आत्मा रंजन की रचनाएँ

नई सदी में टहलते हुए

भागते समय से ताल बिठाना
बदलती सदी को कुशलता से फलांगना
वह है अनाम घुड़्दौड़ का
एक समर्थ घोड़ा
तीव्र में तीव्रतर गति
टहलने निकलने का उसका ख़्याल
अपने आप में सुखद है सांसों के लिए
और जीवन के लिए भी
नई सदी के पहले पड़ाव पर
टहलने निकला है वह
स्वत: ही दौड़ते से जा रहे
इसके क़दम उसकी अंगुली थामे है
एक बच्चा
बच्ची होने की संभावनाओ की
गर्म हत्याओं के बाद
लिया है जिसने जन्म

बोलता जा रहा लगातार
बड़बड़ाता सा खींचता हुआ उसकी कमीज़
नहीं विक्षिप्त नहीं है बच्चा
दरअसल सुनने वाले कानो में
चिपका हुआ है मोबाईल
और वे मग्न है अपनी दुनिया में
आँखें भी हैं आगे ही आगे
बच्चे से कहीं ऊँची खीजता हुआ
रूआँसा बच्चा चुप है अब गुमसुम
ढीली पड़ती जा रही
अंगुली पर उसकी पकड़
वह सोच रहा एक और विकल्प
पापा के साथ टहलने से तो अच्छा था
घर पर बी.डी.ओ. गेम खेलना
उसका इस तरह सोचना
इस सदी का एक ख़तरनाक हादसा है
बहुत ज़रूरी है कि कुछ ऐसा करें
कि बना रहे यह अँगुलियों का स्नेहिल स्पर्श
और जड़ होती सदी पर
यह नन्हीं स्निग्ध पकड़
कि बची रहे
पकड़ जितनी नर्म ऊष्मा
ताकि बची रहे यह पृथवी।

एक लोक वृक्ष के बारे में

मदनू के मगनू तक उच्चारणों में
बोला जाता हुआ तुम्हारा नाम
जिज्ञासा और रहस्य से लिपटा है आज
तुम्हारे व्यकितत्व की ही मानिंद
मौन व्याधि तोड़ कुछ तो बताओ अपने बारे में
क्यों पूर्व की ओर ही गाए जाने हैं तुम्हारे पांगे*
जी जान लुटाने के बाद भी कलेजा माँगती
निष्ठुर नायिका का समर्पित प्रेमी
कसक भरी मनुहार गुहार क्यों लगाता है तुम्हारे ही पास!

सबकुछ जानने वाले भी कुछ नहीं जानते तुम्हारे बारे में
चिड़िया की भाषा में चहकते हो तुम
बूंदों की भाषा में थिरकते
बसंत और पतझड़ की भाषा में खिलते और सुबकते
चीख़ तक के लिए इस बहरे समय में
जानेगा भी कौन तुम्हारे नि:शब्द को

पीपल की तरह बस्ती के बीचों-बीच
शुचिता के ऊंचे चबूतरे पर विराजमान
नहीं हो तुम पूजा के पात्र
देवदार की मानिंद नहीं है तुम्हारे पास
देव संस्कृति से जुड़े होने का गौरव
था महान ग्रंथों में दर्ज मुग्धकारी इतिहास
धर्म की अलौकिकता
या इतिहास की स्वर्णिमता से ग्रस्त
तुम नहीं हो कोई महान धर्माचारी या महानायक
औषध गुणों या फलदायी उपयोगितावाद के
लिजलिजे लगाव से मुक्त
एक संपूर्ण वृक्ष की सार्वजनिक दाय लिए
तमाम सायास क्रियाओं से अछूते
किसी धार घाटी या नाले में
या फिर अपनी मनपसंद जगह
बावड़ी के खबड़ीले टोडे पर
समूची मानवीय हलचल में डोलते लह्राते रहे हो
मदन जैसे आकर्षक मजनू से समर्पित
सदियों से लोकगीतों में गाए जाते
एक ठेठ लोक नायक हो तुम
बांवड़ी के जल को अपनी जड़ों की मार्फ़त
सौंपते रहे हो ह्रदय ठंडक और मिठास
भर दोपहर बोझा लादे खड़ी चढ़ाई का दंभ रौंदते
पसीने नहाए बदन और सूखते कंठ के लिए
ठण्डे पानी की घूँट के साथ
तुम्हारे पास है-ठणडी हवा और घनी छाया की राहत

भरे जाते हुए मटकों, गागरों औरटोकणियों** की
हर एक ध्वनि के ध्यानार्थ से परिचित हो तुम

जानते हो ख़ाली बर्तन का इतिहास
और भरे हुए बर्तन का भविष्य
पनिहारनों और घासियारनों के बतियाए जाते हुए
सुख-दुःख के मर्म को समझते हो तुम

पूरी सहजता के साथ
जंगली फूल की तरह चुपचाप कहीं
उपजते उमगते उमड़ते प्रेम के
सूमूचे सुख और समूची यातना के
सच्चे साक्षी रहे हो तुम
बनते रहे हो उनके लोकगीतों की टीसती टेर

अलबत्ता सीडी में में सजाए जा रहे
टैक्सियों में पर्यटकों को परोसे जा रहे
डिस्को ताल लोकगीतों में
कहीं नहीं है तुम्हारा ज़िक्र
अपेक्षित बाबड़ियों के
वीरान किनारों पर भी
बिल्कुल वैसे ही खड़े हो तुम
इस बात गवाही देते
कि जो पूजा नहीं जाता
नहीं होता इतिहास के गौरमयी पन्नों में दर्ज
वह भी अच्छा हो सकता है।

रास्ते

डिगे भी हैं
लड़खड़ाए भी
चोटें भी खाई कितनी ही
पगडंडियां गवाह हैं
कुदलियों, गैंतियों
खुदाई मशीनों ने नहीं
कदमों ने ही बनाए हैं –
रास्ते!

शक्ति पूजा 

लगातार लगातार
तलाश रहे हम
दूसरों की कमियाँ
कि हो सकें
ताकतवर।

देव दोष 

अद्वितीय किस्म के आस्थावान
और दुर्लभ किस्म के सुंदर
जीवन के बीचों-बीच
साक्षात ईश्वर की उपस्थिति में
अपने समूचे भोलेपन के साथ
उन्होंने उड़ा दी
एक मेमने की गर्दन।

देवदोष: दूरदराज़ पहाड़ी क्षेत्रों की लोक आस्थाओं में ग्राम देवता के नाराज़ हो जाने का परिणाम रोग कष्ट,अवनति आदे समझे जाते हैं । यह देवदोष कहलाता है। देवता के कोप से बचने के लिए वहाँ आज भी पशुबलि दी जाती है।

हाँडी 

जानती हो तुम कि काठ की हाँडी
एक बार ही चढ़ती है
मंज़ूर नहीं था तुम्हें शायद
यूँ एक साथ चढ़ना
और जल जाना निरर्थक
इसलिए चुन ली तुमने
एक धातु की उम्र
धातु को मिला फिर
एक रूप एक आकार
हाँडी, पतीली, कुकर, या कड़ाही जैसा
मैं जानना चाहता हूँ
हाँडी होने का अर्थ
तान देती है जो ख़ुद को लपटों पर
और जलने को
पकने में बदल देती है

सच-सच बताना
क्या रिश्ता है तुम्हारा इस हाँडी से
माँजती हो इसे रोज़
चमकाती हो गुनगुनाते हुए
और छोड़ देती हो एक हिस्सा
जलने की जागीर सा खामोशी से

कोई औपचारिक सा ख़ून का रिश्ता मात्र
तो नहीं जान पड़ता
गुनगुनाने लगती है यह
तुम्हारे संग एक लय में
खुद्बुदाने लगती है
तुम्हारी कड़छी और छुवन मात्र से
उठाने लगती है महक
उगलने लगती है
स्वाद का रहस्य

खीजती नहीं हो कभी भी इस पर
न चढ़ पाने का दु:ख यद्यपि
साझा करती है यह तुम्हारे संग
और तुम इसके संग
भरे मन और ख़ामोश निगाहों से

सच मैं जानना चाहता हूँ
कैसा है यह रिश्ता?

कंकड़ छांटती

भागते हांफते समय के बीचोंबीच
समय का एक विलक्षण खंड है यह
अति व्यस्त दिन की
सारी भागमभाग को धत्ता बताती
दाल छांटने बैठी है वह
काम से लौटने में उसके विलम्ब के बावजूद
तमाम व्यस्तताओं को
खूंटी पर टांग दिया है उसने
पूरे इत्मीनान से टांगे पसार
बैठ गई है गृहस्थ मुद्रा में
हाथ मुंह धोने, कपड़े बदलने जैसी
हड़बड़ी नहीं है इस समय
एक आदिम ठहराव है
तन्मयता है पूरी तल्लीनता
पूरे मन से डूबी हुई एक स्त्री
एक-एक दाने को सौंप रही
उंगलियों का स्निग्ध स्पर्श
अन्न को निष्कंकर होने की
गरिमा भरी अनुभूति
स्वाद के तमाम रहस्य
और भी बहुत कुछ…

एक स्त्री का हाथ है यह
दानों के बीचोंबीच पसरा स्त्री का मन
घुसपैठिए तिनके, सड़े पिचके दाने तक
धरे जाते हुए
तो फिर कंकड़ की क्या मजाल!
उसकी अनुपस्थिति में
एक पुरुष को
अनावश्यक ही लगता रहा है यह कार्य
या फिर तीव्रतर होती जीवन गति का बहाना

उसकी अनुपस्थिति दर्ज होती है फिर
दानों के बीचोंबीच
स्वाद की अपूर्णता में खटकती
उसकी अनुपस्थिति
भूख की राहत के बीच
दांतों तले चुभती
कंकड़ की रड़क के साथ
चुभती रड़कती है उसकी अनुपस्थिति
खाद्य और खाने की
तहजीब और तमीज़ बताती हुई

एक स्त्री का हाथ है यह
जीवन के समूचे स्वाद में से
कंकड़ बीनता हुआ!

औरत की आंच 

भुलेखे में हैं पुरुष
नंगे जिस्मों में कहीं ढूँढ़ रहे जो
औरत की आंच
भुलेखे में वे भी
बरबाद कर रहे जो इसे
ठंडे मौसम में सड़कों पर
भेजकर उसे फटेहाल
जबकि भव्य भवनों
आलीशान कॉलोनियों तक में
पसरी हुई है चारों तरफ
इंसान को निचोड़ती-गलाती ठंड

आपने छूकर देखा है कभी
शाम को उतार कर अलगनी पर रखी
उसकी शॉल को
दुनिया का एक श्रेष्ठ और कोमल कवच
होने का गौरव लिए
सहेजे रहती है जो औरत की आंच
छूकर देखा है कभी
उसके पर्स में रखा शीशा, रूमाल या बिंदिया
संजोए हुए हैं जो उसके पोरों की नाज़ुक छुअन
छूकर देखा है
सड़क के किनारे लेटाए
उसके बच्चे के गाल को
पसीना पोंछती बार-बार पुचकारती
खुलकर सौंपती है जिसे
होंठों का स्पर्श

आंच का व्यापार भी है
हर तरफ़ ज़ोरों पर
सतरंगे तिलिस्मी प्रकाश की चकाचौंध में
उधर टीवी पर भी रचा जा रहा
आंच का प्रपंच

ज़रूरी है आग
और उससे भी ज़रूरी है आंच
नासमझ हैं
समझ नहीं रहे वे
आग और आंच का फर्क
आग और आंच का उपयोग
पूजने से जड़ हो जाएगी
कैद होने पर तोड़ देगी दम
मनोरंजन मात्र नहीं हो सकती
आग या आंच
खतरनाक है उनकी नासमझी

राखी बंधवाते महसूस कर सकते हो
इस आंच को
वही आंच जिसे महसूस कर रहा
ठंडे पानी से नहाता वह फूल
जिसे सींच रही एक बच्ची
हाथ-बुने स्वेटर के
रेशे-रेशे में विन्यस्त है
तमाम बुरे दिनों
और ठंडे मौसमों के खिलाफ
गुनगुने स्पर्श से संजोई आंच
औरत की आंच
पत्थर, मिट्टी, सीमेंट को सेंकती है
बनाती है उन्हें एक घर
उसकी आंच से प्रेरित होकर ही
चल रहा है यह अनात्म संसार

एक अंडा है यह पृथ्वी
मां मुर्गी की तरह से रही जिसे
औरत की आंच
एक बर्फ का गोला है जमा हुआ
जिसकी जड़ता और कठोरता को
निरंतर पिघला रही वह
जीवित और जीवनदायी
जल में बदलती हुई।

हंसी वह 

जी खोल कर हंसी वह
पूरे वेग से
उसकी पारदर्शी हंसी
सुबह की ताज़ा धूप सी
हवाओं में छिटकी

फिर अचानक सहमी ठिठकी वह
आया ख्याल
ऐसे हंसना नहीं चाहिए था उसे
वह एक लड़की है
उसके ऊपर के दांत बेढब हैं
कुछ बाहर को निकले हुए!

पृथ्वी पर लेटना 

(एक)

पृथ्वी पर लेटना
पृथ्वी को भेंटना भी है

ठीक वैसे जैसे
थकी हुई हो देह
पीड़ा से पस्त हो रीढ़ की हड्डी
सुस्ताने की राहत में
गैंती-बेलचे के आसपास ही कहीं
उन्हीं की तरह
निढाल लेट जाना
धरती पर पीठ के बल

पूरी मौज में डूबना हो
तो पृथ्वी का ही कोई हिस्सा
बना लेना तकिया
जैसे पत्थर
मुंदी आँखों पर और माथे पर
तीखी धुप के खिलाफ
धर लेना बाहें
समेत लेना सारी चेतना
सिकुड़ी टांग के खड़े त्रिभुज पर
ठाठ से टिकी दूसरी टांग
आदिम अनाम लय में हिलता
धूल धूसरित पैर
नहीं समझ सकता कोई योगाचार्य
राहत सुकून के इस आसन को

मत छेड़ो ऐसे में
धरती के लाडले बेटे का
माँ से सीधा संवाद है यह
माँ पृथ्वी दुलरा-बतिया रही है
सेंकती-सहलाती उसकी
पीराती पीठ
बिछावन दुभाषिया है यहाँ
मत बात करो
आलीशान गद्दों वाली चारपाई की
देह और धरती के बीच
अड़ी रहती है वह दूरियाँ ताने
वंचित होता / चूक जाता
स्नेहिल स्पर्श
खालिस दुलार
कि तमाम खालिस चीज़ों के बीच
सुविधा एक बाधा है

पृथ्वी पर लेटना
पृथ्वी को भेंटना भी है
ख़ास तौर पर इस तरह
ज़िंदा देह के साथ
ज़िंदा पृथ्वी पर लेटना!

(दो)

सुख का क्या है
एक छोटे से स्पर्श में भी
मिल जाता है कभी
अपने असीम की झलक देता हुआ
जैसे पा रहा अनायास वह
अपने ही विलास में कहीं
समुद्र किनारे धुप-स्नान की मुद्रा में
औंधे मुंह निढाल लेटा रेत पर
छाती को गहरे सटाता पृथ्वी से
आँखे मूंदे
और-और फैलाता बाँहें
पूरी पृथ्वी को
अपनी सटाई देह और
फैलाई-बांहों में
भरने समेटने के लुत्फ़ में डूबा

पाना हो तो पा लें
यूं भी कभी
स्पर्श का सुख ही सही
पृथ्वी से
थोड़ा ऊपर जीने वाले!

(तीन)

मिटटी में मिलाने
धूल चटाने जैसी उक्तियाँ
विजेताओं के दंभ से निकली
पृथ्वी की अवमानना है
इसी दंभ ने रची है दरअसल
यह व्याख्या और व्यवस्था
जीत और हार की

विजेता का दंभ है यह
सीमेंट-कंकरीट में मढ़ दी गई
तमाम मिटटी
घुसपैठ करती धूल के लिए
वैक्यूम क्लीनर जैसे
शिकारी हथियार

कौन समझाए इन्हें कि सिर्फ़
हारने वाला ही नहीं मिलता मिटटी में
यह भी कि धूल चाटने वाला ही
जानता है असल में मिटटी की महक
धरती का स्वाद

कण-कण में घुले-मिले
कितने-कितने इतिहास
मिटटी से बेहतर कौन जानता है
कि कौन हो सका है मिटटी का विजेता
रौंदने वाला तो बिलकुल नहीं
जीतने के लिए
गर्भ में उतरना पड़ता है पृथ्वी के
गैंती की नोक, हल की फाल की मानिंद
छेड़ना पड़ता है
पृथ्वी की रगों में जीवन राग
कि यहाँ जीतना और जोतना पर्यायवाची है
कि जीतने की शर्त
रौंदना नहीं रोपना है
अनंत-अनंत संभावनाओं की
अनन्य उर्वरता
बनाए और बचाए रखना!

(चार)

पृथ्वी पर लेटना
पृथ्वी को भेंटना ही है
कौन समझाए विजेताओं
बुद्धिमानों को
कि लेटना न सही
वे सीख लें कम से कम
पृथ्वी पर लौटना
वह तो दूर की बात है
जानता है जो एक मनमौजी बच्चा
असीम सुख का असीम स्वाद
कि क्या है–
पृथ्वी पर लोटना!

रंग पुताई करने वाले 

रंगों से है उनका
और उनके जीवन का वास्ता
कुछ-कुछ हो सकता है
पर ठीक वैसा नहीं
रहा जैसा पिकासो का
गुरु देव रवीन्द्र या एमएफ हुसैन का
हालांकि रंग इन्हें भी खींचते हैं
लुभाते हैं वैसे ही
कमोवेश मिल सकती हैं
उनसे इनकी रूचियाँ
प्राथमिकताएँ तो लगभग नहीं ही

अपनी प्राथमिकताओं में बंधे
सुबह के जाड़े के खिलाफ मुस्तैद
गलबंद कसी कनपटियाँ ताने
जर्दा तंबाकू मलते फटकते
चल पड़े हैं वे काम पर

ये किशन रहता है दड़बेनुमा खोली में
करीम कच्चे मटकांधों में
ये रामधन तबेलेनुमा भाड़े की कोठरी में
पर बड़े-बड़े लोगों के पास
महफूज हैं इनके नाम पते
कि रंग पुताई के माहिर कारीगर हैं वे
बड़े-बड़े आलीशान घरों को
तितलियों-फूलों की मानिंद
रंगते सजाते हैं वे महंगे रंगों से
ये बात अलग
कि उनके घरों में
लगता रहा है चूना ही

सुबह से शाम तक
रंगों से खेलते रहते हैं वे
अपने पूरे कला कौशल के साथ
पर कोई नहीं मानता इन्हें कलाकार
वे जीते हैं पुश्त दर पुश्त / अनाम
हालांकि कम नहीं है इनकी भी रंगों की समझ
क्या कितना मिलाकर बनता कैसा रंग
किशन कहता है-साहब
आसान नहीं है मथना सहेजना ये सफेद
जरा नहीं मानता लाग लपेट
ब्रश तक चाहिए सुथरा और बर्तन भी
कहता करीम-ब्रश धोने पर
कैसा गंदला बच रहता बाल्टी में
ठीक-ठीक काला भी नहीं-बदरंग
जैसे तमाम रंगों की हो कोई साजिश
हाथों से तो छूटता ही नहीं कमबख्त
यही आता उसके हिस्से में अधिकतर
हाथों में नाखून कोनों में जमता हुआ
गहरा उतरता हुआ फटी बिवाईयों में
चीकट कपड़ों पर अधिकतर यही
या और भी कैसे-कैसे बेतरतीब रंगों के छींटे

कितना सधा है उनका हाथ
दो रंगों को मिलाती लतर
मजाल है ज़रा भी भटके सूत से
कैसे भी छिंट जाए उनका जिस्म, उनके कपड़े
सुथरी दीवार पर मगर
कहीं नहीं पड़ता कोई छींटा

कितने महंगे कितने बढ़िया
बनाए गए रंग ये ब्रश
पता नहीं निर्माताओं को
किसी किशन, करीम या रामधन के
हाथों में ही जीवित हो उठते ब्रश
और लकदक हो उठते रंग

करते हंसी ठठा, बतियाते
दूर देहात का कोई लोक गीत गुनगुनाते
रंग पुताई कर रहे हैं वे
कहाँ समझ सकता है कोई
खाया-अघाया कला समीक्षक
उनके रंगों का मर्म
कि छत की कठिन उल्टान में
शामिल है उनकी पिराती पीठ का रंग
कि दुर्गम ऊंचाईयों के कोनो कगोरों में
पुते हुए हैं उनकी छिपकली या
बंदर मुद्राओं के जोखिम भरे रंग
देखना चाहो तो देख सकते हो
चटकीले रंगों में फूटती ये चमक
एशियन पेंट के किसी महंगे फार्मूले की नहीं
इनके माथे के पसीने पर पड़ती
दोपहर की धूप की है

दरअसल महंगी कला दीर्घाओं की
चारदिवारी तक महदूद नहीं
हमारी रोजमर्रा कि दृश्यावलियों को
खूबसूरत बनाया है इनके रंगों ने

इन हाथों के पास हैं
तमाम सीलन को पोंछने हरने का हुनर
खराब मौसम और खराब स्थितियों की
खामोश साज़िश है सीलन
मौन पकता कोई अवसाद
बदरंग छाईयों या चकत्तों में कहीं प्रकट होता
हवाओं में घुलता

दरअसल यह दीवार की नहीं
पृथ्वी की सीलन है
इन हुनरमंद हाथों से पुंछती
मरहम लगवाती हुई।

पत्थर चिनाई करने वाले 

(एक)

बहुत लोग
मानते ही नहीं उसे कारीगर
मजदूर और कारीगर के
लगभग बीच की स्थिति है वह
लगभग इतनी ही हैसीयत
उतनी ही पहचान

मारतोड़ कहलाने वाला
एक सरल-सा हथौड़ा
मात्र उसका औज़ार
या ज़्यादा से ज़्यादा
एक सूत एक साहल एक गुणिया भर
मारतोड़ से कोने कगोरे तोड़ता
पूरी तन्मयता से
पत्थर चिनाई कर रहा है वह

चिड़िया के घोंसला बनाने
मधुमक्खी या तितैया के
छत्ता बनाने जैसी
आदिम कला है यह
सदियों से संचित
बरसों से सधी हुई
पहुँच रही एक-एक पत्थर के पास

ईंट नहीं है यह
सुविधाजनक ढांचों में ढलकर निकली
सीधे समतल सूतवां जिस्म की तराश लिए
पृथ्वी का सबसे सख्त हिस्सा है
आकार की सबसे अनिश्चित बनावट
बिल्कुल अनगढ़ खबड़ीला बेढंगा जिस्म
याद है उसे गुरु के शब्द-
गारा या सीमेंट मसाला
बैसाखियाँ हैं
कला कि मिलावट
असल तो वह है
बिना मसाले कि सूखी चिनाई
कि डिबिया कि तरह
बैठने चाहिए पत्थर
खुद बोलता है पत्थर
कहाँ है उसकी जगह
बस सुननी पड़ती है उसकी आवाज़
खूब समझता है वह
पत्थर की जुबान
पत्थर की भाषा में बतिया रहा है
सुन रहा गुन रहा बुन रहा
एक एक पत्थर

बेतरतीब बिखरे पत्थरों में
दौड़ती पारखी नज़र
टिकती है लगभग उपयुक्त विकल्प पर
हाथ तौलते विकल्पों को
उंगलियाँ पोर-पोर टोहतीं उतार चढ़ाव
‘लगभग’ को ‘बिल्कुल वही’ में बदलते
देखते ही देखते
ऐसा बैठ जाता पत्थर
जैसे वहीं के लिए बना था वह

पत्थर की रग-रग से वाकिफ है
किस रंग का कैसा है वह
कमज़ोर है या मज़बूत
कौन आगे लगेगा कौन पीछे
कहाँ कितनी चोट से टूटेगा
किस आकार में कितना कोना

मिट्टी से सने हैं पत्थर
मिट्टी से सने हैं उसके हाथ
और बीड़ी और जर्दे की गंध से सने
और पसीने की गंध से सने
पृथ्वी की आत्मा
और उसकी देह गंध से सने
और पृथ्वी पर फूलते फलते
जीवन की गंध से सने हैं उसके हाथ
जड़ता में सराबोर भरता जीवन की गंध
पत्थर चिनाई कर रहा है वह

पत्थर चुनता है वह
पत्थर बुनता है
पत्थर गोड़ता है / तोड़ता है पत्थर
पत्थर कमाता है पत्थर खाता है
पत्थर की तरह रूलता पड़ता
धूल मिट्टी से नहाता है
पत्थर के हैं उसके हाथ
पत्थर का जिस्म
बस नहीं है तो रूह नहीं है पत्थर की
पत्थरों के बीच रोता है वह
पत्थरों के बीच गुनगुनाता
एक एक पत्थर को सौंपता अपनी रूह

पत्थर पर पत्थर पर पत्थर
धर देने जैसा
सरल नहीं है यह काम
चीज़ों की बनावट
कहाँ होती है सरल उतनी
दिखती है जितनी
जितनी मान लेते उसे हम
बेहद महीन बुनावट है यह
पत्थर के चौफैर वजूद
बेढंगेपन को नापकर
बनानी होती है जगह
धरना उसे जमाना होता है इस तरह
कि टुकड़े-टुकड़े बिखरी कठोरता को जोड़ कर
बुननी होती है मजबूती

बेकार कहलाने वाले
कहीं रास्ते की बाधा तक बनते
पृथ्वी के टूटे अंग को जोड़ता
फिर बनाता उसे पृथ्वी की ज़िंदा देह
बेकार हो चुके के भीतर खोजता रचता
उसके होने के सबसे बड़े अर्थ
बेकार हो चुके के भीतर खोजता रचता
पृथ्वी के प्राण
पत्थर चिनाई कर रहा है वह

पृथ्वी को चिनने की कला है यह
टूटी बिखरी पृथ्वी को
जोड़ने सहेजने की कला
रचने, जोड़ने, जिलाने का
सौंदर्य और सुख।

(दो)

तीखी ढलान की
जानलेवा साज़िशों के ख़िलाफ़
एक मज़बूत निर्माण का नाम है डंगा
ढहने के ख़िलाफ़
डटे रहने का जीवट

दुनिया कि तमाम खाइयों के विपरीत
मजबूती से डटे हुए हैं डंगे
सधी हुई रूहों के साथ
डटे हुए हैं पत्थर जिस्म
पूरी मुस्तैदी के साथ
अपनी देहों पर उठाए हुए
सभ्यता विकास के तमाम रास्ते!

स्मार्ट लोग

मशहूर रेस्तरां की बड़ी-सी मेज़ के गिर्द
जमा हुआ है स्मार्ट युवक-युवतियों का टोला
शीतल पेय की चुस्कियों
सिगरेट के छल्लों के बीच
खिलखिलाते बतिया रहे हैं मस्ती में

भरपूर ऊर्जा से भरी
स्मार्ट लोगों की दुनिया है यह
स्मार्ट हैं उनकी पोशाकें और जूते
मशहूर ब्रांड की पतलूनें, टाईयाँ, सूट, चश्में
करीने से प्रेस की हुई झक सफ़ेद कमीज़ें
जिन्हें निखारने के लिए
टी.वी. पर मशहूर हस्तियाँ बेच रहीं हैं पाउडर
पाउडर ही क्यों और भी बहुत कुछ
बहुत कुछ से भरी पड़ी हैं उनकी अलमारियाँ
ओर आदमकद शीशे की दराज़ों में
आकर्षक पैक और छोटी-बड़ी शीशियों में
मौजूद है हर मर्ज़ की दवा
स्मार्ट हैं उनके चेहरे
आँखें, दांत, बाल, नाखून
धूल और पसीने के लिए है उनके पास
अदा से नाक सिकोड़ती घिन्न
वे हँसते हैं खांसते हैं सलीके से
फूहड़ नहीं स्मार्ट है उनकी हंसी
और खांसी-खंखार भी
उनके लकदक ड्राइंग रूम की
स्मार्ट व्यवस्था से आक्रान्त
कहीं दबता-सा जा रहा घर
किताबें नहीं हैं कहीं भी, न लाइब्रेरी
अलबत्ता चंद पत्रिकाएँ हैं स्मार्ट मुखपृष्ठों वाली

एक से बढ़कर एक
स्मार्ट हैं उनके सेलफोन
स्मार्ट पर्स में सलीके से रखें हैं
स्मार्ट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, गिफ्ट कार्ड
एक दूसरों को नीचा दिखाने के
उनके पास हैं स्मार्ट तरीके
छोटी-छोटी साजिशों में उलझे
बड़ी-सी साजिशों से बेख़बर हैं स्मार्ट लोग
उनके लिए अमर्त्य सेन है
जनरल नॉलेज का एक प्रश्न
वे अनवरत घंटों बतिया सकते हैं
मशहूर कंपनी की बाइक
और कार के नए मॉडलों पर
स्मार्ट हैं उनके सपने

स्मार्ट लोग
स्मार्ट कंपनियों में करते हैं स्मार्ट जॉब
और कमाते हैं स्मार्ट मनी!

खेलते हैं बच्चे : एक 

खेलते हैं बच्चे
तब भी
जब खेलने लायक नहीं होता है मौसम
बाहर की हवा होती है विषाक्त
घर की हवा
गहरी गहरी ठहरी ठहरी

खेलते हैं बच्चे
तब भी
जब दुरुस्त नहीं होता शरीर का तापमान
चुपके से खिसक लेते माँ से बचाकर नज़र
उनकी दिशा में उठा ही रह जाता है
रोकने के लिए मांग का बाम सना हाथ

खेलते हैं बच्चे
तब भी जब वक़्त नहीं होता खेलने का
घर में बिखरा पड़ा या बस्ते में बंद
शेष होता है होमवर्क
उस सब को छोड़कर भी
खेल लेते हैं बच्चे
तब भी, जब सर पर होती है परीक्षाएँ
कुछ अधिक ज़िद के साथ खेलते हैं बच्चे
मौसम, विष, तनाव, चिंता
सब डराते हैं मांओं को
दब्बू से मगर नहीं फटकते पास
जब खेलते हैं बच्चे।

खेलते हैं बच्चे : दो

खेलते हैं बच्चे
वह भी
जिनके पापा नहीं जाते विदेश
नहीं लाते बल्ला गेंद न रैकेट न बार्बी
वे भी जिनके पापा नहीं लाते अक्सर
मुश्किल से कभी कभार ही
ला पाते हैं कोई खिलौना
या जिनकी गुल्लक में
खिलौने की क़ीमत से
कम ही जुट पाते हैं सिक्के

पापा से ज़िद करने पर
बोनस मिलते ही लाने का
प्यारा-सा आश्वासन पाते
सहेज संभाल कर रखते इक्का-दुक्का खिलौने
और समझदार बच्चों की तरह खेलते हैं चुपचाप

खेलते हैं बच्चे
वे भी, जिनके पास नहीं होते खिलौने
नहीं होती है खिलौने के लिए एक मासूम ज़िद
नहीं होते जिनके पास
ज़िद करने के लिए पापा ही
खेलते हैं बच्चे
वे भी हुए
बचपन ख़ुद भी खेलता है जिनसे आँख मिचौली
बड़ों की दुनिया का खुरदरापन
अंकित है जिनकी नन्हीं हथेलियों में
व्यस्त पुकारों और फटकारों के बीच भी
वक्त मिलते ही
खेल लेते हैं वे

लकड़ी के एक टुकड़े
और कपड़े की एक गेंद के साथ
कहीं भी हो सकते हैं वे
आंगन गली नुक्कड़ या सड़क पर
हो हल्ला करते हुए
या खेलते हुए छुपन छुपाई चोर सिपाही
या पत्थर की गोल चित्ति बनाकर
धरती के सीने पर दाल रेखाएँ
उछलते एक टांग पर
या बेकार सामान के बेढंगे
टुकड़ों को समेट कर
या यहाँ तक
कि मिट्टी और पत्थर के साथ भी
खूब मज़े से खेलते हैं बच्चे

वे लगते हैं बहुत अच्छे
जब उनके बच्चा होने के ख़िलाफ़
बड़ों की तमाम साजिशों की
खिल्ली उड़ाते हुए
खेलते हैं बच्चे!

नहाते बच्चे

सिर्फ माँ ही
नहला सकती है बच्चों को
इस तरह

या फिर धूल
या धूप!

आधुनिक घर 

आधुनिक घरों के पास नहीं हैं छज्जे
कि लावारिस कोई फुटपाथी बच्चा
बचा सके अपना भीगता सर
नहीं बची हैं इतनी भर जगह
कि कोई गौरैया जोड़ सके तिनके
सहेज परों की आंच
बसा सके अपना घर-संसार!

बोलो जुल्फिया रे 

एक दार्शनिक ने कहा-
किसी को लम्बी उम्र की दुआ देनी हो
तो कहना चाहिए
तेरी उम्र लोकगीत जितनी हो!
लेकिन अपवाद ही हुए तुम
तुम्हारी कहानी से अपरिचित था शायद दार्शनिक
मेरे भीतर क्यों गूँज रही है
रह-रह कर तुम्हारी कसकती लम्बी तान
लहलहाते मक्कई खेत के छोर पर खड़ा हूँ मैं
सामने पसरी है खेतों की लम्बी कतार

कहाँ है वह गाँव भर से जुटे बुआरों का-
‘जितने सरग में तारे उतने मेरे मामा के बुआरे’
जैसी कहावतों को मूर्त करते हुए
कहाँ है वह बाजों-गाज़ों के साथ चलती गुड़ाई का शोर
यहीं गूंजते थे तुम्हारे बोल-
‘बोलो जुल्फिया रे’

युवक-युवतियों के टोलों के बीच
यहीं जमते थे तुम्हारी लय में ढले सवाल-जवाब
यहीं तो खुलते थे उनके भर आए दिलडू के द्वार
तुम में ही उमड़ती थीं सुच्चे प्यार की परतें
बूढ़ाती स्मृतियों में कहीं ठहर गया है दृश्य
किसी का काम न छूटने पाए पीछे
बारी-बारी सबके खेतों में उतरता सारा गाँव
हल्ले-गुल्ले से ही कांप उठते खरपतवार
और दो-तीन पालियों में ही निपट जाता
बड़े से बड़ा खेत
कई कामचोर तो ऐसे ही तर जाते
जुल्फिए की दाद देते-देते

खिलनियों की नोक से निकलता
धरती की परतों में छिपा कांपता संगीत
मिटटी की कठोरता में उर्वरता और
जड़ता में जीवन फूंकते
कठोर जिस्म के भीतर से उमड़ते
झरने का नाम है जुल्फिया
चू रहे पसीने का खरापन लिए
कहीं रूह से टपकता प्रेमराग
ऐसे अनन्य लोकगीत तुम
कैसे बन गए एक लोकगीत की त्रासदी
बोलो जुल्फिया रे!

फ़िल्मी गानों पर मर मिटते
भविष्य तलाशने में जूझ रहे युवक-युवतियाँ
देह लपकने को आतुर संगीत संयोजक
कहीं नहीं सुनाई देती
जुल्फिए की हूकती-गूंजती टेर

खेतों में अपने-अपने जूझ रहे सब ख़ामोश
पडोसी को नीचा दिखाते
खींच तान में लीन
जीवन की आपाधापी में जाने कहाँ खो गया
संगीत के उत्सव का संगीत
कैसे और किसने किया
श्रम के गौरव को अपदस्थ
क्यों और कैसे हुए पराजित तुम ख़ामोश
अपराजेय सामूहिक श्रम की
ओ सरल सुरीली तान
कुछ तो बोलो जुल्फिया रे!

(हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचलित कृषि कार्यों को मिल-जुल कर करने की ‘बुआरा प्रथा’ में सामूहिक गुड़ाई लोक वाद्यों की सुरताल के साथ संपन्न होती थी! जुल्फिया एक लोक गायन शैली है इसे सामूहिक गुड़ाई के अवसर पर गाया जाता था! बुआरा प्रथा के साथ ही यह गायन भी अब लुप्तप्राय: है!)

मरा हुआ आदमी 

 (एक)

बहुत पहले की बात है
सोया हुआ था एक आदमी
घने अंधेरे में
बिल्कुल जड़, प्रतिरोध रहित

मृत जान उन्होंने
कर डाला उसका अन्तिम संस्कार

नहीं यह
बहुत पुराना अँधेरा नहीं
आज का ही कोई सभ्य दिन है।

(दो)

अलबत्ता
यह बहुत कम होता है

चीखता है जब भी
मरा हुआ आदमी
जीवित से हो जाता है
ज़्यादा ताकतवर
खौ़फ़नाक!

घर से दूर

सुबह शाम की चिक चिक
घर के तमाम झमेलों से
निजात पाने को
मन भरता है उड़ान

घर से जितनी दूर
निकल आते हैं हम
उतना ही याद आता है घर।

ये हाथ

ऐसे मत देखो भाई इन्हें
काले हैं बदरंग तो क्या
खुरदरे और सख्त
ये हाथ
तमाम सौंदर्य के सर्जक हैं

खिलाते हैं सबसे सुंदर फूल
उगाते सबसे सुंदर फल
गठीले चिकने सबसे सुंदर दाने
सबसे सख्त दाने के भीतर
रचते सबसे कोमल अंकुर
पोसते सबसे कोमल कोंपल

सबसे सुंदर बनाते हैं घर
दीवारें पोतते सबसे सुंदर
रास्ता बनाते निष्कंटक
साफ शफ़्फ़ाक
तोड़ते सबसे सख्त बंजर

जानते समझते हैं
बिवाइंयों का दर्द
हाथ की और खेत की भी
ऐसे मत देखो भाई इन्हें
काले हैं बदरंग तो क्या
खुरदरे और सख्त
ये हाथ!

किस्सा सिर्फ चिड़िया का नहीं 

उन्होंने इस तथ्य को
सम्पूर्ण सत्य की तरह कहा
कि बहुत छोटा होता है
चिड़िया का दिल

और वे भूल गए
चिड़िया की
आकाश मापती उड़ान!

बनावट से भी अधिक

कुछ चीज़ें
अपनी बनावट से अधिक
अपने होने में सुन्दर होती हैं
जैसे घर में एक खिड़की
(कैसा काठ या डिजाइन से भी
अधिक अर्थवान मात्र उसका होना)

ठीक वैसे ही
बल्कि उससे भी कहीं अधिक
जैसे घर में एक औरत!

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