी है
गेबी है
जिस में
ख़ुदा आदमी बाप और माँ
की मिथ के मआनी की मय्या नहीं है

रेत 

तेरे आतिश-फ़िशानों से बहते हुए
सुर्ख़-सैलाब की पेश-गोई
ओलम्पस के आतिश-कदे से
सुनहरी हरारत की राहत चुरा कर
प्रोमिथेस के ज़मीं पर उतरने से पहले
बहुत पहले तारीख़ के ग़ार में एक
सह-चश्मे इफ़रीत ने इस कहानी में की थी
जिसे पढ़ के ख़ुद उस पे दीवानगी का वो दौरा पड़ा
ख़ुद को अंधा किया
फिर सुनाता रहा दास्ताँ अंधी ताक़त की
बर्बादियों पर रूलाता रहा
आँख से सात सागर बहे
रेत लेकिन हमेशा की प्यासी
बुझाती रही आँसुओं से मिरे प्यास की आग को

तू नहीं जानता रेत की प्यास को
रेत की भूक को
रेत की भूक ऐसी कि जिस में समा जाएँ
लोहा उगलते पहाड़ों के सब सिलसिले
प्यास ऐसी कि जिस में उतर जाएँ
सारे समुंदर
तिरे आँसुओं के

मगर तेरे आँसू टपकने में कुछ देर है
देर कितनी लगी
हाथियों की क़तारों को
ज़ेर-ए-ज़मीं
तेल और तार बुनने की मीआद से ख़ूब वाक़िफ़ है तू
तू इसी तेल की बू पे पागल हुआ
और धमकता धरप्ता हुआ
आ गया रेत के राज में
वक़्त के आज में
वक़्त का आज तेरा है जिस में
मिर्रीख़ ओ मराइख़ से आगे रसाई है तेरी
मगर रेत तो पर नहीं ताक़त-ए-पर नहीं देखती
पाँव को तौलती है
किसे सोलती है

सत्तर माओं का प्यार 

किताबों का ज़ीना बना कर
मचानी से मैं ने मिठाई चुराई तो
घर में किसी को भी ग़ुस्सा न आया
ये कम-सिन ज़ेहानत की तासीर थी
या शरारत की शीरीं शकर-क़ंदियों जैसे उम्रों की लज़्ज़त
अभी तक वो ख़ुश-ज़ाएक़ा वाक़िआ
जब रग-ए-जाँ में घुलता है
बचपन के बाग़ात की तितलियाँ
फूल बन कर बरसती हैं
पथरीली उम्रों के दिन रात की
ज़र्द काली मुसीबत का ग़म भूल कर
मुस्कुराहट की मीठी फुवारें
बयाबाँ को जल-थल बनाती हैं गाती हैं
एक दो तीन
अल्लाह मियाँ की ज़मीन
चार पाँच छे सात
सारे मिल कर खाएँ भात
आठ नौ दस पानी मीठा रस
पानी की लहरों पे हचकोले खाती हुई
काग़ज़ी-उम्र की नाव
करवट बदल कर उलट देती है ख़्वाब सारे
किताबों पे गिरते हुए आँसुओं से
सियाही के दरिया ही बनते हैं
दरिया समुंदर बनाते हैं
सारे समुंदर सियाही क़लम बन गईं सारी शाख़ें
क़सम उँगलियों की
मोहब्बत भरा ख़त मिरे और तिरे दरमियाँ तीर है
मैं लिक्खूँ और लिखता रहूँ ता-क़यामत
मोहब्बत की नज़्में
मगर जानियाँ इतन किताबों को ज़ीना बना कर
कई बार मैं ने
तिरे आसमानों पे जा कर
तुझे ढूँढ लाने की नाकाम कोशिश में
आँसू बहाए
सियाही के दरिया बनाए

कहाँ है तू ख़ुद अपनी शीरीं सदा से
मिरी तीरा-बख़्ती में
शुभ-रात की मिसरियाँ घोल दे
माँ तो नाराज़ है
अब कई रोज़ से बोलती भी नहीं

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