अविनाश मिश्र की रचनाएँ

सिन्दूर 

क्या वह बता सकता था
कि अब तुम मेरी नहीं रहीं
लेकिन उसने ही बताया
जब तुम मिलीं बहुत बरस बाद
और वह तुम्हारे साथ नहीं था

बेन्दा 

यूँ तुम देखने में बुरे नहीं
उम्र भी तुम्हारी कुछ खास नहीं
बनावट से भी तुम्हारी रश्क होता है
लेकिन तुम्हें सब वक़्त ढोया नहीं जा सकता
जबकि तुम उसके इतने करीब हो !

बिन्दिया 

वह तुम्हारा कोई स्वप्न थी
या अभिलाषा
या कोई आत्म-गौरव
या वह कोई बाधा थी
सूर्य, चन्द्रमा, नखत, समुद्र या पृथ्वी की तरह नहीं
एक रंग-बून्द की तरह प्रतिष्ठित —
तुम्हारे भाल पर

काजल

तुम्हारी आँखों में बसा
वह रात की तरह था
दिन की कालिमा को सँभालता
उसने मुझे डूबने नहीं दिया
कई बार बचाया उसने मुझे
कई बार उसकी स्मृतियों ने

नथ

वह सही वक़्त बताती हुई घड़ी है
चन्द्रमा को उसमें कसा जा सकता है
और समुद्र को भी

कर्णफूल

बहुत बड़े थे वे और भारी भी
तुम्हारे कानों की सबसे नर्म जगह पर
एक चुभन में फँसे झूलते हुए
क्या वे दर्द भी देते थे
तुम से फँसे तुम में झूलते हुए —
क्या बेतुका ख़याल है यह —
क्या इनके बग़ैर तुम अधूरी थीं
नहीं, आगे तो कई तकलीफ़ें थीं

गजरा 

मैं तुम्हारे अधरों की अरुणाई नहीं
तुम्हारे नाख़ूनों पर चढ़ी गुलाबी चमक नहीं
तुम्हारे पैरों में लगा महावर नहीं
नाहक ही मैं पीछे आया
तुम्हारे केश-अरण्य में गमकता
अपनी ही सुगन्ध से अनजान
मैं तुम्हारा अन्तरंग नहीं

मंगलसूत्र

वह वास्तविक निकष है एक तय निष्कर्ष का
या मुझे अनाकर्षित करने की कोई क्षमता
मर्यादा उसका प्रकट गुण है
और कामना तुम्हारा
मैं अगर कोई सूत्र हूँ
तब मेरा मंगल तुम पर निर्भर है

बाजूबन्द 

वह आमन्त्रित है
मैं भी
अन्य भी

प्रथम पुरुष के लिए वह अर्गला है
मध्यम के लिए आश्चर्य
अन्य के लिए आकांक्षा

मेंहदी

इस असर से तुम्हारी हथेलियाँ
कुछ भारी हो जाती थीं
इतनी भारी
कि तुम फिर और कुछ उठा नहीं सकती थीं
इस असर के सूखने तक
बहुत भारी था जीवन
समय बहुत निर्भर

चूड़ियाँ

तुम्हें न देखूँ तब भी
बँधा चला आता था
बहुत मीठी और नाज़ुक थी उनकी खनक
छूते ही रेजा-रेजा…

अँगूठी

इसका मुहावरा ही और है
यह सबसे पहले आती है
शेष सब इसके बाद —
एक भार की तरह
आत्म-प्रचार की तरह
इसमें उदारता भी स्वाभाविक होती है और उपेक्षा भी
यह जब जी चाहे उतारकर दी जा सकती है
उधार की तरह

मेखला

मध्यमार्गी वह
मध्य में मैं
मध्यमाँगी तुम

पायल

वह शोर और दर्द जो उठ रहा था
उनसे नहीं उनके बिछड़ जाने से उठ रहा था
कितनी सूनी और कितनी अधूरी थी इस बिछुड़न में
तुम्हारी चाल
बेताल

बिछुए

वे रहे होंगे
मैं उनके बारे में ज़्यादा नहीं जानता
मैं उनके बारे में जानना नहीं चाहता
उनके बारे में जानना स्मृतियों में व्यवधान जैसा है

इत्र

मैं ऐसे प्रवेश चाहता हूँ तुम में
कि मेरा कोई रूप न हो
मैं तुम्हें ज़रा-सा भी न घेरूँ
और तुम्हें पूरा ढँक लूँ

प्रतिभाएँ अपनी ही आग में

कोई इलाहाबाद का था
यह उसके लिए बहुत था
कोई ‘सिंह’ था
यह उसकी सबसे बड़ी योग्यता थी
वह इसे नाम के आगे लगाए या न लगाए

सब इस तरह अपने-अपने
जनपदीय और जातीय वैभव में
बहुत और योग्य थे

जबकि बहुत सारे योग्य लोग
सिर्फ़ इस वजह मार दिए जाते थे
क्योंकि वे इनकार करते थे…

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