आरसी प्रसाद सिंह की रचनाएँ

चाँद को देखो

चाँद को देखो चकोरी के नयन से
माप चाहे जो धरा की हो गगन से।

मेघ के हर ताल पर
नव नृत्य करता
राग जो मल्हार
अम्बर में उमड़ता

आ रहा इंगित मयूरी के चरण से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से।

दाह कितनी
दीप के वरदान में है
आह कितनी
प्रेम के अभिमान में है

पूछ लो सुकुमार शलभों की जलन से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से।

लाभ अपना
वासना पहचानती है
किन्तु मिटना
प्रीति केवल जानती है

माँग ला रे अमृत जीवन का मरण से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से
माप चाहे जो धरा की हो गगन से।

नए जीवन का गीत

मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया।
मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला?
मरुमाया की यह मरीचिका? तुहिनपर्व की यह वरमाला?
हुई यामिनी शेष न मधु की, तूने नया विहान दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
अपने मन के दर्पण में मैं किस सुन्दर का रूप निहारूँ?
नव-नव गीतों की यह रचना किसके इंगित पर बलिहारूँ?
मानस का मोती लेगी वह कौन अगोचर राजमराली?
किस वनमाली के चरणों में अर्पित होगी पूजा-थाली?
एक पुष्प के लोभी मधुकर को वसन्त-उद्यान दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
मलयानिल होता, तो मेरे प्राण सुमन-से फूले होते।
पल्लव-पल्लव की डालों पर हौले-हौले झूले होते।
एक चाँद होता, तो सारी रात चकोर बना रह जाता।
किन्तु, निबाहे कैसे कोई लाख-लाख तारों से नाता?
लघु प्रतिमा के एक पुजारी को अतुलित पाषाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
ओ अनन्त करुणा के सागर, ओ निर्बन्ध मुक्ति के दानी।
तेरी अपराजिता शक्ति का हो न सकूँगा मैं अभिमानी।
कैसे घट में सिन्धु समाए? कैसे रज से मिले धराधर।
एक बूँद के प्यासे चातक के अधरों पर उमड़ा सागर।
देवालय की ज्योति बनाकर दीपक को निर्वाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
मुँहमाँगा वर देकर तूने मेरा मंगल चाहा होगा।
शायद मैंने भी याचक बन अपना भाग्य सराहा होगा।
इसीलिए, तूने गुलाब को क्या काँटों की सेज सुलाया?
रत्नाकर के अन्तस्तल में दारुण बड़वानल सुलगाया?
अपनी अन्ध वन्दना को क्यों मेरा मर्मस्थान दे दिया?
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

जीवन का झरना

यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।

कब फूटा गिरि के अंतर से? किस अंचल से उतरा नीचे?
किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे?

निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है!
धुन एक सिर्फ़ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है।

बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता,
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।

लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है।
तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है।

निर्झर कहता है, बढ़े चलो! देखो मत पीछे मुड़ कर!
यौवन कहता है, बढ़े चलो! सोचो मत होगा क्या चल कर?

चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है !
रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है !

सैर सपाटा 

कलकत्ते से दमदम आए
बाबू जी के हमदम आए
हम वर्षा में झमझम आए
बर्फी, पेड़े, चमचम लाए।

खाते पीते पहुँचे पटना
पूछो मत पटना की घटना
पथ पर गुब्बारे का फटना
तांगे से बेलाग उलटना।

पटना से हम पहुँचे राँची
राँची में मन मीरा नाची
सबने अपनी किस्मत जाँची
देश-देश की पोथी बाँची।

राँची से आए हम टाटा
सौ-सौ मन का लो काटा
मिला नहीं जब चावल आटा
भूल गए हम सैर सपाटा !

जय अखंड भारत

शक्ति ऐसी है नहीं संसार में कोई कहीं पर, जो हमारे देश की राष्ट्रीयता को अस्त कर दे ।
ध्वान्त कोई है नहीं आकाश में ऐसा विरोधी, जो हमारी एकता के सूर्य को विध्वस्त कर दे !

राष्ट्र की सीमांत रेखाएँ नहीं हैं बालकों के खेल का कोई घरौंदा, पाँव से जिसको मिटा दे ।
देश की स्वाधीनता सीता सुरक्षित है, किसी दश-कंठ का साहस नहीं, ऊँगली कभी उसपर उठा दे ।

देश पूरा एक दिन हुंकार भी समवेत कर दे, तो सभी आतंकवादियों का बगुला टूट जाए ।
किन्तु, ऐसा शील भी क्या, देखता सहता रहे जो आततायी मातृ-मंदिर की धरोहर लूट जाए ।

रोग, पावक, पाप, रिपु प्रारंभ में लघु हों भले ही किन्तु, वे ही अंत में दुर्दम्य हो जाते उमड़कर ।
पूर्व इस भय के की वातावरण में विष फैल जाए, विषधरों के विष उगलते दंश को रख दो कुचलकर ।

झेलते तूफ़ान ऐसे सैकड़ो आए युगों से, हम इसे भी ऐतिहासिक भूमिका में झेल लेंगे ।
किन्तु, बर्बर और कायरता कलंकित कारनामों की पुनरावृति को निश्चेष्ट होकर हम सहेंगे ।

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ
मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ

मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में
तुम्हारे द्वार पर विस्मृत पड़ा उपहार मैं भी हूँ

बनाया हाथ से जिसको किया बर्बाद पैरों से
विफल जग में घरौंदों का क्षणिक संसार मैं भी हूँ

खिला देता मुझे मारूत मिटा देतीं मुझे लहरें
जगत में खोजता व्याकूल किसी का प्यार मैं भी हूँ

कभी मधुमास बन जाओ हृदय के इन निकुंजों में
प्रतीक्षा में युगों से जल रही पतझाड़ मैं भी हूँ

सरस भुज बंध तरूवर का जिसे दुर्भाग्य से दुस्तर
विजन वन वल्लरी भूतल-पतित सुकुमार मैं भी हूँ

चिड़िया

पीपल की ऊँची डाली पर बैठी चिड़िया गाती है ।
तुम्हें ज्ञात अपनी बोली में क्या संदेश सुनाती है ?

चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की रीति हमें सिखलाती है ।
वह जग के बंदी मानव को मुक्ति-मंत्र बतलाती है ।

वन में जितने पंछी हैं- खंजन, कपोत, चातक, कोकिल,
काक, हंस, शुक, आदि वास करते सब आपस में हिलमिल ।

सब मिल-जुलकर रहते हैं वे, सब मिल-जुलकर खाते हैं ।
आसमान ही उनका घर है, जहाँ चाहते, जाते हैं ।

रहते जहाँ, वहीं वे अपनी दुनिया एक बनाते हैं ।
दिनभर करते काम रात में पेड़ों पर सो जाते हैं ।

उनके मन में लोभ नहीं है, पाप नहीं, परवाह नहीं ।
जग का सारा माल हड़पकर जीने की भी चाह नहीं ।

जो मिलता है, अपने श्रम से उतना भर ले लेते हैं ।
बच जाता तो औरों के हित, उसे छोड़ वे देते हैं ।

सीमा-हीन गगन में उड़ते निर्भय विचरण करते हैं ।
नहीं कमाई से औरों की अपना घर वे भरते हैं ।

वे कहते हैं– मानव, सीखो तुम हमसे जीना जग में ।
हम स्वच्छंद, और क्यों तुमने डाली है बेड़ी पग में ?

तुम देखो हमको, फिर अपनी सोने की कड़ियाँ तोड़ो ।
ओ मानव, तुम मानवता से द्रोह भावना को छोड़ो ।

पीपल की डाली पर चिड़िया यही सुनाने आती है ।
बैठ घड़ीभर, हमें चकित कर, गाकर फिर उड़ जाती है ।

जीवन

चलता है, तो चल आँधी-सा ; बढता जा आगे तू!
जलना है, तो जल फूसों-सा ; जीवन में करता धू-धू!

क्षणभर ही आँधी रहती है ; आग फूस की भी क्षणभर!
किन्तु उसी क्षण में हो जाता जीवन-मय भू से अम्बर!

मलयानिल-सा मंद-मंद मृदु चलना भी क्या चलना है?
ओदी लकड़ी-सा तिल-तिल कर जलना भी क्या जलना है?

जब पानी सर से बहता है

तब कौन मौन हो रहता है?
जब पानी सर से बहता है।

चुप रहना नहीं सुहाता है,
कुछ कहना ही पड़ जाता है।
व्यंग्यों के चुभते बाणों को
कब तक कोई भी सहता है?
जब पानी सर से बहता है।

अपना हम जिन्हें समझते हैं।
जब वही मदांध उलझते हैं,
फिर तो कहना पड़ जाता ही,
जो बात नहीं यों कहता है।
जब पानी सर से बहता है।

दुख कौन हमारा बाँटेगा
हर कोई उल्टे डाँटेगा।
अनचाहा संग निभाने में
किसका न मनोरथ ढहता है?
जब पानी सर से बहता है।

निर्वचन 

चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।
अब न झंझावात है वह अब न वह विद्रोह मेरा।

भूल जाने दो उन्हें, जो भूल जाते हैं किसी को।
भूलने वाले भला कब याद आते हैं किसी को?
टूटते हैं स्वप्न सारे, जा रहा व्यामोह मेरा।
चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।

ग्रीष्म के संताप में जो प्राण झुलसे लू-लपट से,
बाण जो चुभते हृदय में थे किसी के छल-कपट से!
अब उन्हीं चिनगारियों पर बादलों ने राग छेड़ा।
चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।

जो धधकती थी किसी दिन, शांत वह ज्वालामुखी है।
प्रेम का पीयूष पी कर हो गया जीवन सुखी है।
कालिमा बदली किरण में ; गत निशा, आया सवेरा।
चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।

स्वागत

स्वागत, मुदमंगलमय सहर्ष
हे नूतन ऋतु, हे नवल वर्ष !

बिखरे चरणों पर मुक्तमाल, यह शरत्सुंदरी की प्रसन्न
दल-दल पर दूर्वादल-प्रवाल ! आनन श्री छायापथ प्रपन्न
फैला जो नव रवि-रश्मि-जाल, आली शेफाली की सुगंध

ये चहक उठे बन-बिहंग-बाल !!
उमड़ी हरियाली में अबंध !
पा प्रथम तुम्हारा पुलक-स्पर्श
छलका कवि का यौवन-विमर्श
स्वागत-सहर्ष, हे नवल वर्ष !
स्वागत-सहर्ष, हे नवल वर्ष !
उतरा वनगिरि से सुख-प्रपात
रे मंद-मंद दक्षिणी वात
यामिनी चारु चंद्रिका-स्नात
मंगल संध्या-मंगल प्रभात !
यह नवजीवन का नवोत्कर्ष
स्वागत-स्वागत, हे नवल वर्ष !
— — — — —

इस शारद सुषमा में सकाल
जागो, जीवन के स्वर्ण-काल !
नव ध्येय, चाह नव, नवोत्साह, ले द्वेष-प्रेम, संघर्ष-हर्ष
नव-नव भावों का नव उछाह !
इतिहास बना अब विगत वर्ष
रे भेद पुरातन दोष-कोष आ,
नव पल, नव क्षण, दिवस-मास
गूँजे नवयुग का शंख-घोष !!!
नव प्रगति ह्रास, नव अश्रु-ह्रास !
फूलो वन-वन की ढाल-डाल
चमका प्राची में ज्योति-भाल
इस शारद सुषमा में सकाल, जागो मेरे नव उषाः काल !
हो मंगलमय भावी विधान
जाग्रत स्वदेश गौरव महान् !
मंगलमय कण-कण, हृदय, प्राण
नव मंत्र, तंत्र नव, ज्ञान-ध्यान !!
खोलो भविष्य का अंतराल
मेरे नित-नूतन क्रांति-काल !

(हंस : अक्तूबर 1934)

निर्वास

कैसे अलि, भाया यह उपवन ?
वैभव-समाधि पर ऋतुपति की
यह पतझड़ का सैकत-नर्तन !
तू नंदन-वन की मोहमयी
सुंदरी परी शोभाशाली;
तेरी चितवन से किस प्रकार
मदिराकुल होता वनमाली !
रोता है यहाँ अतीत-स्वप्न
विधवा का आहत उर उन्मन !
होता है यहाँ सदैव अरी,
अपमानित घड़ियों का क्रंदन !!

वे दिन हाँ, वे दिन चले गए;
निर्मोह काल छले गए !
अलि, पले गए जिन हाथों से
उन हाथों से ही दले गए !!
मरु का तरु-फल-जल-हीन देश
जलता पावक-कण क्षण-अणुक्षण !
लुट गया धरा का हरित-वेश;
अब यहाँ न कोई आकर्षण !!
कैसे सुख की हो रही चाह ?
इन कुश-वृत्तों पर कुटिल आह !
माधवि ! सह लोगी क्यों कर इस
प्रज्वलित चिता का रक्त-दाह ?
पावस-दिनांत में घनाकार
जब भू को छू लेता अपार,
वन-वन में अपना उदाहार
ढूँढ़ेगा नूपुर-झनत्कार;
तब तू प्रिय की सुध में विभोर,
किस सुरधनु का धर स्वर्ण छोर,
झूलोगी बंकिम अंग-न्यास
उच्छ्वासित मेघवन में सहास ?
सखि, भूल केतकी का हुलास;
शूलों में गुरुतर अगुर-वास !
अब छोड़-कंटकों के दुख में
वह कल्पविटप-कल्पना उदास !!
प्रति फलित व्यथा के रागों में
है पल्लव का मर्मर-वेदन;
दुस्तर है तेरे लिए सजनि,
इस कुटिल-जाल का परिभेदन !
बहती करील के नयनों से
निशिवासर अविरल अश्रुधार !
शाखा-शाखा पर नाच रही
शुचि की तीखी-तीखी बयार !!
कहती न रेणु ब्रज-वेणु-कथा;
गोपन-बाला का नृत्य-रास !
अब तो कालिंदी-कुंजों में
खंजरी बजाता सूरदास !!

(हंस : जनवरी, 1935)

कवि-श्री

आया बन जग में प्रातः रविः
मैं भारत-भाग्य विधाता कवि !

तोड़ता अलस जग-जाल जटिल;
सुकुमार, स्नेह-धारा-उर्म्मिल !
मैं पुरुष-पुरातन, प्रेम-दान;
चिर-कविर्मनीषी, सृष्टि-प्रान !!
बरसाती लौह-लेखनी पवि;
मैं विद्रोही इठलाता कवि !

सुर-तरु-सा कर सौरभ-प्रसार
सौंदर्य-पिपासा कुल, उदार;
शाश्वत, अनंत, अच्युत, अक्षर;
मैं चिर-अनादि, अतुलित, निर्जर !
सिकता पर अंकित करता छवि,
मैं नवयुग का निर्माता कवि !

छंदों में बाँध मरुत, सागर;
नाचता नित्य मैं नट-नागर !
शशि, उडु, ग्रह क्रम-क्रम से सभ्रम
करते मानस में संचक्रम !
प्राणों की अपने देता हवि;
मैं भारत-भाग्य विधाता कवि !

आँधी-सी मेरी गति अशांत;
मैं कुवलय-कोमल, कुमुद-कांत !
विग्रह, विनाश, मूर्च्छा, प्रमाद;
मैं अमृत-कल्पना, विष-विषाद !
उद्भासित, शाशित दिग्दिगंत
मेरी प्रतिभा से शुचि-ज्वलंत !!
आक्रांत कर रही प्रांत-प्रांत;
आँधी-सी मेरी गति अशांत !

मैं प्रलय-प्रभंजन, शुभ मुहूर्त;
मंगल, मराल-वाहन, अमूर्त्त !
मैं धूम-ध्वज, मैं मकर केतु,
आकाश विहारी, सिंधु सेतु !!
मैं निष्ठुर, निर्भय, मदोन्भ्रांत;
प्रतिभा से मेरी नभाक्रांत !

उद्धत, अनियंत्रित, महावीर;
सुमनाधिराज मैं सुनाशीर !
युग-युग प्रसिद्ध, युग-युग प्रशस्त;
मैं अमर-वाक् कवि वरद-हस्त !!
चीत्कार-चकित, निर्द्वंद्व, भ्रांत;
मैं आँधी, झंझारव अशांत !

…. …. ….

मैं निरुपम कवि प्रिय, निर्विकार
पाटल-पलाश-पेलव, कुमार !

सुख-दुख-स्वप्न-सस्मित, विभोर
रहता मैं चिर-शिशु, चिर-किशोर
मृग-सा कस्तूरी गंध-अंध
फिरता वन-वन में मैं अबंध !!
वाणी नन्दित मंदार हार
मैं विश्व-विमोहन कलाकार !

भावों का बहता जब समीर
आता नयनों में छलक नीर
मैं अपने गीतों से अधीर
गुंजित कर देता वन-कुटीर !
इस भवतोयधि-जाप मेंअपार
मैं नाविक कवि, निरुपम, उदार !
मैं चिर-सुंदर, चिर-मधु अनंत
मधुमत्त मधुव्रत्त, मधु वसंत !
यौवन मकर्ष, उन्माद-हर्ष !!
पारस-सा मेरा स्वर्ण स्पर्श !
मैं जगद्वंद्व, जग-मुक्ति-द्वार
कवि चिदानंद, उज्ज्वल, उदार !

(हंस : मार्च 1935)

हमारा देश

हमारा देश भारत है नदी गोदावरी-गंगा,
लिखा भूगोल पर युग ने हमारा चित्र बहुरंगा।

हमारे देश की माटी अनोखी मूर्ति वह गढ़ती,
धरा क्या स्वर्ग से भी जो गगन सोपान पर चढ़ती।

हमारे देश का पानी हमें वह शक्ति है देता,
भरत सा एक बालक भी पकड़ वनराज को लेता।

जहाँ हर साँस में फूले सुमन मन में महकते हैं,
जहां ऋतुराज के पंछी मधुर स्वर में चहकते हैं।

हमारे देश की धरती बनी है अन्नपूर्णा सी,
हमें अभिमान है इसका कि हम इस देश के वासी।

जहाँ हर सीप में मोती जवाहर लाल पलता है,
जहाँ हर खेत सोना कोयला हीरा उगलता है।

सिकंदर विश्व विजयी की जहाँ तलवार टूटी थी,
जहाँ चंगेज की खूनी रंगी तकदीर फूटी थी।

यही वह देश है जिसकी सदा हम जय मनाते हैं,
समर्पण प्राण करते हैं खुशी के गीत गाते हैं।

उदय का फिर दिवस आया, अंधेरा दूर भागा है,
इसी मधुरात में सोकर हमारा देश जागा है।

नया इतिहास लिखता है हमारा देश तन्मय हो,
नए विज्ञान के युग में हमारे देश की जय हो।

अखंडित एकता बोले हमारे देश की भाषा,
हमारी भारती से है हमें यह एक अभिलाषा।

राष्ट्रगीत 

सारे जग को पथ दिखलाने-
वाला जो धु्रव तारा है।
भारत-भू ने जन्म दिया है,
यह सौभाग्य हमारा है।।
धूप खुली है, खुली हवा है।
सौ रोगों की एक दवा है।
चंदन की खुशबू से भीगा-
भीगा आँचल सारा है।।
जन्म-भूमि से बढ़कर सुंदर,
कौन देश है इस धरती पर।
इसमें जीना भी प्यारा है,
इसमें मरना भी प्यारा है।।
चाहे आँधी शोर मचाए,
चाहे बिजली आँख दिखाए।
हम न झुकेंगे, हम न रुकेंगे,
यही हमारा नारा है।।
पर्वत-पर्वत पाँव बढ़ाता।
सागर की लहरों पर गाता।
आसमान में राह बनाता,
चलता मन-बनजारा है।।
चाँद और मंगल का सपना।
सच होने जाता है अपना।
अमर तिरंगा ध्वज उछालकर
नवयुग ने ललकारा है।।
भारत-भू ने जन्म दिया है
यह सौभाग्य हमारा है।।

बादल आए झूम के

बादल आए झूम के।
आसमान में घूम के।
बिजली चमकी चम्म-चम।
पानी बरसा झम्म-झम।।
हवा चली है जोर से।
नाचे जन-मन मोर-से।
फिसला पाँव अरर-धम।
चारों खाने चित्त हम।।
मेघ गरजते घर्र-घों।
मेढक गाते टर्र-टों।
माँझी है उस पार रे।
नाव पड़ी मँझधार रे।।
शाला में अवकाश है।
सुंदर सावन मास है।
हाट-बाट सब बंद है।
अच्छा जी आनंद है।।
पंछी भीगे पंख ले।
ढूँढ़ रहे हैं घोंसले।
नद-नाले नाद पुकारते।।
हिरन चले मैदान से।
गीदड़ निकले माँद से।
गया सिपाही फौज में।
मछली रानी मौज में।।

अजनबी की आवाज़

आपके इस शहर में गुज़ारा नहीं
अजनबी को कहीं पर सहारा नहीं

बह गया मैं अगर, तो बुरा क्या हुआ ?
खींच लेती किसे तेज़ धारा नहीं

आरज़ू में जनम भर खड़ा मैं रहा
आपने ही कभी तो पुकारा नहीं

हाथ मैंने बढ़ाया किया बारहा
आपको साथ मेरा गवारा नहीं

मौन भाषा हृदय की उन्हें क्यों छुए ?
जो समझते नयन का इशारा नहीं

मैं भटकता रहा रौशनी के लिए
गगन में कहीं एक तारा नहीं

लौटने का नहीं अब कभी नाम लो
सामने है शिखर और चारा नहीं

बस, लहर ही लहर एक पर एक है
सिंधु ही है, कहीं भी किनारा नहीं

ग़ज़ल की फसल यह इसी खेत की
किसी और का घर सँवारा नहीं

गीत-ग़ज़ल

हो गई हैं चार आँखें यार से
लड़ गई तलवार क्यों तलवार से

आप क्या हैं ? आपको मालूम क्या ?
पूछिये अपने किसी बीमार से

प्यार का कुछ और ही दस्तूर है
रंग लाता और कुछ तकरार से

मौत ने क्यों कर दिया हमको अलग ?
हम कभी चिपके न थे संसार से

शत्रु को हरगिज न छोटा जानिए
जल गया घर एक ही अंगार से

किस बला का नाम औरत रख दिया ?
कौन बचता है दुतरफ़ा धार से

ज़िंदगी ही जब सलामत है नहीं
माँग क्या कुछ और हो सरकार से

जो बनी अपनी हिफ़ाजत के लिए
हम गये टकरा उसी दीवार से

आदमी हम भी कभी थे काम के
गो कि लगते हैं कभी बेकार से

अब कमर कस कूच करना चाहिए
आ रही आवाज़ सीमा पार से

दिल ही तो है

दिल हमारा लापता है शाम से
कर रहा है क्या ? गया किस काम से

दर्द ले कर दिल हमारा ले लिया
हो गए दोनों बड़े अंजाम से

लाश में ही जान अब तो डालिए
एक भी बाक़ी न क़त्लेआम से

आप हों चाहे न जितनी दूर क्यों ?
जी रहे हम आपके ही नाम से

ज़िंदगी गुज़री मुसीबत से भरी
मर गए हम तो बहुत आराम से

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ
मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ

मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में
तुम्हारे द्वार पर विस्मृत पड़ा उपहार मैं भी हूँ

बनाया हाथ से जिसको किया बर्बाद पैरों से
विफल जग में घरौंदों का क्षणिक संसार मैं भी हूँ

खिला देता मुझे मारूत मिटा देतीं मुझे लहरें
जगत में खोजता व्याकुल किसी का प्यार मैं भी हूँ

कभी मधुमास बन जाओ हृदय के इन निकुंजों में
प्रतिक्षा में युगों से जल रही पतझाड़ मैं भी हूँ

सरस भुज बंध तरूवर का जिसे दुर्भाग्य से दुस्तर
विजन वन वल्लरी भूतल-पतित सुकुमार मैं भी हूँ

सैर-सपाटा 

कलकत्ते से दम दम आए,
बाबू जी के हम-दम आए!

हम वर्षा में झम-झम आए,
बर्फी, पेड़े, चमचम लाए!

खाते-पीते पहुँचे पटना,
पूछो मत पटना की घटना!

पथ पर गुब्बारे का फटना,
ताँगे से बेलाग उलटना!

पटना से हम पहुँचे राँची,
राँची में मन-मीरा नाची!

सबने अपनी किस्मत जाँची,
देश-देश की पोथी बाँची!

राँची से आए हम टाटा,
सौ-सौ मन का लोहा काटा!

मिला नहीं जब चावल-आटा
भूल गए हम सैर-सपाटा!

-साभार: नंदन, जुलाई 1994, 32

अखाड़ा

बहुत मशहूर दुनिया में हमारा यह अखाड़ा है,
भयंकर भीम भी आकर यहाँ पढ़ता पहाड़ा है।

बहादुर वीर रुस्तम से यहाँ सुहराब लड़ता है,
यहाँ बलवान गामा है जिविस्को भी पछड़ता है।
सितारे हिंद है कोई यहाँ वनराज है कोई,
हिरण पर शेर है कोई बया पर बाज़ है कोई।
यहाँ खरगोश ने धर कर शिकारी को पछाड़ा है,
बहुत मशहूर दुनिया में हमारा यह अखाड़ा है।

हमारे इस अखाड़े में कन्हैयालाल लड़ते हैं,
बहुत से भूत लड़ते हैं, बहुत बेताल लड़ते हैं।
बहुत चौबे, बहुत छब्बे, बहुत दुब्बे लपटते हैं,
यहाँ चूहे मिलाकर हाथ, बिल्ली पर झपटते हैं।
नदी की एक मछली से यहाँ घड़ियाल हारा है,
बहुत मशहूर दुनिया में हमारा यह अखाड़ा है!

-साभार: कागज की नाव, आरसीप्रसाद सिंह, 48-50

सोने की कलगी 

सूरज का दरबार लगा
चिड़ियों का बाजार लगा!
सब पंछी चहचहा रहे,
अपनी बोली सुना रहे
सूरज बोला-रहने दो,
मुझको भी कुछ कहने दो!

सबसे पहले जो जागे,
पहुँचे वह मेरे आगे!
स्वयं जागकर चुप न रहे,
औरों को भी ‘उठो’ कहे!
राज मुकुट वह पहनेगा,
राजा की पदवी लेगा!
सबसे पहले ही उठकर,
सूरज के दरवाजे पर-
मुर्गे ने यों दस्तक दी
ऊँची चोटी मस्तक की!
मुर्गा बोला-कुकडू़-कूँ,
और रहे सब टुटरू-टूँ!
मुर्गे ने पाई सिर पर,
सोने की कलगी सुंदर!
अरुण साथ लेकर आया
‘अरुण शिखा’ वह कहलाया!

नानी कहती नई कहानी 

एक नदी है बड़ी सयानी, बहने दो!
नानी कहती नई कहानी, कहने दो!
पंछी गाते हैं बहार में, गाने दो!
नैया पहुँची बीच धार में, जाने दो!
सेबों से हर डाल भरी है, पकने दो!
दरवाजे पर भीड़ खड़ी है, बकने दो!
चूहे-बिल्ली में खटपट है खाने दो!
पप्पी का पिल्ला नटखट है, आने दो!
मम्मी की है फ्रॉक निराली, सीने दो!
पापा के मुँह में है प्याली, पीने दो!
एक महल है बहुत पुराना, गिरने दो!
एक नगर है बहुत सुहाना, उठने दो!
मुन्ना सपने में रोता है, रोने दो!
दुनिया में जो कुछ होता है, होने दो!

दूरबीन 

दूरबीन से देखो भाई,
जो न पास में पड़े दिखाई!

आसमान के तारे लगते
जैसे जुगनू घास में,
चाँद खिसककर आ जाता है
जैसे पैसा पास में!
या कि रामदाने की लाई,
दूरबीन से देखो भाई!

छप्पर पर के कद्दू-जैसा
लगता सूरज दूर का,
धु्रव तारा लगता है मानो
लड्डू मोतीचूर का!

खा मत लेना समझ मिठाई,
दूरबीन से देखो भाई!

तीस कोस पर जो मंदिर है
लगता अपने द्वार पर,
ठीक नाक के पास पहुँचते
जो फल रहते ताड़ पर!

ज्यों पॉकेट में दियासलाई,
दूरबीन से देखो भाई!

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