अहसान बिन ‘दानिश’ की रचनाएँ

कुत्ता और मज़दूर 

कुत्ता इक कोठी के दरवाज़े पे भूँका यक़बयक़
रूई की गद्दी थी जिसकी पुश्त से गरदन तलक
रास्ते की सिम्त सीना बेख़तर ताने हुए
लपका इक मज़दूर पर वह सैद(शिकारी) गरदाने हुए ॥

जो यक़ीनन शुक्र ख़ालिक़ का अदा करता हुआ ।
सर झुकाए जा रहा था सिसकियाँ भरता हुआ॥

पाँव नंगे फावड़ा काँधे पे यह हाले तबाह।
उँगलियाँ ठिठुरी हुईं धुँधली फ़िज़ाओं पर निगाह ॥
जिस्म पर बेआस्तीं मैला, पुराना-सा लिबास
पिंडलियों पर नीली-नीली-सी रगें चेहरा उदास ॥

ख़ौफ़ से भागा बेचारा ठोकरें खाता हुआ ।
संगदिल ज़रदार के कुत्ते से थर्राता हुआ॥

क्या यह एक धब्बा नहीं हिन्दोस्ताँ की शान पर ।
यह मुसीबत और ख़ुदा के लाडले इन्सान पर ।
क्या है इस दारुलमहन में आदमीयत का विक़ार?
जब है इक मज़दूर से बेहतर सगे सरमायादार॥

एक वो हैं जिनकी रातें हैं गुनाहों के लिए।
एक वो हैं जिनपे शब आती है आहों के लिए॥

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे 

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज़-ए-सबा हो जैसे

लोग यूँ देख कर हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बड़ा
यूँ न मिल हमसे ख़ुदा हो जैसे

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझपे एहसान किया हो जैसे

ऐसे अंजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे

हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे

ज़िन्दगी बीत रही है “दानिश”
एक बेजुर्म सज़ा हो जैसे

कभी मुझ को साथ लेकर, कभी मेरे साथ चल के

कभी मुझ को साथ लेकर, कभी मेरे साथ चल के
वो बदल गये अचानक, मेरी ज़िन्दगी बदल के

हुए जिस पे मेहरबाँ, तुम कोई ख़ुशनसीब होगा
मेरी हसरतें तो निकलीं, मेरे आँसूओं में ढल के

तेरी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ के, क़ुर्बाँ दिल-ए-ज़ार ढूँढता है
वही चम्पई उजाले, वही सुरमई धुंधलके

कोई फूल बन गया है, कोई चाँद कोई तारा
जो चिराग़ बुझ गये हैं, तेरी अंजुमन में जल के

मेरे दोस्तो ख़ुदारा, मेरे साथ तुम भी ढूँढो
वो यहीं कहीं छुपे हैं, मेरे ग़म का रुख़ बदल के

तेरी बेझिझक हँसी से, न किसी का दिल हो मैला
ये नगर है आईनों का, यहाँ साँस ले सम्भल के

नज़र फ़रेब-ए-कज़ा खा गई तो क्या होगा 

नज़र फ़रेब-ए-कज़ा खा गई तो क्या होगा
हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा

नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर
नई सहर भी कजला गई तो क्या होगा

न रहनुमाओं की मजलिस में ले चलो मुझको
मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा

ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ
मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा

शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारनेवालों
ख़िज़ाँ-सिरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा

ये फ़िक्र कर कि इस आसूदगी के धोके में
तेरी ख़ुदी को भी मौत आ गई तो क्या होगा

ख़ुशी छीनी है तो ग़म का भी ऐतमाद न कर
जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा

पुरसिश-ए-ग़म का शुक्रिया, क्या तुझे आगही नहीं

पुरसिश-ए-ग़म का शुक्रिया, क्या तुझे आगही नहीं
तेरे बग़ैर ज़िन्दगी दर्द है, ज़िन्दगी नहीं

दौर था एक गुज़र गया, नशा था एक उतर गया
अब वो मुक़ाम है, जहाँ शिकवा-ए-बेरुख़ी नहीं

तेरे सिवा करूँ पसंद क्या तेरी क़ायनात में
दोनों जहाँ की नेअमतें, क़ीमत-ए-बंदगी नहीं

लाख ज़माना ज़ुल्म ढाए, वक़्त न वो ख़ुदा दिखाए
जब मुझे हो यक़ीं कि तू हासिल-ए-ज़िन्दगी नहीं

दिल की शगुफ़्तगी के साथ राहत-ए-मयकदा गई
फ़ुर्सत-ए-मयकशी तो है, हसरत-ए-मयकशी नहीं

ज़ख़्म पे ज़ख़्म खाके जी, अपने लहू के घूँट पी
आह न कर, लबों को सी, इश्क़ है दिल्लगी नहीं

देख के ख़ुश्क-ओ-ज़र्द फूल, दिल है कुछ इस तरह मलूल
जैसे तेरी ख़िज़ाँ के बाद, दौर-ए-बहार ही नहीं

सिर्फ़ अश्क-ओ-तबस्सुम में उलझे रहे

सिर्फ़ अश्क-ओ-तबस्सुम में उलझे रहे
हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़

रात ढलते जब उनका ख़याल आ गया
टिक-टिकी बँध गई चाँदनी की तरफ़

कौन सा जुर्म है,क्या सितम हो गया
आँख अगर उठ गई, आप ही की तरफ़

जाने वो मुल्तफ़ित हों किधर बज़्म में
आँसूओं की तरफ़ या हँसी की तरफ़

न सियो होंट, न ख़्वाबों में सदा दो हम को

न सियो होंठ, न ख़्वाबों में सदा दो हम को
मस्लेहत का ये तकाज़ा है, भुला दो हम को

हम हक़ीक़त हैं, तो तसलीम न करने का सबब
हां अगर हर्फ़-ए-ग़लत हैं, तो मिटा दो हम को

शोरिश-ए-इश्क़ में है, हुस्न बराबर का शरीक
सोच कर ज़ुर्म-ए-मोहब्बत की, सज़ा दो हम को

मक़सद-जीस्त ग़म-ए-इश्क़ है, सहरा हो कि शहर
बैठ जाएंगे जहां चाहे, बिठा दो हम को

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