आशमा कौल की रचनाएँ

जीवन 

स्वप्नों के बादल
जब उड़ते हुए
यथार्थ की धरा पर
बरसते हैं
यादों के अनगिनत मोती
तब समय के धागे से
निकलकर बिखरते हैं ।
महसूस होता है
उस समय,
यह उड़ना और बरसना
ही जीवन है ।

भोग-विलास में
उड़ते हुए मनुष्य को
मोक्ष प्राप्ति के लिए
बरसना है ।

बादल का मोक्ष है
धरती पर बरसना
मनुष्य का मोक्ष है
मिट्टी से मिलना ।

सपनों के बादल
बार-बार उड़ते हैं
यथार्थ की धरा पर
पुनः बरसते हैं
जीवन का क्रम
इसी तरह चलता है ।

अहसास

आसमान जब मुझे अपनी बाँहों में लेता है
और ज़मीन अपनी पनाहों में लेती है
मैं उन दोनों के मिलन की कहानी
लिख जाती हूँ, श्वास से क्षितिज बन जाती हूँ ।

दिशाएँ जब भी मुझे सुनती हैं
हवाएँ जब भी मुझे छूती हैं
मैं ध्वनि बन फैल जाती हूँ
और छुअन से अहसास हो जाती हूँ ।

किसी शंख की आवाज़ जब मुझे लुभाती है
किसी माँ की लोरी जब मुझे सुलाती है
मैं दर्द से दुआ हो जाती हूँ
आँसुओं से ओस बन जाती हूँ ।

अनहद नाद जब भी बज उठता है
और अंतर्मन प्रफुल्लित होता है
मैं सीमित हो असीमित में विलीन होकर
आकार से निराकार हो जाती हूँ ।

उस अलौकिक क्षण में मैं स्वयं को उसी का अंश मानती हूँ
उस अद्वितीय पल में मैं उसी का रूप पाती हूँ ।

साक्षी 

मैं जड़ बनना चाहती हूँ
जड़ की तरह धैर्यवान
उसी की तरह अपनी ज़मीन
नहीं छोड़ना चाहती हूँ
चाहती हूँ मेरी ज़मीन पर
आशाओं के नए फूल खिलें
प्यार की कलियाँ महकें
सदभाव की बेलें पनपें
और मैं उस बसंत की साक्षी बनूँ ।

मैं किनारा होना चाहती हूँ
किनारे-सी संयमी
उसी की तरह अपनी शर्म
अपना पानी नहीं छोड़ना चाहती ।

चाहती हूँ मेरा पानी
शांत बहता रहे
निरंतर सागर से मिलने की
कहानी कहता रहे
और मैं उस मिलन की साक्षी बनूँ ।

मौन रह कर 

मौन रह कर
यह शीशा ही
बता सकता है कि
उम्र कैसे ढलती है

मौन रह कर
सिर्फ़ पगडंडी ही
बता सकती है कि
कारवाँ कैसे गुज़रते हैं

मौन रहकर
यह दिल ही
बता सकता है कि
जज्बात कैसे मचलते हैं

मौन रह कर
यह पर्वत ही
बता सकता है कि
तपस्या कैसे करते हैं

मौन रह कर
यह शून्य ही
बता सकता है कि
शोर कैसा लगता है

मौन रह कर
यह नियति ही
संकेत कर सकती है कि
सृष्टि कैसे चलती है

आँसू 

आँसू दर्द की
मौन भाषा कहते हैं
वे हमेशा गर्व से
पलकों किनारे रहते हैं
क्षणभंगुर-सी अपनी
ज़िंदगी में जाने इतना दर्द
कैसे सहते हैं
आँसू दर्द….

मन के बोझ को
हल्का बनाने की ख़ातिर
पलकों की सेज छोड़
गालों पर आकर बहते हैं
आँसू दर्द….

राजा से रंक तक
न छिपा सके जिसको
शोर के बिना ही
ये दर्दे-दास्तान कहते हैं
आँसू दर्द….

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