आर.पी. सारस्वत की रचनाएँ

तितली का घर

सज-धज करके कैसी आई,
मैडम बटर फ्लाई।
इस डाली से उस डाली तक
झट से उड़कर जाती,
फूल-फूल के पास पहुँचकर
हँस-हँसकर बतलाती
हँसते रहना ही जीवन है
सुन लो मेरे भाई!
रंग-बिरंगे पंखों से यह
अपनी ओर लुभाती,
जब भी चाहूँ इसे पकड़ना
लेकिन हाथ न आती!
ऐसी बात इसे दादी जी
है किसने समझाई?
चींटी का घर, चूहों का घर
चिड़िया का भी घर है,
नहीं मिला पर तितली का घर
तुमको पता, किधर है?
ढूँढ़ रहा हूँ कब से, अब तक
दिया नहीं दिखलाई!

दादा का अखबार

सुबह-सुबह दादा जी चाहें
बस भैया अखबार!

ऐनक ऊपर-नीचे करते,
पूरे पन्ने जमके पढ़ते।

थकते नहीं जरा भी,
ताजा दम दिखते हर बार!

जो भी जहाँ इन्हें मिल जाते,
सबसे पहले खबर सुनाते!

एक खबर के टुकड़े-टुकड़े
करें हजारों बार!

चाय पड़ी ठंडी हो जाती,
चीख-चीख दादी थक जाती।

खबरों में ही सिमट गया है,
दादा का संसार।

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