अशोक सिंह की रचनाएँ

सब-कुछ तय कर लिया जाएगा तय करने से पहले

सब तय है कि
सब-कुछ तय कर लिया जाएगा
तय करने से पहले

तय कर लिया जाएगा कि
क्या करवाना है तय
कैसे और किसके पक्ष में

यह भी तय रहेगा कि
कौन रखेगा प्रस्ताव
कौन समर्थन करेगा
लिखेगा कौन सभा की कार्यवाही
कौन लिखवाएगा, क्या लिखवाएगा
सब-कुछ

सब-कुछ पहले से तय रहेगा
और तयशुदा ढंग से
करवा लिया जाएगा सब-कुछ तय

तय किया रहेगा यह भी कि
कौन बोलेगा सभा में सबसे पहले
और कौन अन्त में
किसे, कितना और कब बोलने दिया जाएगा
इतना तक भी

इतना तक भी कि
कितना सच बोलना है
मिलाना है उसमें कितना झूठ
और कितनी डालनी है उसमें चासनी
कब-कब कितना और कैसे खींचनी है
भावुकता की डोर
कि सब-कुछ रहे सही सन्तुलित
और समानुपात में
सब-कुछ तय रहेगा पहले से

सब-कुछ तय रहेगा कि
कौन किस पर नज़र रखेगा
और कौन कब-कब
कहाँ से बैठकर बजाएगा तालियाँ
इस तरह जबकि तय है कि
सब-कुछ तय किया रहेगा
हम सब के तय करने से पहले
और उन्हीं का तय किया हुआ होगा
अन्तिम रूप से तय

तो क्षमा करना दोस्तो !
इस तयशुदा ढंग से प्रायोजित सभा में
शामिल नहीं हो सकता मैं तुम्हारे साथ
तुम्हें जाना है तो जाओ!

मैं तुम्हारे आतंक से मुक्त होना चाहता हूँ ईश्वर!

ईश्वर!
मैं नहीं जानता तुम कहाँ हो
कहीं हो भी या नहीं
यह भी नहीं जानता

वैसे भी तुम्हारे होने या न होने
के पचड़े में मैं नहीं पड़ना चाहता

तुम कहीं हो, तो भी ठीक
नहीं हो तो भी

मेरी समझ से मेरा तुम्हारा रिश्ता
सड़क पर चल रहे दो अनजान आदमियों की तरह है
जिन्हें अगले चौराहे पर मुड़ जाना है
अलद-अलग दिशाओं में
अपने-अपने काम पर जाने के लिए

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है
न ही डर है तुम्हारा
क्योंकि मुझे पता है
तुम्हारे होने से नहीं है हमारा अस्तित्व
बल्कि आदमी है तो ज़िन्दा हो तुम

डरता हूँ तो
तुम्हारे नाम का आतंक फैलाने वाले उन धर्माधिकारियों से
जो गर्भ में पल रहे शिशु तक का रक्त-तिलक लगा
जय-जयकार करते हुए लेते हैं तुम्हारा नाम

औरों की तरह मैं तुमसे कुछ मांगता-छांगता नहीं
न धन-दौलत, न शक्ति, कुछ भी नहीं

लेकिन मैं तुम्हारे आतंक से मुक्त होना चाहता हूँ, ईश्वर!
अगर सचमुच तुम कहीं हो और कुछ दे सकते हो
तो मुझे अपने आतंक से मुक्त करो, ईश्वर!

पहाड़ पर बैठे एक आदिवासी प्रेमी-युगल की बातचीत

अब हम कहां मिलेंगे फूलमनी
किस जंगल किस पहाड़ पर
मिलेंगे हम दोनों!

गाँव के पिछवाड़े का सारा जंगल
कट गया धीरे-धीरे
अब तो पहाड़ भी काटे जा रहे हैं !
देखो, न पिछले कुछ सालों में ही
न जाने कहां गायब हो गए इतने सारे पहाड़ !
थोड़े बहुत, जो बचे-खुचे हैं
वे हो गए हैं नंगे और बदरंग

इक्के-दुक्के जो रह गए अछूते कहीं दूर-दराज में
सुना है, वहाँ नक्सलियों का डेरा है
ख़तरे से ख़ाली नहीं है
वहाँ हम दोनों का मिलना
पता नहीं कब कोई पुलिस वाला
नक्सली कहकर पकड़ ले जायें हमें
जैसे अभी हाल में ले गए
काठी कुंड के सालदाहा पहाड़ी से
रूपलाल और निरोजनी को पकड़कर

अब वह समय नहीं रहा फूलमनी
नहीं रह गया वह सब कुछ अपना
यह जो बस्ती की सीमा के पार
छोटी-सी कुरुवा पहाड़ी भी थी अपनी
जिस पर कभी मिल लेते थे हम दोनों
गाय-बकरियाँ चराने के बहाने
अब वह भी “सृष्टि उद्यान’ में बदल गई

जहाँ न तो वे पलाश के पेड़ रहे
न बाँसों की झुरमुट
कँटीले तारों के बाड़ लग गये हैं
लग गया है गेट पर कड़ा पहरा वहाँ
अब वह पहाड़ी हमारी नहीं रही फूलमनी
मनोरंजन पार्क में बदल गई है
बाबुओं के बच्चों बहू-बेटियों के लिए
जहाँ हम जैसो को अन्दर जाने की मनाही है

देखा नहीं उस दिन
जब उसके पिछवाड़े बैठ हम दोनों
बतिया रहे थे अपना सुख-दुख
किस तरह पहरेदार ने चोरी के नाम पर
डाँट कर भगाया था हमें !

अब ऐसे में जब कहीं कोई सुरक्षित जगह
नहीं बची हमारे मिलने की
तुम्हीं बताओ फूलमनी
हम कहाँ मिलें तुमसे
किस जंगल
किस पहाड़ पर मिलें हम दोनों !

बस का इन्तज़ार करती लड़की

बस का इन्तज़ार करती लड़की
बस पड़ाव पर बैठी
उलट रही है पत्रिका के पन्ने
उसका वक़्त तो काटे नहीं कटता ।

लड़की देख रही है बार-बार घड़ी
जो बहुत धीरे चल रही है आज
उसे याद है कल बड़ी जल्दी हो गई थी शाम
जबकि और भी लम्बा होना चाहिए था कल का दिन ।

यह उसकी पिता की उम्र का आदमी
अख़बार की ओट से उसे घूर रहा है ।
उधर खड़े चार लड़कों ने
कभी क्या लड़की देखी नहीं ।

पान की गुमटी पर खड़ा
सिगरेट फूंकता आदमी
बेशर्मी की हद पार कर
देख रहा है लगातार…
काट रहे हैं चक्कर इर्द-गिर्द
दो नौजवान लड़के
सुना रहे हैं मोबाइल से अश्लील गाने
देखते तिरछी नजरों से बार-बार
बतिया रहे हैं न जाने क्या ।

एक-दो पुलिसवाले होने चाहिए
इस जगह पर
नहीं…. नहीं… पुलिसवाले भी तो….
एक निरीह सोच
रोज़-रोज़ कौंधती है दिमाग में
भीड़ भरे बस की तो बात ही अलग है ।

बेटियाँ

घर की बोझ नहीं होती हैं बेटियाँ
बल्कि ढोती हैं घर का सारा बोझ

वे हैं
तो सलामत हैं
आपके कुर्ते के सारे बटन
बची है उसकी धवलता

उनके होने से ही
चलते हैं आपके हाथ
और आपकी आँखें ढूँढ लेती हैं
अपनी गुम हो गयी कलम

घड़ी हो या छड़ी
चश्मा हो या कि अखबार
या कि किताबें कोट और जूते
सब कुछ होता है यथावत
बेतरतीव बिखरी नहीं होती है चीज़ें
ख़ाली नहीं रहता कभी
सिरहाने तिपाई पर रखा गिलास

वे होती हैं तो
फैला नहीं पाती हैं मकड़ियाँ जालें
तस्वीरों पर जम नहीं पाती धूल
कभी मुरझाते नहीं गमले के फूल

उनके होने पर
समय से पहले ही आने लगती है
त्योहारों के आने की आहट

वे हैं तो समय पर मिल जाती है चाय
समय से दवाईयाँ
और समय पर पहुँच जाते हैं आप दफ़्तर

उनके होने से ही
ताज़ा बनी रहती है घर की हवा
बचा रहता है मन का हरापन

माँ की रसोई

वक़्त के चूल्हे पर चढ़ी है
जीवन की हांड़ी
खौल रहा है उसमें
आँसू का अदहन

अभी-अभी माँ डालेगी
सूप भर दुख
और झोंकती अपनी उम्र

डबकाएगी घर-भर की भूख !

पेड़-1 

पेड़ के बारे में कुछ जानना हो तो पेड़ से नहीं
उस पर घोंसला लगाए बैठे पक्षियों से पूछो
पूछो उस थके-हारे मुसाफ़िर से
जो उसकी छाया में बैठा सुस्ता रहा है

उसकी शाखाओं से झूला बाँध झूलती
लड़कियों से पूछो
उन लड़को से भी जो उसकी फुनगी पर बैठ
चाभ रहे हैं फल
लकड़ी बिनती लकड़हारन से भी पूछो
पहाड़ तोड़ती पहाड़न से पूछो
यहाँ बैठ पगुराती गाय-बकड़ियों से पूछो

और पूछना हो तो
अभी-अभी चालीस कोस पालकी ढोकर ला रहे
चारो कहारों से पूछो
सबसे पूछो मगर
पेड़ के बारे में पेड़ से मत पूछो

याद रखो, पेड़
आदमी की तरह ख़ुद कभी
अपना बखान नहीं करते ।

पेड़-2

पेड़ कहाँ नहीं है
जंगल नदी पहाड़ से लेकर
घर के आगे-पीछे और
सड़कों के किनारे-किनारे तक

जहाँ जाओ वहाँ
दिख ही जाता है कोई न कोई पेड़

क्योंकि पेड़ जानता है
कि आदमी को हर कहीं उसकी ज़रूरत पड़ती है
इसलिए हर जगह उपस्थित होता है वह उसके लिए

पेड़-3

पहाड़ पर रहने से
पेड़ का दिल पत्थर नहीं हो जाता
और न ही विषधर के लिपटे रहने से विषैला

बभनटोली में हो या चमरटोली में
पेड़, पेड़ ही रहता है
वह पंडिताई का दम्भ नहीं भरता
और न ही चमरौंधी की हीनता आती है उसमें

पेड़ कभी जाति नहीं पूछते
और न ही किसी का धर्म जानने की
होती है उसमें जिज्ञासा
चाहे मुसलमानों के मुहल्ले में रहे या हिन्दुओं के !

पेड़-4 

यह सच है कि
आदमी की तरह उसकी आँखे नहीं होती
पर इसका मतलब यह तो नहीं कि
पेड़ अन्धे होते हैं, कुछ देख नहीं सकते
सुन नहीं सकते, बोल नहीं सकते
हँस-गा नहीं सकते, रो नहीं सकते पेड़ ?

अगर तुम ऐसा मानते हो
तो क्षमा करना
पेड़ों का मानना है कि तुम आदमी नहीं हो !

पेड़-5

पेड़ों का कहीं कोई घर नहीं होता
बल्कि पेड़ स्वयं होते हैं एक घर
पशु-पक्षी से लेकर आदमी तक के लिए

आँधी-पानी हो या बरसात
पेड़ रक्षा करते हैं सबकी
पर अफ़सोस
पेड़ सुरक्षित नहीं हैं अपने-आप में !

वे आग से नहीं डरते, आँधी-पानी से नहीं डरते
चोर-बदमाशों से नहीं डरते
ख़तरनाक़ आतंकवादियों से भी नही लगता उन्हें डर

वे डरते हैं –
आदमी के भीतर पनप रही सैकड़ों कुल्हाड़ियों से !

पेड़-6

पेडों ने सबको सब कुछ दिया
चिरैयाँ को घोंसला
पशुओं को चारा
मुसाफ़िर को छाया
भूखों को फल
पुजारी को फूल
वैद्य को दवा
बच्चों को बाँहों का झूला
चूल्हों को लकड़ी, घर को दरवाज़ा, छत, खिड़कियाँ
नेताओं, अफ़सरों को कुर्सियाँ

बदले में इन सबने पेड़ो को
अब तक क्या दिया ?

नहीं चाहकर भी आज
इसका हिसाब माँगते हैं पेड़ !

पेड़-7

इधर कविताओं में कम पड़ते जा रहे है पेड़
कम होती जा रही पेडों पर लिखी कविताएँ

पेडों को दु:ख है कि
उस कवि ने भी कभी अपनी कविताओं में
उसका जिक्र नहीं किया
जो हर रोज़ उसकी छाया में बैठ
लिखता रहा देश-दुनिया पर अपनी कविताएँ

पेडों को दु:ख है कि
उस हाथ ने काटे उसके हाथ
जिस हाथ ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए
और मारे उसने उसके सिर पर पत्थर
जिसको अक़्सर अपनी बाँहों में झूलाता
देता रहा अपनी मिठास

दु:खी हैं पेड़ कि
उस हाथ ने किए उसके हाथ ज़ख़्मी
जिसके ज़ख़्मी हाथों पर मरहम का लेप बन
सोखता रहा वह उसकी पीड़ा

पेड़ दुखी है कि
उनका दु:ख कहीं दर्ज नहीं होता
और न ही अख़बारों में आदमी की तरह
छपती हैं उसकी हत्या की खबरें !

दु:खी है पेड़ कि
सब दिन सबका दु;ख बाँटने के बावजूद
आज उसका दु:ख कोई नहीं बाँटता !

यहाँ तक कि उसकी छाया में बैठकर
वर्षों पंचायती करने वालों ने भी
कभी उनकी पंचायती नहीं की !

पेड़-8 

पेड़ पर लिखते-लिखते
कई लोग पेड़ हो गए
और बोलते-बोलते पेड़ की तरह मौन

पर अफ़सोस !
पेड़ों को लेकर
वर्षों से चल रही बहस में शामिल लोग
आज पेड़ क्यों नहीं हो जाते ?

पेड़-9

पेड़ों की भी अपनी दुनिया है
अपना एक समाज
उन्हें भी भोजन चाहिए, पानी चाहिए
हवा चाहिए, धूप चाहिए
और चाहिए तनकर खड़ा होने के लिए
थोड़ी-सी जगह

अपना सुख-दुख बतियाने के लिए
रिश्ते-नाते, पड़ोसी भी

निरन्तर अकेले पड़ते जा रहे पेड़
पूछते हैं हमसे
अगर उनकी तरह हमें भी
बिना रिश्ते-नाते-पड़ोसी के
अकेले रहना पड़े कहीं
तो कैसा लगेगा हमें ?

पेड़-10

औरों की तरह पेडो़ को भी
ईश्वर से शिकायत है

शिकायत है कि
ईश्वर ने उसे पेड़ क्यों बनाया ?

अगर बनाया ही तो
क्यों नहीं दिए हाथ-पैर-जुबान
ताकि डटकर कुल्हाड़ियों का सामना कर सकते
कर सकते जबाब-तलब
आदमी से आदमी की तरह !

ख़ैर, जो दिया सो दिया
इतना तो कर ही सकता है ईश्वर अभी भी
कि उस आदमी के हाथों का फल-फूल
स्वीकार नहीं करे कभी
जिन हाथों ने कभी कोई फल-फूल तक के
पेड़ नहीं लगाए !

पेड़-11

पेड़ आत्मकथा लिखना चाहते हैं
बयान देना चाहते हैं आदमी की तरह
आदमी की अदालत में

दिखा-दिखाकर अपना ज़ख़्म
दर्ज कराना चाहते हैं अपनी शिकायत

यूनियन बनाना चाहते हैं पेड़
हड़ताल पे जाना चाहते हैं

आन्दोलन करना चाहते हैं
आदमी के बढ़ते जुल्म के ख़िलाफ़
हथियार उठाकर

पर अफ़सोस !
ऐसा कुछ कर नहीं पा रहे पेड़
क्योंकि पेड़, पेड़ हैं
आदमी नहीं !

पेड़-12

एक ऐसे समय में
जब पेड़ आदमी नहीं हो सकते
और न ही आदमी पेड़

पेड़ आदमी से पूछना चाहते हैं
विनम्रता से एक बात कि —
अगर उसकी जगह आदमी होता
और आदमी की जगह वह
तो आज उस पर क्या बीत रही होती ?

कहो न ! चुप क्यों हो ?
क्या बीत रही होती तुम पर
अगर आदमी के बजाय तुम पेड़ होते ?

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