आतीक़ अंज़र की रचनाएँ

गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था 

गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था
वो एक ख़्वाब था या बस नज़र का धोका था

सितारे ओस मिरे साथ सुब्ह तक रोए
मगर वो शख़्स तो पत्थर का जैसे तुर्शा था

बिछड़ते वक़्त अना दरमियान थी वर्ना
मनाना दोनों ने इक दूसरे को चाहा था

क़रीब आ के भी ख़्वाबों की खो गईं किरनें
कि मुझ से आगे मिरा बद-नसीब साया था

गिला नहीं है जो उस ने मुझे न पहचाना
लहू-लुहान मिरी ज़िंदगी का चेहरा था

निगल सका न सब-ए-ग़म का अज़दहा मुझ को
उफ़ुक़ पे वक़्त-ए-सहर आफ़्ताब उभरा था

हसीन चाँद के चेहरे पे पड़ गए धब्बे
कि मेरे दिल के अंधेरे से ये भी गुज़रा था

जिस की ख़ातिर मैं ने दुनिया की तरफ़ देखा न था

जिस की ख़ातिर मैं ने दुनिया की तरफ़ देखा न था
वो मुझे यूँ छोड़ जाएगा कभी सोचा न था

उस के आँसू ही बताते थे न अब लौटेगा वो
इस से पहले तो बिछड़ते वक़्त यूँ रोता न था

रह गया तन्हा मैं अपने दोस्तों की भीड़ में
और हमदम वो बना जिस से कोई रिश्ता न था

क़हक़हों की धूप में बैठे थे मेरे साथ सब
आँसुओं की बारिशों में पर कोई भीगा न था

अश्क पलकों पे बिछड़ कर अपनी क़ीमत खो गया
ये सितारा क़ीमती था जब तलक टूटा न था

मरमरीं गुम्बद पे रूकती थी हर इक प्यासी नज़र
पर किसी ने मक़बरे में ग़म छुपा देखा न था

न मिल सका तरी लहरों में भी क़रार मुझे 

न मिल सका तरी लहरों में भी क़रार मुझे
समुंदर अपनी तहों में ज़रा उतार मुझे

हवा के पाँव की आहट गुलाब की चीख़ें
सुनी है मैं ने अदालत ज़रा पुकार मुझे

मैं बार बार तिरे वास्ते बिखर जाऊँ
तू बार बार मिरे आईने सँवार मुझे

फ़लक को तोड़ दूँ मैं अपनी आह से लेकिन
ज़मीन वालों से बे-इंतिहा है प्यार मुझे

इक उस की ज़ात से जब मेरा ए‘तिबार उठा
तो फिर किसी पे भी आया न ए‘तिबार मुझे

सुलगती रेत की क़िस्मत में दरिया लिख दिया जाए 

सुलगती रेत की क़िस्मत में दरिया लिख दिया जाए
मुझे इन झील सी आँखों में रहना लिख दिया जाए

तिरी ज़ुल्फ़ों के साए में अगर जी लूँ मैं पल-दो-पल
न हो फिर ग़म जो मेरे नाम सहरा लिख दिया जाए

मिरा और उस का मिलना अब तो ना-मुम्किन सा लगता है
उसे सूरज मुझे शब का सितारा लिख दिया जाए

अकेला मैं ही क्यूँ आख़िर सजाऊँ पलकों पे तारे
कभी उस की पलकों पे सितारा लिख दिया जाए

मुझे छोड़ा है तपती धूप में जिस शख़्स ने तन्हा
उसे भी ग़म की दुनिया में अकेला लिख दिया जाए

जो शब-ख़ूँ मारता है मेरी बस्ती के उजालों पर
मुक़द्दर उस के भी घर का अंधेरा लिख दिया जाए

कहीं बुझती है दिल की प्यास इक दो घूँट से ‘अनज़र’
मैं सूरज हूँ मिरे हिस्से में दरिया लिख दिया जाए

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए 

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए
उन्हें मैं सोच रहा हूँ जो अब पराए हुए

मुझे ने छोड़ अकेला जुनूँ के सहरा में
कि रास्ते ये तिरे ही तो हैं दिखाए हुए

घिरा हुआ हूँ मैं कब से जज़ीरा-ए-ग़म में
ज़माना गुज़रा समुंदर में मौज आए हुए

कभी जो नाम लिखा था गुलों पे शबनम से
वो आज दिल में मिरे आग है लगाए हुए

ज़माना फूल बिछाता था मेरी राहों में
जो वक़्त बदला तो पत्थर है अब उठाए हुए

हया का रंग वही उन का मेरे ख़्वाब में भी
दबाए दाँतों में उँगली नज़र झुकाए हुए

मैं तुम से तर्क-ए-तअल्लुक की बात क्यूँ सोचूँ
जुदा न जिस्मों से ‘अनज़र’ कभी भी साए हुए

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