आरती मिश्रा की रचनाएँ

आवाज़

दो ढाई बजे रात
जब सब सो रहे हैं
कुत्ते भी
मेरा मन करता है
ज़ोर की आवाज़ लगाऊँ
दसों दिशाओं को कँपा देनेवाली आवाज़
चुप्पियों को चीरकर रख देनेवाली
चाँद के गूँगेपन के ख़िलाफ एक आवाज़
इस घोर सन्नाटे को भंग करके मैं
परिणाम की प्रतीक्षा करना चाहती हूँ

मायालोक के बाहर

क्रमश: चीज़ों के
और सरलतम होते जाने के बाद भी
तुम हमारे लिए
ईश्वरों जैसे ही हो

वह पत्थरों की मूर्तियों
और तस्वीरों में दिखता है

तुम चलचित्रों में अख़बारों में
पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों में
बड़े-बड़े शीर्षकों के साथ
बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करते हुए

तुम्हारी चर्चाएँ स्वाद्य आस्वाद्य
तुम्हारी पोशाक

हारी-बीमारी 

ईश्वर की अनगिनत गाथाओं-सी रोचक
हर घर की बैठक में बहस का विषय तुम
मन्दिरों और तुम्हारे द्वार पर एक-सी लम्बी कतारें हैं
चढ़ावे हैं मन्नतें हैं
आशीर्वाद की ललक भी है

दरस परस को लालायित तुम्हारी जनता जनार्दन
ईश्वर की भाँति तुम सर्वशक्तिमान
वरदान देने में सक्षम हो
विधि-विधानों की लगाम तुम्हारे हाथ में है

सब कुछ कर सकते हो
सब कुछ पा सकते हो
निमिष मात्र में कहीं भी आ जा सकते हो
अरबों की आवाज़ दबा सकते हो
खदेड़ सकते हो
जड़ समेत उखाड़ सकते हो
निर्वासित और पद्-दलित कर सकते हो
आसन्न मौत के फरमान तुम्हारी स्याही से लिखे जाते हैं
दंगे फसाद से लेकर
युद्धों तक के रिमोट तुम्हारे हाथ में हैं
ऋचाओं सूक्तियों स्मृतियों की कथाओं-सा

अब हमें तुम पर विश्वास नहीं रहा
तुम्हारी घोषणाएँ अब हमें आश्वस्त नहीं करतीं
तुम्हारे आश्वासन हमारे विश्वास में तब्दील नहीं होते
कैसे कहें तुम्हारे आँसू भी सच नहीं लगते
सब कुछ छद्म लगता है, ईश्वरीय माया-सा
कि फैलाई माया और सब मिट गया

लेकिन अब हम
पिचके पेटों
तार तार कपड़ों
बिना सपनों की नींद और ठिठुरती रात के साथ
तुम्हारे मायालोक से बाहर
कठोर ज़मीन पर पैर टिकाए खड़े हैं

और किसी भी बहस में पडऩे से अधिक
यह सच है कि तुम हममें से एक नहीं हो
कभी थे भी नहीं
और क्यूँ होना चाहोगे
ईश्वर निरंकुश सत्ता का प्रतीक है
और तुम भी सेवक कहाँ रहे
प्रतिनिधि भी नहीं रहे
अंतत: शासक ही बन गए

इतिहास की कुछेक पंक्तियों पर उँगलियाँ फेरो
देखो, उस निरंकुश सत्ता को हमने
कब का ठुकरा दिया…

मुर्दा मौन 

तुम्हारा बोलते जाना अच्छा है
जैसे कि रस्सी बटना, लम्बी सी
अच्छा है समय के लिए भी
तुम्हारा यूँ ही बोलते रहना लगातार

तुम चिल्लाते
चीख़ते
या गालियाँ बकते तो भी अच्छा था

अच्छा नहीं हो सकता, बिल्कुल भी
यह मुर्दा मौन
चुप लगा जाना
हर प्रश्न के उत्तर में तुम्हारा यंत्रवत मुंडी हिलाना
और सोचना-‘बोलने से भला होता क्या है?’

धरती से भारी

वह एक क़दम धरती से भी भारी था
वही क़दम, आगे बढ़ाते हुए
मैंने वादा किया था ख़ुद से
पीछे मुडक़र नहीं देखूँगी

इस एक वाक्य में बैठे शब्दों को
दुरुस्त करती रही
किसी मंत्र सा सोते जागते बुदबुदाती रही
वह देहरी जिसे पार किया
और इरादे-वादे पक्के किए
उन दीवारों पर छपे अपने हाथों के छाप
उन लिपियों पर लीपापोती करती

वैसे तो क़दम मैं आगे ही आगे बढ़ाती चली
यह आगे बढऩा कई अर्थों में धरती के सापेक्ष था
जैसे वह आगे बढ़ती है
निरन्तर घूमती रहती है
और घूमते हुए धुरी पर लौटती है फिर… फिर…

मेरी नज़रें समय को नाप रही थीं
क़दम आगे बढ़ रहे थे
मेरा घूर्णन धरती जैसा नियत न था
एक पल भी पर्याप्त था धुरी में वापसी के लिए
मेरा लौटना मुझ तक पहुँचनेवाली सूचनाओं से परे था

मैं लौटती कभी मुट्ठीभर नींद सोकर
तो कभी हवा का एक झोंका उड़ा ले जाता सालों पीछे
मैं लौटती उन्नीसवीं सालगिरह में कभी
तो कभी सीधे फिसलकर किसी सदी के मुहाने में जा खड़ी होती
मैं लौटती उन अदेखी गुफाओं में
जिनकी छाती में आग उगी थी पहली बार
उँगलियों की उन सिहरनों में मेरा लौटना होता
जिनकी पोरों में प्रेम की लहरें उमगती थीं

अक्षरों से अनजान वे
कोई भाषा और लिपि उनके हिस्से में नहीं आई
अपनी ओर खींच-खींच लाने वाली वह छुअन
जो भाषा जानती तो यही कहती
लौटना पीछे होना नहीं होता
जैसे दौडऩा आगे निकल जाना

एक चीख़ के दायरे में 

यूँ तो गूँगे हो जाने की हद तक चुप रही मैं
इस बीच, एक आत्मयुद्ध चलता रहा
कि निश्चित कर पाना
चीख़ने और गूँगे हो जाने के बीच का कुछ… कुछ

यही ‘कुछ’ तलाशते एक दिन
चीख़ उठी
बस्स्स्स ! बहुत हो गया
मेरी चीख़ गरम हवाओं में धुलकर
चौतरफ़ा फैल चुकी थी

इस दौरान हवाएँ बेशक थोड़ा धीमे-धीमे बहीं
क़दमों ने कुछ तय कर लिया था शायद
वे निहायत तेज़ और तेज़ चले
मुझे मंज़िल का पता-ठिकाना मालूम ना था

मेरी घरघराती आवाज़ थोड़ी कम हुई तो
ख़ुद को उस पहाड़ के पास खड़ा पाया
जिसे सपनों के वार्डरोब में
तहाकर रख दिया था
आज बाँहें फैला दीं
गले से लगा दिया
चूम लिया माथे को

यह सपना जागरण की अमानत है
सोती आँखों में भी जागते रहनेवाला
वह अब पहाड़ की चोटी को जूम कर रहा है
यह सब एक चीख़ के दायरे में घटता गया

किरच-किरच 

यह सब कुछ काँटों की सेज में सोने जैसा था
फिर भी मैं सोई और
ऐसा लगा कि कई जन्मों तक सोती रही

इन दिनों और उन दिनों भी यही किया मैंने
ना कहना चाहकर भी कहा ‘हाँ’ और ‘हाँ’
मैंने ये किया
मैंने वो किया
इसलिए कि
सब चाहते रहे ‘यही होना चाहिए’

कुछ विचित्र लगा कि यह सब
भीड़ सा काम करते हुए भी मैं
अलग और विशिष्ट रेखांकित हुई
और वह महीन आवाज़ जो लगातार गूँजती रही
उसे अनसुना किया मैंने
नासमझ बनी रही
ठेलती और तोड़ती रही खुद को किरच किरच

ये काँच के टुकड़े थे
ऐसे टुकड़े जिनमें न तो प्रतिबिम्ब दिखता
ना ही आर-पार
इन टुकड़ों को समेटती
मेरी पाँचों उँगलियाँ लहूलुहान हुई हैं
और रेशे-रेशे बिखरा है मेरा अस्तित्व

इन प्रक्रियाओं से गुज़रते जाने
कि निषेध के पाले में खड़ी होने के बावजूद
कोई हुँकार न भर पाने के बाद
मैं दूर कहीं भागकर गुम होना चाहती हूँ
किसी गुफा के अँधेरे कोने में छिपकर
उजास के तिनकों को मुट्ठियों में समेटना चाहती हूँ
दौडक़र किसी पहाड़ पर चढ़ना और चीख़ना चाहती हूँ
घुस जाना चाहती हूँ उस बियावान में
जहाँ आवाज़ें हर प्रश्न के उत्तर ढूँढ़ लाती हैं।

पहाड़ और पगडण्डियाँ 

यह सब अनायास ही हुआ
रास्ते की तलाश में भटकती मैं
पगडण्डियों से होती हुई
इस विशालकाय चट्टान पर आ खड़ी हुई

नीचे झाँककर देखा
शहर, जैसे कोई भयानक क़िस्सा
शहर के लोग, उस क़िस्से के असली किरदार
पहली बार उनसे डर न लगा
आज इस शहर के वैभव ने मुझे बिल्कुल नहीं डराया

चींटियों से रेंगते लोग और
टूटी पेंसिल के धब्बेदार स्केच जैसे शहर को देखकर
मन में जुगुप्सा जगी
आज तक के जिए मेरे डरों और बदहवासियों को यादकर
ख़ुद पर तरस आया

यहाँ इस काली चट्टान पर खड़े हो
मेरे भय और वे चिन्ताएँ
जो मेरी नज़रों को शक की सुइयाँ बना
जहाँ तहाँ चुभो देती थीं
जो बार-बार दरवाज़े की कुण्डी टोहने हड़बड़ाकर उठ बैठती थीं
जो आधी रात तक आँखों से दूर रखती थीं नींद को
वे आशंकाएँ विलीन हो गईं
यह शहर, अब मेरे गाँव के एक मुहल्ले में तब्दील हो चुका है

पहाड़ का होना

बस अभी अभी सोचा-
पहाड़ बन जाऊँ
और मेरी देह चट्टान में तब्दील हो गई

यहाँ सोचना शुरू किया
वहाँ खर-पतवारों की नाना प्रजातियाँ उग आईं
सोचना ही पर्याप्त है शायद बदलने के लिए
जैसे कि मेरी आँखों के रंग में
धूसर खुरदुरापन फैल गया है

इस चट्टान बनी देह की असलियत जानने के लिए
खरोंचा
सच, मेरे नाखूनों में ख़ून की बून्दें नहीं
धूल के कण भर गए

कठोर बेरंग पहाड़-सा होना और
धरती की नजाकतें भूल-भालकर
देह पर उगा लेना काँटे
पहाड़ जैसा ही एक प्रश्न है

 

कोई और तो नहीं 

तुम सौंप दोगी
जिस दिन
उसे अपना सम्मान तक

वह तुम्हारे अन्त:देश की
एक-एक अन्तड़ियाँ
हिला-हिलाकर देखेगा

 

तुम सौंप दोगी
जिस दिन
उसे अपना सम्मान तक

वह तुम्हारे अन्त:देश की
एक-एक अन्तड़ियाँ
हिला-हिलाकर देखेगा

‘वहाँ कोई और तो नहीं!!’

तबाही

वे
अलग अलग आवाज़ों में
कुछ कहे जा रहे थे

आवाज़ें
बस, शोर पैदा कर रही थीं
कुछ अस्फुट से शब्द
आधे-अधूरे अर्थों के साथ

किसी चट्टान से टकराते हुए
मेरे कानों तक पहुँचते
बादल

 

बारिश

बाढ़
फिर राहत… सहायता… पुनर्वास

थोड़ी देर बाद
वे आवाज़ें चीख़ों में बदल गईं
अब, एक ही शब्द चौतरफ़ गूँज रहा था

तबाही ऽ..ऽ
तबाही ऽ..ऽ
तबाही ऽ..ऽ

मेरे पास और सुनने का साहस न था
दोनों हाथ कान तक पहुँच चुके थे
मैंने टेलीविजन बन्द कर दिया

 

कबाड़ख़ाना 

आवाज़ दे रही थी कब से
घर में फैली धूल मुझे
जहाँ-तहाँ उगे मकड़ी के जाले
कोनों में ढेर लगे काग़ज़ और तमाम अटरम-शटरम
आज उठा ही ली झाडू हाथ में मैंने
धुँधलके में पसरे घर का रूपान्तरण सुबह की धूप में करने के लिए
आलमारियाँ पलटीं, ज़रूरतों को तराशती रही
बरसों बरस लिपटे मिले तहों में
किसी जेवर का ख़ाली डिब्बा
कोई तकाज़े की चिन्दी
एक साड़ी के पल्लू पर ड्राइक्लीनर की पर्ची अभी भी लगी थी
सबों के चेहरों पर जमी धूल पोंछती पटरियाँ बनाती गई
क़िस्से बन चुकी गाड़ियाँ एक बार फिर से
धड़धड़ाती गुज़रने लगीं
समन्दर किनारे पैर फैलाकर बैठ चुकी थी मैं
लहरें मुझे घुटनों तक भिंगोकर विलीन हो जातीं
और मैं अनवरत गिनती जा रही थी… एक…दो… तीन… चार…
इधर धूल की पँक्तियों का अनुवाद जारी था
मेरे जिए दिन डिब्बे में बन्द चिल्लरों की तरह खनखनाने लगे
एक पेटी ने खोल दिए पन्द्रह साल तो
उस बड़े बक्से में पूरे पैंतीस सालों का हिसाब-किताब था
डलियों में महीने पखवाड़े सप्ताह भरे मिले
आधा पहर ढल चुका होगा अभी
मैं टटोल रही थी मेज की दराज़ें
परदे कुशन लिहाफ़पोश खोल रही थी
सामने कचरे का ढेर लग चुका था
माँ बैठी थी पास हमेशा की तरह
निरखती हरेक चीज़ को
रखती हुई कुछ-कुछ कोने में आले में टोकरी में
वे डिब्बियाँ पानी की बोतलें
तहा-तहाकर पन्नियाँ सहेजती और मिठाइयों के ख़ाली डिब्बे
रख लेती थी सफ़र में खाना बाँधने के लिए
हमारे फेंके पेन-पेन्सिलों को भी वे
परखकर ही अलग रखती
संजो लेने की आदत कचरे को भी ज़रूरत में बदल देती
कि कई बार हम बिगड़ते काम बनाने
उस ढेर की तरफ़ बढ़ जाते और
मिल ही जाती हमें नई साड़ी में लगाने के लिए पुरानी आलपिन
या पापा के शर्ट का बटन
अब मेरे क़दम किताबों वाले कोने की ओर बढ़ चले
मैं एक एक काग़ज़ निरखने लगी थी, माँ की तरह
किताबों से धूल के अधिकार मिटाने में जुट गई
इस ज़रूरी कोने से गैरज़रूरी अलग कर सकने में
मैं असफल हो रही थी
धूल मेरे नाख़ूनों के भीतर और हथेली की महीन रेखाओं में भी समा गई
एक लम्बे और बेहद जद्दोजहद के बाद कम ज़रूरत का
एक ढेर बनाया मैंने
उस ढेर को कचरे की ओर खिसकाते हुए
मेरे हाथ दादी के झुर्रीवाले हाथों में बदल गए थे
उनकी थरथराहट को महसूसा मैंने तब और
समय से रद्द हो जाने की पीड़ा भी
कैसे बौखलाती बड़बड़ाती थीं वे
अच्छी-भली बातों के बीच पनिया जातीं उनकी आँखें
जब मैं कविताओं की बात करती या
छोटी बहन कोई तस्वीर बना रही होती
उन्हें याद आ जाते अपने हाथों के गढ़े कुठले-बखारी
काग़ज़ोंवाली फूल-सी हल्की टोकनियाँ
जिनमें दो-तीन दिनों तक नरम बनी रहती थीं रोटियाँ
दीवारों पर उगाई कलाकृतियाँ एक बार फिर से उग आतीं
एक पल के लिए मैंने दीवारों का लिप्यान्तरण कर दिया
समय की गोद में हमेशा के लिए नहीं मिलती पनाह
किसी को भी
मैंने थोड़ी देर के लिए किताबों का अनुवाद कुठलों में कर दिया
मेरे हाथ दादी के हाथ की तरह थरथराने लगे
उसी तरह बड़बड़ाने लगी मैं
और इतना ही नहीं माथे पर उग आईं नसें भी उसी लय में थरथराने लगीं
मैं धूल और कचरे के बीच बैठ गई
सब कुछ थामकर जैसे
कुछ भी खिसकने नहीं दूँगी
समय को भी नहीं
मेरा समय, जिसका हाथ पकडक़र अभी मैं खिलखिला रही हूँ
आँखों में आँखें डालकर रिझा रही हूँ
किसी प्रेमी की तरह वह मुझे
लम्बी ड्राइव पर चलने का आमन्त्रण दे रहा है
और अभी तो किसी भी रेस्त्रां के कोने मेें बैठकर
कॉफ़ी पी सकती हूँ उसके साथ
वह मेरा हाथ छुड़ा आगे बढ़े
मैं कचरे के ढेर में शामिल होऊँ, इससे पहले
कुछ कहना है मुझे, बहुत कुछ बेशक
जैसे काग़ज़ की चिन्दियाँ या रंग-बिरंगे कपड़ों की कतरनें
बोरे में भरी हों
ठीक वैसा ही भरा है मेरे भीतर, ठूँस-ठूँसकर
आज पूरा का पूरा कहना है और देर किए बग़ैर
मैं गर्द से ढँके अपने उन्हीं शब्दों को
धरती के पूरे फैलाव में बिखेर देना चाहती हूँ
मेरी नज़रें नहीं जातीं वहाँ भी

 

ज़िन्दगी एक रेलवे स्टेशन है

मरीना त्स्विताएवा को याद करते हुए

1.

तुम्हें नहीं देखा पर जाना
और महसूस कर रही हूँ
जैसे ओस का होना
मोती-सा
बेशक़ीमती होती हैं स्मृतियाँ
हमेशा साथ रहती हैं
कुछ रेखाएँ कुछ अक्स कुछ शब्द
जेहन में बहते रहते हैं
जैसे धमनियों में रक्त बहता है
स्पन्दन, धडक़नों को हवा देता है जिस तरह
मरीना! न होकर भी तुम्हारा होना
ऐसा ही है

2.

मैं महसूस करना चाहती हूँ
तुम्हारी एक-एक वेदना
जहाँ से कविता सिरजती रही
उस जज़्बे को, जिसने वनवासों को फलाँगते
पार की जीवनयात्रा
काग़ज़ क़लम भी सँभाले हुए
कठिन है उस क्रूर भूख की तडप
जिसने कब किसको छोड़ा
तुम्हें आख़िर क्यूँ छोड़ती
ख़ूनी पंजों में दबाए प्रियजनों को
अट्टहास करती रही
सच, भूख ब्रह्माण्ड भर यातना का दूसरा नाम है
स्थिर संकल्प तुम्हारे
बेचैन हुई तड़पी
टूटी-जुड़ी बार बार
अडि़य़ल क़लम
स्वाभिमान की लक़ीरों के पार नहीं गई
यह क्रूरता, उस क्रूरता के वाबस्ता
दरअसल घुटने न टेकने का ऐलान थी

3.

जि़न्दगी एक रेल्वे स्टेशन है
चली जाऊँगी जल्दी…
कहाँ… नहीं बताऊँगी
मास्को से प्राग
प्राग से पेरिस… फिर मास्को
छुक-छुक करती चलती रही रेलगाड़ी
और एक दिन बेआवाज़ हो गई
चली गई चिरविश्राम के लिए
बिना सिगनल दिए
अपना सामान छोडक़र
मैं प्लेटफार्म पर खड़ी
तुम्हारी परछाई छूने का प्रयास कर रही हूँ…

 

नींद भर सोने दो

न जाने कितने जन्मों से उनींदी हैं
उसकी बोझिल आँखें

घूरती दीवार
उसमें सुराख बना देंगी
कुछ भी यथावत नहीं बचेगा
आग लगा देंगी

ख़्वाबों में
खिलखिलाहट में
पानी में भी

सावधान !
उसे नींद भर सोने दो

 

उल्टे-सीधे घर

1.

मेरी उँगलियों ने भी थामी थीं
दो सलाइयाँ
उल्टे-सीधे घर बनाने का
लक्ष्य दिया गया था
कितनी चतुरता से माँएँ
सौंप देती हैं बेटी को घर
उसे आकार देने
सजाने-सँवारने का काम
उँगलियों में घट्टे पड़ जाने से अधिक
घर छूट जाने का डर लगा रहता है
आजीवन दो उँगलियों की चाल पर
टिका रहता है घर

2.

स्वेटर बुनती बेटियों को देखकर
बेहद ख़ुश होती हैं माँएँ
एक-एक घर सँभालती
अल्हड़ बेटी की तन्मयता
माँओं को आश्वस्त करती है
बेटी के हाथ का बुना पहला गुलूबन्द
अनछुई ऊष्मा से सराबोर कर देता है
एक-एक फन्दे को परखती
ताकीद देती कहती है —
और अच्छा बुनो, हमेशा माँ नहीं होगी साथ

घुड़सवार महिला की कहानी
मैं एक रास्ता बनकर फैल जाना चाहती हूँ चुपचाप
इस ऊबड़-खाबड़ कँक्रीट के बियाबान में
उसी तरह, जैसे फैल जाती थीं हमारी नींद में
दादी की कहानियाँ
मैं उन्हीं कहानियों की रंगीन पृष्ठों वाली किताब बनकर
उनके पन्नों की तरह फडफ़ड़ाना चाहती हूँ
इस तरह कि गुज़रे जहाँ से सदी दर सदी
चहलक़दमी करे घर त्यौहार छोटी-छोटी ख़ुशियां ग़म
और कमोबेश बासठ बहत्तर या बयासी की उमर में
जब नई पौध दिन में सोए और
रात-रात भर काम कर रही हो
मैं धीरे से दाख़िल होकर
उनके प्यालों में कॉफ़ी की तरह
सुनाऊँगी ‘हूँकी’ के बिना ही
घुड़सवार महिला की कहानी या कोई और
बिलकुल दादी की लय में।

 

माँ की डायरी से

1.

अभी अभी जन्मा था वह
और रोया भी था
रोया नहीं दरअसल मुस्कुराया था इस तरह
कि अंजुरी भर गुलाल बिखर गया आसपास
रंग गए रिश्ते नातों के महीन धागे
आसमान गुलाबी हो गया
उसके घुँघराले बालों को छूकर हवाएँ थिरकने लगीं
पहला रुदन, यह आदिम राग
यहीं से बनते हैं गीत
यहीं से कहानियाँ
साल और तारीख़ें भी यहीं से
यहीं से…

2.

मैं स्त्री हो गई थी समूची स्त्री
कि मेरे आँचल में कुनमुना रहा था
एक नन्हा ‘सोता’
हवाओं के साथ बहने की कोशिश करता
हाथ पाँव मारता गहरे पानी में जैसे
मेरी आँचल में उसकी भूख का पर्याय था

3.

यह तीसरा दिन था जब
मेरी सुबह और दिनों से अलहदा थी
वह परियों की बाँहों में झूलता रहा था शायद
गुलाबी होठों को फैलाए बिना
मुस्कुरा रहा था
मैं नहीं रोक पाई उँगलियों की पोरों को
धीरे से छू लिए गाल
बारिश में नहाए फूल की पँखुड़ियों सरीखे

4.

मैं उसे नाम देना चाहती थी
खोजा क्यारियों के बीच
चिड़ियों और तितलियों के घर गई
नदियों झरनों पहाड़ों में भटकती रही
हवाओं के बीच कुछ पल गुज़ारे
आसमान में जाकर एक-एक तारे से पूछे उनके नाम
उसके जैसा कोई कहाँ था
मैं परियों के गाँव जाकर
ढूँढूँगी, एक सुन्दर सा नाम

5.

किसी लय सा आलोड़न बह रहा था
मेरे भीतर, मालकोस गूँजता तब-तब
जब वह खींचता जीवनरस
मोहन वह, मुरली बजाता दुधियाए होंठों से
उँगलियाँ उसकी लहराती रहतीं
जब तक छेड़ता तान
फिर थककर सो जाता
सचमुच दिशाएँ मुग्ध हो जातीं
और मैं बन जाती
पूरी की पूरी वृन्दावन

6.
आज मेरी सुबह को नीम की पत्तियों ने
ख़ुशबू से भर दिया
उतर आईं नहाने के पानी में
घर के कोनों में भर गई हल्दी सने भात की महक
दूध पीपल के एक-एक घूँट ने
रक्त में घोल दिया परिवर्तनों का स्वाद
और लोटे भर-भर आशीषें मेरे सिर पर उँड़ेली गईं
हरेक बून्द को जतन से समेटकर
रख लिया है मैंने अपनी पीली चुनरी के आँचल में
कि बनाऊँगी बखत-बखत पर
उसके मोज़े-दास्ताने, झबले-टोपी
और भविष्य की चिन्ताओं के लिए भी कुछ ढाल जैसे

7.

जैसे अलसाई पत्तियों के मुँह
ओस की बून्दे धो देती हैं और वे
कुल्हड़ भर-भर रोशनी सुडक़ने लगती हैं
उसने मेरे पेट में गुलाबी पाँव मारे
हथेलियों से टटोला आँचल
कि जाग-जाग उठी मैं
जैसे कभी सोई ही न थी

 

एक मूरत और

मीरा गाती रही
साँसों के झाँझ-मजीरे बजा-बजाकर

समझाती रही प्रेम की पीर
‘मेरो दरद न जाने कोय’
न प्रेम जाना किसी ने न दीवानगी

बस, एक मूरत
और जोड़ दी मन्दिर में

 

काँटोंवाली बाड़ 

1.

ठहरो, वहीं रुको
पास मत आओ
कि असंख्य काँटे उगे हैं मेरी हथेलियों में
तुम भी लहूलुहान हो जाओगे
कब तक मरहम-पट्टी कर करके क़दम बढ़ाओगे
तुम तोहमतें लगाओ
उससे पहले आगाह किए जाती हूँ

2.

मैं जानती हूँ
पूछे बिना नहीं रहोगे
मेरे रहस्यों को खोजने
झाँकोगे इधर-उधर
मेरी हथेलियों में भरे काँटे बीनने की
कोशिश
ज़रूर करना चाहोगे

3.

जानबूझकर उगाए हैं मैंने
ये नुकीले काँटे, अपने चारों ओर
आख़िर जंगली जानवरों से बचाता ही है
किसान अपने खेत

4.

वैसे तो चुभते हैं मुझे भी
रिसता है लहू
ये नुकीले शुष्क काँटे
भेद करना नहीं जानते अपने पराए में
बस चुभ जाते हैं
गोरी-काली मोटी-मुलायम
कैसी भी त्वचा में
किसी भी मन में

5.

औरों से थोड़ा भिन्न हो तुम
झाड़-पोंछकर मेरे शब्दों की चुभन
यूँ लौट-लौटकर पूछते हो…
क्या काँटों के बीच फूल खिलने की
रूमानियत में
यक़ीन करते हो?

 

समोधन बाबा का तमूरा

1.

अरसे बाद
बना पाए मुट्ठीभर धागे
जिसमें और रंग न चढ़े कोई
माना कि रंग उचट भी न पाएँगे
थोड़ा तनकर खड़े हो गए वे
अपने लिबास पर इतराए

2.

पता ही न चला कब बारिश आई
कोई तूफ़ानी झोंका-सा
घुल गए रंग
धुल गए रंग
फिर भी रंगा बार-बार

3.

फटी ओढऩी तो क्या, लगाई थेगड़ी
सिला टाँका
चीख़-चीख़कर लगाई गाँठ

4.

गोधूलि बेला में बैठी देहरी पर
दिया-बाती बिसराए
कि बजने लगा तमूरा समोधन बाबा का
तारों की कम्पन में थरथराता स्वर रहीम का
वे गुनगुनाते मेरी बग़ल से निकल गए
मैं बिखरे धागे बीनकर
जोड़ने की जुगत में
एक बार फिर से लग गई

 

तस्वीर बन गई

मैंने कुछ कहना चाहा
बरबस तुम्हारा नाम आया

मैं सुनना चाहती थी कोई गीत
बोल तुम्हारे कानों में खनखनाने लगे

रात दो बजे मैं जाग रही हूँ
कविता लिखने की कोशिश करती

मेरी क़लम चलती रही
तुम्हारी तस्वीर बन गई

 

कुछ कहा शायद 

कदम बढ़ाए थे मैंने
डर-डरकर

मेरे शब्दों में
शंकाओं की थरथराहट को
पकड़ा तुमने

मेरी पूरी हथेली अपनी हथेलियों में लेकर
कुछ कहा शायद
मैंने सिर्फ़ बुदबुदाहट सुनी

और बस यन्त्रवत
कन्धों पर सिर धर दिया तुम्हारे
अब मुझे डर नहीं लग रहा

 

अन्धेरा घिर आने पर 

मैं अपनी चेतना को उतारकर
रद्द हो चुके कपड़ों की तरह फेंक देना चाहती हूँ
इन दिनों वही करना चाहती हूँ
जैसा तुम कहते जाओ
तुम्हारी हथेलियों की तपन को फैलाकर नस-नस में
पकड़कर उँगली
चलते जाना चाहती हूँ
शहर के आख़िरी छोरवाली झोपड़ी तक
आज, अन्धेरा घिर आने की परवाह किए बग़ैर

 

तुम्हारी हृदयरेखा

कितनी घनी और गहरी रेखाओं का जाल बुना है
तुम्हारी हथेलियों में
छोटी-बड़ी महीन-महीन रेखाएँ
लगता है नन्हें बच्चे ने कोई
काग़ज़ गोद दिया हो
मेरी आदत में शुमार हो चला है इनसे खेलते रहना
छूना टटोलना खरोंचना
कुछ पढऩे की कोशिश करते रहना
अटपटी हरकतों में मेरी यदा-कदा तुम भी उलझ जाते हो
मेरे साथ-साथ कुछ पढऩे की कोशिश करने लगते हो
कुछेक के तो नाम भी पता हैं तुम्हें
बाहर बारिश हो रही है
मैं शीशे के पार गिरती बड़ी-बड़ी बून्दों को देखने लगी
आज की रात अमावस जैसी काली और ख़ौफ़नाक थी
और बिल्कुल भी डर नहीं रही थी मैं
तुम्हारे हाथ की रेखाओं के सौ-सौ स्पर्श ने
थपथपा दिया मुझे
उनमें से एक शायद वह हृदयरेखा होती है
रात भर मेरे साथ जागती है
जबकि तुम गहरी नींद में सो चुके होते हो
वह मेरा हाथ थामकर
वही नज़्म दोहराती है
जिसे मैं बार-बार सुनना चाहती हूँ




 

 

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