अशोक भाटिया की रचनाएँ

लिखना

लिखना
अपने को छीलना है
कि भीतर हवा के आने–जाने की
खिड़की तो निकल आए

लिखना
शब्द बीनना है
कि भीतरी रोशनी
दूसरों तक यों पहुँचे
कि भीतरी किवाड़ खोल दे

लिखना
एक उगना है
एक उगाना है
कि शब्द जहाँ पड़ें
उग आएँ हर ज़मीन में
पनप आएँ रेगिस्तानों में भी
और खींच लाएँ पानी को

लिखना आख़िर
पानी तक पहुँचना है ।

ज़िंदगी की कविता

कविता
हर कहीं है
जीवन की लय में
थिरकती कविता की पदचाप
सुन सको तो सुनो

खुरपी की लय से
मिट्टी गोड़ता माली
भरता है पौधे में संगीत
तो झूमते हैं फूल

किसान की लय पर
उसके हल–बैल
भरते हैं ज़मीन में उमंग
तो झूमती हैं बालियाँ

कामगार के हाथों से होकर
कविता
ढलती है पुर्जों में
अनवरत संगीत की लय पर
कविता
घरैतिन के हाथों से होकर
तवे पर पहुँचती है
तो बनती है रोटी
कविता
बच्चे की किलकारी की तरह
हर कहीं है
नदी की उच्छल तरंगों में
चिड़िया के पंखों में
कविता है
तभी एक उड़ान है

जहाँ कहीं भी कविता है
वहाँ जीवन का
ज़िंदा इतिहास रचा जा रहा है….

जवाब

गर्मी
स्वेटर की ऊन में है
या
मोंटे कार्लो की स्लिप में ?
जान
जीन्स के कपड़े में है
या
अडीडास के नाम में ?

स्वाद
बेसन की भुजिया में है
या
हल्दीराम के पैक में ?

पीठ पर ऊन उगाती भेड़
कपड़ा बनाते कामगार
चना उगाते किसान को
जवाब नहीं सूझ रहा

कला का जन्म

कैसे फूटती है कला
चित्र बनाते तुम्हारे नन्हे हाथ
जानते तो नहीं
लेकिन लिए हैं अपने में
सृष्टि का मासूम सौंदर्य

सूर्य का आलोक उस दिन
तुम्हारे मन से होकर
फैल गया था
तुम्हारे बनाए चित्र में
सुबह के रूप में

पेंटिंग की
गीले ताज़े रंगों की चमक
और भागती–हॉंफती
पेंटिग थमाती
तुम्हारी आँखों की चमक में
कोई गहरा रिश्ता था

जीने की दहलीज पर
तुम्हारा प्रमाण है यह पेंटिंग
ईश्वर यदि है तो उसने
ऐसे ही सौंदर्य को रचा होगा
जैसे तुमने
एक निश्छल उमंग से
ब्रश को पकड़कर
अपनी उंगलियों में कसा होगा
और खड़ी की होंगी
पहाड़ और पेड़ों की पंक्तियाँ
झोपड़ी और पगडंडियाँ

तुम्हारी पेंटिंग
नहीं मानती बंधन
उसका पुरस्कार
तुम्हारी आँख की चमक है
तुम्हारी सात्त्विक दमक है

हम और रस्सियाँ

जब से मैं ज़मीन तोड़कर
उठना शुरू हुआ हूँ ज़मीन पर
मैंने अपने और सबके इर्द–गिर्द
रस्सियों का उलझा हुआ जाल
बुना हुआ पाया है
रस्सियाँ कुछ हर जगह हैं
रस्सियाँ कुछ कहीं–कहीं हैं
रस्सियाँ नई, पुरानी, सख़्त, मुलायम
रस्सियाँ मज़बूत और ढीली

आदमी को बाँध लेती हैं
कुछ रस्सियाँ
आदमी ख़ुद बँधता है
कुछ रस्सियों से
और इन सबके बीच
वह उठने लगता है
तन जाता है शामियाने की तरह

ज़मीन और आदमी को
जोड़ती हैं रस्सियाँ
तो क्या आदमी की नियति यही है
कि वह कस जाए
यों कसता जाए
आसपास फैली हुई रस्सियों के बीच
सिर्फ़ कसा–तना शामियाना कुछ नहीं है
रस्सियाँ ढीली पड़ जाएँगी
रस्सियाँ टूट जाएँगी
रस्सियाँ खुल जाएँगी
रस्सियाँ तोड़ दी जाएँगी
रस्सियाँ नहीं हैं सब कुछ
यह शामियाने और रस्सियों का
संबंध ही सब कुछ है
सिर्फ़ कसा–तना शामियाना कुछ नहीं है
इतिहास इसे देखकर चल देगा आगे
वह तो यह देखेगा
कि किन रस्सियों की गाँठ
स्वीकार लीं तुमने
या धिक्कार दीं तुमने

पहाड़ : दो कविताएँ

1.
एक पहाड़ यह है
कंधों को दूर तक फैलाए
मौसम की बर्फ़ को
अपनी हरियाली पर झेलता हुआ

यह पहाड़ वह है
अपनी हरियाली में आकण्ठ डूबा
मौसम के सामने कंधे झुकाए
बर्फ़ को ज़मीन पर धकेलता हुआ
तुम्हें कैसा पहाड़ बनना है ?

2.
अपनी ज़मीन पर
मज़बूती से क़दम रख
आदमी उठता है सतह से ऊपर
तो बनता है एक मज़बूत पहाड़
मज़बूत पहाड़ ही महान होता है
देता है दिल में जगह
लोगों को उठाता है अपने कंधों पर

पहाड़ की तरह
मज़बूत आदमी ही
ख़ुशगवार मौसम के लिए
फैलाता है हरियाली

एकजुट

आकाश में
नहीं है कोई लकीर
सारे तारे मिलकर देते हैं
रोशनी और सौंदर्य और कल्पना
सबके लिए

प्रकृति में
नहीं है कोई लकीर
कितने पेड़ जनती है पृथ्वी
और वे सब रचते हैं
हरियाली और छाया और फल
सबके लिए

सूर्य के लिए
नहीं है कोई बंधन
वह कितनी ऊर्जा की सुइयाँ
चुभोता है अलसाई ज़मीन को
और जनता है जीवन
सबके लिए

बादल नहीं मानते
प्रांत या दिशा का बंधन
वे जब बहते हैं
तो बरसते हैं सब ओर सुदूर
उर्वरा करते हुए ज़मीन को
सबके लिए

हम भी देश और दुनिया को
पेड़ और सूर्य
आकाश और बादल की तरह
सींच सकते हैं ।

मध्यवर्ग : चार कविताएँ 

1.
एक स्याह सुरंग से निकल–निकल कर
चमड़े की छाती ताने आते हैं वे
सुख बटोरने के लिए
सच्चाइयों के आर–पार
घने पर्दों को लटकाए
चले जातें हैं वे

इन पर्दों के बीच
इतिहास की गति से बचने की
अपनी कमज़ोरियाँ भुलाने
ज़िंदगी को लड़ाई की बजाय
स्थिर सुख में बदलने की साजिश के अगुआ
सुख को सभ्यता मानकर
एक मुर्दा संस्कृति के बीच
अपने सिरों पर गिद्धों की तरह बैठे हुए
चले जाते हैं वे
एक स्याह सुरंग से
दूसरी स्याह सुरंग तक

2
पैंतीस की उम्र में
मैं बड़ा सुखी हूँ
बाल कटी बीवी
टी०वी०, बच्चे, फ्रिज के बाद
अब अपना मकान है मेरे पास
पूँजीपतियों के शेयर हैं
कुछ रोमानी सपने
और कामुक कल्पनाएँ
सफल कर लिया है जीवन मैंने

3.
बाबूजी पैदा हुए थे
क्या कर गए ?
कॉलेज में पढ़े
नौकरी की
इधर का उधर किया
पेंशन ली
और मर गए ।

बाबूजी पैदा हुए थे
क्या कर गए !

4.
हम हैं असली इन्सान
मिट्टी में, गारे में, पुर्जों में
घिसटते रहना भी कोई ज़िंदगी है !
देखो, उनके पास
शानदार कोठी है, कार है…

आलीशान बंगलों में
बन्द होके रहना
किसी से सुनना न कहना भी
कोई जिंदगी है !
देखो, वे मेहनत करते हैं
मिट्टी में कितनी
खुली तरह जीते हैं…..

हम हैं असली इन्सान
दोनों से अलग
ज़िंदगी, गति, इतिहास से बचते हुए
इस ज़मी के मेहमान !

आज़ादी

मुझे बोलने दिया जाए
मुझे क्रोध करने दिया जाए
मुझे स्त्री और देश से
प्रेम करने दिया जाए
मुझे फेफड़े–भर
ऑक्सीजन लेने दी जाए
मुझे हर क़िताब पढ़ने का
अधिकार दिया जाए
मुझे इतिहास जानने दिया जाए
मुझे सदियों से बनाई गई
स्याह सुरंगों से बाहर निकलने दिया जाए
मुझ अच्छे–बुरे लोगों से
मिलने दिया जाए
मुझे सौन्दर्य को महसूस करने दिया जाए
मुझ पर जीने की शर्तें न लगाई जाएँ
मुझे ज़िंदगी से सुख छीनने दिया जाए ।

रचना का जन्म

रचना का जन्म
एक लम्बी यात्रा है, दोस्त
इसे आसान मत समझो

नदी की यात्रा से पहले भी होती है
यात्रा
नदी की यात्रा के बाद भी होती है
एक रचना
इन सबकी साँझी यात्रा होती है
अन्तहीन….

रचना सिर्फ़ शब्दों की नदी नहीं है
छलछलाते पानी के किनारे
टहल सकते हैं कुछ अनजान लोग
इसकी ठंडक पाने के लिए
पर नदी वहीं तक नहीं
न उसका गंतव्य दर्शक ही हैं
उसे तो पैदा करनी है
ऊर्जा से लहकती पीढ़ी
नदी तभी नदी है

इसलिए मेरे दोस्त
रचना आसान नहीं है
प्रकृति जुटी रहतीं है
समुद्र से बादल
और बादल से समुद्र होने की जद्दोजहद में
तब कहीं पारदर्शी जल–कण
अटकते हैं बादलों में
हर बादल में नही होता
भार सहने का माद्दा
देखो तो कितने जल–कण
दे सकता है तुम्हारा चेतना–समुद्र

बादल परत–दर–परत
घुमड़ते–गरज़ते हैं
प्रचण्ड हवाओं का दबाव सहते
टकराते–छितराते
तब कहीं समुद्र का प्रतिरूप
पृथ्वी को सौंपते हैं

कुछ बादल बरसते हैं
पत्थरों चट्टानों पर
कुछ मेंढुका नक्षत्र से आकर
उथले–उथले छू जाते हैं ज़मीन को
अपनी शक्तिहीनता दिखाते हुए

चेतन समुद्र की शक्ति
जब रचती है शब्द–कण
तभी शब्द–कण
बादल होकर नदी में बदलते हैं
नदी–रूप वह शक्ति
भागती है गन्तव्य की ओर
रास्ता बनाती हुई

नदी केवल शब्द–समूह नहीं है
वह तभी नदी है
जब कूलों के बीच बहती हुई
रमती है वह खेत की माटी में
बरहा के बीच से होकर
प्रतीक्षारत अंकुर को अमृत दे
बालियों को लहलहा देती है

रचना की यह यात्रा
समुद्र से हरियाली तक की
शक्ति–यात्रा है
इसे आसान मत समझो, मेरे दोस्त !

यात्राएँ-1

तुम तीनों
किधर जा रहे हो भाई ?

उधर पतझड़ है
रेत की चमक है
अँधेरा है

तुम तीनों
किधर जा रहे हो भाई ?

एक तुम
जो सिर्फ़ बोल लेते हो
और बोलते–बोलते
सब सोख लेते हो

और तुम, जो देख लेते हो
और बस सोच लेते हो

और एक तुम
जो निचोड़कर डाल दिए जाते हो
कँटीले तारों पर सूखने को
जो सब सह लेते हो
किसी तरह बह लेते हो

तुममें से
मुँह से
सोच से
हाथ से
पूरा आदमी कौन है
पूरा आदमी बनेगा
सोच को हाथ
हाथ को सोच का साथ देने में
सोच और हाथ को
अपनी आव़ाज देने में
पूरा आदमी बनेगा!
तुम तीनों
किधर जा रहे हो भाई ?

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