अहमद ‘जावेद’ की रचनाएँ

आँसू की तरह दीदा-ए-पुर-आब 

आँसू की तरह दीदा-ए-पुर-आब में रहना
हर गाम मुझे ख़ाना-ए-सैलाब में रहना

वो अब्रू-ए-ख़म-दार नज़र आए तो समझे
आँखों की तरह साया-ए-महराब में रहना

ग़फ़लत ही में कटते हैं शब ओ रोज़ हमारे
हर आन किसी ध्यान किसी ख़्वाब में रहना

दिन भर किसी दीवार के साए में तग-ओ-ताज़
शब जुस्तुजू-ए-चादर-ए-महताब में रहना

वीराना-ए-दुनिया में गुज़रते हैं मेरे दिन
रातों को रवाक़-ए-दिल-ए-बे-ताब में रहना

मिट्टी तो हर इक हाल में मिट्टी ही रहेगी
क्या टाट में क्या क़ाक़िम ओ संजाब में रहना

घर और बयाबाँ में कोई फ़र्क़ नहीं है
लाज़िम है मगर इश्क़ के आदाब में रहना

इक पल को भी आँखें न लगीं ख़ाना-ए-दिल में
हर लम्हा निगह-बानी-ए-असबाब में रहना

आख़िरुल-अम्र तेरी सम्त सफ़र

आख़िरुल-अम्र तेरी सम्त सफ़र करते हैं
आज इस नख़्ल-ए-मसाफ़त को शजर करते हैं

जो है आबाद तेरी आइना-सामानी से
हम इसी ख़ाना-ए-हैरत में बसर करते हैं

दिल तो वो पेट का हल्का है के बस कुछ न कहो
अपनी हालत से कब ऐसों को ख़बर करते हैं

वस्ल और हिज्र हैं दोनों ही मियाँ से बैअत
देखिये किस पे इनायत की नज़र करते हैं

दिल ने कुछ ज़ोर दिखाया तो ये सुनना इक दिन
हम भी अलवंद-ए-ग़म-ए-यार को सर करते हैं

तुम को तो दीन की भी फ़िक्र है दुनिया की भी
भाई हम तो यूँही बेकार बसर करते हैं

चाक करते हैं गिरेबाँ इस फ़रावानी

चाक करते हैं गिरेबाँ इस फ़रावानी से हम
रोज़ ख़िलअत पाते हैं दरबार-ए-उरयानी से हम

मुंतख़ब करते हैं मैदान-ए-शिकस्त अपने लिए
ख़ाक पर गिरते हैं लेकिन औज-ए-सुल्तानी से हम

हम ज़मीन-ए-क़त्ल-गह पर चलते हैं सीने के बल
जादा-ए-शमशीर सर करते हैं पेशानी से हम

हाँ मियाँ दुनिया की चम-ख़म ख़ूब है अपनी जगह
इक ज़रा घबरा गए हैं दिल की वीरानी से हम

ज़ोफ़ है हद से ज़्यादा लेकिन इस के बा-वजूद
ज़िंदगी से हाथ उठा सकते हैं आसानी से हम

दिल से बाहर आज तक हम ने क़दम रक्खा नहीं
देखने में ज़ाहिरा लगते हैं सैलानी से हम

दौलत-ए-दुनिया कहाँ रक्खें जगह भी हो कहीं
भर चुके हैं अपना घर बे-साज़-ओ-सामानी से हम

ज़र्रा ज़र्रा जगमगाती जलवा-बारानी-ए-दोस्त
देखते हैं रोज़न-ए-दीवार हैरानी से हम

अक़्ल वालो ख़ैर जाने दो नहीं समझोगे तुम
जिस जगह पहुँचे हैं राह-ए-चाक-दामानी से हम

कारोबार-ए-ज़िंदगी से जी चुराते हैं सभी
जैसे दुर्वेशी से तुम मसलन जहाँ-बानी से हम

दिल-ए-बे-ताब के हम-राह सफ़र 

दिल-ए-बे-ताब के हम-राह सफ़र में रहना
हम ने देखा ही नहीं चैन से घर में रहना

स्वांग भरना कभी शाही कभी दुर्वेशी का
किसी सूरत से मुझे उस की नज़र में रहना

एक हालत पे बसर हो नहीं सकती मेरी
जाम-ए-ख़ाक कभी ख़िलअत-ए-ज़र में रहना

दिन में है फ़िक्र-ए-पस-अंदाज़ी-ए-सरमाया-ए-शब
रात भर काविश-ए-सामान-ए-सहर में रहना

दिल से भागे तो लिया दीदा-ए-तर ने गोया
आग से बच के निकलना तो भँवर में रहना

अहल-ए-दुनिया बहुत आराम से रहते हैं मगर
कब मयस्सर है तेरी राह-गुज़र में रहना

वस्ल की रात गई हिज्र का दिन भी गुज़रा
मुझे वारफ़्तगी-ए-हाल-ए-दिगर में रहना

कर चुका है कोई अफ़लाक ओ ज़मीं की तकमील
फिर भी हर आन मुझे अर्ज़-ए-हुनर में रहना

हमारी हम-नफ़सी को भी क्या

हमारी हम-नफ़सी को भी क्या दवाम हुआ
वो अब्र-ए-सुर्ख़ तो मैं नख़्ल-ए-इंतिक़ाम हुआ

यहीं से मेरे अदू का ख़मीर उट्ठा था
ज़मीन देख के मैं तेग़-ए-बे-नियाम हुआ

ख़बर नहीं है मेरे बादशाह को शायद
हज़ार मर्तबा आज़ाद ये ग़ुलाम हुआ

अजब सफ़र था अजब-तर मसाफ़िरत मेरी
ज़मीन शुरू हुई और में तमाम हुआ

वो काहिली है के दिल की तरफ़ से ग़ाफ़िल हैं
ख़ुद अपने घर का भी हम से न इंतिक़ाम हुआ

हुई है ख़त्म दर ओ बाम की कम-असबाबी
मयस्सर आज वो सामान-ए-इंहिदाम हुआ

हमेशा दिल वो हवस-ए-इंतिक़ाम

हमेशा दिल वो हवस-ए-इंतिक़ाम पर रक्खा
ख़ुद अपना नाम भी दुश्मन के नाम पर रक्खा

वो बादशाह-ए-फ़िराक़-ओ-विसाल है उस ने
जो बार सब पर गिराँ था ग़ुलाम पर रक्खा

किये हैं सब को अता उस ने ओहदा ओ मंसब
मुझे भी सीना-ख़राशी के काम पर रक्खा

कोई सवार उठा है पस-ए-ग़ुबार-ए-फ़ना
क़ज़ा ने हाथ कुलाह ओ नियाम पर रक्खा

किसी ने बे-सर-ओ-पाई के बा-वजूद मुझे
ज़मीन-ए-सजदा ओ अर्ज़-ए-क़याम पर रक्खा

किसी का ध्यान मह-ए-नीम-माह 

किसी का ध्यान मह-ए-नीम-माह में आया
सफ़र की रात थी और ख़्वाब राह में आया

तुलू-ए-साअत-ए-शब-ख़ूँ है और मेरा दिल
किसी सितारा-ए-बद की निगाह में आया

मह ओ सितारा से दिल की तरफ़ चला वो जवाँ
अदू की क़ैद से अपनी सिपाह में आया

जिहाद-ए-ग़म में कोई सुस्त ज़र्ब मेरी तरह
गिरफ़्त-ए-मैसर-ए-अश्क-ओ-आह में आया

सितारे डूब गए और वो सितारा-गर
थकन से चूर ज़मीं की पनाह में आया

चराग़ है मेरी रातों का एक ख़्वाब-ए-विसाल
जो कोई पल तेरी चश्म-ए-सियाह में आया

दुखी दिलों की सलामी क़ुबूल करते हुए
नज़र झुकाए कोई ख़ानक़ाह में आया

क्या पूछते हो शहर में घर और

क्या पूछते हो शहर में घर और हमारा
रहने का है अंदाज़ इधर और हमारा

वो तेग़ न जाने किधर उठती है अभी तो
झगड़ा है दिल-ए-सीना-सिपर और हमारा

जब होश में आए तो उसे देख भी लेंगे
फ़िल-हाल है अंदाज़-ए-नज़र और हमारा

ये मेहर ओ निशाँ तब्ल ओ अलम ख़ूब है लेकिन
बढ़ जाएगा कुछ बार-ए-सफ़र और हमारा

दिल ऐसा मकाँ छोड़ के ये हाल हुआ है
यानी निगह-ए-ख़ाना-बदर और हमारा

मुझ से बड़ा है मेरा हाल

मुझ से बड़ा है मेरा हाल
तुझ से छूटा तेरा ख़याल

चार पहर की है ये रात
और जुदाई के सौ साल

हाथ उठा कर दिल पर से
आँखों पर रक्खा रुमाल

नंग है तकिये-दारों का
पा-ए-तलब या दस्त-ए-सवाल

मन जो कहता है मत सुन
या फिर तन पर मिट्टी डाल

उजला उजला तेरा रूप
धुँदले धुँदले ख़द्द-ओ-ख़ाल

सुख की ख़ातिर दुख मत बेच
जाल के पीछे जाल न डाल

राज-सिंघासन मेरा दिल
आन बिराजे हैं जग-पाल

किस दिन घर आया ‘जावेद’
कब पाया है उस को बहाल

Share