अहमद अज़ीम की रचनाएँ

अब सोचिये तो दाम-ए-तमन्ना में आ गए

अब सोचिये तो दाम-ए-तमन्ना में आ गए
दीवार ओ दर को छोड़ के सहरा में आ गए

तस्वीर थे जो अव्वलीं सर-शारियों में लोग
वो ज़ख़्म बन के चश्म-ए-तमन्ना में आ गए

उन से भी पूछिये कभी अपनी ज़मीं का कर्ब
जो साहिलों को छोड़ के दरिया में आ गए

वहशत ने यूँ तो ख़ूब दिया हर क़दम पे साथ
लेकिन तेरे फ़रेब-ए-दिल-आरा में आ गए

इस अंजुमन में अंजुम ओ ज़हरा भी थे मगर
हम शब-गुज़ीदा सिहर-ए-सुरय्या में आ गए.

ऐसा इलाज-ए-हबस-ए-दिल-ए-ज़ार चाहिए

ऐसा इलाज-ए-हबस-ए-दिल-ए-ज़ार चाहिए
इक दर फ़सील-ए-जाँ में हवा-दार चाहिए

इक झील नग़मा-रेज़ हो अहल-ए-सफ़र के साथ
सर-सब्ज़ दूर तक सफ़-ए-अशजार चाहिए

सहरा कफ़-ए-तमव्वुज-ए-दरिया में हो असीर
शोला हवा से बर-सर-ए-पैकार चाहिए

ये रूह एक ताइर-ए-वहशी नज़ाद है
हर दम सफ़र के वास्ते तय्यार चाहिए

अपने फ़रोग़-ए-हुस्न की तश्हीर के लिए
शहज़ादी-ए-ख़याल को दर-बार चाहिए

इस शहर-ए-ख़िश्तो-ओ-संग को शीशे की चाह है
कोई जवान आईना-बरदार चाहिए

बाज़ार-ए-आरज़ू में कटी जा रही है उम्र
हम को ख़रीद ले वो ख़री-दार चाहिए

ऐसी भी कहाँ बे-सर-ओ-सामानी हुई है

ऐसी भी कहाँ बे-सर-ओ-सामानी हुई है
जो सब को मुझे देख के हैरानी हुई है

दिल में तो तेरी याद थी इक बूँद लहू की
आँखों में जो आई तो यही पानी हुई है

क़ुल्ज़ुम का है एज़ाज़ के तह-दारी की हर मौज
इस ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर की दीवानी हुई है

क्या ढूँडने निकली है किसी क़ैस को पागल
इस दर्जा जो ये बाद-ए-बयाबानी हुई है

आसेब-ज़दा हैं दर-ओ-दीवार-ए-शब-ओ-रोज़
किस दर्जा मह ओ साल की वीरानी हुई है

बोए हैं बहुत चश्म-ए-तमन्ना में यहाँ ख़्वाब
तब जा के ज़मीं दिल की ये बारानी हुई है

दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया

दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया
लेकिन मैं चाँद-रात में बाहर नहीं गया

आँखों में उड़ रहा है अभी तक ग़ुबार-ए-हिज्र
अब तक विदा-ए-यार का मंज़र नहीं गया

ऐ शाम-ए-हिज्र-ए-यार मेरी तू गवाही दे
मैं तेरे साथ साथ रहा घर नहीं गया

तू ने भी सारे ज़ख़्म किसी तौर सह लिए
मैं भी बिछड़ के जी ही लिया मर नहीं गया

सादा फ़सील-ए-शहर मुझे देखती रही
लेकिन मैं तेरा नाम भी लिख कर नहीं गया

बख़्शा शब-ए-फ़िराक़ को दिल ने अबद का तूल
शब भर लहू-लुहान रहा मर नहीं गया

फ़ितना उठा तो रज़्म-गह-ए-ख़ाक से उठा

फ़ितना उठा तो रज़्म-गह-ए-ख़ाक से उठा
सूरज किसी के पैरहन-ए-चाक से उठा

ये दिल उठा रहा है बड़े हौसले के साथ
वो बार जो ज़मीं से न अफ़्लाक से उठा

सब मोजज़ों के बाब में ये मोजज़ा भी हो
जो लोग मर गए हैं उन्हें ख़ाक से उठा

सूरज की ज़ौ चराग़-ए-शिकस्ता की लौ से हो
क़ुल्ज़ुम की मौज दीदा-ए-नम-नाक से उठा

पूछा जो उस ने अहद-ए-जराहत का माजरा
दरिया लहू का हर रग-ए-पोशाक से उठा

इश्क़ में हो के मुब्तला दिल ने कमाल कर दिया

इश्क़ में हो के मुब्तला दिल ने कमाल कर दिया
यूँ ही सी एक शक्ल को ज़ेहरा जमाल कर दिया

हम को तुम्हारी बज़्म से उठने का कुछ क़लक़ नहीं
जैसा ख़याल हो सका वैसा ख़याल कर दिया

सैल-ए-रवान-ए-उम्र के आगे ठहर सका न कुछ
वक़्त ने मेहर-ए-हुस्न को रू-बा-ज़वाल कर दिया

एक सम-ए-अज़ाब सा फैल गया वजूद में
रोज़-ओ-शब-ए-फ़िराक़ ने जीना मुहाल कर दिया

मेरी ज़बान-ए-ख़ुश्क पर रेत का जाइक़ा सा है
मौसम-ए-बर-शिगाल ने कैसा ये हाल कर दिया

धुँद में खो के रह गईं सूरतें मेहर ओ माह सी
वक़्त की गर्द ने उन्हें ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया

इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक

इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक
वो मेरे साथ साथ था उरूज से ज़वाल तक

नहीं है सहल इस क़दर के जी सके हर एक शख़्स
बला-ए-हिज्र की रुतों से मौसम-ए-विसाल तक

हमारी किश्त-ए-आरज़ू ये धूप क्या जलाएगी
तुम्हारा इंतिज़ार हम करेंगे बर-शिगाल तक

अमीक़ ज़ख़्म इस क़दर ब-दस्त-ए-रोज़-ओ-शब मिले
के मुंदमिल न कर सकी दवा-ए-माह-ओ-साल तक

क़ुबा-ए-ज़र्द-ओ-सुर्ख़ का ये इम्तिज़ाज-अल-अमाँ
जमाल को वो ले गया परे हद-ए-कमाल तक

किसे ख़बर के है क्या क्या ये जान थामे हुए

किसे ख़बर के है क्या क्या ये जान थामे हुए
ज़मीं थामे हुए आसमान थामे हुए

फ़ज़ाएँ कुछ भी नहीं हैं फ़क़त नज़र का फ़रेब
खड़ा हुआ है कोई आसमान थामे हुए

सफ़ीना मौज-ए-सैल-ए-बला से गर्म-ए-सतीज़
हवा का बार-ए-गिराँ बादबान थामे हुए

गिरा है कोई जरी ऐ फ़सील-ए-शहर-ए-तबाह
मुज़ाहिमत का दरीदा-निशान थामे हुए

सड़क के पार चला जा रहा है बचता हुआ
किसी का हाथ कोई मेहरबान थामे हुए

अजब तिलिस्म सा मंज़र है भीगती हुई शाम
कोई परी है धनक की कमान थामे हुए

मैं तो सोया भी न था क्यूँ ये दर-ए-ख़्वाब गिरा

मैं तो सोया भी न था क्यूँ ये दर-ए-ख़्वाब गिरा
मेरी आग़ोश में बुझता हुआ महताब गिरा

फिर समुंदर की तरफ़ लौट चली मौज-ब-मौज
फिर कोई तिश्ना-दहन आ के सर-ए-आब गिरा

अक्स मिस्मार न कर दीदा-ए-हैराँ के सरिश्क
मेरे ख़्वाबों के दर ओ बाम न सैलाब गिरा

ढूँड सीपी की तरह दिल को न साहिल के क़रीब
ये सदफ़ दूर बहुत दूर तह-ए-आब गिरा

आहन ओ संग को ज़हराब-ए-फ़ना चाट गया
पहले दीवार शिकस्ता हुई फिर बाब गिरा

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