अशोक अंजुम की रचनाएँ

आँसू 

पीड़ा का अनुवाद हैं आँसू
एक मौन संवाद हैं आँसू

दर्द, दर्द बस दर्द ही नहीं
कभी-कभी आह्लाद हैं आँसू

जबसे प्रेम धरा पर आया
तब से ही आबाद हैं आँसू

अब तक दिल में है हलचल-सी
मुझको उनके याद हैं आँसू

कभी परिंदे कटे-परों के
और कभी सैयाद हैं आँसू

इनकी भाषा पढ़ना ‘अंजुम’
मुफ़लिस की फ़रियाद हैं आँसू

गोली की मेहरबानी

गोली की मेहरबानी कुछ बम की मेहरबानी
फ़ाक़े हुए कईं दिन से मातम की मेहरबानी

कलियाँ भी अब उगलने चिंगारियाँ लगी हैं
दहशत है गुलसितां में सिस्टम की मेहरबानी

तिकड़म कईं भिड़ा कर भी हो रहे विफल थे
ठेका मिला जो उन को ये रम की मेहरबानी

जो घाव था ज़रा-सा नासूर बन गया है
जो तुमने दिया था उस मरहम की मेहरबानी

कोठी से चल के गोरी कोठे पे आ गई है
दिल जिस को दिया था उस बालम की मेहरबानी

कैसी गरम हवा है पकने लगे हैं बच्चे
गुम हो रहा है बचपन मौसम की मेहरबानी

द्वार पर साँकल लगाकर सो गए

द्वार पर साँकल लगाकर सो गए
जागरण के गीत गाकर सो गए।

सोचते थे हम कि शायद आयेंगे
और वे सपने सजाकर सो गए।

काश! वे सूरत भी अपनी देखते
आइना हमको दिखाकर सो गए।

रूठना बच्चों का हर घर में यही
पेट खाली छत पर जाकर सो गए।

हैं मुलायम बिस्तरों पर करवटें
और भी धरती बिछाकर सो गए।

रात-भर हम करवटें लेते रहे
और वे मुँह को घुमाकर सो गए।

घर के अंदर शोर था, हाँ इसलिए
साब जी दफ्तर में आकर सो गए।

कितनी मुश्किल से मिली उनसे कहो
वे जो आज़ादी को पाकर सो गए।

फिर गज़ल का शे’र हो जाता, मगर
शब्द कुछ चौखट पे आकर सो गए।

प्रेम की, सचाई की, बोलियाँ ही गायब हैं 

प्रेम की सच्चाई की बोलियां ही गायब हैं
आदमी के अंदर से बिजलियां ही गायब हैं

साबजी पधारे थे सैर को गुलिस्तां की
तब से इस चमन की सब तितलियां ही गायब हैं

हाथ क्या मिलाया था दिल ही दे दिया था उन्हें
हाथ अपने देखे तो उंगलियां ही गायब हैं

यूं ही गर्भ पे जो चली आपकी ये मनमानी
कल जहां से देखोगे ल़डकियां ही गायब हैं

वे भले प़डोसी थे, आए थे नहाने को
बाथरूम की तब से टौंटियां ही गायब हैं

चीर को हरण कैसे अब करोगे दुशासन
जींस में हैं पांचाली, सा़डयां ही गायब हैं

होटलों में खाते हैं वे चिकिनओबिरयानी
और कितने हाथों से रोटियां ही गायब हैं।

ज़िन्दगी का ज़िन्दगी से वास्ता जिंदा रहे

ज़िन्दगी का ज़िन्दगी से वास्ता जिंदा रहे
हम रहें जब तक हमारा हौसला जिंदा रहे

वक़्त ने माना हमारे बीच रख दीं दूरियाँ
कोशिशें ये हों, दिलों में रास्ता जिंदा रहे

ऐ मेरे दुश्मन! तुझी ने दी मुझे जिंदादिली
मैं अगर जिंदा रहूँ, तू भी सदा जिंदा रहे

प्यार से सुलझाइये, हल गुत्थियां हो जायेंगी
जब तलक संसार है ये फलसफा जिंदा रहे

मेरी कविता, मेरे दोहे, गीत मेरे और ग़ज़ल
मैं रहूँ या न रहूँ मेरा कहा जिंदा रहे

चल उठ नेता

चल उठ नेता तू छेड़ तान!
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

तू नए-नए हथकंडे ला!
वश में अपने कुछ गुंडे ला!
फ़िर ऊँचे-ऊँचे झंडे ला
हर एक हाथ में डंडे ला
फ़िर ले जनता की ओर तान
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

इस शहर में खिलते चेहरे क्यों?
आपस में रिश्ते गहरे क्यों?
घर-घर खुशहाली चेहरे क्यों?
झूठों पर सच के पहरे क्यों?
आपस में लड़वा, तभी जान!
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

तू अन्य दलों को गाली दे!
गंदी से गंदी वाली दे!
हरपल कोई घात निराली दे!
फ़िर दाँत दिखाकर ताली दे!
फ़िर गा मेरा “मेरा भारत महान”
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

प्रतिपक्ष पे अनगिन खोट लगा!
ना सम्भल सके यूं चोट लगा!
कुछ भी कर काले नोट लगा!
हर तरफ़ वोट की गोट लगा!
कुर्सी ही अपना लक्ष्य मान!
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

तेरा हर लफ्ज़ मेरी रूह को छूकर निकलता है

तेरा हर लफ्ज़ मेरी रूह को छूकर निकलता है.
तू पत्थर को भी छू ले तो बाँसुरी का स्वर निकलता है.

कमाई उम्र भर कि और क्या है, बस यही तो है
में जिस दिल में भी देखूं वो ही मेरा घर निकलता है.

मैं मंदिर नहीं जाता मैं मस्जिद भी नही जाता
मगर जिस दर पर झुक जाऊं वो तेरा दर निकलता है

ज़माना कोशिशें तो लाख करता है डराने की
तुझे जब याद करता हूँ तो सारा दर निकलता है.

यहीं रहती हो तुम खुशबू हवाओं की बताती है
यहाँ जिस ज़र्रे से मिलिए वही शायर निकलता है.

सयानी बिटिया

जबसे हुई सयानी बिटिया
भूली राजा-रानी बिटिया

बाज़ारों में आते-जाते
होती पानी-पानी बिटिया

जाना तुझे पराये घर को
मत कर यों मनमानी बिटिया

किस घर को अपना घर समझे
जीवन-भर कब जानी बिटिया

चॉकलेट भैया को भाये
पाती है गुड़धानी बिटिया

सारा जीवन इच्छाओं की
देती है कुर्बानी बिटिया

चौका, चूल्हा, झाडू, बर्तन
भूल गई शैतानी बिटिया

हल्दी, बिछूए, कंगल मेंहदी
पाकर हुई बिरानी बिटिया

हर लेती हैं बेटियाँ 

सहती रहती रात-दिन, तरह-तरह के तीर
हर लेती हैं बेटियाँ, घर-आँगन की पीर ।

सौदागर इस देश के, रहते मद में चूर
बिटिया को महँगा लगे, माथे का सिंदूर ।

नहीं दुपट्टे की तरफ़, उठे किसी के हाथ
बहना घर से जो चले, भैया चलता साथ ।

माँग भरी ना अब तलक, गया रूप-रंग-नूर
उनकी माँगों ने किये, सपने चकनाचूर ।

ख़ून-पसीना जोड़कर, लो दहेज के साथ
बिटिया के करने चला, दुखिया पीले हाथ ।

आँगन की तुलसी जली, धूप पड़ी यों तेज़
इक तुलसी ससुराल में, झुसली बिना दहेज।

बाबुल की छत ले गया, आख़िर कन्यादान
बेटी के घर के लिए, अंजुम बिका मकान ।

तेरे पाँवों से जगें, घर-आँगन के भाग
जा बेटी परदेस जा, जुग-जुग जिये सुहाग

घर-आँगन में हर तरफ़, एक मधुर गुंजार
हँसी-ठिठोली बेटियाँ, व्रत-उत्सव-त्यौहार ।

कुछ मंत्रों ने रच दिये, नये-नये संबंध
बाबुल के अँगना खिली, पिय-घर चली सुंगध ।

बापु, माँ, भाई, बहन, रोये घर-संसार
चिड़िया चहकी कुछ बरस, उड़ी पिया के द्वार ।

बेटी गंगा की लहर, बेटी कोमल राग
जहाँ रहे, हर हाल में, रौशन करे चिराग ।

बेटी, चुप्पी साध ले, मत कर व्यर्थ सवाल
पीहर पर भारी पड़े, क्यों इक दिन ससुराल

इत्ते जादा मत इतराओ नेताजी

इत्ते जादा मत इतराओ नेताजी
सोच-समझ कैं गाल बजाओ नेताजी

धूल नायं जो भगत सिंग के पाँयन की
बाकूं भगत सिंग बतलाओ नेताजी

राजनीत के कीचड़ में तुम लिपट रए
रगड़-रगड़ कैं जाय छुड़ाओ नेताजी

तुम जे सोचौ सब बकबास सुनिंगे हम
भौत है गयौ अब रुकि जाओ नेताजी

नई -नई छोरिन के चक्कर में फसि कैं
मत पलीत मट्टी करवाओ नेताजी

तुम तौ खाओ दूध-मलाई जी भरिकै

तुम तौ खाओ दूध-मलाई जी भरिकै
हमकों खाय रई महँगाई जी भरिकै

कल कूँ सिगरे सिंथेटिक ही पीओगे
गैया काटें रोज कसाई जी भरिकै

नेता – अफसर लूटि रए हैं जनता कूँ
चोर-चोर मौसेरे भाई, जी भरिकै

होय न सत्यानास जब तलक भारत कौ
हिन्दू-मुस्लिम करौ लड़ाई जी भरिकै

जे छिछोरगर्दी तुमकूँ लै ही डूबी
चौराहे पै भई पिटाई जी भरिकै

वो आरक्षन पायकेँ अफसर बनि बैठे
‘अंजुम’ तुमनें करी पढ़ाई जी भरिकै

करे कोशिश अगर इंसान तो क्या क्या नहीं मिलता 

करे कोशिश अगर इंसान तो क्याक्या नहीं मिलता
वो उठकर चल के तो देखे जिस रस्ता नहीं मिलता !

भले ही धूप हो, कांटे हों पर चलना ही प़डता है
किसी प्यासे को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता !

कहें क्या ऐसे लोगों से जो कहकर ल़डख़डाते हैं
कि हम आकाश छू लेते मगर मौका नहीं मिलता !

कमी कुछ चाल में होगी, कमी होगी इरादों में
जो कहते कामयाबी का हमें नक्शा नहीं मिलता!

हम अपने आप पर यारो भरोसा करके तो देखें
कभी भी ग़िडग़िडाने से कोई रुतबा नहीं मिलता!

खिड़कियों की साजिशों से 

खिड़कियों की साजिशों से कुछ हवा की ढील से
झोपड़ी जल ही न जाए देखना कन्दील से

एक छोटा ही सही पर घाव देकर मर गई
यूँ वो चिड़िया अन्त तक लड़ती रही उस चील से

तू कचहरी की तरफ चल तो दिया पर सोच ले
फाँस गर निकली तेरी निकलेगी प्यारे कील से

करे कोशिश अगर इन्सान तो क्या-क्या नहीं मिलता

करे कोशिश अगर इन्सान तो क्या-क्या नहीं मिलता
वो उठकर चल के तो देखे जिसे रास्ता नहीं मिलता

भले ही धूप हो कांटे हों पर चलना ही पड़ता है
किसी प्यासे को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता

कमी कुछ चाल में होगी , कमी होगी इरादों में
जो कहते कामयाबी का हमें नक्शा नहीं मिलता

कहें क्या ऐसे लोगों से जो कहकर लड़खड़ाते हैं
की हम आकाश छू लेते मगर मौक़ा नहीं मिलता

हम अपने आप पर यारो भरोसा करके तो देखें
कभी भी गिडगिडाने से कोई रुतबा नहीं मिलता

Share