असलम इमादी की रचनाएँ

कोई इशारा कोई इस्तिआरा क्यूँकर हो 

कोई इशारा कोई इस्तिआरा क्यूँकर हो
अब आसमान-ए-सुख़न पर सितारा क्यूँकर हो

अब उस के रंग में है बेशतर तग़ाफ़ुल सा
अब उस के तौर शनासी का चारा क्यूँकर हा

वो सच से ख़ुश न अगर हो तो झूठ बोलेंगे
कि वो जो रूठे तो अपना गुज़ारा क्यूँकरहो

उन्हें ये फ़िक्र कि दिल को कहाँ छुपा रक्खें
हमें ये शौक़ कि दिल का ख़सारा क्यूँकर हो

उरूज कैसे हो ज़ौक़-ए-जुनूँ को अब ‘असलम’
सुकूँ का आइना अब पारा पारा क्यूँकर हो

कोशिश है गर उस की कि परेशान करेगा

कोशिश है गर उस की कि परेशान करेगा
वो दुश्मन-ए-जाँ दर्द को आसान करेगा

हम उस को जवाबों से पशीमान करेंगे
वो हम को सवालों से पशीमान करेगा

पहलू-तिही करते हुए दुज़-दीदा जो देखे
चेहरे के तअस्सुर से वो हैरान करेगा

तू छुप के ही आए कि बरफ़्गंदा-नक़ाब आए
दिल की यही आदत है कि नुक़सान करेगा

क़ज़्ज़ाकों की बस्ती में रहा करते हैं हम सब
हर घर को कोई दूसरा वीरान करेगा

हर टीस से उभरेगी तिरी याद की ख़ुशबू
हर ज़ख़्म मिरे शौक़ पे एहसान करेगा

‘असलम’ ये सुना है कि मिरा शहर-ए-वफ़ा भी
तख़रीब को शर्मिदा-ए-ईक़ान करेगा

तमाम खेल तमाशों के दरमियान वही

तमाम खेल तमाशों के दरमियान वही
वो मेरा दुश्मन-ए-जाँ यानी मेहरबान वही

हज़ार रास्ते बदले हज़ार स्वाँग रचे
मगर है रक़्स में सर पर इक आसमान वही

सभी को उस की अज़िय्यत का है यक़ीन मगर
हमारे शहर में है रस्म-ए-इम्तिहान वही

तुम्हारे दर्द से जागे तो उन की क़द्र खुली
वगरना पहले भी अपने थे जिस्म-ओ-जान वही

वही हुरूफ़ वही अपने बे-असर फ़िक़रे
वही बुझे हुए मौज़ू और बयानी वही

वहाँ हर इक इसी नश्शा-ए-अना में है

वहाँ हर इक इसी नश्शा-ए-अना में है
कि ख़ाक-ए-रहगुज़र-ए-यार भी हवा में है

अलिफ़ से नाम तिरा तेरे नाम से मैं अलिफ़
इलाही मेरा हर इक दर्द इस दुआ में है

वही कसीली सी लज़्ज़त वही सियाह मज़ा
जो सिर्फ़ होश में था हर्फ़-ए-ना-रवा में है

वो कोई था जो अभी उठ के दरमियाँ से गया
हिसाब कीजे तो हर एक अपनी जा में है

नमी उतर गई धरती में तह-ब-तह ‘असलम’
बहार-ए-अश्क नई रूत की इब्तिदा में है

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