अहमद फ़राज़ की रचनाएँ

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और
उस कू-ए-मलामत में गुजरते कोई दिन और

रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरते
आँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और

हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखा
ए काश तेरे बाद गुजरते कोई दिन और

राहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों को
तुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और

गो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थी
मरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन और

उस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थे
ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और

कू-ए-मलामत – ऐसी गली, जहाँ व्यंग्य किया जाता हो
खुर्शीद – सूर्य, रंज – तकलीफ़, गमतलब– दुख पसन्द करने वाले
तर्के-तअल्लुक – रिश्ता टूटना( यहाँ संवाद हीनता से मतलब है)

अजब जूनून-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था

अजब जूनून-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था,
ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था,

ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया,
अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र से निकला था,

ये तीर दिल में मगर बे-सबब नहीं उतरा,
कोई तो हर्फ़ लब-ए-चारागर से निकला था,

मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया,
कि दिल का दर्द मेरे चश्म-ए-तर से निकला था,

वो कैसे अब जिसे मजनू पुकारते हैं ‘फ़राज़’,
मेरी तरह कोई दिवाना-गर से निकला था,

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जानाँ

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्साँ जानाँ

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तेरा एहसाँ जानाँ

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ

आख़िर आख़िर तो ये आलम है कि अब होश नहीं
रग-ए-मीना सुलग उठी कि रग-ए-जाँ जानाँ

मुद्दतों से ये आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ

हम भी क्या सादा थे हम ने भी समझ रखा था
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है ग़म-ए-जानाँ जानाँ

अब की कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँ
सर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गिरेबाँ जानाँ

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ

जिस को देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जानाँ

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जानाँ

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ

होश आया तो सभी ख़्वाब थे रेज़ा-रेज़ा
जैसे उड़ते हुये औराक़-ए-परेशाँ जानाँ

अब के बरस भी

लब[1] तिश्न-ओ-नोमीद[2] हैं हम अब के बरस भी
ऐ ठहरे हुए अब्रे-करम[3] अब के बरस भी

कुछ भी हो गुलिस्ताँ[4] में मगर कुंजे- चमन [5] में
हैं दूर बहारों के क़दम अब के बरस भी

ऐ शेख़-करम[6]! देख कि बा-वस्फ़े-चराग़ाँ[7]
तीरा[8] है दरो-बामे-हरम[9] अब के बरस भी

ऐ दिले-ज़दगान[10] मना ख़ैर, हैं नाज़ाँ[11]
पिंदारे-ख़ुदाई[12] पे सनम[13] अब के बरस भी

पहले भी क़यामत[14] थी सितमकारी-ए-अय्याम[15]
हैं कुश्त-ए-ग़म [16] कुश्त-ए-ग़म अब के बरस भी

लहराएँगे होंठों पे दिखावे के तबस्सुम[17]
होगा ये नज़ारा[18] कोई दम[19] अब के बरस भी

हो जाएगा हर ज़ख़्मे-कुहन [20] फिर से नुमायाँ[21]
रोएगा लहू दीद-ए-नम[22] अबके बरस भी

पहले की तरह होंगे तही[23] जामे-सिफ़ाली[24]
छलकेगा हर इक साग़रे-जम[25] अब के बरस भी

मक़्तल[26] में नज़र आएँगे पा-बस्त-ए-ज़ंजीर[27]
अहले-ज़रे-अहले-क़लम[28] अब के बरस भी

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें होंठ
  2. ऊपर जायें प्यासा और निराश
  3. ऊपर जायें दया के बादल
  4. ऊपर जायें उद्यान
  5. ऊपर जायें उद्यान के कोने में
  6. ऊपर जायें ईश्वर
  7. ऊपर जायें बावजूद
  8. ऊपर जायें अँधेरा
  9. ऊपर जायें काबे के द्वार व छत
  10. ऊपर जायें आहत हृदय
  11. ऊपर जायें गर्वान्वित
  12. ऊपर जायें ईश्वरीय गर्व
  13. ऊपर जायें मूर्तियाँ
  14. ऊपर जायें प्रलय, मुसीबत
  15. ऊपर जायें समय का अत्याचार
  16. ऊपर जायें दुख के मारे हुए
  17. ऊपर जायें मुस्कुराहटें
  18. ऊपर जायें दृश्य
  19. ऊपर जायें कुछ समय
  20. ऊपर जायें गहरा घाव
  21. ऊपर जायें सामने आएगा
  22. ऊपर जायें भीगे नेत्र
  23. ऊपर जायें ख़ाली
  24. ऊपर जायें मिट्टी के मद्य-पात्र
  25. ऊपर जायें जमशेद नामी जादूगर का मद्यपात्र
  26. ऊपर जायें वध-स्थल
  27. ऊपर जायें बेड़ियों में जकड़े पैर
  28. ऊपर जायें विद्वान व लेखक

अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन

अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन
ज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन

देखना सब रक़्स-ए-बिस्मल में मगन हो जाएँगे
जिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन

वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की है
लोग तो फल-फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन

हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना
रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन

आ फ़सील-ए-शहर से देखें ग़नीम-ए-शहर को
शहर जलता हो तो तुझ को बाम पर देखेगा कौन

अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली

अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली
आ चुके अब तो शब-ओ-रोज़ अज़ाबों वाले

अब तो सब दश्ना-ओ-ख़ंज़र की ज़ुबाँ बोलते हैं
अब कहाँ लोग मुहब्बत के निसाबों वाले

ज़िन्दा रहने की तमन्ना हो तो हो जाते हैं
फ़ाख़्ताओं के भी किरदार उक़ाबों वाले

न मेरे ज़ख़्म खिले हैं न तेरा रंग-ए-हिना
मौसम आये ही नहीं अब के गुलाबों वाले

अल्मिया 

अल्मिया[1]

किस तमन्ना [2]से ये चाहा था कि इक रोज़ तुझे
साथ अपने लिए उस शहर को जाऊँगा जिसे
मुझको छोड़े हुए,भूले हुए इक उम्र[3]हुई

हाय वो शहर कि जो मेरा वतन है फिर भी
उसकी मानूस[4]फ़ज़ाओं [5]से रहा बेग़ाना[6]
मेरा दिल मेरे ख़्यालों[7]की तरह दीवाना[8]

आज हालात का ये तंज़े-जिगरसोज़ [9]तो देख
तू मिरे शह्र के इक हुजल-ए-ज़र्रीं[10] में मकीं[11]
और मैं परदेस में जाँदाद-ए-यक-नाने-जवीं[12]

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें त्रासदी
  2. ऊपर जायें कामना,दिल की गहराइयों से
  3. ऊपर जायें लंबा समय
  4. ऊपर जायें परिचित
  5. ऊपर जायें हवाओं (वातावरण)
  6. ऊपर जायें अंजान
  7. ऊपर जायें विचारों
  8. ऊपर जायें पागल
  9. ऊपर जायें सीने को छलनी कर देने वाला उलाहना
  10. ऊपर जायें सोने (स्वर्ण) की सेज
  11. ऊपर जायें निवासी
  12. ऊपर जायें जौ की एक रोटी को तरसता

अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी

अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी
इक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी

मैं भी शहरे-वफ़ा में नौवारिद
वो भी रुक रुक के चल रही है अभी

मैं भी ऐसा कहाँ का ज़ूद शनास
वो भी लगता है सोचती है अभी

दिल की वारफ़तगी है अपनी जगह
फिर भी कुछ एहतियात सी है अभी

गरचे पहला सा इज्तिनाब नहीं
फिर भी कम कम सुपुर्दगी है अभी

कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता
बूंदा-बांदी भी धूप भी है अभी

ख़ुद-कलामी में कब ये नशा था
जिस तरह रु-ब-रू कोई है अभी

क़ुरबतें लाख खूबसूरत हों
दूरियों में भी दिलकशी है अभी

फ़सले-गुल में बहार पहला गुलाब
किस की ज़ुल्फ़ों में टांकती है अभी

सुबह नारंज के शिगूफ़ों की
किसको सौगात भेजती है अभी

रात किस माह -वश की चाहत में
शब्नमिस्तान सजा रही है अभी

मैं भी किस वादी-ए-ख़याल में था
बर्फ़ सी दिल पे गिर रही है अभी

मैं तो समझा था भर चुके सब ज़ख़्म
दाग़ शायद कोई कोई है अभी

दूर देशों से काले कोसों से
कोई आवाज़ आ रही है अभी

ज़िन्दगी कु-ए-ना-मुरादी से
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी

इस क़दर खीच गयी है जान की कमान
ऐसा लगता है टूटती है अभी

ऐसा लगता है ख़ल्वत-ए-जान में
वो जो इक शख़्स था वोही है अभी

मुद्दतें हो गईं ‘फ़राज़’ मगर
वो जो दीवानगी थी, वही है अभी

नौवारिद – नया आने वाला, ज़ूद-शनास – जल्दी पहचानने वाला
वारफतगी – खोया खोयापन, इज्तिनाब – घृणा, अलगाव
सुपुर्दगी – सौंपना, खुदकलामी – खुद से बातचीत, शिगूफ़े– फूल, कलियां

चश्मे-पुर-खूं – खून से भरी हुई आँख
आबे-जमजम – मक्के का पवित्र पानी
अबस – बेकार, सानी – बराबर, दूसरा
कामत – लम्बे शरीर वाला (यहाँ कयामत/ज़ुल्म ढाने वाले से मतलब है)

आँख से दूर न हो 

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा

इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा

किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दो
मरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा

डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का “फ़राज़”
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जाएगा

इज़्हार

   इज़्हार[1]

पत्थर की तरह अगर मैं चुप रहूँ
तो ये न समझ कि मेरी हस्ती[2]
बेग़ान-ए-शोल-ए-वफ़ा[3] है
तहक़ीर[4] से यूँ न देख मुझको
ऐ संगतराश[5]!
तेरा तेशा[6]
मुम्किन[7] है कि ज़र्बे-अव्वली[8] से
पहचान सके कि मेरे दिल में
जो आग तेरे लिए दबी है
वो आग ही मेरी ज़िंदगी है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें अभिव्यक्ति
  2. ऊपर जायें अस्तित्व
  3. ऊपर जायें प्रेम-प्रतिज्ञा से अनभिज्ञ
  4. ऊपर जायें उपेक्षा
  5. ऊपर जायें मूर्तिकार
  6. ऊपर जायें छैनी
  7. ऊपर जायें संभव
  8. ऊपर जायें पहली चोट

इन्हीं ख़ुश-गुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओ 

इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओ
वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूँ दिखाओ

ये उदासियों के मौसम कहीं रायेगाँ न जाएँ
किसी ज़ख़्म को कुरेदो किसी दर्द को जगाओ

वो कहानियाँ अधूरी जो न हो सकेंगी पूरी
उन्हें मैं भी क्यूँ सुनाऊँ उन्हें तुम भी क्यूँ सुनाओ

मेरे हमसफ़र पुराने मेरे अब भी मुंतज़िर हैं
तुम्हें साथ छोड़ना है तो अभी से छोड़ जाओ

ये जुदाइयों के रस्ते बड़ी दूर तक गए हैं
जो गया वो फिर न लौटा मेरी बात मान जाओ

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ “फ़राज़” कब तक
जो तुम्हें भुला चुका है उसे तुम भी भूल जाओ

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार उससे मैनें बेवफ़ाई की

वरना अब तलक यूँ था ख़्वाहिशों की बारिश में
या तो टूट कर रोया या ग़ज़लसराई की

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की

हो चला था जब मुझको इख़्तिलाफ़ अपने से
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर हैं नासेह के
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की

फिर क़फ़स में शोर उठा क़ैदियों का और सय्याद
देखना उड़ा देगा फिर ख़बर रिहाई की

इस दौर-ए-बेजुनूँ की कहानी कोई लिखो

इस दौर-ए-बेजुनूँ की कहानी कोई लिखो
जिस्मों को बर्फ़ ख़ून को पानी कोई लिखो

कोई कहो कि हाथ क़लम किस तरह हुए
क्यूँ रुक गई क़लम की रवानी कोई लिखो

क्यों अहल-ए-शौक़ सर-व-गरेबाँ हैं दोस्तो
क्यों ख़ूँ-ब-दिल है अहद-ए-जवानी कोई लिखो

क्यों सुर्मा-दर-गुलू है हर एक तायर-ए-सुख़न
क्यों गुलसिताँ क़फ़स का है सानी कोई लिखो

हाँ ताज़ा सानेहों का करे कौन इंतज़ार
हाँ दिल की वारदात पुरानी कोई लिखो

इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ 

इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा[1] हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें चोली

उसका अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है यूँ है

उसका अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है, यूँ है
यूँ तो कहने को सभी कहते है, यूँ है, यूँ है

जैसे कोई दर-ए-दिल हो पर सिताज़ा कब से
एक साया न दरू है न बरू है, यूँ है,

तुमने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफा की तस्वीर
चले हर खार पे कि कतरा-ए-खूँ है, यूँ है

अब तुम आए हो मेरी जान तमाशा करने
अब तो दरिया में तलातुम न सकूँ है, यूँ है

नासेहा तुझको खबर क्या कि मुहब्बत क्या है
रोज़ आ जाता है समझाता है, यूँ है, यूँ है

शाइरी ताज़ा ज़मानो की है मामर ‘फ़राज़’
ये भी एक सिलसिला कुन्फ़े क्यूँ है, यूँ है, यूँ है

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ

हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उससे ज़रा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ

अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ

अब तक तो दिल का दिल से तार्रुफ़ न हो सका
माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ

क्या-क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ

कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आईओ
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहद “फ़राज़” तुझसे कहा ना बहुत हुआ

उसने कहा सुन 

उसने कहा सुन
अहद निभाने की ख़ातिर मत आना
अहद निभानेवाले अक्सर मजबूरी या
महजूरी की थकन से लौटा करते हैं
तुम जाओ और दरिया-दरिया प्यास बुझाओ
जिन आँखों में डूबो
जिस दिल में भी उतरो
मेरी तलब आवाज़ न देगी
लेकिन जब मेरी चाहत और मेरी ख़्वाहिश की लौ
इतनी तेज़ और इतनी ऊँची हो जाये
जब दिल रो दे
तब लौट आना

उसने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया 

उसने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
हिज्र की रात बाम पर माहे-तमाम रख दिया

आमद-ए-दोस्त की नवीद कू-ए-वफ़ा में आम थी
मैनें भी इक चिराग़-सा दिल सर-ए-शाम रख दिया

देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैनें तो सब हिसाब-ए-जाँ बरसर-ए-आम रख दिया

उसने नज़र-नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे
मैनें तो उसके पाँओं में सारा कलाम रख दिया

शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मैकशी रही
उसने जो फेर ली नज़र मैनें भी जाम रख दिय

और “फ़राज़” चाहिये कितनी मुहब्बतें तुझे
के माँओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया

ऐसे चुप हैं के ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे 

ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
तेरा मिलना भी जुदाई कि घड़ी हो जैसे

अपने ही साये से हर गाम[1] लरज़[2] जाता हूँ
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे

मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं
अपने ही पावों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे

तेरे माथे की शिकन [3]पहले भी देखी थी मगर
यह गिरह[4] अब के मेरे दिल पे पड़ी हो जैसे

कितने नादान हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिये उम्र पड़ी हो जैसे

आज दिल खोल के रोये हैं तो यूँ ख़ुश हैं “फ़राज़”
चंद लम्हों[5] की ये राहत[6] भी बड़ी हो जैसे

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें हर क़दम
  2. ऊपर जायें काँप
  3. ऊपर जायें झुर्री
  4. ऊपर जायें गाँठ
  5. ऊपर जायें क्षणों
  6. ऊपर जायें चैन

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चालो

तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो

नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो

ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो

अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो

तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है
“फ़राज़” तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो

कभी मोम बनके पिघल गया कभी गिरते गिरते सम्भल गया

कभी मोम बन के पिघल गया कभी गिरते गिरते सँभल गया
वो बन के लम्हा गुरेज़ का मेरे पास से निकल गया

उसे रोकता भी तो किस तरह के वो शख़्स इतना अजीब था
कभी तड़प उठा मेरी आह से कभी अश्क़ से न पिघल सका

सरे-राह मिला वो अगर कभी तो नज़र चुरा के गुज़र गया
वो उतर गया मेरी आँख से मेरे दिल से क्यूँ न उतर सका

वो चला गया जहाँ छोड़ के मैं वहाँ से फिर न पलट सका
वो सँभल गया था ‘फ़राज़’ मगर मैं बिखर के न सिमट सका

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल[1] बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे

वो ख़ार-ख़ार[2] है शाख़-ए-गुलाब[3] की मानिन्द[4]
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म[5] हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे

ये लोग तज़्क़िरे[6] करते हैं अपने लोगों के
मैं कैसे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे

मगर वो ज़ूदफ़रामोश[7] ज़ूद-रंज[8] भी है
कि रूठ जाये अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे

वही जो दौलत-ए-दिल[9] है वही जो राहत-ए-जाँ[10]
तुम्हारी बात पे ऐ नासिहो[11] गँवाऊँ उसे

जो हमसफ़र[12] सर-ए-मंज़िल[13] बिछड़ रहा है “फ़राज़”
अजब[14] नहीं कि अगर याद भी न आऊँ उसे

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें उर्दू की एक काव्य विधा
  2. ऊपर जायें कँटीला
  3. ऊपर जायें गुलाब की टहनी
  4. ऊपर जायें भाँति
  5. ऊपर जायें घावों से भरा हुआ
  6. ऊपर जायें चर्चाएँ
  7. ऊपर जायेंभुलक्कड़
  8. ऊपर जायें शीघ्रबुरा मान जाने वाला
  9. ऊपर जायें दिल की पूँजी
  10. ऊपर जायें जीवन का सुख
  11. ऊपर जायेंउपदेशको
  12. ऊपर जायें सहयात्री
  13. ऊपर जायेंगंतव्यस्थल पर
  14. ऊपर जायें अचंभा

कहा था किस ने के अह्द-ए-वफ़ा करो उससे

कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे

ये अह्ल-ए-बज़ तुनक हौसला सही फिर भी
ज़रा फ़साना-ए-दिल इब्तिदा करो उससे

ये क्या के तुम ही ग़म-ए-हिज्र के फ़साने कहो
कभी तो उसके बहाने सुना करो उससे

नसीब फिर कोई तक़्रीब-ए-क़र्ब हो के न हो
जो दिल में हों वही बातें किया करो उससे

“फ़राज़” तर्क-ए-त’अल्लुक़ तो ख़ैर क्या होगा
यही बहुत है के कम कम मिला करो उससे

किताबों मे‍ मेरे फ़साने ढूँढते हैं 

किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं,
नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं ।

जब वो थे तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं ।

कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,
आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं ।

मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं ।

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं ।

उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’,
नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं ।

किस को गुमाँ है अबके मेरे साथ तुम भी थे 

किस को गुमाँ है अबके मेरे साथ तुम भी थे,
हाय वो रोज़ो-शब के मेरे साथ तुम भी थे

यादश बख़ैर अहदे-गुज़िश्ता की सोहबतें,
एक दौर था अजब के मेरे साथ तुम भी थे

बे-महरी-ए-हयात की शिद्दत के बावजूद,
दिल मुतमईन था जब के मेरे साथ तुम भी थे

मैं और तकाबिले- ग़मे-दौराँ का हौसला,
कुछ बन गया सबब के मेरे साथ तुम भी थे

इक ख़्वाब हो गई है रह-रस्मे- दोसती,
एक वहम -सा है अब के मेरे साथ तुम भी थे

वो बज़्म मेरे दोस्त याद तो होगी तुम्हें “फराज़”
वो महफ़िले-तरब के मेरे साथ तुम भी थे

किसी से दिल की हिक़ायत कभी कहा नहीं की

किसी से दिल की हिक़ायत कभी कहा नहीं की,
वगर्ना ज़िन्दगी हमने भी क्या से क्या नहीं की,

हर एक से कौन मोहब्बत निभा सकता है,
सो हमने दोस्ती-यारी तो की वफ़ा नहीं की,

शिकस्तगी में भी पिंदारे-दिल सलामत है,
कि उसके दर पे तो पहुंचे मगर सदा नहीं की,

शिक़ायत उसकी नहीं है के उसने ज़ुल्म किया,
गिला तो ये है के ज़ालिम ने इंतेहा नहीं की,

वो नादेहंद अगर था तो फिर तक़ाज़ा क्या,
के दिल तो ले गया क़ीमत मगर अदा नहीं की,

अजीब आग है चाहत की आग भी के ‘फ़राज़’,
कहीं जला नहीं की और कहीं बुझा नहीं की,

कुछ न किसी से बोलेंगे 

कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे

हम बेरहबरों का क्या
साथ किसी के हो लेंगे

ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिन
तेरे भेद न खोलेंगे

जीवन ज़हर भरा साग़र
कब तक अमृत घोलेंगे

नींद तो क्या आयेगी “फ़राज़”
मौत आई तो सो लेंगे

कुछ शेर 

1.
अब किस का जश्न मनाते हो उस देस का जो तक़्सीम हुआ
अब किस के गीत सुनाते हो उस तन-मन का जो दो-नीम हुआ

2.
उस ख़्वाब का जो रेज़ा रेज़ा उन आँखों की तक़दीर हुआ
उस नाम का जो टुकड़ा टुकड़ा गलियों में बे-तौक़ीर हुआ

3.
उस परचम का जिस की हुर्मत बाज़ारों में नीलाम हुई
उस मिट्टी का जिस की हुर्मत मन्सूब उदू के नाम हुई

4.
उस जंग का जो तुम हार चुके उस रस्म का जो जारी भी नहीं
उस ज़ख़्म का जो सीने पे न था उस जान का जो वारी भी नहीं

5.
उस ख़ून का जो बदक़िस्मत था राहों में बहाया तन में रहा
उस फूल का जो बेक़ीमत था आँगन में खिला या बन में रहा

6.
उस मश्रिक़ का जिस को तुम ने नेज़े की अनी मर्हम समझा
उस मग़रिब का जिस को तुम ने जितना भी लूटा कम समझा

7.
उन मासूमों का जिन के लहू से तुम ने फ़रोज़ाँ रातें कीं
या उन मज़लूमों का जिस से ख़ंज़र की ज़ुबाँ में बातें कीं

8.
उस मरियम का जिस की इफ़्फ़त लुटती है भरे बाज़ारों में
उस ईसा का जो क़ातिल है और शामिल है ग़मख़्वारों में

9.
इन नौहागरों का जिन ने हमें ख़ुद क़त्ल किया ख़ुद रोते हैं
ऐसे भी कहीं दमसाज़ हुए ऐसे जल्लाद भी होते हैं

10.
उन भूखे नंगे ढाँचों का जो रक़्स सर-ए-बाज़ार करें
या उन ज़ालिम क़ज़्ज़ाक़ों का जो भेस बदल कर वार करें

11.
या उन झूठे इक़रारों का जो आज तलक ऐफ़ा न हुए
या उन बेबस लाचारों का जो और भी दुख का निशाना हुए

12.
इस शाही का जो दस्त-ब-दस्त आई है तुम्हारे हिस्से में
क्यों नन्ग-ए-वतन की बात करो क्या रखा है इस क़िस्से में

13.
आँखों में छुपाये अश्कों को होंठों में वफ़ा के बोल लिये
इस जश्न में भी शामिल हूँ नौहों से भरा कश्कोल लिये

14.
दिल के रिश्तों कि नज़ाक़त वो क्या जाने ‘फ़राज़’
नर्म लफ़्ज़ों से भी लग जाती हैं चोटें अक्सर

15.
चढते सूरज के पूजारी तो लाखों हैं ‘फ़राज़’,
डूबते वक़्त हमने सूरज को भी तन्हा देखा |

16.
उस शख़्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया ।

क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता 

कुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता

आँखें हैं के खाली नहीं रहती हैं लहू से
और ज़ख्म-ए-जुदाई है के भर भी नहीं जाता

वो राहत-ए-जान है इस दरबदरी में
ऐसा है के अब ध्यान उधर भी नहीं जाता

हम दोहरी अज़ीयत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर
पाऔं भी हैं शील शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता

दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत है
और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

पागल होते हो ‘फ़राज़’ उससे मिले क्या
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं 

क्यूँ तबीयत कहीं ठहरती नहीं
दोस्ती तो उदास करती नहीं

हम हमेशा के सैर-चश्म सही
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं

शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं

ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन!
इतनी आसानियों से मरती नहीं

जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं

क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे

क़ुर्बतों[1] में भी जुदाई के ज़माने माँगे
दिल वो बेमेह्र[2] कि रोने के बहाने माँगे

अपना ये हाल के जी हार चुके लुट भी चुके
और मुहब्बत वही अन्दाज़ पुराने माँगे

यही दिल था कि तरसता था मरासिम [3]के लिए
अब यही तर्के-तल्लुक़[4] के बहाने माँगे

हम न होते तो किसी और के चर्चे होते
खल्क़त-ए-शहर[5] तो कहने को फ़साने माँगे

ज़िन्दगी हम तेरे दाग़ों से रहे शर्मिन्दा
और तू है कि सदा आइनेख़ाने[6]माँगे

दिल किसी हाल पे क़ाने[7] ही नहीं जान-ए-“फ़राज़”
मिल गये तुम भी तो क्या और न जाने माँगे

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें सामीप्य
  2. ऊपर जायें निर्दयी
  3. ऊपर जायें प्रेम-व्यवहार,सम्बन्ध
  4. ऊपर जायें संबंध-विच्छेद
  5. ऊपर जायें शहरी जनता
  6. ऊपर जायें वह भवन जिसके चारों ओर दर्पण लगे हों
  7. ऊपर जायेंआत्मसंतोषी

कोई भटकता बादल

कोई भटकता बादल

दूर इक शहर में जब कोई भटकता बादल
मेरी जलती हुई बस्ती की तरफ़ जाएगा
कितनी हसरत[1] से उसे देखेंगी प्यासी आँखें
और वो वक़्त की मानिंद[2] गुज़र[3] जाएगा

जाने किस सोच में खो जाएगी दिल की दुनिया
जाने क्या-क्या मुझे बीता हुआ याद आएगा
और उस शह्र का बे-फैज़[4]भटकता बादल
दर्द की आग को फैला के चला जाएगा

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें लालसा
  2. ऊपर जायें भाँति
  3. ऊपर जायें निकल, बीत
  4. ऊपर जायें कंजूस

क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तगू करे 

क्या ऐसे कम-सुख़न[1] से कोई गुफ़्तगू[2] करे
जो मुस्तक़िल[3] सुकूत[4] से दिल को लहू करे

अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम[5] का दुख नहीं
पर दिल ये चाहता है के आगाज़[6] तू करे

तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत[7] है ज़िन्दगी
खुद को गँवा के कौन तेरी जुस्तजू करे

अब तो ये आरज़ू है कि वो जख़्म[8] खाइये
ता-ज़िन्दगी[9] ये दिल न कोई आरज़ू करे

तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र[10]
अब कोई हादिसा[11] ही तेरे रु-ब-रू [12]करे

चुपचाप अपनी आग में जलते रहो “फ़राज़”
दुनिया तो अर्ज़े–हाल[13] से बे-आबरू[14] करे

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें कम बोलने वाला
  2. ऊपर जायें बातचीत
  3. ऊपर जायें अटल
  4. ऊपर जायें मौन
  5. ऊपर जायें मेल-जोल छोड़ना
  6. ऊपर जायें प्रारम्भ
  7. ऊपर जायें उत्तम
  8. ऊपर जायें घाव
  9. ऊपर जायें जीवन भर
  10. ऊपर जायें लज्जित दृष्टि
  11. ऊपर जायें दुर्घटना
  12. ऊपर जायें समक्ष
  13. ऊपर जायें हालत सुनाने
  14. ऊपर जायेंअपमानित

क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी

क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी
हँसती हुई रात रो पड़ी थी

हम ख़ुद ही हुए तबाह वरना
दुनिया को हमारी क्या पड़ी थी

ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की यादें
जब आप से दोस्ती बड़ी थी

जाते तो किधर को तेरे वहशी
ज़न्जीर-ए-जुनूँ कड़ी पड़ी थी

ग़म थे कि “फ़राज़” आँधियाँ थी
दिल था कि “फ़राज़” पन्खुदई थी

ख़ामोश हो क्यों दादे-ज़फ़ा क्यूँ नहीं देते

ख़ामोश हो क्यों दाद-ए-ज़फ़ा[1] क्यूँ नहीं देते
बिस्मिल[2] हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते

वहशत[3] का सबब रोज़न-ए-ज़िन्दाँ[4] तो नहीं है
मेहर-ओ-महो-ओ-अंजुम[5] को बुझा क्यूँ नहीं देते

इक ये भी तो अन्दाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ[6] है
ऐ चारागरो![7] दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते

मुंसिफ़[8] हो अगर तुम तो कब इन्साफ़ करोगे
मुजरिम[9] हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

रहज़न[10] हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ[11] भी
रहबर हो तो मन्ज़िल का पता क्यूँ नहीं देते

क्या बीत गई अब के “फ़राज़” अहल-ए-चमन[12] पर
यारान-ए-क़फ़स[13] मुझको सदा[14] क्यूँ नहीं देते

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें अन्याय की प्रशंसा
  2. ऊपर जायें घायल
  3. ऊपर जायें भय, त्रास
  4. ऊपर जायें जेल का छिद्र
  5. ऊपर जायें सूर्य, चाँद और तारे
  6. ऊपर जायें जीवन के दुखों का इलाज
  7. ऊपर जायें वैद्यो,चिकित्सको
  8. ऊपर जायें न्यायाधीश
  9. ऊपर जायें अपराधी
  10. ऊपर जायें लुटेरा
  11. ऊपर जायें दिल और जान की पूँजी
  12. ऊपर जायें चमन वाले
  13. ऊपर जायें जेल के साथी
  14. ऊपर जायें आवाज़

ख़ुदकुशी

ख़ुदकुशी[1]

वो पैमान[2] भी टूटे जिनको
हम समझे थे पाइंदा[3]
वो शम्एं भी दाग हैं जिनको
बरसों रक्खा ताबिंदा[4]
दोनों वफ़ा करके नाख़ुश[5] हैं
दोनों किए पर शर्मिन्दा[6]
प्यार से प्यारा जीवन प्यारे
क्या माज़ी[7] क्या आइंदा[8]
हम दोनों अपने क़ातिल हैं
हम दोनों अब तक ज़िन्दा.

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें आत्महत्या
  2. ऊपर जायें वचन
  3. ऊपर जायें अनश्वर
  4. ऊपर जायें प्रकाशमान
  5. ऊपर जायें अप्रसन्न
  6. ऊपर जायें लज्जित
  7. ऊपर जायें अतीत
  8. ऊपर जायें भविष्यकाल

ख़ुदग़रज़

ख़ुदग़रज़[1]

ऐ दिल! अपने दर्द के कारन तू क्या-क्या बेताब[2]रहा
दिन के हंगामों[3]में डूबा रातों को बेख़्वाब[4] रहा
लेकिन तेरे ज़ख़्म का मरहम तेरे लिए नायाब[5] रहा

फिर इक अनजानी सूरत ने तेरे दुख के गीत सुने
अपनी सुन्दरता की की किरनों से चाहत के ख़्वाब[6]बुने
ख़ुद काँटॊं की बाढ़ से गुज़री तेरी राहों में फूल चुने

ऐ दिल जिसने तेरी महरूमी [7]के दाग़ को धोया था
आज उसकी आँखें पुरनम[8]थीं और तू सोच में खोया थ
देख पराए दुख की ख़ातिर[9]तू भी कभी यूँ रोया था?

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें स्वार्थी
  2. ऊपर जायें व्याकुल
  3. ऊपर जायें कोलाहल
  4. ऊपर जायें जागता हुआ
  5. ऊपर जायें दुर्लभ,अप्राप्य
  6. ऊपर जायें स्वप्न
  7. ऊपर जायें निराशा,वंचितता
  8. ऊपर जायें भीगी हुईं
  9. ऊपर जायें के लिए,कारण

ख़ुशबू का सफ़र 

ख़ुशबू का सफ़र[1]

छोड़ पैमाने-वफ़ा[2]की बात शर्मिंदा [3]न कर
दूरियाँ ,मजबूरियाँ[4],रुस्वाइयाँ[5], तन्हाइयाँ[6]
कोई क़ातिल ,[7]कोई बिस्मिल, [8]सिसकियाँ, शहनाइयाँ
देख ये हँसता हुआ मौसिम है मौज़ू-ए-नज़र[9]

वक़्त की रौ में अभी साहिल[10]अभी मौजे-फ़ना[11]
एक झोंका एक आँधी,इक किरन , इक जू-ए-ख़ूँ[12]
फिर वही सहरा का सन्नाटा, वही मर्गे-जुनूँ[13]
हाथ हाथों का असासा[14],हाथ हाथों से जुदा[15]

जब कभी आएगा हमपर भी जुदाई का समाँ
टूट जाएगा मिरे दिल में किसी ख़्वाहिश[16]का तीर
भीग जाएगी तिरी आँखों में काजल की लकीर
कल के अंदेशों[17]से अपने दिल को आज़ुर्दा [18]न कर
देख ये हँसता हुआ मौसिम, ये ख़ुशबू का सफ़र

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें सुगंध की यात्रा
  2. ऊपर जायें वफ़ादारी का संकल्प
  3. ऊपर जायें लज्जित
  4. ऊपर जायें विवशताएँ
  5. ऊपर जायें बदनामियाँ
  6. ऊपर जायें अकेलापन
  7. ऊपर जायें वधिक
  8. ऊपर जायें घायल
  9. ऊपर जायें चर्चा का विषय
  10. ऊपर जायें किनारा,तट
  11. ऊपर जायें मृत्यु-लहर
  12. ऊपर जायें ख़ून की नदी
  13. ऊपर जायें दीवानेपन की मृत्यु
  14. ऊपर जायें पूँजी
  15. ऊपर जायें अलग
  16. ऊपर जायें कामना
  17. ऊपर जायें पूर्वानुमान
  18. ऊपर जायें

ख़्वाब 

ख़्वाब[1]

वो चाँद जो मेरा हमसफ़र[2]था
दूरी के उजाड़ जंगलों में
अब मेरी नज़र से छुप चुका है

इक उम्र से मैं मलूलो-तन्हा[3]
ज़ुल्मात[4] की रहगुज़ार[5] में हूँ
मैं आगे बढ़ूँ कि लौट जाऊँ
क्या सोच के इन्तज़ार[6] में हूँ
कोई भी नहीं जो यह बताए
मैं कौन हूँ किस दयार[7] में हूँ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें स्वप्न
  2. ऊपर जायें सह-यात्री
  3. ऊपर जायें दुखित और अकेला
  4. ऊपर जायें अँधेरों
  5. ऊपर जायें रास्ते
  6. ऊपर जायें प्रतीक्षा
  7. ऊपर जायें दुनिया

ख़्वाब मरते नहीं

ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें कि जो
रेज़ा-रेज़ा[1] हुए तो बिखर जाएँगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रोशनी हैं नवा हैं[2] हवा हैं
जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं
ज़ुल्म के दोज़खों से भी फुकते नहीं
रोशनी और नवा के अलम
मक़्तलों[3] में पहुँचकर भी झुकते नहीं
ख़्वाब तो हर्फ़[4] हैं
ख़्वाब तो नूर[5] हैं
ख़्वाब सुक़रात [6] हैं
ख़्वाब मंसूर[7]हैं.

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें कण-कण
  2. ऊपर जायें आवाज़
  3. ऊपर जायें वधस्थल
  4. ऊपर जायें अक्षर
  5. ऊपर जायें प्रकाश
  6. ऊपर जायें जिन्हें सच कहने के लिए ज़ह्र का प्याला पीना पड़ा था
  7. ऊपर जायें एक वली(महात्मा) जिन्होंने ‘अनलहक़’ (मैं ईश्वर हूँ) कहा था और इस अपराध के लिए उनकी गर्दन काट डाली गई थी

ग़ज़ल सुन के परेशां हो गए क्या

ग़ज़ल सुन के परेशां हो गए क्या,
किसी के ध्यान में तुम खो गए क्या,

ये बेगाना-रवी पहले नहीं थी,
कहो तुम भी किसी के हो गए क्या,

ना पुरसीश को ना समझाने को आए,
हमारे यार हम को रो गए क्या,

अभी कुछ देर पहले तक यहीं थी,
ज़माना हो गया तुमको गए क्या,

किसी ताज़ा रफ़ाक़त की ललक है,
पुराने ज़ख़्म अच्छे हो गए क्या,

पलट कर चाराग़र क्यों आ गए हैं,
शबे-फ़ुर्क़त के मारे सो गए क्या,

‘फ़राज़’ इतना ना इतरा होसले पर,
उसे भूले ज़माने हो गए क्या,

गिले फ़िज़ूल थे अहद-ए-वफ़ा के होते हुये 

गिले फ़ुज़ूल थे अहद-ए-वफ़ा के होते हुए
सो चुप रहा सितम-ए-नारवां के होते हुए

ये क़ुर्बतों में अजब फ़ासले पड़े कि मुझे
है आशना की तलब आशना के होते हुए

वो हिलागर हैं जो मजबूरियाँ शुमार करें
चिराग़ हम ने जलायें हवा के होते हुये

न कर किसी पे भरोसा के कश्तियाँ डूबीं हैं
ख़ुदा के होते हुये नाख़ुदा के होते हुये

किसे ख़बर है कि कासा-ब-दस्त फिरते हैं
बहुत से लोग सरों पर हुमा के होते हुए

“फ़राज़” ऐसे भी लम्हें कभी कभी आये
कि दिल गिरिफ़्ता रहा दिलरुबा के होते हुए

कुर्बत = करीबी, हिलागर = जो बहाने बनाये, कासा-ब-दस्त = हाथ में कटोरा लिये हुए,
हुमा = स्वर्ग का पंछी (सौभाग्य की निशानी),

गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं 

गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं

फक्त तुमको ही नहीं रंज-ए-चाक दमानी
जो सच कहें तो दरीदा लिबास हम भी हैं

तुम्हारे बाम की शम्में भी तब्नक नहीं
मेरे फलक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं

तुम्हें तुम्हारे आइना खाने की ज़न्गालूदा
मेरे सुराही और सागर गर्द गर्द से हैं

न तुमको अपने खादों खाल ही नज़र आयें
न मैं यह देख सकूं जाम में भरा क्या है

बशारतों पे वोह जले पड़े की दोनों को
समझ में कुछ नहीं आता की माज़रा क्या है

न सर में व्हो गरूर-ए-कसीदा कामती है
न कुम्रियों की उदासी में कुछ कमी आई

न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाब
न शाख-ए-अमन लिए फाख्ता कोई आई

आलम तो यह है की दोनों के मर्ज़ारों से
हवा-ए-फितना-ओ-बू-ए-फसाद आती है

सितम तो यह है की दोनों को वहम है की बहार
उदूक-ए-खून में नहाने के बाद आती है

सो यह माल हुआ की इस दरिंदगी का की
अब तुम्हरे हाथ सलामत रहे न हाथ मेरे

करें तो किस से करें अपनी लग्ज़िसों का गिला
न कोई साथ तुम्हरे न कोई साथ मेरे

तुम्हें भी जिद है की मास्क-ए-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ की जारो जाफा के आदि हैं

तुम्हें भी जोम महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी फख्र की हम कर्बला के आदि हैं

तुम्हरे हमारे शहरों की मजबूर बनवा मखलूक
दबी हुई हैं दुखों के हजार्ड हेरों में

अब इनकी तीर-ए-नाशी भी चिराग चाहती है
जो लोग उन्नीस सदी तक रहे अंधेरों में

चिराग जिन से मोहब्बत को रौशनी फैले
चिराग जिन से दिए बेशुमार रोशन हों

तुम्हारे देश में आया हूँ दोस्तों
अब के न साज़-ओ-नगमों की महफ़िल न शायरी के लिए

अगर तुम्हरी ही आन का है सवाल
तो चलो मैं हाथ बढ़ता हूँ दोस्ती के लिए

गुज़रे हुए तवील ज़माने के बाद भी

गुज़रे हुए तवील ज़माने के बाद भी,
दिल में रहा वो छोड़ के जाने के बाद भी,

पहलू में रह के दिल नहीं दिया है बहुत फ़रेब,
रखा है उसको याद भुलाने के बाद भी,

गो तू यहाँ नहीं है मगर तू यहीं पे है,
तेरा ही ज़िक्र है मेरे जाने के बाद भी,

लगता है कुछ कहा ही नहीं है उसे ‘फ़राज़’,
दिल का तमाम हाल सुनाने के बाद भी,

चलो इश्क़ नहीं चाहने की आदत है 

चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है
कि क्या करें हमें दू्सरे की आदत है

तू अपनी शीशा-गरी का हुनर न कर ज़ाया[1]
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है

मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता
मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है

तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी[2]
न वो सख़ी[3] न तुझे माँगने की आदत है

विसाल[4] में भी वो ही है फ़िराक़[5] का आलम
कि उसको नींद मुझे रत-जगे की आदत है

ये मुश्क़िलें हों तो कैसे रास्ते तय हों
मैं ना-सुबूर[6] उसे सोचने की आदत है

ये ख़ुद-अज़ियती कब तक “फ़राज़” तू भी उसे
न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें व्यर्थ
  2. ऊपर जायें वंचितता
  3. ऊपर जायें दानवीर
  4. ऊपर जायें मिलन
  5. ऊपर जायें जुदाई
  6. ऊपर जायें ना-समझ

जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है

जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है,
एक समन्दर मेरी आँखों से बहा करता है,

उसकी बातें मुझे खुश्बू की तरह लगती है,
फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है,

मेरे दोस्त की पहचान ये ही काफ़ी है,
वो हर शख़्स को दानिस्ता ख़फ़ा करता है,

और तो कोई सबब उसकी मोहब्बत का नहीं,
बात इतनी है के वो मुझसे जफ़ा करता है,

जब ख़ज़ाँ आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही मिला करता है,

जानाँ दिल का शहर नगर अफ़सोस का है

जानाँ दिल का शहर, नगर अफ़सोस का है
तेरा मेरा सारा सफ़र अफ़सोस का है

किस चाहत से ज़हरे-तमन्ना माँगा था
और अब हाथों में साग़र अफ़सोस का है

इक दहलीज पे जाकर दिल ख़ुश होता था
अब तो शहर में हर इक दर अफ़सोस का है

हमने इश्क़ गुनाह से बरतर जाना था
और दिल पर पहला पत्थर अफ़सोस का है

देखो इस चाहत के पेड़ की शाख़ों पर
फूल उदासी का है समर अफ़सोस का है

कोई पछतावा सा पछतावा है ‘फ़राज़’
दुःख का नहीं अफ़सोस मगर अफ़सोस का है

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो

ये ख़्वाब है ख़ुश्बू है के झोंका है के पल है
ये धुंध है बादल है के साया है के तुम हो

इस दीद की सआत में कई रन्ग हैं लरज़ाँ
मैं हूँ के कोई और है दुनिया है के तुम हो

देखो ये किसी और की आँखें हैं के मेरी
देखूँ ये किसी और का चेहरा है के तुम हो

ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ कहीं ठहरे तो ये जानूँ
हर साँस में मुझको ये लगता है के तुम हो

हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल ज़दगाँ का
अब कौन है शीरीं है के लैला है के तुम हो

इक दर्द का फैला हुआ सहरा है के मैं हूँ
इक मौज में आया हुआ दरिया है के तुम हो

वो वक़्त न आये के दिल-ए-ज़ार भी सोचे
इस शहर में तन्हा कोई हम सा है के तुम हो

आबाद हम आशुफ़्ता सरों से नहीं मक़्तल
ये रस्म अभी शहर में ज़िन्दा है के तुम हो

ऐ जान-ए-“फ़राज़” इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी
हमको ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है के तुम हो

जो भी दुख याद न था याद आया 

जो भी दुख याद न था याद आया
आज क्या जानिए क्या याद आया

फिर कोई हाथ है दिल पर जैसे
फिर तेरा अहदे-वफ़ा[1]याद आया

जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल
एक-इक नक़्श[2]तिरा याद आया

ऐसी मजबूरी के आलम[3]में कोई
याद आया भी तो क्या याद आया

ऐ रफ़ीक़ो[4]! सरे-मंज़िल जाकर
क्या कोई आबला-पा[5]याद आया

याद आया था बिछड़ना तेरा
फिर नहीं याद कि क्या याद आया

जब कोई ज़ख़्म भरा दाग़ बना
जब कोई भूल गया याद आया

ये मुहब्बत भी है क्या रोग ‘फ़राज़’
जिसको भूले वो सदा याद आया

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें वफ़ादारी का प्रण
  2. ऊपर जायें मुखाकृति
  3. ऊपर जायें हालत,अवस्था
  4. ऊपर जायें मित्रो
  5. ऊपर जायें जिसके पाँवों में छाले पड़े हुए हों

तम्सील

तम्सील [1]

कितनी सदियों के इन्तज़ार के बाद
क़ुर्बत-ए-यक-नफ़स[2] नसीब[3] हुई
फिर भी तू चुप उदास कम-आवेज़[4]

ऐ सुलगते हुए चराग़ भड़क
दर्द की रौशनी को चांद बना
कि अभी आंधियों का शोर है तेज़

अप पल मर्ग-ए-जावेदां[5] का सिला[6]
अजनबीयत[7] के ज़हर में मत घोल
मुझको मत देख मगर आँख तो खोल

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें उपमा
  2. ऊपर जायें घनिष्टता
  3. ऊपर जायें भाग्य से मिली हुई
  4. ऊपर जायें मिलने-जुलने से कतराने वाला (of reserved nature)
  5. ऊपर जायें हमेशा क़ायम रहने वाली मृत्यु
  6. ऊपर जायें फल, बदला
  7. ऊपर जायें अनजानापन

तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये 

तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये

फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया
अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये

क्या लोग थे के जान से बढ़ कर अजीज थे
अब दिल से मेह नाम भी अक्सर के हो गये

ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें
ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये

समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर
फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये

अब के ना इंतेज़ार करें चारगर का हम
अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये

रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को “फ़राज़” तुम
देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये

तू कि अन्जान है इस शहर के आदाब समझ 

तू कि अन्जान है इस शहर के आदाब[1] समझ
फूल रोए तो उसे ख़ंद-ए-शादाब[2]समझ

कहीं आ जाए मयस्सर[3] तो मुक़द्दर[4] तेरा
वरना आसूदगी-ए-दहर[5] को नायाब[6] समझ

हसरत-ए-गिरिया[7] में जो आग है अश्कों में नहीं
ख़ुश्क आँखों को मेरी चश्म-ए-बेआब[8] समझ

मौजे-दरिया[9] ही को आवारा-ए-सदशौक़[10] न कह
रेगे-साहिल[11] को भी लबे-तिश्ना-सैलाब[12] समझ

ये भी वा[13] है किसी मानूस[14] किरन की ख़ातिर[15]
रोज़ने-दर[16] को भी इक दीदा-ए-बेख़्वाब[17] समझ

अब किसे साहिल-ए-उम्मीद[18] से तकता है ‘फ़राज़’
वो जो इक कश्ती-ए-दिल थी उसे ग़र्क़ाब[19] समझ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें ढंग ,शिष्टाचार
  2. ऊपर जायें प्रफुल्ल मुस्कान
  3. ऊपर जायें प्राप्य
  4. ऊपर जायें भाग्य
  5. ऊपर जायें संतोष का युग
  6. ऊपर जायें अप्राप्य
  7. ऊपर जायें रोने की इच्छा
  8. ऊपर जायें बिना पानी की सरिता
  9. ऊपर जायें नदी की लहर
  10. ऊपर जायें कुमार्गी
  11. ऊपर जायें तट की मिट्टी
  12. ऊपर जायें बाढ़ के लिए तरसते हुए होंठ
  13. ऊपर जायें खुला हुआ
  14. ऊपर जायें परिचित
  15. ऊपर जायें लिए
  16. ऊपर जायें द्वार का छिद्र
  17. ऊपर जायें जागती आँख
  18. ऊपर जायें आशा के तट
  19. ऊपर जायें डूबी हुई

तेरे होते हुये महफ़िल में जलते हैं चिराग़ 

तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चिराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चिराग़

अपनी महरूमियों पे शर्मिन्दा हैं
ख़ुद नहीं रखते तो औरों के बुझाते हैं चिराग़

बस्तियाँ चाँद सितारों पे बसाने वाले
कुर्रा-ए-अर्ज़ बुझाते जाते हैं चिराग़

क्या ख़बर है उनको के दामन भी भड़क उठते हैं
जो ज़माने की हवाओं से बचाते हैं चिराग़

ऐसी तारीकीयाँ आँखों में बसी हैं “फ़राज़”
रात तो रात हम दिन को जलाते हैं चिराग़

दिल बहलता है कहाँ अंजुम-ओ-महताब से भी

दिल बहलता है कहाँ अंजुम-ओ-महताब से भी
अब तो हम लोग गए दीदा-ए-बेख़्वाब से भी

रो पड़ा हूँ तो कोई बात ही ऐसी होगी
मैं के वाक़िफ़ था तेरे हिज्र के आदाब से भी

कुछ तो उस आँख का शेवा है खफ़ा हो जाना
और कुछ भूल हुई है दिल-ए-बेताब से भी

ऐ समंदर की हवा तेरा करम भी मालूम
प्यास साहिल की तो बुझती नहीं सैलाब से भी

कुछ तो उस हुस्न को जाने है ज़माना सारा
और कुछ बात चली है मेरे एहबाब से भी

देख ये हौसला मेरा, मेरे बुज़दिल दुश्मन 

देख ये हौसला मेरा, मेरे बुज़दिल दुश्मन
तुझ को लश्कर में पुकारा , तन-ए-तन्हा हो कर

उस शाह-ए-हुस्न के दर पर है फ़क़ीरों का हुज़ूम
यार हम भी ना करें अर्ज़-ए-तमन्ना जा कर

हम तुझे मना तो करते नहीं जाने से ‘फ़राज़’
जा उसी दर पे मगर, हाथ ना फैला जा कर

नींद

नींद
सर्द [1]पलकों की सलीबों [2]से उतारे हुए ख़्वाब[3]
रेज़ा -रेज़ा[4]हैं मिरे सामने शीशों की तरह
जिन के टुकड़ों की चुभन,जिनके ख़राशों [5]की जलन
उम्र-भर जागते रहने की सज़ा देती है
शिद्दते-कर्ब[6]से दीवाना बना देती है

आज इस क़ुर्ब[7]के हंगाम[8]वो अहसास[9]कहाँ
दिल में वो दर्द न आँखों में चराग़ों का धुवाँ
और सलीबों से उतारे हुए ख़्वाबों की मिसाल[10]
जिस्म गिरती हुई दीवार की मानिंद[11]निढाल
तू मिरे पास सही ऐ मिरे आज़ुर्दा-जमाल[12]

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें ठंडी
  2. ऊपर जायें चौपड़ जैसी सूली
  3. ऊपर जायें स्वप्न
  4. ऊपर जायें टुकड़े
  5. ऊपर जायें रगड़
  6. ऊपर जायें दर्द की अधिकता
  7. ऊपर जायें सामीप्य
  8. ऊपर जायें भीड़
  9. ऊपर जायें संवेदना
  10. ऊपर जायें उदाहरण
  11. ऊपर जायें भाँति
  12. ऊपर जायें पीड़ित सौंदर्य

फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं

“फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं
मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं

लब-ओ-दहन भी मिला गुफ़्तगू का फ़न भी मिला
मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूँ भी नहीं

मेरी ज़ुबाँ की लुक्नत से बदगुमाँ न हो
जो तू कहे तो तुझे उम्र भर मिलूँ भी नहीं

“फ़राज़” जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा चाहे है
तू पास आये तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नहीं

बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा

बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा
अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा

अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में
बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा

ख़्वाबों में ख़्वाब उस के यादों में याद उस की
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िन्दगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बतों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफ़ाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्दतों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूँ हुआ के सावन आँखों में आ बसे थे
फिर यूँ हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारो हम को ख़बर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़िआ ज़रा सा

तेवर थे बेरुख़ी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आश्ना सा

हम दश्त थे के दरिया हम ज़हर थे के अमृत
नाहक़ था ज़ोंउम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उस को देखा कल शाम इत्तेफ़ाक़न
अपना भी हाल है अब लोगो “फ़राज़” का सा

वो तफ़व्वुतें हैं मेरे खुदा कि ये तू नहीं कोई और है

वो तफ़व्वुतें हैं मेरे खुदा कि ये तू नहीं कोई और है
कि तू आसमां पे हो तो हो, पये सरे जमीं कोई और है

वो जो रास्ते थे, वफ़ा के थे, ये जो मन्जिलें है, सजा की हैं
मेरा हमसफ़र कोई और था मेरा हमनशीं कोई और है

मेरे जिस्मों जान में तेरे सिवा नहीं और कोई दूसरा
मुझे फिर भी लगता है इस तरह कि कहीं कहीं कोई और है

मैं असीर अपने गिजाल का, मैं फ़कीर दश्ते विसाल का
जो हिरन को बांध के ले गया वो सुबुक्तगीं कोई और है

मैं अजब मुसाफिर-ए-बेईमां, कि जहां जहां भी गया वहां
मुझे लगा कि मेरा खाकदान, ये जमीं नहीं कोई और है

रहे बेखबर मेरे यार तक, कभी इस पे शक, कभी उस पे शक
मेरे जी को जिसकी रही ललक, वो कमर जबीं कोई और है

ये जो चार दिन के नदीम हैं, इन्हे क्या ’फ़राज़’ कोई कहे
वो मोहब्बतें, वो शिकायतें, मुझे जिससे थीं, वो कोई और है.

मैं तो आवारा शायर हूँ मेरी क्या वक़’अत 

मैं तो आवारा शायर हूँ मेरी क्या वक़’अत
एक दो गीत परेशान से गा लेता हूँ

गहे गहे किसी नाकाम शराबी की तरह
एक दो ज़हर के साग़र भी चढ़ा लेता हूँ

तू के इक वादी-ए-गुलरंग की शहज़ादी है
एक बेकार से इन्साँ के लिये वक़्फ़ न हो

तेरे ख़्वाबों के जज़ीरों में बड़ी रौनक़ है
एक अंजान से तूफ़ाँ के लिये वक़्फ़ न हो

ये आलम शौक़ का देखा न जाये

ये आलम[1]शौक़ [2]का देखा न जाये
वो बुत[3] है या ख़ुदा देखा न जाये

ये किन नज़रों से तुम ने आज देखा
के तेरा देखना देखा न जाये

हमेशा के लिये मुझ से बिछड़ जा
ये मंज़र[4] बारहा[5] देखा न जाये

ग़लत है जो सुना पर आज़मा[6] कर
तुझे ऐ बेवफ़ा[7] देखा न जाये

ये महरूमी[8] नहीं पास-ए-वफ़ा है
कोई तेरे सिवा देखा न जाये

यही तो आश्ना[9] बनते हैं आख़िर
कोई नाआश्ना [10]देखा न जाये

“फ़राज़” अपने सिवा है कौन तेरा
तुझे तुझ से जुदा देखा न जाये

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें दशा
  2. ऊपर जायेंअभिलाषा
  3. ऊपर जायें मूर्ति
  4. ऊपर जायें दृश्य
  5. ऊपर जायें बार-बार
  6. ऊपर जायें परीक्षा लेकर
  7. ऊपर जायें जो वफ़ादार न हो
  8. ऊपर जायेंअसफलता
  9. ऊपर जायें परिचित्
  10. ऊपर जायेंअपरिचित

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत[1]का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम[2] न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे[3] दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया[4] से भी महरूम[5]
ऐ राहत-ए-जाँ [6]मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम[7] को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें प्रेम का गर्व
  2. ऊपर जायें प्रेम-व्यहवार
  3. ऊपर जायेंसांसारिक शिष्टाचार
  4. ऊपर जायें रोने का स्वाद
  5. ऊपर जायें वंचित
  6. ऊपर जायें प्राणाधार
  7. ऊपर जायें किसी की ओर से अच्छा विचार रखने वाला मन

वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा

वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा
अगर चला है तो जो कुछ मुझे दिया ले जा

मक़ाम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ आ गया है फिर जानाँ
ये ज़ख़्म मेरे सही तीर तो उठा ले जा

यही है क़िस्मत-ए-सहरा यही करम तेरा
कि बूँद-बूँद अता कर घटा-घटा ले जा

ग़ुरूर-ए-दोस्त से इतना भी दिलशिकस्ता न हो
फिर उठ के सामने दामन-ए-इल्तजा ले जा

नदामतें हों तो सर बार-ए-दोश होता है
“फ़राज़” जाँ के एवज़ आबरू बचा ले जा

वही जुनूँ है वही क़ूच-ए-मलामत है

वही जुनूँ[1]है वही क़ूच-ए-मलामत [2]है
शिकस्ते-दिल[3]प’ भी अहदे-वफ़ा [4]सलामत[5]है

ये हम जो बाग़ो-बहाराँ[6]का ज़िक्र[7]करते हैं
तो मुद्दआ[8]वो गुले-तर[9]वो सर्वो-क़ामत[10]है

बजा ये फ़ुर्सते-हस्ती[11]मगर दिले-नादाँ[12]
न याद कर के उसे भूलना क़यामत[13]है

चली चले यूँ ही रस्मे-वफ़ा[14]-ओ-मश्क़े-सितम[15]
कि तेगे़ -यारो-सरे-दोस्ताँ[16]सलामत है

सुकूते-बहर[17]से साहिल [18]लरज़[19]रहा है मगर
ये ख़ामुशी किसी तूफ़ान की अलामत [20]है

अजीब वज़्अ[21]का ‘अहमद फ़राज़’ है शाइर
कि दिल दरीदा[22]मगर पैरहन[23]सलामत है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें उन्माद
  2. ऊपर जायें निंदा वाली गली
  3. ऊपर जायें दिल के टूटने
  4. ऊपर जायें वफ़ादारी का प्रण
  5. ऊपर जायें सुरक्षित
  6. ऊपर जायें वाटिका और वसंत
  7. ऊपर जायें चर्चा
  8. ऊपर जायें उद्देश्य
  9. ऊपर जायें ताज़ा फूल
  10. ऊपर जायें सर्व वय्क्ष जैसे सुंदर डील-डौल वाला
  11. ऊपर जायें जीवनकाल
  12. ऊपर जायें नादान दिल
  13. ऊपर जायें महाप्रलय
  14. ऊपर जायें वफ़ादारी की परंपरा
  15. ऊपर जायें अत्याचार का अभ्यास
  16. ऊपर जायें मित्रों और प्रियजनों की तलवार
  17. ऊपर जायें महासागर का मौन
  18. ऊपर जायें तट
  19. ऊपर जायें काँप
  20. ऊपर जायें लक्षण
  21. ऊपर जायें शैली
  22. ऊपर जायें दु:खी हृदय
  23. ऊपर जायें वस्त्र

संग-दिल है वो तो क्यूँ उस का गिला मैंने किया

संग-दिल है वो तो क्यूँ उस का गिला मैंने किया
जब के ख़ुद पत्थर को बुत, बुत को ख़ुदा मैंने किया

कैसे ना-मानूस लफ़्ज़ों की कहानी था वो शख़्स
उस को कितनी मुश्क़िलों से तर्जुमा मैंने किया

वो मेरी पहली मोहब्बत ,वो मेरी पहली शिकस्त
फिर तो पैमान-ए-वफ़ा सौ मर्तबा मैंने किया

हूँ सज़ा-वार-ए-सज़ा क्यूँ जब मुक़द्दर में मेरे
जो भी उस जान-ए-जहां ने लिख दिया, मैंने किया

वो ठहरता क्या के गुज़रा तक नहीं जिसके लिए
घर तो घर हर रास्ता आरास्ता मैंने किया

मुझ पे अपना जुर्म साबित हो ना हो लेकिन ‘फ़राज़’
लोग कहते हैं के उस को बेवफ़ा मैंने किया

सवाल

   सवाल
(‘फ़िराक़’ की तस्वीर देखकर)

एक संग- तराश[1] जिसने बरसों
हीरों की तरह सनम[2] तराशे
आज अपने सनमकदे[3] में तन्हा[4]
मजबूर, निढाल,ज़ख़्म-ख़ुर्दा[5]
दिन रात पड़ा कराहता है

चेहरे पे उजाड़ ज़िन्दगी के
लम्हात[6] की अनगिनत ख़राशें[7]
आँखों के शिकस्ता[8] मरक़दों[9] में
रूठी हुई हसरतों की लाशें

साँसों की थकन बदन की ठंडक
अहसास से कब तलक लहू ले
हाथों में कहाँ सकत [10] कि बढ़कर
ख़ुद-साख़्ता[11] पैकरों [12] को छू ले

ये ज़ख़्मे-तलब[13], ये नामुरादी[14]
हर बुत के लबों[15] पे है तबस्सुम[16]
ऐ तेशा-ब-दस्त[17] देवताओ!
तख़्लीक़[18] अज़ीम[19] है कि ख़ालिक़[20]
इन्सान जवाब चाहता है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें मूर्तिकार
  2. ऊपर जायें प्रतिमाएँ
  3. ऊपर जायें मंदिर
  4. ऊपर जायें अकेला
  5. ऊपर जायें घायल
  6. ऊपर जायें क्षणों
  7. ऊपर जायें रगड़ें
  8. ऊपर जायें टूटे-फूटे
  9. ऊपर जायें समाधियों
  10. ऊपर जायें ताक़त
  11. ऊपर जायें स्वयं द्वारा निर्मित
  12. ऊपर जायें आकृतियों
  13. ऊपर जायें माँग के घाव
  14. ऊपर जायें दुर्भाग्य
  15. ऊपर जायें होंठों
  16. ऊपर जायें मुस्कान
  17. ऊपर जायें हाथ में कुदाली लिए हुए
  18. ऊपर जायें सृजन
  19. ऊपर जायें महान
  20. ऊपर जायें सृजक

सामने उसके कभी उसकी सताइश नहीं की

सामने उसके कभी उसकी सताइश नहीं की।
दिल ने चाहा भी मगर होंटों ने जुंबिश नहीं की॥

जिस क़दर उससे त’अल्लुक़ था चले जाता है,
उसका क्या रंज के जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की॥

ये भी क्या कम है के दोनों का भरम क़ायम है,
उसने बख़्शिश नहीं की हमने गुज़ारिश नहीं की॥

हम के दुख ओढ के ख़िल्वत में पड़े रहते हैं,
हमने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की॥

ऐ मेरे अब्रे करम देख ये वीरानए-जाँ,
क्या किसी दश्त पे तूने कभी बारिश नहीं की॥

वो हमें भूल गया हो तो अजब क्या है फ़राज़,
हम ने भी मेल-मुलाक़ात की कोशिश नहीं की॥

हवा के ज़ोर से पिंदार-ए-बाम-ओ-दार भी गया

हवा के ज़ोर से पिंदार-ए-बाम-ओ-दर भी गया
चिराग़ को जो बचाते थे उन का घर भी गया

पुकारते रहे महफ़ूज़ किश्तियों वाले
मैं डूबता हुआ दरिया के पार उतर भी गया

अब एहतियात की दीवार क्या उठाते हो
जो चोर दिल में छुपा था वो काम कर भी गया

मैं चुप रहा कि इस में थी आफ़ियत जाँ की
कोई तो मेरी तरह था जो दार पर भी गया

सुलगते सोचते वीराँ मौसमों की तरह
कड़ा था अहद-ए-जवानी मगर गुज़र भी गया

जिसे भुला न सका उस को याद क्या रखता
जो नाम दिल में रहा ज़ेहन से उतर भी गया

फटी-फटी हुई आँखों से यूँ न देख मुझे
तुझे तलाश है जिस की वो शख़्स मर भी गया

मगर फ़लक की अदावत उसी के घर से न थी
जहाँ “फ़राज़” न था सैल-ए-ग़म उधर भी गया

हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू

हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू
कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू

बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से
जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू

मेरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ
तेरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू

मैं जानता हूँ के दुनिया तुझे बदल देगी
मैं मानता हूँ के ऐसा नहीं बज़ाहिर तू

हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है
ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू

“फ़राज़” तूने उसे मुश्किलों में डाल दिया
ज़माना साहिब-ए-ज़र और सिर्फ़ शायर तू

हाथ उठाए हैं मगर लब पे दुआ कोई नहीं

हाथ उठाए हैं मगर लब पे दुआ कोई नहीं
की इबादत भी तो वो जिस की जज़ा[1] कोई नहीं

ये भी वक़्त आना था अब तू गोश-बर- आवाज़[2] है
और मेरे बरबते-दिल[3] में सदा[4] कोई नहीं

आ के अब तस्लीम कर लें तू नहीं तो मैं सही
कौन मानेगा के हम में बेवफ़ा कोई नहीं

वक़्त ने वो ख़ाक उड़ाई है के दिल के दश्त से
क़ाफ़िले गुज़रे हैं फिर भी नक़्शे-पा[5] कोई नहीं

ख़ुद को यूँ महसूर[6] कर बैठा हूँ अपनी ज़ात[7] में
मंज़िलें चारों तरफ़ है रास्ता कोई नहीं

कैसे रस्तों से चले और किस जगह पहुँचे “फ़राज़”
या हुजूम-ए-दोस्ताँ[8] था साथ या कोई नहीं

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें प्रतिफल
  2. ऊपर जायें आवाज़ पर कान लगाए हुए
  3. ऊपर जायें सितार जैसा एक वाद्य यंत्र
  4. ऊपर जायें आवाज़्
  5. ऊपर जायें पद-चिह्न
  6. ऊपर जायें घिरा हुआ
  7. ऊपर जायें अस्तित्व
  8. ऊपर जायें दोस्तों का समूह
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