असद ज़ैदी की रचनाएँ

फटी हुई अरज़ी 

धीरे धीरे यह महामारी गुज़र जाएगी
इसी बीच आएगी मर्दुमशुमारी

वह पन्द्रहवीं बार आ रही होगी
आफ़त की तरह, जो बच रहे उन्हें समेटने
वह राष्ट्र बनाने जो अब नहीं बना तो कब बनेगा
2031 किसने देखा है

यह जनगणना है कि जनसंहार
किसी ने 1872 में नहीं पूछा था अंग्रेज़ बहादुर से
कि आप कौन होते है तय करने वाले हम कौन हैं
कि अब से चुन लें सब एक बस एक पहचान
कौन हिन्दू है कौन सिख कौन मुसलमान
क्यों रंग रहे हैं संख्याओं को ख़ून से

2021 में कौन पूछेगा आज की सरकार से
वाम नहीं पूछेगा मध्य नहीं पूछेगा तो क्या
दक्षिण पूछेगा दक्षिण से कि तुम कौन होते हो
कहने वाले कि कौन नागरिक है कौन अनागरिक

क्या बस कविता पूछेगी यह सवाल, क्या वही अरज़ी देगी
जनगणना आयोग को कि महामहिम इसे मुल्तवी करें
कि लोकतंत्र का हित फ़िलहाल इसी में है
अब जबकि सब कुछ बर्बरों के क़ब्ज़े में है
आपने अभी गिनती को स्थगित नहीं किया तो
हमारा वतन हमें ही डुबो देगा हमारे ख़ून में

क़रीने से तीन हिस्सों में फटी अरज़ी
दे दी जाएगी तुम्हारे हाथ में
कोई हमदर्द मुंशी कहेगा डियर सर
असली गिनती जहाँ होती है वह कोई और दफ़्तर है
और वह गिनती तो पहले ही हो चुकी वहाँ जाइए
इस आयोग के दफ़्तर में सर फोड़ने से क्या हासिल ?

पुरातत्त्व 

मुझे अक्सर तलब होती है
ग्वार की फली सेम की फली
अरवी के पत्ते देसी टिमाटर की
तरसता हूँ हर मौसम
जामुन सीताफल झड़बेरी को
अरे, उस खिरनी को जिसे अब
पहली नज़र में शायद न पहचानूँ
पर जो खारी बावली के फुटपाथ पर
मुझे पहचान ले और सोचे यह उजबक
कहाँ चला जाता है अजनबी बना
जो मेरे लिए बेमौसम तरसा करता था

ईसा की इक्कीसवीं सदी के दो दशक
पूरे हो रहे हैं दो बदमाश मुल्क की जान पे हैं
इनके पीछे कई करोड़ और भी हैं
उनकी मदद के लिए आ गई है महामारी
आदमख़ोर मनमोहिनी प्यारी राजदुलारी
करने शहरों बस्तियों को समतल और नाबाद
यह दौर अभी लम्बा चलेगा ख़ुशी से
सर्वसम्मति से कहते हैं टी० वी० चैनल पर
ग्यारह के ग्यारह नजूमी बिरहमन

दिल्ली में पहली बार कुछ नहीं होता
देस ही ऐसा है — नया भी पहले हुआ लगता है
क़त्ले आम हो कि महामारी कि भुखमरी,
कि शहर का सौन्दर्यीकरण, कि परिवार नियोजन
कोरोनावायरस पहले सेमिनार को रद्द करवाता है,
फिर उसे वेबिनार में बदल देता है
लाइव वर्कशॉप के इस निमंत्रण का मैं क्या करूँ
शहर की धरोहर पर ज़ूम के मंच से क्या बोलूँ

जिन्होंने देखी है, 1947-48 की दिल्ली
उनके सीनों में दफ़्न है एक और ही इतिहास
कैसे कहूँ यह बात
पुरातत्त्व और पर्यटन की इस कार्यशाला में

क्यों न पहनें औरतें गहने

क्यों न पहनें औरतें गहने

इस तरह हो सकती है एक कविता शुरू
सोचा भूल न जाऊँ तो लिख लिया
एक काग़ज़ के पुरज़े पर
जो बाजी के यहाँ छूट गया
फिर मैं भी उसे भूल गया ।

काग़ज़ के पुरज़े जीते हैं
अराजक और रहस्यमय जीवन ।

एक बरस बाद उसने पूछा
“क्या लिखने वाले थे तुम ?”

बाजी कुछ बीमार थी, मैं उसका
हाथ थामे बैठा था, वह
आँखें बन्द किए लेटी थी ।

“कि किसलिए गहने नहीं पहनने चाहिए औरतों को ?
या कि उनकी मर्ज़ी है… बेशक पहनें ?”

मैं झेंप गया, कहा उससे :
“तंग न करो, बाजी !”

ओ बे-रहम बहना, पूछकर
तूने सारी बात बिगाड़ दी,
मेरे दिमाग़ में निबन्ध नहीं था,
कविता थी कविता !

अब खो गई हमेशा के लिए ।

आगमन 

मैं दिल्ली में दाख़िल हुआ
सराय रोहिल्ला के रास्ते से
मुझे मालूम था न वहाँ सराय है न रोहिल्ले
बस छोटी लाइन का मैला सा स्टेशन था उस वक़्त
जहाँ चेतक एक्सप्रैस का सफ़र ख़त्म हो जाता था
उतरते ही जान गया एक पुरातन शहर में आ गया हूँ
उससे भी पुरातन भीड़ के बीच क़िस्मत आज़माने

भूखा था बाहर निकलकर देखा क्या खाऊँ
एक आदमी ख़ोमचा लिए खड़ा था
उसने भाँप लिया कहा खाकर तो देख भइया !
और मैंने जाना कि रामलड्डू किसे कहते हैं

यहाँ नए आए हो? उसने पूछा

बताने लगा सुनो, नेहरू जी को मरे दस साल हुए
और बेशक मुल्क पर इन्दिरा गाँधी की पकड़ तगड़ी है
पर दिल्ली में चलती है हाल-फ़िलहाल
मदनलाल खुराना की केदार नाथ साहनी की
विजय कुमार मल्होत्रा की कँवरलाल गुप्ता की
चलने को तो थोड़ी बहुत
ब्रह्मप्रकाश, दलीप सिंह और भगत की भी चल जाती है

गुरु हनुमान का जैसा अखाड़ा पूरे भारत में कहीं नहीं
उसी के पट्ठे दुनिया में देश का नाम करेंगे देख लेना
हम जनसंघी नहीं, दिल से तो हम भैया कांगरेसी हैं
पर सच बात तुमको बतला रहे हैं

हर दिल्ली आनेवाले को आना चाहिए
बस में चढ़ना और उतरना फुर्ती से मगर बिना घबराए
यह सीख उसी से मिली
जेब का ख़याल रखो पर धक्कामुक्की से न डरो
कहा ये बातें याद रखने की हैं

मैंने इस चक्कर में दो बार रामलड्डू खा लिए
राजनीति का आरम्भिक सबक़ भी ले लिया
पहलवानी के शौक़ीन उस ख़ोमचेवाले से
पैसे दिए तो उसने ग़ौर से देखा मेरे तार तार बटुए को
कहा वह भी प्रवासी है मुझसे ज़्यादा पैसे नहीं ले रहा
पूछा कितने दिन टिकने का इरादा है

मैंने कहा फ़िलहाल तो आमद हुई है
रवानगी के बारे में अभी कैसे बताऊँ !

रतनलाल

नामवर सिंह से मेरा कभी मोहभंग नहीं हुआ

मोहभंग तो भूषण भारतेन्दु गुप्त द्विवेदी प्रसाद
चतुरसेन और रामविलास शर्मा से भी न हुआ था
तो नामवर प्रभृति इत्यादि वग़ैरा तथा अन्य से कैसे होता

समकालीन विभूतियों से मिलने में
देर हुई; कुछ के जीवन की सांध्य वेला थी
कुछ किसी और जगह की बस से निकल चुके थे

तवक़्क़ो मुझे भी किसी से कुछ न थी

मुझे मोहभंग की ख़ुराक पिलाई गर्म गर्म ताज़ा
दशक सत्तर के दो नौजवान प्रवासी बंगालियों ने
दारुण वंद्योपाध्याय भीषण चक्रवर्त्ती
भाँप गए थे मैं किसी नशे की तलाश में हूँ

कैसा लगा तुम्हें, ठीक रहा न ? बोले दोनों नर
मैंने कहा निहायत कड़वा और ख़राब
लानत है इस पर लानत है आप लोगों पर दादा
आप लोग रतनलाल जैसे हो सकते थे
आप उसके जैसा लिख सकते थे
आप उसके जैसा दिख सकते थे
आप काम के कवि हो सकते थे

कुछ दिन वे असमंजस में रहे
दोनों उदीयमान कवि और खोजी
रतनलाल रतनलाल कौन साला रतनलाल

फिर समझ गए कि कोई रतनलाल-
वतनलाल नहीं है
कि यह मेरे दिमाग़ की ख़ुराफ़ात है
कि मैं चम्बल के किनारे से आया
पूर्वी राजस्थान का साधारण ठग हूँ

आसिफ़ा के नाम

सलाम, अरे आसिफ़ा !

तुमको मेरा और तुम्हारी ख़ाला का सलाम पहुँचे !
चुन्नो और नवाब भी सलाम कहते हैं…
तुम इनको नहीं जानती मैं भी नहीं जानता… पर हैं बड़े ना-अहल ।
तमाम नालायक़ बच्चों का सलाम पहुँचे तुम्हें और तुम्हारे घोड़ों को
वे जलन से मरे जाते हैं घोड़ों को हरी चरागाह को
तुम्हारी आज़ादी को देख कर ।

अगर ये पहुँच गए तुम्हारे पास तो ख़ूब कोहराम मचाएँगे
चरागाह मैं दौड़ लगाएँगे घास को रौंदेंगे तुम मुस्कुराओगी
तुम्हें मालूम है घास कितनी कड़ियल और समझदार होती है ।

अगले वक़्तों के बुज़ुर्गों का तुमको प्यार — मीर-ओ-सौदा का
नज़ीर-ओ-अनीस और मिर्ज़ा नौशा का, अन्तोन और अल्ताफ़ का
और बीसवीं सदी के तुम्हारे पुरखों — नाज़िम-ओ-पाब्लो, फ़ेदेरीको, बर्तोल्त-ओ-रवि, फ़ैज़-ओ-गजानन का
मक़बूल-ओ-अमीर, महमूद, थियो यूनानी-ओ-अब्बास-ए-ईरानी का
उदास और मनहूस फ़रिश्तों — सेसर, फ़्रांत्स-ओ-पाउल का
शक्की पर रहमदिल—सआदत-ओ-रघुवीर-ओ-तदेऊश का
और हर क़िस्म की पुरानी ख़वातीन का — अन्ना, रोज़ा, अनीस, मरीना, ज़ोहरा, विस्वावा,
अख़्तरी, बाला, कमला, मीना, गीता, नरगिस, स्मिता… ये फ़ेहरिस्त ख़त्म होने को नहीं आती ।

तुमने इनमें किसी का नाम नहीं सुना, ये भी तुम्हें कहाँ जानते थे !
तो मामला बराबर हुआ । न इन्हें कोई शिकवा न तुम्हें कोई शिकायत !
सुकून, और बस यह उल्फ़त —

चंचल, शोख़, संजीदा, ख़ामोश
और मुर्दा । प्यार तो प्यार है… खोया प्यार भी हमेशा प्यार ही रहेगा ।
बहुत बदनसीबी देखी है इन बुज़ुर्गों ने, पर तुम्हें देखकर सब ख़ुश होंगे
सआदत ताया कहेंगे लो यह आई हमारी नन्ही शहीद !

ख़ुशनसीब लोगों का क़िस्सा कुछ और है — जो विजयी हैं वही ना-ख़ुश हैं ।
साल उन्नीस सौ सैंतालीस… अक्तूबर और नवम्बर के वो दो महीने ।
एक दिन शुमार मे जो इकसठ थे, दो हफ़्तों में चालीस से नीचे आ गए —
ऐसा था डोगरा राज का जनसंख्या प्रबन्धन ।
मरने वालों की तादाद — दो लाख सैंतीस हज़ार, उजड़े और लापता — छह लाख।
तुम्हें मालूम है कौन था हरि सिंह
और वो मेहर चन्द, प्रेम नाथ, यादविन्दर सिंह…?
कोई बात नहीं — वे सब जा चुके हैं अब, सारे क़ातिल, और उनके गुर्गे ।
उनकी औलाद अब ख़ुद को मज़लूमों में गिनती है ।
ये लोग कहते हैं हम दुखी हैं, हम वंचित हैं । दरअस्ल वो सच कहते हैं ।
कैसी तकलीफ़ों में गुज़री है कर्णसिंह की ज़िन्दगी ! यह कहो तो सब करते हैं हा हा हा !
अब मनहूस महबूबा को ही देखो — वह नहीं समझ पाती कि हर बला
हर जुर्म उसी के माथे पर क्यों मढ़ दिया जाता है
क्यों हर शै और हर शख़्स उसे ना-ख़ुश कर देने को आमादा है !

और हाँ आसिफ़ा, उस अजीबो-ग़रीब अलबेले अरिजीत सेन कलाकार को अपना समझना
वह तुम्हें चरागाह में मटरगरगश्ती करता दिखाई देगा
अपने किसी घोड़े को बता देना उसके पास जाकर शराफ़त से हिनहिनाए
और अगर वह तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हो
तो उसे रोककर कहना सिगरेट बुझा दे और
उसके हाथ में थमा देना साफ़ पानी का एक गिलास ।

24.4.2018

नोट :

1. आसिफ़ा जम्मू-कश्मीर के पशुपालक बाकरवाल (गुज्जर) समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची थी। 10 जनवरी 2018 के दिन कठुआ ज़िले की हीरानगर तहसील के कसाना गाँव के पास जंगल के किनारे एक चरागाह में अपने घोड़ों को चराने गई, फिर वापस नहीं आई। कुछ दिन बाद उसका शव जंगल में बरामद हुआ । इस मामले में आठ लोगों को गिरफ़्तार किया गया । जाँच के नतीजे बताते हैं कि अपहरणकर्ताओं ने सूनी जगह पर बने एक मन्दिर के गर्भगृह में सात दिन तक उसे बेहोश रखकर उसके साथ बलात्कार किया, फिर उसका गला घोंटकर पत्थर से सर कुचल दिया और उसकी लाश को फेंक दिया। मुख्य अपराधियों में मन्दिर का पुजारी (अवकाशप्राप्त सरकारी मुलाज़िम), कई पुलिस कर्मचारी और एक नाबालिग लड़का भी शामिल हैं। अप्रैल में जब पुलिस का जाँच दल अदालत में आरोप-पत्र दाखिल कराने पहुँचा तो कठुआ के वक़ीलों नें जबरन उनका रास्ता रोका। जम्मू इलाक़े के अनेक हिन्दुत्ववादी संगठनों ने आरोपियों के समर्थम में आन्दोलन और प्रदर्शन शुरू कर दिए. कश्मीरी पण्डित समुदाय के अति-दक्षिणपन्थी संगठन पनून कश्मीर के नेताओं का रुख़ भी बलात्कारियों के समर्थन का था। राज्य की साझा सरकार में शामिल भारतीय जनता पार्टी के दो मन्त्री खुलेआम आरोपियों के समर्थन में उतर आए । इनमें एक मन्त्री वही था जिसने दो साल पहले खेती-बाड़ी की किसी समस्या को लेकर प्रतिनिधिमण्डल में आए गुज्जर सदस्यों को सम्बोधित करके कहा था, “गुज्जरो, 1947 को भूल गए क्या ?” इस तरह वह बाकलवाल समुदाय को शेष भारत में अब तक अज्ञात उस हत्याकाण्ड की याद दिला रहा था जिसके तहत डोगरा राजा हरि सिंह की फ़ौजों ने हिन्दू साम्प्रदायिक दस्तों के साथ मिलकर जम्मू डिवीज़न में क़रीब दो लाख सैंतीस हज़ार मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया था, और कुल मिलाकर छह लाख लोगों को रियासत से बाहर धकेल दिया था । जम्मू डिवीज़न आबादी के हिसाब से उस समय मुस्लिम बहुल था। इस जातीय सफ़ाए के बाद वहाँ मुस्लिम जनसंख्या 61 प्रतिशत से गिर कर 38 प्रतिशत रह गई। वैसी ही हत्यारी शक्तियाँ आज आसिफ़ा के क़ातिलों के पक्ष में खड़ी हैं ।

2. इस कविता में इतिहास और वर्तमान की बहुत सी हस्तियों के नाम आए हैं। अधिकांश को उनके पहले नाम से याद किया गया है। यहाँ उनके पूरे नाम क्रमानुसार दिए जा रहे हैं।
आसिफ़ा, चुन्नो (काल्पनिक), नवाब (काल्पनिक), मीर तक़ी ‘मीर’, मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ‘सौदा’, नज़ीर अकबराबादी, मीर बब्बर अली अनीस, मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ‘ग़ालिब’, अन्तोन चेख़व, ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’, नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, पाब्लो पिकासो, फ़ेदेरीको गार्सीया लोर्का, बेर्तोल्त ब्रेख़्त, रवीन्द्रनाथ टैगोर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, गजानन माधव मुक्तिबोध, मक़बूल फ़िदा हुसैन, (उस्ताद) अमीर ख़ाँ, महमूद दरवीश, थिओ अंजीलोपुलोस, अब्बास कियारुस्तमी, सेसर वाय्येख़ो, फ़्रांत्स काफ़्का, पाउल सेलान, सआदत हसन मन्टो, रघुवीर सहाय, तदेऊश रूज़ेविच, आन्ना अख़्मातवा, रोज़ा लग्ज़ेमबर्ग, अनीस क़िदवाई, मरीना त्स्वेतायेवा, ज़ोहराबाई आगरेवाली, विस्वावा शिम्बोर्स्का, बेगम अख़्तर, बालासरस्वती, कमला दास सुरैया, मीना कुमारी, गीता दत्त, नरगिस, स्मिता पाटील, हरि सिंह (डोगरा राजा), मेहर चन्द महाजन, प्रेमनाथ डोगरा, यादविन्दर सिंह (पटियाला का राजा), कर्ण सिंह, महबूबा मुफ़्ती, अरिजीत सेन ।

कवि-राजनेता

‘चश्म हो तो आईना-खाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच’
(मीर)
जिस जनशत्रु का जन्मदिन आज है भूल गया है कि
उसके दुश्मन का कल था
कुछ साल पुरानी तस्वीर में जिससे वह गले मिल रहा है

आजकल हँसते हुए झिझकता है
सोचता है बाहर जाकर दाँतों का नवीकरण करा ले
फिर बिटिया अन्नो की शादी आ जाएगी
उसके अगले हफ़्ते पिता की बरसी फिर गणतन्त्र दिवस

चेहरा कितनी विकट चीज़ है यह
पता चला है उन्हें फ़ेसबुक से फ़ैनपेज से

चेहरों की एक क़िताब हुआ करती थी
जिसे लोग भूल गए हैं

पिछले साल से

|| 3/24 प्रेम वाटिका ||

“मुस्कुराते क्यों हो?” तुमने कहा, “यह घर
प्रेम ही से चला है अब तक ।”

“अभी तुम मिले देखा कितनी सुन्दर बहू है मेरी
वफ़ादार बेटा और इतना प्यारा सा इनका बच्चा…
और फिर मैं भी यहाँ हूँ जैसा तुमने कहा —
निश्चिन्त, प्रसन्न और सम्पन्न दिखती विधवा !”

मैंने घूमकर उसका घर देखा इतने बरस बाद
दो दालान, उन में फलते-फूलते मोगरे, अनार,
हरसिंगार, मौलसरी, कचनार, करौन्दा, अमरूद,
गुड़हल, हरदम गदराई मधुमालती…

“क्या बिना प्रेम के इतना सब हो सकता है ?”

मैंने पता नहीं किस धुन में कहा — बिल्कुल हो सकता है, सीमा !
बिल्कुल हो सकता है…

क्या तुमने ज़ालिमों के बाग़ीचे नहीं देखे…
उनकी चहल-पहल भरी हवेलियाँ
जिनमें सदा हँसी गूँजा करती थी…
अलबत्ता नियति ने जहाँ अब अपार्टमेण्ट बना दिए हैं ।

“हूँ…”, उसने कहा, “और तुम्हें क्या-क्या याद है ?”

मैंने कहा, कुछ नहीं, इतना याद है तुम स्कूल में सिर्फ़
एक दरजा मुझसे आगे थीं, पर रौब के साथ ‘ए जूनियर’ कहकर
मुझको तलब किया करती थीं ।

“हूँ…”, कहकर उसने पूछा, “अपने स्कूल का क्या हाल है ?”

ठीक ही चलता लगता है — मैंने कहा — उसके चारों तरफ़
बस्तियाँ बस गई हैं, पर स्कूल का परिसर बचा हुआ है, और हाँ,
पाकड़ का पेड़ अभी भी वहीं खड़ा है, मैदान के किनारे पर ।
बच्चों से अब वहाँ रोज़ वन्दे मातरम् गवाया जाता है…

“हूँ… और तुम्हारे मालवीय नगर के क्या हाल हैं ?”

तुम्हारी ये “हूँ…” की आदत अभी तक गई नहीं, सीमा !

“ऐसा नहीं है, लड़के, बस तुम्हें देखकर लौट आई है ।”

और हम हंसने लगे चालीस साल लाँघ कर,
हंसते-हंसते लगभग निर्वाण की दहलीज़ तक जा पहुँचे ।

रही मालवीय नगर की बात सो क्या कहूँ…
जैसा भारत मालवीय जी चाहते थे वहाँ बसा हुआ है ।

29.1.2018

दान-पुण्य 

सिर्फ एक भूला-बिसरा सरकारी ज़िला अस्पताल ही
इक्कीसवीं सदी से आपकी रक्षा कर सकता है
और एक ज्ञानी कम्पाउन्डर जो हजामत के बाद
चेहरे पर फिटकरी की बट्टी रगड़ता है

मरने के लिए यह जगह बुरी नहीं है हकीम जी
कहता है वह बेड नम्बर 14 पर लेटे आदमी से
जो दरअसल घर के झगड़े-टण्टे से तंग आकर अक्सर
अस्पताल में भर्ती हो जाया करता है

सुना है, बड़े लोग इसी काम के लिए
बेदान्ता नाम के हस्पताल में जाते हैं
और एक एक पार्टी जाते-जाते अरे इतना दान
बेदान्ता में कर जाती है जितने में
हम हों तो दो-दो गऊशाला चार-पाँच पक्के प्याऊ बनवा दें
और एक कुआँ भी खुद जाए कि
मनुष्य का कल्याण हो और पशु का
और बाक़ी रहे जगत में दानकर्ता का नाम भी

कुछ लोग कुआँ खुदवाकर नामी हों
कुछ उसमें कूदकर

पुरानी बात 

बात बीच में रोककर मेरी बहन
अचानक कहती है — पता नहीं ये रमज़ान सुकून से गुज़रेंगे या नहीं…
ईद कैसी होगी?
मैं क्या कहता क्या बीत सकता है इस फासिस्ट समय में!
सिवा इसके — बाजी, सिग्नल ख़राब है, घर पहुँचकर लैण्डलाइन से बात करूँगा।
मैंने सुनी उसकी ठण्डी साँस और तीन पुराने लफ्ज़ — अल्लाह ख़ैर करे!
उसने सुना मुझे कहते हुए — खुदा हाफ़िज़!

वही जीवन फिर से 

कितने लोग हैं इस दुनिया में जिन्होंने गाहे बगाहे
रोककर कभी मुझसे कहा — ऐ भैया … !

किसी ने बस रास्ता पूछा एक औरत ने आधी रोटी माँगी
या कहा कि बीमार है छोरी, किसी डागदर से मिलवा दे
किसी ने इसलिए पुकारा कि मुड़के देखूँ तो मेरी शक़्ल देख सके
आँखें मिचमिचाए और कहे भैया तू कहाँ कौ है
इनमें से कुछ तो कभी के गुज़र गए कुछ अभी हैं
कैसे जानूँ कौन भूत है कौन अभूत
दानिश को इससे क्या कि सब रस्ते में हैं

दो पीढ़ी बाद अक्सर कोई बता नहीं पाता मामला क्या था
जिस रजिस्टर में टूट-फूट दर्ज हुई वह बोसीदा हो चला
काग़ज़ भी तो जैविक चीज़ है
स्याही-क़लम-दवात से बहुत कुछ लिखा गया
01010101 में तब्दील नहीं हुआ और जान लीजिए
काग़ज़-पत्तर भले कुछ बचे रहें 01010101 को छूमन्तर होते
ज़रा देर नहीं लगेगी
मरणशीलों में सबसे मरणशील है यह बाइनरी कोड

दुनिया के अन्त के बारे में कोई नहीं जानता
सब उसके आरम्भ के पीछे पड़े रहते है धर्म हो चाहे वाणिज्य और विज्ञान
मिल-जुल के हम सब सबकुछ तबाह किए दे रहे हैं इस विनाश की सामाजिकता
इसका मर्म इसके भेद अभेद ज़रूर किसी दैवी मनोरंजन का मसाला हैं

तुम देख लो सभी तो यहाँ बैठे हैं सारे यज़ीद,
फ़िरऔन, क़ारून, इबलीस, दज्जाल… तुम पूछती थी या अल्लाह क्या अब
हमारा क़ब्रिस्तान भी हमसे छीन लिया जाएगा
वक़्त आने पर मैं कहाँ जाऊँगी …

ऐसी ही मरी रहना अब, मेरी आपा
सुकून की नींद भी ऐसी ही होती है
बना रहेगा तुम्हारा कथानक वैसा जैसा कि तुम छोड़कर गईं
और न आना जीने के लिए वही जीवन फिर से

22.11.2017

अनुभवी हाथ

अब किसी को याद नहीं एक ज़माने में मैं
ब-यक-वक्त रंगमंच समीक्षक और
राशिफल लेखक हुआ करता था
एक अख़बार में जिसके मालिक थे एक बुज़ुर्ग स्वतन्त्रता सेनानी
और सम्पादक उनका भूतपूर्व कमसिन माशूक
जो अब चालीस का हो चला था
और जिसकी आँखें एक आहत इन्सान की आँखें थीं

तुम्हें यहाँ दोहरी भूमिका निभानी है —
सम्पादक ने मुझसे कहा और गौर से मेरे चेहरे को देखा —
दिन में राशिफल बनाकर देना है और रात को नाटक समीक्षा
पर देखो उल्टी चाल नहीं… कि यहाँ नाटक करो और
शाम को वहाँ नजूमी बनकर हाथ देखने लगो, हा हा…
और सुनो पहले तीन महीने यहाँ नाम नहीं छपता।

मैं क्या कहता आदमी वह शायद बुरा न था
तो मैंने धीरे से कहा — जी ठीक है।

हफ्ते भर ही में गुल खिलने शुरू हो गए
वहाँ के कम्पोज़ीटरों ने मुझे हाथों हाथ लिया, कहते — अरे भैया तुम कहाँ से आए
मेरे लिखे अतिनाटकीय और मसालेदार भविष्यफल को वे
वह मज़े लेकर पढ़ते और कभी कभी गैली-प्रूफ दिखाने के बाद
अपनी तरफ से उसमें चुपके से कुछ जोड़ दिया करते

वही थे मेरे असली साथी और हमदम
लैटरप्रैस और सीसे के टाइपों के उस धुँधले युग में

और शहर की तमाम नाटक मण्डलियाँ जल्द ही मुझसे खार खाने लगीं
और शहर की वह प्रमुख अभिनेत्री जो गृहमन्त्री की कुछ लगती थी
एक औसत दर्जे की अभिनेत्री कहे जाने पर इतना बिगड़ी कि
नौसिखिए समीक्षक के बजाए सम्पादक के पीछे पड़ गई।
तीन ही महीने लगे मेरी छुट्टी होने में, सम्पादक ने मुझे लगभग
प्यार से गले लगाया — अरे मियाँ, कैसे तुमने इतने कम समय में
इतने दुश्मन पैदा कर दिए? हर कोई मेरे ख़ून का प्यासा घूमता है…
वो शहज़ादी कहती है मैं ही सब लिखवा रहा हूँ
और घटिया ड्रामे करने वाला वो कमीना डायरेक्टर, वो भड़ुआ, वो… वो दलाल…
उसे मेरे खिलाफ़ उकसाए जा रहा है…
क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारे लिए मेरी नौकरी जाए?

सूखे गले से मैंने कहा — नहीं
आपकी क्यों…’

उसने कहा —
मालिक से उनके घर पर मिल लो, तुम्हें पूछ रहे थे।

अब मेरा और क्या बिगड़ सकता है मैंने सोचा
कुछ ही देर बाद मैं बैठा था स्वतन्त्रता सेनानी के आमने-सामने।

सोचा एक बार तुम्हारे दर्शन तो कर लूँ — उसने कहा —
और तुम्हें यह कहूँ कि मुझे हमेशा अपना शुभचिन्तक मानना, बिल्कुल
तुम मेरा राशिफल बहुत अच्छी तरह बताते रहे हो ज्योतिष पर तुम्हारी पकड़ है
और अपने ग्रह नक्षत्र देखने की तुम्हें अभी कोई ज़रूरत नहीं…
तुम बड़े तेज़ और होनहार नौजवान हो, बस
थोड़ा सँवरना दरकार है…
जिसके लिए इस घर के दरवाज़े हमेशा खुले हैं यह याद रखना… फरज़न्द।’

और यह कहकर
उसने अपना पुरातन और बेहद उदास हाथ मेरी तरफ बढ़ाया

मुझे वह सचमुच एक उदास आदमी मालूम हुआ

आसान हिंसा

अौर फिर यह भी कि व्यक्ति को मारने में ज़्यादा झंझट है समूह को
मारने में कोई कठिनाई नहीं कोई संशय नहीं कोई चमक भी नहीं
अपराध को छिपाने की ज़रूरत भी क्या जब वह अपराध हो भी न, उसे तो
अापके कहे बिना पत्रकार ही छिपा लेते हैं सरे अाम टी० वी० नट जाता है
बुद्धिजीवी उचाट मन से सुनता है राजनेता हाँ हूँ करता है
सुनवाई के दौरान मुन्सिफ़ बार-बार उबासी लेता है
हिंसा इतनी अासान हो गई है जितना कि हिंसा का ख़याल
बेख़याली में भी लोगों को मार डाला जा सकता है
जानवर को हम खाने के लिए मारते हैं सोच समझकर काटते हैं
मनुष्य को बस मारने के लिए
एक धब्बा जो जल्द ही फीका पड़ कर उड़ जाता है एक परछाईं
जो ग़ायब हो जाती है सरदी की धूप की तरह

अगले ढाई साल 

अगले ढाई साल में कुछ तय नहीं होने जा रहा
भविष्य अा चुका है
जब उसने कन्धे पर हाथ रखा तुम कहीं अौर देख रहे थे
जब उसका टीका तुम्हारे माथे पर लगा तुम हँस रहे थे
वह कौन था जो खोया-खोया-सा टी० वी० देखता था
पराजित और बदहवास-सा बैंक की तरफ़ भागता था
परसों ही तो वह कह रहा था सिस्टम रिबूट हो रहा है
थोड़ा इन्तिज़ार करो
नक्षत्रों का जीवन काल की अवधारणा अन्तरिक्ष की दूरियाँ
तुम्हारे घर से ए० टी० एम० का फ़ासला
तुम्हारे बचपन से अाती हुई कोई रौशनी
सब गड्डमड्ड हैं एक अजीब सी सीटी बजती है कानों में
देखने के तरीक़े जानने की बातें सीखने की इच्छा
सब पर कोई एक्सपायरी डेट छाप दी गई लगती है
उलट-पुलट कर देखते हो इबारत साफ़ पढ़ी भी नहीं जाती
उस खोई हुई औरत को भी आज ही दिखना था
इन्तिज़ार करती हुई भीड़ के बीच
कैशियर पुकारता है सुमनलता बड़ी चपलता से वह उठती है बोलती है — हाँ जी
टोकन देकर पैसे लेकर लौटते हुए वह अचानक तुम्हारे सामने रुकती है —
‘हलो, अाप मुझे पहचान नहीं रहे हैं, मैं अापके पड़ोस में रहती हूँ!’
‘जी’ — कहके तुम अजीब ढंग से मुस्कुराते हो, तुम्हें अब पता नहीं वह कौन है
अौर तुम कहाँ खड़े हो — अतीत में, अनिश्चित भविष्य में, या अटपटे वर्तमान में
भविष्य आ चुका है
अभी अभी तक बहुत कुछ तुम्हारे अनुकूल था
कमल तुम्हारे लिए एक फूल था केसर महज़ एक रंग
चीख़ता हुअा अादमी एक अशालीन उपस्थिति
एक फीकी हँसी रह गई है जो अौर फीकी होती जाती है
कड़वापन, व्यंग्य, कटाक्ष, निंदा सब हुक्मरानों के अहाते में हैं
तुम्हारे पास है क्या, न नुक्कड़ न नाटक
प्रहसन पर भी अब उन्हीं का एकाधिकार है।

प्रेम वाटिका

मुस्कुराते क्यों हो?” तुमने कहा, यह घर
प्रेम ही से चला है अब तक.”

अभी तुम मिले देखा कितनी सुन्दर बहू है मेरी
वफ़ादार बेटा और इतना प्यारा सा इनका बच्चा…
और फिर मैं भी यहाँ हूँ जैसा तुमने कहा —
निश्चिन्त, प्रसन्न और सम्पन्न दिखती विधवा !”

मैंने घूमकर उसका घर देखा इतने बरस बाद
दो दालान, उन में फलते-फूलते मोगरे, अनार,
हरसिंगार, मौलसरी, कचनार, करौन्दा, अमरूद,
गुड़हल, हरदम गदराई मधुमालती…
क्या बिना प्रेम के इतना सब हो सकता है ?’’
मैंने पता नहीं किस धुन में कहा — बिल्कुल हो सकता है, सीमा,
बिल्कुल हो सकता है…

क्या तुमने ज़ालिमों के बाग़ीचे नहीं देखे…
उनकी चहल-पहल भरी हवेलियाँ
जिनमें सदा हंसी गूँजा करती थी…
अलबत्ता जहाँ नियति ने अब अपार्टमेण्ट बना दिए हैं ।

हूँ…’’, उसने कहा, और तुम्हें क्या-क्या याद है ?”

मैंने कहा, कुछ नहीं इतना याद है तुम स्कूल में सिर्फ़
एक दरजा मुझसे आगे थीं पर रौब के साथ ‘ए जूनियर’ कहकर
मुझको तलब किया करती थी ।

हूँ…’’, कहकर उसने पूछा, अपने स्कूल का क्या हाल है ?”

ठीक ही चलता लगता है — मैंने कहा —उसके चारों तरफ़
बस्तियाँ बस गई हैं, पर स्कूल का परिसर बचा हुआ है, और हाँ,
पाकड़ का पेड़ अभी भी वहीं खड़ा है, मैदान के किनारे पर ।
बच्चों से अब वहाँ रोज़ वन्दे मातरम् गवाया जाता है…

हूँ… और तुम्हारे मालवीय नगर के क्या हाल हैं ?”

तुम्हारी ये हूँ…” की आदत अभी तक गई नहीं, सीमा !

ऐसा नहीं है, लड़के, बस, तुम्हें देखकर लौट आई है…”

और हम हंसने लगे चालीस साल लाँघकर,
हंसते-हंसते लगभग निर्वाण की दहलीज़ तक जा पहुँचे ।

रही मालवीय नगर की बात सो क्या कहूँ …
जैसा भारत मालवीय जी चाहते थे वहाँ बसा हुआ है ।

29.1.2018

नेपाल 

नेपाल तुम हमेशा अपना रास्ता बन्द कर लेते हो
नेपाल तुम हमेशा घिरे रहते हो हर तरफ़ अपने ही दोस्तों से, तुम्हें
दुश्मनों की क्या ज़रूरत…
कहीं वह घड़ी बीत तो नहीं गई?
नेपाल तुम्हें समुद्र तक जाना था, नेपाल
तुम्हें पामीर से उराल से हाथ मिलाना था,
नेपाल…
उनका निशाना तुम्हारा जिगर था—उसे तुमने नहीं बचाया।
सलाहकारों से कहो अब थोड़ा आराम कर लें।
और फिर अपनी आवाज़ सुनो—देखो कहीं तुम उसे भूल तो नहीं गए,
कहीं तुम्हारे लोग अपने ही से अजनबी तो नहीं हुए जा रहे।
नेपाल क्या तुम्हारी सभी लड़कियाँ लौट आई हैं
उपमहाद्वीपीय भट्टियों से? उनसे कहो तुम्हें उनका इन्तिज़ार है।
अनाज के दाने उनका इन्तिज़ार करते हैं,
बादलों के फाहे मरहम से तर उनका इन्तिज़ार करते हैं,
आ जाओ ताकि दरवाज़े की लकड़ी और दहलीज़ का पत्थर और
सड़क पर मील के निशान कह सकें अब सब ठीक है।
(2008–2009)
——
[अाठ साल पहले लिखी कविता का इतना ही अंश बचा रह गया है।]

ऐसा नहीं है 

ऐसा नहीं है कि सारे कुकर्म समाजवादियों ने ही किए हों
अर्धवाम तो वे थे ही राष्ट्रभक्त और सर्वधर्मसमभावक थे ही
उनकी कुछ गाढ़ी दोस्तियाँ मार्क्सवादियों से भी थीं मुसलमानों से भी
और मैकालेपरस्तों से भी कोई ज़ाती रंजिश तो न थी
उन्होंने हमेशा सिद्धान्त की लड़ाई को
सिद्धान्त तक रखा — मर्यादा न तोड़ी…
संघी राज अकेला उन्हीं का लाया हुअा तो नहीं भाई, मोदी संभावना
क्या उन्हीं के चाहने से अाई? पीछे की बात करें तो क्या करते लोहिया और जे० पी०
मामला पतन और गिरावट का नहीं युगीन नियति का है
समाजवाद की बातें हवा हुईं धर्मनिरपेक्षता बचाए नहीं बच रही…
सामाजिक न्याय की शक्तियों का हाल आपने देख ही लिया कि जहाँ
‘ताक़त ही ताक़त है… चीख़ नहीं’ — क्या तो नाम है कवि का जिसने यह कहा?
रही बात कम्युनिस्टों की तो कम्युनिस्टों में भी अब क्या बचा रहा है!
ऐसा नहीं है कि हिन्दुस्तान में हम अाप ही को नज़र आती हो बदतरी
ऐसा भी नहीं है कि हिन्दुस्तान ही में निवास करती हो ये बदतरी।
यह एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर
न मुक्ति की बात रही न मुक्ति-संग्राम की
औद्योगिक हड़ताल कैसी गर्वीले कामगार कहाँ
पूँजी पूँजी न रही, वित्त ही वित्त है अब
किस दुनिया में रहते हो साथी मज़दूर वर्ग अब एक मिथ है
वर्ग भी मिथ है मिथ हमेशा मिथ थी पर जब तक थी अच्छी थी
लाल लाल लहरा लिया जब तक लहरा लिया
कहते हैं सभी विज्ञजन—समाजविज्ञानी, इतिहासज्ञ, मीडिया-विशेषज्ञ
अभियंता, चिकित्सक, खिलाड़ी, और – सच तो यह है – ख़ुद अाप… सिर्फ़ हमीं नहीं।

हमारे ज़माने में विमर्श है अमर्ष भी ख़ूब है किसी का लेकिन पक्ष पता नहीं चलता
कौन कहाँ जाकर मिलता है किसी से, कितनी देर लगा रहता है फ़ोन पर नेट पर
किसकी कितनी ऊर्जा जाती है हिसाब-किताब में
चाल-चलन मापने के ये पैमाने व्यवस्था के काम आते हैं जीविका से इनका क्या रिश्ता
सच्ची मेहनत सच्ची आग सच्चा अनाज सच्चे आँसू ऐसे नहीं अाते
अचानक ख़ून के धब्बों की तरह उभरती हैं ख़ाली जगहें कभी यहाँ कभी वहाँ
जिन्हें भरने दौड़ते हैं वे जन जिनके कंधे पर गमछा बग़ल में बच्चा नहीं
मेट्रो में मिला नए अर्थतंत्र में काम करता उन्नीस साला लड़का कहता है क्या अन्याय सर,
अाप ही बताओ व्यवस्थाएँ कहीं चला करती हैं
अन्याय के बिना!
क्या तुम किसी ग़रीब के बेटे नहीं? सुनकर वह अापा खो देता है
ग़रीब क्यों होने लगे हम अंकल जी, अापने मेरे को कमूनिस्ट समझा है क्या?
ऐसे मूड में है हमारा नौजवान, यही उसका प्रतिरोध है
यों मुकम्मल होती है सादर प्रणाम से शुरू हुई बात।
एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर
प्रतिपक्ष है जहाँ स्त्री नहीं, स्त्री है जहाँ प्रतिपक्ष नहीं, और स्त्री मैं है स्त्री वह नहीं
स्त्री का शोर ही जहाँ स्त्री है ख़ामोशी स्त्री नहीं है संशय मनुष्यता नहीं
पितृसत्ता का विनाश भी अब एक ख़राब-सा जुमला होकर रह गया है
जो विरोध की लाचारी बताता है जिसे सबसे पहले संरक्षण चाहिए और अंत में संरक्षण
अदालत में पेश हो तो पुलिस के साथ, थाने जाना हो तो वकील के हमराह
पीछे ग़ैर भरोसेमन्द-सी एक ओ० बी० वैन।
जो लोग पर्दों पर निगाह गड़ाए रहते हैं यक़ीन मानिए पर्दा भी उन्हीं को देखता है
टेक्स्ट और ओरल तक न रह जाइए जानिए विज़ुअल डिजिटल वर्चुअल
ऐसा तादात्म्य इतिहास में कभी देखा नहीं गया कि यह दैनिक चमत्कार है
हिन्दुस्तान भी बस एक चमत्कार ही है दलालों ने हर चीज़ को खेल में बदल दिया हैं
विडियो गेम से उकताते हैं तो मुसलमानों को मारने के लिए निकल पड़ते हैं
और जो रास्ते में आता है कहते हैं हम आपको देख लेंगे नम्बर अापका भी आएगा जी।
हम बार बार बोल चुके हैं — ज़ोर से कहता है एक दलित विमर्शकार —
हिन्दू मुस्लिम मामला खुली धोखाधड़ी है, साफ़ मिली-भगत है दोनों पक्षों की
ताकि दलितों का पक्ष सामने न आने पाए, थोड़ी बहुत मारकाट से क्या फ़र्क़ पड़ता है
असली लड़ाई दलितों की है, मियाँ लोगों की नहीं।
यह एक चौथाई सदी खड़ी है तीन सदियों के मलबे पर
खुला मैदान है कहीं भी मूत लो, किधर भी निपट अाअो
असल सचाई तो ये है कि
जो उत्तरसत्य पर ईमान लाए, है वही इस ज़मीन का सच्चा नागरिक।

कुंजड़ों का गीत

हम एक ही तरह के सपने देखेंगे
उसकी टोकरी में गाजर मटर और टमाटर होंगे
मेरे सर पर आलू प्याज़ और अदरक
हरा धनिया और हरी मिरच अलग पोटली में
या गीले टाट के नीचे
लीचड़ खरीदारों के लिए, क्योंकि लीचड़ खरीदार ही
अच्छे खरीदार होते हैं, अच्छे इन्सान
अच्छी औरत अच्छा आदमी
बच्चों की फ़िक्र करने वाले

क्योंकि वही हमसे बात करते हैं
आग्रह करते हैं हुज्जत करते हैं झगड़े पर उतर आते हैं
हमारी आंखों में आंखें डालकर बात करना जानते हैं
चलते-चलते नाराज़ी दिखाते हुए
कुछ बुरी-बुरी बातें कहते हैं जिनके पीछे
छिपी होती है आत्मीयता और ज्ञान

अगले रोज़ वे फिर हमसे उलझने आ जाते हैं
वे झींकते हैं हम चिल्लाते हैं दूसरे ग्राहक झुंझलाते हैं
– यहां रोज़ का किस्सा है –
अन्त में बची रहती है थोड़ी-सी उदारता

वे हमें हमारे नाम और आदतों से जानते हैं
कोई रास्ते में मिलती है तो पूछती है : रामकली
कैसी हो ? ऐसी बन-ठन के कहां जा रही हो ?
बिटिया का नाम — आराधना — बड़ा अच्छा नाम रक्खा है
कोई बाबू मिले तो बोलते हैं : और भाई कैलाश
दिखाई नहीं दिए कई दिन से
घर पर सब ठीक तो है ?
घर पर यों तो कुछ भी ठीक नहीं है
पर सब कुछ ठीक है

हमसे सब्ज़ी खरीदने वाले भी भांत-भांत के हैं
समझो सौ में से दस तो हमसे भी हल्के
दस बराबर के और बाकी बड़े खाते-पीते आप जैसे अमीर
हम सबको बराबर मानते हैं : सबकी सुनते हैं तो
सबको सुना भी देते हैं

हम कम तौल सकते हैं पर कम तौलते नहीं
क्यों ? ! क्योंकि साहब कम तौलने वालों का
बचा रह जाता है शाम को
ढेर सारा सामान ।

कला-दर्शन

एक
सरोज के लिए योग्य वर खोजना आसान नहीं था
ब्राह्मणत्व की आग से भयंकर थी कविता की आग
अन्त में कवि अमर हो जाता है एक पिता रोता पीटता
मर खप जाता है

नायकी कान्हड़ा 

नायकी कान्हड़ा की द्रुत गत
सुनकर मैं झाँकता हूँ
एक सूने मकान के अन्दर
दालान खाली था
जीने पर जमा था
कई मौसमों का गुबार

अन्दर घुसता हूँ
तो आवाज़ बन्द हो जाती है
आती सुनायी देती है
खाली टेप की-सी घिसघिसाहट

यहाँ न हवा थी
न कोई बेकल आत्मा
शायद था मेरी
अपनी ही पोशाक का हाहाकार।

अप्रकाशित कविता

एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी
होती जा रही है अब और ख़राब

कोई इन्सानी कोशिश उसे सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती
एक स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लम्बा चक्कर काटकर गुज़रना पड़ता है

मैं क्या करूँ उस शिथिल
सीसे-सी भारी काया को
जिसके आगे प्रकाशित कविताएँ महज तितलियाँ है और
सारी समालोचना राख

मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ।

संस्कार

बीच के किसी स्टेशन पर
दोने में पूड़ी-साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होने लगता है
पेट की मरोड़ की तरह
और फिर छिपाकर फेंक देते हैं कहीं कोने में
अपना दोना ।
सोचते हैं : मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही दरवाज़े से निकलकर नहीं चला आया था ।

जो देखा नहीं जाता 

हैबत के ऐसे दौर से गुज़र है कि
रोज़ अख़बार मैं उलटी तरफ़ से शुरू करता हूं
जैसे यह हिन्दी का नहीं उर्दू का अख़बार हो

खेल समाचारों और वर्ग पहेलियों के पर्दों से
झांकते और जज़्ब हो जाते हैं
बुरे अन्देशे

व्यापार और फ़ैशन के पृष्ठों पर डोलती दिखती है
ख़तरे की झांईं

इसी तरह बढ़ता हुआ खोलता हूं
बीच के सफ़े, सम्पादकीय पृष्ठ
देखूं वो लोग क्या चाहते हैं

पलटता हूं एक और सफ़ा
प्रादेशिक समाचारों से भांप लेता हूं
राष्ट्रीय समाचार

ग़र्ज़ ये कि शाम हो जाती है बाज़ औक़ात
अख़बार का पहला पन्ना देखे बिना.

वापस खींचो सारे छुरे तुमने घोंपे थे

हँसली के ऊपर गुर्दों के आसपास
लौटाओ लोगों को मुर्दाघरों से

इमर्जेंसी वार्ड में जहाँ ड्यूटी पर लगे
दो उनींदे डॉक्टर तुम्हारे किसी शिकार को
बचाने की कोशिश कर रहे हैं
वे ऐसे तो उसे बचा नहीं पाएँगे

खींचकर वापस लाओ
उन सब मरते हुए लोगों को
बिठाओं उन्हें उनकी बैठकों और काम करने की जगहों में
सुनो उनसे उनके पसंदीदा मज़ाक

जब उनमें से किसी की औरत चाय लेकर आये
तो हस्बे-मामूल बोलो नमस्ते भाभी
और कोई बच्चा-बच्ची झाँकते दिखाई दें तो
बुलाओ और कहो देखो ये रहे तुम्हारे पापा

वापस लो अपनी चश्मदीद गवाहियाँ
जिनका तुमने रिहर्सल किया था
बताओ कि इबारत और दीद भयानक धोख़ा थीं
और याद्दाश्त एक घुलनशील ज़हर
फिर से लिखो अपना
सही सही नाम और काम

उन समाचारों को फ़िर से लिखो
जो अफ़वाहों और भ्रामक बातों से भरे थे
कि कुछ भी अनायास और अचानक नहीं था
दुर्घटना दरअसल योजना थी

मत पोंछो हर जगह से अपनी उँगलियों के निशान
छुड़ाओ अपने बालों से वह बेहूदा खि़जाब

फिर से बनाओ वही हथेलियाँ
जो पसीजती थीं एक मासूम पशुता से
और मनुष्यता के ताप से।

कठिन प्रेम

सूत्रधार :

इसकी भी कई मंज़िलें होती होंगी
और अनेक अवकाश
चलिये चलकर पूछते हैं उस भली महिला से
जिसने किया था
एक अदद कठिन प्रेम
देखिए उस मानुस के जाने के इतने बरस बाद
वह कठिनाई
क्या अब भी जारी है
और कैसे हैं अब
उसके उतार चढ़ाव

००

स्त्री :
एक बात तो यही है कि मैं अब
पहले से ज़्यादा मुक्त हूँ . उस
झाँय झाँय को पीछे छोड़कर
पर खुशी के क्षण भी मुझे याद हैं

००

एक छोटी सी जन्नत थी हमारी बरसाती
जिसको कुछ समझ में न आता कहाँ जाए
तो हमारे यहाँ आ धमकता था

००

झगड़े भी बाद में होने लगे हमारे
ऐसा भी कुछ नहीं था . ये जवानी की बातें हैं
वह मुझे धोखा देने चक्कर में रहता था
मैं उसे ज़हर देने की सोचती थी
फिर वह अचानक मर गया
धोखा दिए बिना ज़हर खाए बिना
मुझे लगा मेरा तो सब कुछ चला गया

००

फिर मैं जैसे तैसे करके ख़ुद को हरकत में लाई
अधूरी पड़ी पी एच डी खींचकर पूरी की और
यूनिवर्सिटी के हलक़ में हाथ डालकर
निकाली एक नौकरी उसी विभाग में जहाँ मैं
अस्थायी पद पर पढ़ा चुकी थी उसके चक्कर में आकर
सब कुछ छोड़ देने से पहले

००

उसके बारे में क्या बताऊँ बेसुरी उसकी आवाज़ थी
बेमेल कपड़े काली काली आँखें
रहस्यमय बातें ख़ालिस सोने का दिल
और ग़ुस्सा ऐसा कि ख़ुद ही को जलाकर रख दे
हम बड़ी ग़रीबी और खु़ददारी का जीवन जीते थे

००

दूसरों को हमारी जोड़ी
बेमेल दिखाई देती थी . थी भी
पर बात यह है कि वह मुझे समझता था
और मैं भी उसे ख़ूब जानती थी
सोचती हूँ ऐसी गहरी पहचान
बेमेल लोगों में ही होती है

००

समाजशास्त्र की मैं रही अध्यापक
यही कहूँगी हमारा प्रेम एक मध्यवर्गीय प्रेम ही था
प्रेम शब्द पर हम हँसते थे
अमर प्रेम यह तो राजेश खन्ना की फ़िल्म होती थी
जैसे आज होते हैं 24×7 टीवी चैनल

००

उसको गए इतने बरस हो गए हैं
पर वह जवान ही याद रहता है
जबकि मैं बूढ़ी हो चली
और कभी कभी तो एक बदमिज़ाज छोटे भाई की तरह
वह ध्यान में आता है

००

कितना कुछ गुज़र गया
इस बीच छठा वेतन आयोग आ गया
साथ के सब लोग इतना बदल गए
न तो वह अब हमारी दुनिया रही न वैसे अब विचार
समझ में नहीं आता यह वास्तविक समाजवाद है या
वास्तविक पूँजीवाद

००

एक नई बर्बरता फैल गई है समाज में
” रोटी नहीं मिलती तो खीर खाओ ” कहते लोगों को
कहूँ तो क्या कहूँ

००

अगर वह जीवित होता तो सोफ़े पर पड़े
आलू का जीवन तो न जीता
हो सकता है कहता हत्यारे हैं ये चिदंबरम
ये मनमोहन ये मोदी इन्हें रोका जाना चाहिए
हो सकता है मैं उसे ही छत्तीसगढ़ के वनों में
जाने से रोकती होती कहती होती और भी रास्ते हैं ।

००

लीजिए पीकर देखिए यह ग्रीन टी . हरी चाय
जिसे पिलाकर पैंतीस बरस हुए उसने मेरा दिल
जीतने की पहली कोशिश की थी
तब मैं हरी चाय के बारे में जानती न थी

दूसरा हेमन्त 

कॉफ़ी होम में घुसते ही मुझे दिखाई दिया
हेमंत कोई तीस साल बाद- – वही चेहरा वही घुँघराले बाल
समझदारी और पलायन से भरी वही
शर्मीली हँसी
कोई युवती आहिस्ता-आहिस्ता उससे
कुछ कह रही थी
ऊपर नीचे कठपुतली की तरह सर हिलाते हुए
वह कह रहा था… अच्छा अच्छा !
जी…हाँ…एकदम- -बिल्कुल

यह कम्बख़्त बिल्कुल नहीं बदला
बेतकल्लुफ़ आवेग से मैं उसकी तरफ बढ़ा
उसने मुझे देखा और नहीं भी देखा
फिर उसी तरह सर हिलाने में मशग़ूल हो गया

जैसी ही मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा –
‘इस शहर में कब से हो हेमंत ! ’
मैं जान गया यह हेमंत नहीं है
वह भी जान गया कि वह हेमंत नहीं है
एक बनावटी लेकिन उदार मुस्कुराहट से उसने
यह मामला रफ़ा दफ़ा किया
कॉफ़ी हाउसों में अक्सर इसी तरह
मंडराता रहता है अतीत
और घूमते रहते हैं कुछ खिसियाए हुए से
गंजे प्रेत
एक शाश्वत प्यास छिपाए हुए

हेमंत– यह कैसे हो सकता था हेमंत
तीस साल तीस साल तो इस नौजवान की
उम्र भी नहीं है गाफ़िल !
यह उस हेमंत का बेटा भी नहीं हो सकता
इतना हमशक्ल होने पर कौन
कमअक़्ल होगा कि
अपने बाप की नक़ल बना फिरे
तुम जो भी कोई हो — क्या सचमुच हो ?
या यह भी एक दिवास्वप्न है हेमंत द्वितीय ?

शल्यचिकित्सा

विष्णु खरे के लिए

एक नास्तिक जो अधेड़ भी है और कविहृदय भी
अभी शल्यचिकित्सा के बाद अस्पताल में पड़ा है
उसे अभी अस्पताल के ख़र्च का अन्दाज़ा नहीं
उसकी पत्नी ने कर डाले हैं कई दूरगामी फ़ैसले
तकलीफ़ और खुमार के दरम्यान पड़ा हुआ
सोचता है वह डॉक्टर सहाय की वजह से नहीं ज़िन्दा है
उसे ज़िन्दा रखे हुए है एक बनफ़्शे का फूल

नाक से लगी नली हटी देखकर उधर से गुजरती हुई नर्स कहती है
अरे इसे क्यों निकाल दिया
एक और नर्स आकर नली को वापस जोड़ जाती है
बोलती है दुबारा ऐसा न करना
बरामदे में स्टूल पर बैठी बेटी दौड़कर आती है : क्या हुआ पापा
और उसका सर सहलाती है

तुम्हें क्या बताऊँ मुल्क पर अपराधी गिरोह छा गए हैं छोटी
और उम्मीद की दहलीज़ है एक उम्र दूर

और ग्रहों पर ज़िन्दगी होती तो पता नहीं कैसी होती बसर
नक्षत्रों की दुनिया ख़ुद से रहती है अनजान
अंत में ब्रह्माण्ड का भी कुछ नहीं बचेगा
वे काले सुराख़ भी ख़त्म हो जाएंगे बस रहेगी एक बुदबुद
जैसे कि धरती पर कभी थी सांय सांय

क्या मालूम मेरी घड़ी कब से बिगड़ी पड़ी है
अगर किसी तरह चलती भी है तो ग़लत वक्त बतलाती है
एक उम्र आती है जब समय का भान दूसरे लोगों की चाल-ढाल से
चेहरे-मोहरे देखकर उनकी बातें सुनकर होने लगता है
घड़ी से और धूप-छाँहसे नहीं अपने ही शरीर से बातें करते हुए
नर-नारी जानने लगते हैं अपना वक़्त

कितनी चीज़ें हैं जो दिखाई देती हैं पर हैं नहीं
उन तारों की तरह जो कभी के गायब हो चुके हैं
पर उनकी झिलमिलाहट पहुँचती है आज तक
सन १९८९ ईस्वी धरती पर क्या कर गया
पर फ़िलहाल उधर धूल ही धूल दिखाई देती है रोशनी नहीं
विचार कितने दिन बाद चमकने लगते हैं खो जाने के बाद
और लुप्त हो चुकी व्यवस्थाएं क्या किवाड़ बंद करके
लुप्त प्रजातियों की तरह
लुप्त होने के कारोबार में लग जाती हैं

अपनी माँ से पूछो अब आगे का क्या प्लान है
यहाँ से कब मुझे छुड़ाकर ले जाएगी

अरे तुम्हें पता है मैं परसों जैसे मर ही गया था
उन्होंने मुझसे मेरे सारे कपड़े उतरवा लिए
जब मैं अपना बनियान और अंडरवियर उतार रहा था
तो लगता था मुझे अपने बच्चों से अलग किया जा रहा है
अब पता नहीं मैं कहाँ जा पडूँगा
नरक तो कोई जगह है नहीं और यह जो महबूब वतन है अपना
ऐसे ही धधका करेगा मेरे बिना।

खाना पकाना

नानी ने जाने से एक रोज़ पहले कहा-
सच बात तो यह है कि मुझे कभी
खाना पकाना नहीं आया ।

००

उसकी मृत्युशैया के इर्द गिर्द जमा थे
कुनबे के बहुत से फ़र्द – ज़्यादातर औरतें ढेरों बच्चे –
सुनकर सब हँसने लगे
और हँसते रहे जब तक कि उस सामूहिक हँसी का उजाला
कोठरी से उसारे फिर आँगन में फैलता हुआ
दहलीज़ के रास्ते बाहर न आ गया
और कुछ देर तक बना रहा ।

००

याददाश्त की धोखे भरी दूरबीन से
मुझे दिखती हैं नानी की अधमुँदी आँखें तीसरे पहर का वक़्त
होटों पर कत्थे की लकीरें और एक
जानी पहचानी रहस्यमय मुस्कान

००

मामला जानने के लिए अन्दर आते कुछ हैरान और परेशान
मेरे मामू मेरे पिता

००

रसोई से आ रहा था फर.फर धुआँ
और बड़ी फूफी की आवाज़ जो उस दिन रोज़े से थीं
अरी मुबीना ज़रा क़बूली में नमक चखकर बताना

००

वे सब अब नदारद हैं

००

मैंने एक उम्र गुज़ार दी लिखते
काटते मिटाते बनाते फाड़ते चिपकाते
जो लिबास पहनता हूँ लगता है आख़िरी लिबास है
लेटता हूँ तो कहने के लिए नहीं होता
कोई एक वाक्य
अन्धेरे में भी आकर नहीं जुटता एक बावला कुनबा
वह चमकीली हँसी वैसा शुद्ध उल्लासण

पानी

जब तक में इसे जल न कहूँ
मुझे इसकी कल-कल सुनाई नहीं देती
मेरी चुटिया इससे भीगती नहीं
मेरे लोटे में भरा रहता है अन्धकार

पाणिनी भी इसे जल कहते थे
पानी नहीं

कालान्तर में इसे पानी कहा जाने लगा
रघुवीर सहाय जैसे कवि
उठकर बोलेः
“पानी नहीं दिया तो समझो
हमको बानी नहीं दिया।”

सही कहा – पानी में बानी कहाँ
वह जो जल में है।

सुबह की दुआ

जीवित रहे मेरी रज़ाई जिसने मुझे पाला है
जीवित रहे सुबह जो मेरी ख़ुशी है

और रहें फिर संसार में वे जिन्हें रहना है

विस्मृत आवास 

टूटी फूटी उजाड़ बन्द अकेली कुटिया
खुलो ! मेहमानों को पानी दो
तुम्हारा सुस्त निवासी देखो आया है
बोलो कितने दिनों से बन्द हो, माँ कहाँ है ?
खुलो एक अच्छी ख़बर की तरह
नहीं तो एक बुरी ख़बर ही की तरह सही
अचानक गले लिपट कर शर्मिन्दा कर दो मुझे ।
कि जहाँ मेरी यादें समाप्त होती हैं माँ रहती होगी
और जहाँ मैं गेंद की तरह उछलता हूँ बचपन में
अब सूखी हवा चलती होगी
कुटिया बनो ऎसी सज़ा जैसी माँ ने नहीं दी
हमें क़ैद कर लो यहाँ कि दीख पड़े अचानक हमें आसमान ।

संगीत के रहते

यह आदमी अपनी पसंद के संगीत में
रास्ते पर आ जाएगा, देखता हुआ

बाक़ाइदगी से माँ को ख़त लिखेगा, ढिबरी जलाकर
जंगल से

यह आदमी रोएगा नहीं जब जिस्म में ख़ून की बहुत कमी होगी
थकान क़ाइदा बन जाएगी रोज़ का तब यह नहीं थकेगा

अख़ीर में इसको भी अहसास हो जाएगा
कि देखो, हारी हुई लड़ाईयाँ कितने काम आती हैं ।

उस ज़माने में 

यह जो शहर यहाँ है
इसका क़िला गिर सकता है

कारें रुक सकती हैं किसी वक़्त

फिसल सकते हैं महाराजा
यहीं कनाट प्लेस में

एक धुँआ उठ सकता है
और संभव है जब तक धुँआ हवा में घुले,
हमारी संसद वहाँ न हो

धुँधला पड़ सकता है यमुना का बहाव
सड़कें भागती और अदृश्य होती हो सकती हैं
लट्टू बुझ सकते हैं
दर्द के बढ़ते-बढ़ते फट सकता है सर
ज़मीन कहीं भी जा सकती है यहाँ से सरककर

नहीं जानते यहाँ के दूरदर्शी लोग कि ज़माना कितनी दूर है
जानते हैं वे
जिन्होंने देखा है इस शहर को बहुत दूर से

पुश्तैनी तोप 

आप कभी हमारे यहाँ आकर देखिए
हमारा दारिद्रय कितना विभूतिमय है

एक मध्ययुगीन तोप है रखी हुई
जिसे काम में लाना बड़ा मुश्किल है
हमारी इस मिल्कियत का
पीतल हो गया है हरा, लोहा पड़ चुका है काला

घंटा भर लगता है गोला ठूँसने में
आधा पलीता लगाने में
इतना ही पोज़ीशन पर लाने में

फिर विपक्षियों पर दाग़ने के लिए
इससे ख़राब और अविश्वसनीय जनाब
हथियार भी कोई नहीं

इसे देखते ही आने लगती है
हमारे दुश्मनों को हँसी

इसे सलामी में दाग़ना भी
मुनासिब नहीं है
आख़िर मेहमान को दरवाज़े पर
कितनी देर तक खड़ा रखा जा सकता है

नाई

एक दिन दाढ़ी बनवाते हुए
मैं उस्तरे के नीचे सो गया

कई बार ऎसा होता है
कि लोग हजामत बनवाते हुए
सो जाते हैं
उस्तरे, कंघे और क़ैंची के नीचे
जैसे पेड़ के नीचे

नाई नींद में भी घुस आया अपने किस्से का छोर संभाले
कहा– अजी मैं कभी का हो गया होता बरबाद
भला हुआ ताऊ ने हाथ में उस्तरा दे कर
बना दिया जबरन मुझे नाई

एक अधूरी कविता

मैं तुम्हारे यहाँ बैठा था
और मुझे लगा मैं किसी चित्र के अन्दर बैठा हूँ
और यह चिड़िया जो तार पर बैठी है अभी उड़ेगी नहीं
और जल्दी ही कोई आकर ख़बर नहीं लेगा हमारी
और यह योजना यूँ ही बनी रहेगी
हम नहीं होंगे आख़िरकार विफल
हम नहीं होंगे विकल
धीरज हमें रास आ जाएगा
हम अपने विनाश को कहेंगे ह्रास
तुम्हारी राय होगी वस्तुओं को रूखा और सूखा होना चाहिए
तुम कहोगी स्वप्नों को कठोर इच्छाओं को
पानी जैसा फीका होना चाहिए
और इसी रूप में बन जाना चाहिए हमें प्रेम का ग्रास

मैं उस जगह से उठ गया जहाँ कभी बैठा था
कुर्सियाँ हटा दी गईं पुताई करा दी गई
लोग बदल दिए गए फ़र्श का अब उतना बुरा हाल नहीं
पर ग़लती से पुराना धुराना पंखा वहाँ लटका रह गया है
धीमे स्वर में घरघराता हुआ
जो चित्र में नहीं आया वह आज भी है वैसा ही बना हुआ

मैं चाहता था कि जब हम जीवन पर बात करें
तो कविता को भूल जाएँ

एक ग़रीब का अकेलापन 

एक ग़रीब का अकेलापन
उसके ख़ाली पेट के सिवा कुछ नहीं
अपनी दार्शनिक चिन्ता में
दुहराता हूँ मैं यही एक बात

दिल्ली की नागरिकता

(विश्वनाथ और हरीश के लिए )

जैसी पाँचवीं कक्षा में गणित मेरे लिए वैसी इस शहर में भीड़ थी

फ़्लैशबैक ख़त्म हुआ । बारिश में भीगता एक रोज़ चला जाता था
कि एक भली औरत ने मुझे एक छाता दिया जो मैंने ले लिया
बिना कुछ बोले अंत में एक दिन एक मक़ाम पर हम विदा हुए

कहिए श्रीमान कैसे हैं ? यह एक दोस्त का ख़त था शहर के
दूसरे कोने से

मैं वहाँ गया
गलियों में बदबू थी अँधेरा कुछ नहीं कहता था
उस दोस्त ने दाँत चमकाए
और मुझे प्यार से खाना खिलाया
वहाँ की हर चीज़ मेरा मुँह देखती थी
हमने थॊड़ी शराब पी ली रेडियो भर्रा रहा था
फटे गले से कोई गाता जाता था
अचानक एक विश्वास मुझमें आने लगा चाहे कुछ भी हो
मैं अन्न्तकाल तक ज़िन्दा रहूँगा

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