अहमद कमाल ‘परवाज़ी’ की रचनाएँ

ये गर्म रात ये सेहरा निभा के चलना है 

ये गर्म रेत ये सहरा[1] निभा के चलना है
सफ़र तवील[2] है पानी बचा के चलना है

बस इस ख़याल से घबरा के छँट गए सब लोग
ये शर्त थी के कतारें बना के चलना है

वो आए और ज़मीं रौंद कर चले भी गए
हमें भी अपना ख़सारा[3] भुला के चलना है

कुछ ऐसे फ़र्ज़ भी ज़िम्मे हैं ज़िम्मेदारों पर
जिन्हें हमारे दिलों को दुखा के चलना है

शनासा[4] ज़हनों पे ताने असर नहीं करते
तू अजनबी है तुझे ज़हर खा के चलना है

वो दीदावर[5] हो के शायर या मसखरा कोई
यहाँ सभी को तमाशा दिखा के चलना है

वो अपने हुस्न की ख़ैरात[6] देने वाले हैं
तमाम जिस्म को कासा[7] बना के चलना है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें जंगल, मैदान, रेगिस्तान
  2. ऊपर जायें लम्बा
  3. ऊपर जायें हानि, क्षति, नुक़सान
  4. ऊपर जायें परिचित, जानकार, वाक़िफ़
  5. ऊपर जायें पारखी, जौहरी
  6. ऊपर जायें दान
  7. ऊपर जायें भिक्षापात्र

जो चोट दे गए उसे गहरा तो मत करो 

जो चोट दे गए उसे गहरा तो मत करो
हम बेवक़ूफ़ हैं, कही चर्चा तो मत करो

माना के तुमने शहर को सर कर लिया मगर
दिल जा नमाज़ है इसे रस्ता तो मत करो

बा-इख्तियार-ए- शहर-ए-सितम हो ये शक नहीं
लेकिन खुदा नहीं है ये दावा तो मत करो

बर्दाश्त कर लिया चलो बारीक पैराहन
पर इसको जान करके भिगोया तो मत करो

तामीर का जूनून मुबारक तुम्हें मगर ,
कारीगरों के हाथ तराशा तो मत करो …

कोई चेहरा हुआ रोशन न उजागर आँखें

कोई चेहरा हुआ रौशन न उजागर आँखें,
आईना देख रही थी मेरी पत्थर आँखें,

ले उड़ी वक़्त की आँधी जिन्हें अपने हमराह,
आज फिर ढूँढ़ रही है वही मंज़र आँखें,

फूट निकली तो कई शहर-ए-तमन्ना डूबे,
एक क़तरे को तरसती हुई बंजर आँखें,

उस को देखा है तो अब शौक़ का वो आलम है,
अपने हलकों से निकल आई हैं बाहर आँखें,

तू निगाहों की ज़बाँ ख़ूब समझता होगा,
तेरी जानिब तो उठा करती हैं अक्सर आँखें,

लोग मरते न दर-ओ-बाम से टकरा के कभी,
देख लेते जो ‘कमाल’ उसकी समंदर आँखें,

अजनबी ख़ौफ़ फ़िज़ाओं में बसा हो जैसे

अजनबी ख़ौफ़ फ़िज़ाओं में बसा हो जैसे,
शहर का शहर ही आसेबज़दा हो जैसे,

रात के पिछले पहर आती हैं आवाज़ें-सी,
दूर सहरा में कोई चीख़ रहा हो जैसे,

दर-ओ-दीवार पे छाई है उदासी ऐसी
आज हर घर से जनाज़ा-सा उठा हो जैसे

मुस्कुराता हूँ पा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब- मगर
दुःख तो चेहरे की लकीरों पे सजा हो जैसे

अब अगर डूब गया भी तो मरूँगा न ‘कमाल’
बहते पानी पे मेरा नाम लिखा हो जैसे

ग़रीब-ए-शहर का सर है के शहरयार का है

ग़रीब-ए-शहर का सर है के शहरयार का है
ये हम से पूछ के ग़म कौन सी कतार का है

किसी की जान का न मसला सहकार का है
यहाँ मुकाबला पैदल से शहसवार का है

ऐ आब-ओ-ताब-ए-सितम मशक क्यूँ नहीं करता
हमें तो शौक़ भी सेहरा-ए-बेहिसार का है

यहाँ का मसला मिटटी की आबरू का नहीं
यहाँ सवाल ज़मीनों पे इख्तियार का है

वो जिसके दर से कभी ज़िन्दगी नहीं देखी
ये आधा चाँद उसी शहर-ए-यादगार का है

ये ऐसा ताज है जो सर पे खुद पहुँचता है
इसे ज़मीन पे रख दो ये खाकसार का है

ये उसके बाद है तहरीर क्या निकलती है
अभी सवाल तो अपने पे इख्तियार का है

वो अब तिजारती पहलू निकाल लेता है

वो अब तिजारती पहलू निकाल लेता है
मैं कुछ कहूं तो तराजू निकाल लेता है

वो फूल तोड़े हमें कोई ऐतराज़ नहीं
मगर वो तोड़ के खुशबू निकाल लेता है,

अँधेरे चीर के जुगनू निकालने का हुनर
बहुत कठिन है मगर तू निकाल लेता है,

मैं इसलिए भी तेरे फ़न की क़द्र करता हूँ,
तू झूठ बोल के आंसू निकाल लेता है,

वो बेवफाई का इज़हार यूं भी करता है,
परिंदे मार के बाजू निकाल लेता है

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