अशहर हाशमी की रचनाएँ

अजनबियत थी मगर ख़ामोश इस्तिफ़्सार पर 

अजनबियत थी मगर ख़ामोश इस्तिफ़्सार पर
नाम उस के इक अलामत में लिखा दीवार पर

राएगाँ जाती हुई उम्र-ए-रवाँ की इक झलक
ताज़ियाना है क़नाअत-आश्ना किरदार पर

दुश्मनों के दरमियाँ मेरा मुहाफ़िज़ है क़लम
मैं ने हर तल्वार रोकी है इसी तल्वार पर

दिन हो जैसा भी गुज़र जाता है अपने तौर से
रात होती है मगर भारी तिरे बीमार पर

सुस्त-गामी ले के मंज़िल तक चली आई मुझे
तेज़-रौ अहबाब हैराँ हैं मिरी रफ़्तार पर

शब के सन्नाटे ही में करता है सच्ची गुफ़्तुगू
शहर अपना दुख सुनाता है दर ओ दीवार पर

ज़िंदगी करना वो मुश्किल फ़न है ‘अशहर’ हाशमी
जैसे कि चलना पड़े बिजली के नंगे तार पर

है कौन जिस से कि वादा ख़ता नहीं होता

है कौन जिस से कि वादा ख़ता नहीं होता
मगर किसी का इरादा ख़ता नहीं होता

जहाँ बिसात पे घिर जाए शाह नर्ग़े में
वहाँ कभी भी पियादा ख़ता नहीं होता

वो दुश्मनों में अगर हो तो बच भी जाऊँ मैं
उसी का वार मबादा ख़ता नहीं होता

जो सर बचे भी तो दस्तार बच नहीं सकती
निशाना उस का ज़ियादा ख़ता नहीं होता

किसी की गर्द-ए-सफ़र बैठते भी देखेंगे
हमारी नज़रों से जादा ख़ता नहीं होता

हैं तजरबे मिरे एहसानमंद लफ़्ज़ों के
हो शक्ल या कि लबादा ख़ता नहीं होता

इक शहर ज़िया-बार यहाँ भी है वहाँ भी

इक शहर ज़िया-बार यहाँ भी है वहाँ भी
लेकिन मिरा आज़ार यहाँ भी है वहाँ भी

रौशन मिरे अंदर के अंधेरों में बराबर
इक आतिश-ए-पिंदार यहाँ भी है वहाँ भी

अहबाब मिरे एक ही जैसे हैं जहाँ हैं
इक जज़्बा-ए-ईसार यहाँ भी है वहाँ भी

इक सुब्ह तिरे साथ कई मील चले थे
उस सुब्ह का असरार यहाँ भी है वहाँ भी

गर साथ अज़ीज़ो न मयस्सर हो तुम्हारा
जीना मिरा बेकार यहाँ भी है वहाँ भी

है जिस की रवानी से लहू गर्म हमारा
वो चश्मा-ए-बेदार यहाँ भी है वहाँ भी

आँखों से मिरे दिल में समाया है जो ‘अशहर’
उस शोख़ की सरकार यहाँ भी है वहाँ भी

क्या क़द्र-ए-अना होगी जबीं जान रही है 

क्या क़द्र-ए-अना होगी जबीं जान रही है
जिस शहर में सज्दों की ही पहचान रही है

कुछ हम ने भी दुनिया को सताया है बहर हाल
कुछ अपनी तबीअत से भी हलकान रही है

मज़बूत रहा हुस्न-ए-नज़र से मिरा रिश्ता
जब तक वो मिरे शहर में मेहमान रही है

मय ने भी दिया है मिरी वहशत को बढ़ावा
दो चार दिनों वो भी निगहबान रही है

उस को तो सफ़र करते नहीं देखा किसी ने
राहों की मगर धूल उसे पहचान रही है

वो हो कि न हो फ़र्क़ नहीं पड़ता है कुछ भी
ये रात कई सदियों से वीरान रही है

क्या जाने कहाँ ख़त्म हो ‘अशहर’ की कहानी
अब तक तो किसी दर्द का उनवान रही है

बादलों की चिट्ठियाँ क्या आईं दरियाओं के नाम

बादलों की चिट्ठियाँ क्या आईं दरियाओं के नाम
हर तरफ़ पानी की इक चलती हुई दीवार थी

इंकिशाफ़-ए-शहर-ए-ना-मालूम था हर शेर में
तजरबे की ताज़ा-कारी सूरत-ए-अशआर थी

आरज़ू थी सामने बैठे रहें बातें करें
आरज़ू लेकिन बेचारी किस क़दर लाचार थी

घर की दोनों खिड़कियाँ खुलती थीं सारे शहर पर
एक ही मंज़र की पूरे शहर में तकरार थी

आँसुओं के चंद क़तरों से थी तर पूरी किताब
हर वरक़ पर एक सूरत माएल-ए-गुफ़्तार थी

उस से मिलने की तलब में जी लिए कुछ और दिन
वो भी ख़ुद बीते दिनों से बर-सर-ए-पैकार थी

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