अशोक ‘मिज़ाज’ की रचनाएँ

ख़त की सूरत में मिला था जो वो पहला काग़ज 

ख़त की सूरत में मिला था जो वो पहला काग़ज़
रात भर जाग के सीने से लगाया काग़ज़

एक आहट सी हुई चौंक के देखा मैंने
एक पत्थर में था लिपटा हुआ ख़त सा काग़ज़

कोई इस दिल पे मुहब्बत की ग़ज़ल लिक्खेगा
काम आयेगा किसी रोज़ ये कोरा काग़ज़

आपका नाम किसी और के संग लाया था
लाल स्याही में छपा ऐक सुनहरा काग़ज़

ग़म का इज़हार कुछ इस तरहा किया था उसने
इक लिफ़ाफे में मिला था मुझे भीगा काग़ज़

अब ख़ुशी है न कोई ग़म न तमन्ना है मिज़ाज
ज़िंदगी आज भी है जैसे कि कोरा काग़ज़

हम फ़क़ीरों की कोई फ़रियाद क्या?

हम फ़क़ीरों की कोई फ़रियाद क्या?
ज़िन्दगी की आस क्या औलाद क्या?

इश्क़ में आबाद क्या बरबाद क्या?
रोमियो क्या क़ैस क्या फ़रहाद क्या?

फ़िक्र माज़ी की भला हम क्यंू करें?
और होना है अब इसके बाद क्या?

आँच के आगे सभी मजबूर हैं
काँच क्या है संग क्या फ़ौलाद क्या?

बुलबुलों को कुछ ख़बर होती नहीं?
सोचता है आज का सैयाद क्या?

इक सबक़ हमने पढ़ा था साथ में
आपको कुछ भी नहीं है याद क्या?

शाइरों को एक ही गम इक खुशी
और कुछ भी है ग़ज़ल के बाद क्या?

मुहब्बतों में किसी से न कुछ गिला रखना 

मुहब्बतों में किसी से न कुछ गिला रखना
सिवा ख़ुदा के किसी का न आसरा रखना

ग़म और ख़ुशी के दऱख्तों में फ़ासला रखना
हमारे प्यार का गुलशन हरा भरा रखना

उजाला करने को दीपक जला लिया दिल में
अब इसकी आँच भी सहने का हौसला रखना

तुम्हारे हाथ से शीशा भी एक टूटा था
हमेशा याद वो छोटा सा हादसा रखना

मिलूँ जो राह में नज़रों को तुम झुका लेना
दुआ सलाम का रिश्ता युँ ही सदा रखना

‘मिजाज’ आज वफ़ा को तेरी ज़रूरत है
जो हो सके तो निभाने का सिलसिला रखना

ज़िन्दगी से न कुछ गिला करना

ज़िन्दगी से न कुछ गिला करना,
हर मुसीबत का सामना करना।

जब सफ़र ही सफ़र की मंजिल है,
सुब्ह का इंतज़ार क्या करना।

मंज़िलें ख़्वाब बनके रह जायें,
इतना बिस्तर से प्यार क्या करना।

मेरे हिस्से में चंद ग़ज़लें हैं,
क़ाग़जों का हिसाब क्या करना।

मैं समन्दरों का मिज़ाज हूँ 

मैं समन्दरों का मिज़ाज हूँ, अभी उस नदी को पता नहीं,
सभी मुझसे आके लिपट गयीं, मैं किसी से जाके मिला नहीं।

मेरे दिल की सिम्त न देख तू, किसी और का ये मुक़ाम है,
यहाँ उसकी यादें मुक़ीम हैं, ये किसी को मैंने दिया नहीं।

मुझे देखकर न झुका नज़र, न किबाड़ दिल के तु बंद कर
तेरे घर में आऊँगा किस तरह, के मैं आदमी हूँ हवा नहीं।

मेरी उम्र भर की थकावटें, तो पलक झपकते उतर गयीं,
मुझे इतने प्यार से आज तक, किसी दूसरे ने छुआ नहीं।

मेरे दिल को ़ख़ुशबू से भर गया, वो क़रीब से यूँ गुज़र गया,
वो मेरी नज़र में तो फूल है, उसे क्या लगा मैं पता नहीं।

ये मुक़द्दरों की लिखावटें, जो चमक गयीं वो पढ़ी गयीं,
जो मेरे क़लम से लिखा गया, उसे क्यूँ किसी ने पढ़ा नहीं।

ये ‘मिज़ाज’ अब भी सवाल है, कि ये बेरूख़ी है कि प्यार है,
कभी पास उसके गया नहीं, कभी दूर उससे रहा नहीं।

शोर आवाज़ से भी बढ़कर है

शोर आवाज़ से भी बढ़कर है
ख़ामुशी गुफ़्तगू से बेहतर है

मैं पहाड़ों को रौंद आया हूँ
अब मेरे सामने समन्दर है

मुझको सोना बना दिया उसने
वो तो पत्थर था अब भी पत्थर है

मेरी आहें भी सर्द निकली हैं
आग सीने में इतने अन्दर है

मेरी शुहरत पे हैरतें कैसी
चाँदनी धूप का ही पैकर है

इक ग़ज़ल तुझ पे मह्रबाँ हैं ‘मिज़ाज’
ये सभी को कहाँ मयस्सर है।

तुम कभी काम ये करने नहीं देते मुझको 

तुम कभी काम ये करने नहीं देते मुझको
दिल के शीशे में सँवरने नहीं देते मुझको

फूल होकर भी किसी काम न आता शायद
तुम जो ख़ुशबू सा बिखरने नहीं देते मुझको

अब मेरे पाँवों में काँटे नहीं चुभ पायेंगे
लोग पलकों से उतरने नहीं देते मुझको

अपनी मंज़िल की लगन और ये क़दमों के निशाँ
एक लम्हा भी ठहरने नहीं देते मुझको

थोड़ी सी आग उसके भी सीने में डाल दे

थोड़ी सी आग उसके भी सीने में डाल दे
मुझको भुलाने वाले को मेरा ख़याल दे

कुछ फ़ायदा न होगा न माने तो रो के देख
दो चार बूँद ओर समन्दर में डाल दे

आवाज़ दे के देख चली आयेगी बहार
ख़ामोशियों को बोलते लफ़्जों में ढाल दे

हल ढूँढने में अपनी सभी उम्र फूँक दें
इन पीढ़ियों को ऐसे न जलते सवाल दे

उस ज़ख़्म के लहू से मैं लिखता हूँ हर ग़ज़ल
ऐसा न हो कि कोई वो खंज़र निकाल दे

अपना सफ़र ‘मिजाज’ ज़ियादा तवील है
क़दमों को अपने और हवाओं की चाल दे

भूलना भी चाहा था

भूलना भी चाहा था, कोशिशें भी की लेकिन, आज तक नहीं भूले
ज़िंदगी के कुछ लम्हे, जिंदगी के कुछ क़िस्से, जिंदगी के कुछ चेहरे

दिल में कुछ परिंदे हैं सब के सब ही ज़ख्मी हैं, मैंने पाल रक्खे हैं
इनमें ख़ासियत ये है, दिल से चिपके रहते हैं, और कहीं नहीं जाते

मेरे दिल में मत झाँको, दिल में और क्या है अब, मैं तुम्हें दिखाऊँ क्या
बेबसी की कुछ ग़ज़लें, बेकली की कुछ नज़्में कुछ घुटे हुये नग़्मे

जिंदगी तवाइफ़ सी पहले रोज़ हँसती थी, और ख़ूब गाती थी
जबसे मैं हुआ मुफ़लिस, उसके पाँव के घुँघरू, अब कभी नहीं बजते

इक फ़कीर ने मुझको, एक दिन दुआ दी थी, जा तेरा भला होगा
और मैं उसी दिन से आज तक परेशाँ हूँ, मोल की दुआ ले के

हम ‘मिज़ाज’ सोना हैं, दोस्त हों कि दुश्मन हों सब हमें परखते हैं
आग की कसौटी पर, इम्तहान देने से, हम कभी नहीं डरते

Share