आशीष जोग की रचनाएँ

व्यक्तिगत

हम अनुभूति-सम्राट,
अभिव्यक्ति-शून्य, सांध्य-प्रहरी |

दिग्भ्रमित, गंतव्य-हीन,
चिर प्रतीक्षित नयन,
करते अरण्य-रोदन वन-केसरी |

हम अनुभूति-सम्राट,
अभिव्यक्ति-शून्य, सांध्य-प्रहरी |

प्रति निशा, बोझिल नयन,
बूढी निद्रा, जर्जर सपन,
फिर प्रभात, नव-प्रतीक्षा, आशा-निराशा,
स्व्दित अपराह्न में,
सहते उष्ण-धाराएँ, आतप सुनहरी |

हम अनुभूति-सम्राट,
अभिव्यक्ति-शून्य, सांध्य-प्रहरी |

शांति-कपोत, करबद्ध,
वाचाहीन, संज्ञा-शून्य,
नयनों में नील गगन विशाल अनंत,
और नीचे जल-सिक्त दूब हरी |

हम अनुभूति-सम्राट,
अभिव्यक्ति-शून्य, सांध्य-प्रहरी |

अनभिज्ञ

गगन के रक्ताभ रंग में,
डूबते सूरज की किरणें,
पूछती हैं आज मुझसे –

जान पाए क्या कभी तुम,
फर्क है क्या
भोर और संध्या की धुंधली लालिमा में?

और मैं,
अनभिज्ञ, निश्चल, मूक, कातर,
दूर नभ में डूबते,
सूरज की किरणों से,
निकलते प्रश्न चिन्हों की दिशा में,
देखता हूँ, खोजता
अजना अजाना एक उत्तर!

क्षितिज के गहेरे धुंधलके
थम लेते हाथ मेरा,
और ले चलते मुझे,
उस पार अपने!

बूँद-बूँद पानी

श्रावण की कृष्ण-वर्णी,
पलकों में, अलकों में,
छलक-छलक जाता है,
बूँद-बूँद पानी!

तूलिका के मृदुस्पर्शी,
रेशों में, केशों में,
झलक-झलक जाती है,
अनकही कहानी!

मरुथल की अनबुझी,
तृष्णा- वितृष्णा की,
तुष्टि-संतुष्टि का,
समाधान पानी!

सृष्टि के, समष्टि के,
मूल पंच तत्वों का,
प्राणधन चंचल मन,
कितना अभिमानी!

श्रावण की कृष्ण-वर्णी,
पलकों में, अलकों में,
छलक-छलक जाता है,
बूँद-बूँद पानी!

एक सपना

मूक शब्दों की हवाएँ, खोलती हैं द्वार अर्थों के निरंतर,
वर्जना की गर्जना से, काँप उठते जीर्ण प्रश्न औ’ श्रांत उत्तर.

प्रतिध्वनि लौटे क्षितिज की चोट खाकर,
रुद्ध कंठों की विषमताएँ,
ढली सांचों में शब्दों की,
छुपी अर्थों के निलयों में हैं आकर.

सुरधनु से पंख खोले,
तिर रहे नैनों के पाख़ी,
खोज में आखेट की,
जो जा छुपा मदिरा के प्यालों में,
भरे जिनको निरंतर काल-साकी.

जीर्ण अवशेषों क़ी स्मृतियाँ,
जा बसी नैनों की पोरों में,
समझ कर चंद्र जिनको,
उठा है हर्ष का कलरव चकोरों में.

नैन चढ़ते चिर निमेषों की चिता पर,
‘नेति-नेति’ की प्रत्यंचाएँ,
उलझती दिग्भ्रमित शर की शिराओं में,
जिन्हे बैठे हैं शब्द संधान में,
मानस के धनुधर,
तर्क-धनुओं पर चढ़ा कर.

भावना की मुठ्ठियों में,
है भरा आवेग कितना,
रेत की घड़ियों के
प्यालों से फिसलती रेत जैसा,
धो रही सदियों से जिसको,
स्तभता की सिंधु-लहरें,
और एकाकी किनारे,
खोजते छिटके प्रवालों में
छुपा हो कौन जाने-
एक सपना !

ना जाउँगा उस पार कभी मैं 

उस पार
उजडी बस्ती में,
है बसती
जर्जर मानवता;

और इस पार मैं –
चाकचिक्य और गगनचुंबी अट्टालिकाओं के मायानागर में बैठा,
सिद्धांतों, आदर्शों, नीतियों और मूल्यों की चहारदीवारी में बंद.
आँखों में सपने लिए-
रामराज्य, दलितोद्धार और समाज-सुधार के!

किंतु मेरी परिभाषाओं की सीमाएँ,
समाप्त हो जाती हैं,
उस बस्ती से ठीक पहले!

और हर रात उस बस्ती में,
हर झोपडे से टिमटिमाती आँखें,
देखती हैं मेरे प्राचीर की ओर,
हाथों में लिए,
आशाएँ, याचनाएँ और स्वप्न!

और इधर मैं-
समाजोद्धार का ठेकेदार,
और मेरा गाँधीवादी दरबार,
रोज खींचते हैं,
नई रेखाएँ निर्धनताओं की.

उधर- करोड़ों हाथों में लिए,
क्षुधा संत्रस्त पेट,
वह बस्ती बिलबिलाती है,
हमारी खींची हुई रेखाओं के नीचे,

और इधर- मेरे अर्थशास्त्री व्यस्त हैं,
आँकड़ों की दुनिया में,
आँकड़े- जो रोज़ सुर्खियाँ बनते हैं,
आँकड़े- जो नित न जाने
कितने निर्धानों को खींच लेते हैं,
मेरे ही अर्थशास्त्रियों की
खींची रेखाओं के ऊपर!

और, उस पार रहने वाला
शायद कोई भी निर्धनता की परिभाषा पर खरा नहीं उतरता!

मैं करता नित नये आश्वमेध,
जाउँगा नित नये देश,
पीटने प्रतिष्ताओं के ढिंढोरे,
करने विज्ञान, कला, साहित्य और संस्कृति और मानवता का आयात-निर्यात,
सुनने झूठी प्रशंसाएँ,

पर-
ना जाउँगा उस पार कभी मैं!
ना जाउँगा उस पार कभी मैं!

पल

क्यूँ न जाने खोजते हैं नयन अब तक,
काल के चहरे की बूढ़ी झुर्रियों में,
खो गए हैं, कुछ मेरे जो पल सुनहरे !

चार कोनों के घरों की,
चौखटें हैं लाँघ जाती,
एक कडुए पल से
उभरी कुछ दरारें.

झांक उठाते सब तरफ से,
हैं न जाने लोग कितने,
और कितने गिद्ध चेहेरे!

क्यूँ न जाने खोजते हैं…

याद की परछाइयों का क्या करूँ मैं?
इनसे तो बीते दिनों की धूप अच्छी.

आज के बोझिल अंधेरे
सैकड़ों पल चाहे ले लो
पर हटा लो,
क्यूँ लगा रक्खे हैं अब तक
मेरे सूरज पर ये पहरे!

क्यूँ न जाने खोजते हैं…

जिंदगी की चाल का भी क्या भरोसा,
आज मुझको तो कहीं कल तुमको भी पीछे न छोड़े.
कब तलक भागोगे पीछे, उन सुनहरे दो पलों के,
ठहर जाओ!
मैं भी ठहरा हूँ, मिलेंगे और कितने लोग ठहरे!

क्यूँ न जाने खोजते हैं…

आँसुओं से भीगती धरती के सीने में भी दिल है,
कौन देखे कौन जाने,
आँख से टपका हुआ इक ख्वाब चुनती,
ये ज़मीं खामोश क्यूँ है.

ख्वाब के दामन से फूटी कोपलों से गूंजते स्वर,
कौन सुनता है, किसे फुरसत है?
डूबे जाम की मदहोशियों में लोग बहरे !

क्यूँ न जाने खोजते हैं नयन अब तक,
काल के चहरे की बूढ़ी झुर्रियों में,
खो गए हैं, कुछ मेरे जो पल सुनहरे !

पहली धार के दोहे

प्यादे ने है रख लिया अपना ‘राजा’ नाम|
असली राजा बच गये, प्यादा हुआ तमाम||१||

सीडब्लूजी (CWG) टूजी (2G) में, अरबों ले गये लूट|
जाते सभी तिहाड़ अब, कोई ना पाए छूट||२||

बच्चों की खातिर किया, इतना भ्रष्टाचार|
किसको देगा दोष अब, बेटी गयी तिहार||३||

अँधा था धृतराष्ट्र पर, दोषी ही कहलाए|
आँखें हो अँधा हुआ, उसको कौन बचाए||४||

मत (vote) देने के मौके पर, लेते जी चुराय|
ड्रॉयिंग रूम में बैठ अब, देते अपनी राय||५||

लोकतंत्र का हो रहा, कैसा ये परिहास|
कठपुतली का खेल है, डोर है किसके पास||६||

नीलकंठ 

मैंने लिया है तुम्हारा आलंबन – तर्क,
छिपाने अपनी बेतुकी ज़िन्दगी का असंतुलन |

मैंने किया है तुम्हारा आलिंगन – भावनाओं,
दबाने अपने पाषण-ह्रदय का प्रकम्पन |

मैंने पिया है तुम्हारा कसैलापन – स्मृतियों,
न जाने क्यूँ, व्यर्थ ही – नीलकंठ बन |

खोखले शब्द – कटु अर्थ

मुझे मालूम है की शब्द खोखले होते जा रहे हैं,
बिल्कुल बेजान!
किंतु फिर भी है मुझे शायद
किसी मौलिक अर्थ की खोज,
इन मृतप्राय शब्दों में!

अर्थ जो शायद सत्य है-

मैं जानता हूँ कि,
जिस सत्य की, जिस अर्थ की,
मुझे खोज है,
वह नहीं मिलेगा,
इन मुर्दा, खोखले, बीमार शब्दों में,
क्योंकि वह अर्थ छिपा है
स्वयं मुझमें,
फैला है, किसी अथाह, नीले सागर सा,
मेरे संपूर्ण व्यक्तित्व पर !

फिर क्या वजह है कि,
मुझे लेना पड़ता है,
आलंबन, इन जर्जर शब्दों का,
जो बिल्कुल शक्तिहीन हैं,
असमर्थ ढोने बोझ,
उन भारी-भरकम अर्थों का !

शायद मेरा व्यक्तित्व ही असमर्थ है,
हाँ, उस अर्थ का सीधा सामना कर पाने का,
साहस मुझमें नहीं हैं !

अर्थ, जो मैं जानता हूँ,
फिर भी न जाने क्यूँ कोसता हूँ,
शब्दों की असमर्थता को,
जबकि मुझे मालूम है कि,
काग़ज़ पर उतर कर,
सत्य कुछ मृदु नहीं हो जाएगा!

फिर, शब्दों के सामर्थ्य की भी तो एक सीमा है,

जबकि अर्थ असीम हैं,
दूर तक फैले रात के आसमान सा,
कला, भयानक, कठोर, अकेला,
किंतु, सत्य !

चार पन्ने

इन्हीं चार पन्नों में सहेज रखा है जीवन,
इन्हीं दो बूंदों में छिपा रखी हैं,
न जाने कितनी स्मृतियाँ,
न जाने कितना सूनापन |

कभी देखा है गिरते तापमान में,
वह हिमगिरी हिमाच्छादित,
तो कभी असह्य चिलचिलाहट में,
वह रश्मिरथी मर्यादित,
इन्हीं दो ऋतुओं में समेट रखा है तन मन|

इन्हीं चार पन्नों में सहेज रखा है जीवन|

कभी दिन ढले गुनगुनाता हूँ,
वही गीत अतुकांत,
कभी रात ढले सुलझाता हूँ,
वही ग्रंथि अनादी अनंत,
इन्हीं दो प्रहारों में संजो रखा है हर क्षण |

इन्हीं चार पन्नों में सहेज रखा है जीवन|

टूटा खिलौना 

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें, छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

कोई नया,कोई पुराना,
कोई अपना,कोइ बेगाना,
इक खिलौना|

हर डगर में,हर सफर में,
इन खिलौनों के नगर में,
ढूँढता फिरता मैं पगला,
एक अपना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें, छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

दो कदम तक साथ चलकर,
छोड़ देते साथ मेरा,
तोड़ देते तुम कुचलकर,
एक सपना|

हर हँसी,बेगानी खुशियाँ,
पागलों के कहकहों में,
कौन सुनता किसकी बातें,
कौन सुनता किसका रोना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें, छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

क्या गिनूं अब खोये कितने गीत मैंने,
और कितने छोड़ आया,
इन खिलौनों के नगर में,
चूर सपने!

चाबियों के ज़ोर पर,
चलते खिलौनों की नज़र में,
कुछ नहीं हैं मेरी खुशियाँ,
कुछ नहीं है मेरा रोना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें,छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

क्या गए तुम छोड़ पीछे?
एक केवल याद अपनी,
पर मगर तुम ले गए हो,
एक शायद मेरी नींदें,
एक शायद मेरा हँसना |

खूब ये भी है मशवरा;
भूल जाओ बात बीती,
याद रक्खो कुछ अगर तो,
इन खिलौनों के नगर में,
चाबियों की चाकरी और,
चाबियों का रोज़ भरना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें,छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

आज तक हूँ मैं अकेला,
अजनबी से इस शहर में,
ढूँढता हूँ फ़िर किसी को,
पूछता हूँ हर किसी से,
मैं न जाने कितनी बातें|

पर कोई भी कुछ न कहता|
और बोलो क्या कहेगा?
इस शहर में हर कोई है,
चाबियों के डर से चलता और रुकता,
इक खिलौना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें,छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

वो पुराने गीत अबतक,
पूछते हैं रोज़ मुझसे|
तोड़ खामोशी ये अपनी!
कब तलक पलटोगे पन्ने?
और बोलो क्या करोगे,
रोज़ पढ़कर तुम हमारा?

तुम बताओ,क्या कहूँ मैं?
ये कि अबतक है अधूरा गीत मेरा,
या कि अबतक है अधूरा,
एक पन्ना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें,छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

आज आकर ये खड़े हैं पास देखो!
गिन न पाउँगा समझ लो,
अनगिनत हैं ये खिलौने|

इनकी आँखें क्यों भरी हैं आंसुओं से?
सब भला खामोश क्यों हैं?
ऐ खिलौनों! क्यों हो गुमसुम?
क्यों नहीं चलते,उछालते,चीखते अब?
कब तलक यूँ चुप रहोगे,
यूँ कि जैसे मर गया हो,
कोई अपना|

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें,छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

ठीक है,तो चुप रहो!
कुछ न कहो मेरी बला से,
लो चला मैं!

और ये क्या?
क्यों न उठते हाथ मेरे?
भाग जाना चाहता हूँ,
और ये क्या?
क्यों न चलते पाँव मेरे?
चीख आती है गले तक,
और ये क्या?
क्यों न खुलते होंठ मेरे?

और देखो क्या ये कहते?
अब कोई भी न भरेगा मेरी चाबी,
चल न पाउँगा कभी मैं,
हो गया हूँ आज से टूटा खिलौना!

आज मिल जाए कोई तो,खोल दूँ मैं सब वो गिरहें,छोड़ दूँ मैं सब वो रोना|

विस्फोटक

इतनी आग,
इतना रोष!

कहाँ छिपाऊँ,
कहाँ दबाऊँ,
किसे सुनाऊँ ?

तुम्हारा क्या,
तुम्हें तो दिखता हूँ मैं
अब तक वैसा ही,
शांत,
सहज,
निश्चल,
बर्फ की तरह बेजान
किसी शव सा!

और मैं-
मेरा रोम-रोम धधकता है-
अनवरत!
व्यक्तित्व का कोना-कोना सुर्ख है,
अपनी ही आग से!

विचारों,
स्मृतियों,
भावनाओं
और घटनाओं का लावा,
झुलसा देता है
मेरे उबलते व्यक्तित्व को
जब-तब!

आश्चर्य है?
इतनी आग लिए
घूमता हूँ मैं
वर्षों से,
पर आज तक किसी को
उसकी आँच तक नहीं आयी?
तुम्हें भी नहीं?
सच?
तुम्हें भी नहीं

पुनर्जन्म

मैं गुज़र रहा था तुम्हारे नीचे से,
और तुमने उडेल दिया मुझ पर,
ढेर सारा अपनत्व,ढेर सारा स्नेह.

और तुम हो गये थे,
फिर से,
यथार्थ के लिए,
निर्जीव,
बेजान.

पर मेरे लिए-
एक अपनत्व का सागर,
जिसकी धमनियों में,
क्षण भर के लिए,
मचल पड़ा था स्नेह,
गीला-गीला,
बहुत आर्द.

क्षण भर के लिए तुमने,
मेरे कंधों पर रख कर हाथ,
दे दीं थीं मुझको अमृत की कुछ बूँदें,
जिन्हे भर दिया था मैने,
अपनी भावनाओं में,
जिसने चला दीं थी, जबरन,
आडी तिरछी स्याह रेखाएँ,
जिन्होने झंकार दिया था,
सोई स्मृति को!

धन्यवाद तुम्हें,
अमृत-घट !

प्रतीक्षा

स्वर तुम्हारे गूँजते हैं, रात इस ठहरी हवा में,
और हर दिन कात लेता गीत मैं कोई स्वरों से इन तुम्हारे.

स्मित तुम्हारा तैर जाता,
साँझ के रक्ताभ रंग में,
भीग जाती रात एकाकी,
महक उठती हैं सुबहें,
मधु-स्मितों से इन तुम्हारे.

शब्द मद्धिम डूब जाते हैं तुम्हारे,
हर प्रहार के पुष्प की हर पंखुड़ी में,
प्रश्न रह जाते अचंभित,
उत्तरों के अर्थ पाकर,
और सस्मित शब्द मद्धिम ये तुम्हारे.

रात्रि की हर रेख तम,
बंधती अलक से इक तुम्हारी,
खींचता हूँ स्याह रेखाएं,
प्रतीक्षा में सुबह की,
झांकती जो केश पाशों से तुम्हारे.

खींचती है धूल में क्यूँ रेख,
बन कर नियति मेरी,
कंपकंपाती ये तुम्हारी उँगलियों की सर्द पोरें,
और कितनी ही निगाहें,
पूछती हैं प्रश्न कितने,
प्रश्न जनती ये तुम्हारी उँगलियों की सर्द पोरें.

ठहर जाती भीड़,
भरते डग निरंतर पग तुम्हारे,
रक्त-कातर हर सुबह,
और बोझिल, हाँफती सी हर दुपहरी,
फुसफुसाती शाम,
झिलमिल उलझनों की आस देती रात ठहरी,
ठहर जाता काल,
भरते डग निरंतर पग तुम्हारे.

रेशमी-अन्याय 

सबके गिरेबान में झाँक कर देखा है,
हाँ! कोई भी दोषी नही है!
लेकिन अन्याय अभी भी जारी है,
किंतु हर कोई अपनी जगह निर्दोष है!
शायद हर किसी ने अपने आप को,
जीवन के न्यायालय में न्यायधीष मान रखा है!

हर किसी को अपराधी के कटघरे में
जाने से हिचकिचाहट है!
हर कोई न्याय की आँखों पर
बँधी पट्टी देखकर संतुष्ट है!

जबकि न्याय साफ-साफ देख रहा है,
अपनी आँखों पर बँधी,
पारदर्शी पट्टी के पीछे से,
अपराधी का वो खाली कटघरा!

और न्यायधीशों से खचाखच भरी अदालत में,
हर किसी की संशय भरी आँखें,
घूरती हुई हर दूसरे को,
हर न्यायधीश की कलम लिखती हुई,
मृत्युदंड बाकी सबके लिए,

अपराधों की लंबी सूची में है,
एक अपराध- न्यायालय की मानहानि भी!

अपराधी का खाली कटघरा,
लज्जित सा, मुँह झुकाए, अर्थहीन, असामयिक!

अचानक हर किसी के चहेरे पर बिखर जाती है,
एक विजयी मुस्कान!
विजय निर्णय की, सार्थकता कलम की!
और अनभिग्यता?
अनभिग्यता उस रेशमी पाश की,
जो उपर से धीरे-धीरे नीचे खिसक रहा है,
हर विजयी न्यायाधीश के दंभी सिर की ओर- चुपचाप!
हर न्यायाधीश प्रसन्न है,
अपनी न्यायशीलता पर!

और रेशमी-अन्याय अभी भी जारी है,
क्योंकि इस बार फंदा खींचने की मेरी बारी है!

अस्तित्व-बोध

तुम्हारा विराट अस्तित्व!
वलयों के दायरों में होते हुए भी,
बिन्दु रेखाओं की सीमाओं से परे!
और मैं?
आकाश-गंगा की दुग्ध-धारा में हिचकोले खाता,
एक अदना सा ऊल्का-पिंड!

तुम, स्थितप्रज्ञ!
वातायनों से आते झोंकों से बुनते,
अपनी ऊर्जस्वितता के ताने-बाने!
जलधि की चंचल लहरों पर तिराते,
अपने ऐतिहासिक अंतर्द्वन्द्व की किश्तियाँ!
जो बहती चली जातीं हैं,
काल क्षितिज की सीमाओं के परे!
रह जाता है-
बस तुम्हारा,
बस तुम्हारे विराट अस्तित्व का, आतंक,
चक्षुओं के राज्य में!

इधर,
मेरी जिजीविषा,
सुरधनु के एक सिरे से,
बहती हुई,
प्रत्यंचा के पथ से,
पहुँच जाती है,
संघर्ष के शर-बिन्दु तक,
मधु-संधान में!

उधर,
मेरे गर्व-रथ के तुरंग,
खींचते ले जाते हैं, कलेवर,
मेरे अस्तित्व-बोध का!
उनकी हर पदचाप के साथ,
बृहत्तर होता जाता है,
तुम्हारा काल-चिंतन!

इधर,
दिग्दाहों से उठते धूम के साथ,
मेरे प्रज्वलित कलेवर से निकलती,
अस्थि-ध्वनि,
गूंजती जाती है,
समष्टि के कर्ण-पट पर!

उधर,
तुम्हारी किंकर्तव्यविमूढ़ता के मलयज में,
तिरते हुए बिखर जाते हैं,
चुपचाप,
क्षार-बिन्दु,
मेरे अस्तित्व-बोध के!

यादें

हर साँझ के धुंधलके के साथ,
दायरे कुछ यादों के,
और गहरे हो जाते हैं!
और बरसों से सहेजे ज़ख्म,
रात के सूनेपन में,
कुछ और हरे हो जाते हैं!!

हर बार न जाने क्यूँ,
मन का अन्वेषी,
चुराकर कुछ पल,
पहुँच जाता है,
उस वीरान महल में,
खींचने उन धूल भरे फर्शों पर,
आड़ी तिरछी कुछ लकीरें,
उँगलियों की पोरों से!

और वापस आने पर,
अपराधी भाव से,
अपनी धुल भरी उँगलियों को,
छिपाने की वह असफल कोशिश,
कुछ पूछने पर
वही असमंजसी मुस्कान
जैसे उसके कान फिर बहरे हो जाते हैं!!

हर साँझ के धुंधलके के साथ,
दायरे कुछ यादों के,
और गहरे हो जाते हैं!
और बरसों से सहेजे ज़ख्म,
रात के सूनेपन में,
कुछ और हरे हो जाते हैं!!

क्षरण 

रात्रि की नीरवता में अक्सर,
सिमट जाता है सम्पूर्ण जीवन |

उस एक मास के घट में,
और फिर छलकती है उस घट से,
अनुभूतियाँ अनेक-
आत्मतोष, असंतुलन, उपलब्धि, पराजय, प्रतिरोध, असंतोष-
और भी न जाने कितने ही ऐसे,
समान्तर भाव, अनुलोम शब्द |

किन्तु इन सभी अनुभूतियों का ध्रुवीकरण जन्म देता है,
एक अजीब, विचित्र,
मनोवैज्ञानिक यौगिक को,
जिसकी सतह से मेरी मानसिकता का संपर्क,
संभवतः कारण है,
मेरे व्यक्तित्व-क्षरण का|

अचानक,
रश्मिरथी के अंशु-पुंज का संपर्क!
और वह घट छितर जाता है,
सूक्ष्म बिन्दुओं में,
मिल जाता है,
फिर तरल होकर,
बहते जीवन के साथ!

रह जाती है,
सिर्फ,
पकी-अधपकी,
मिटटी की टीस !

किस गुनाह की सजा ये मिल रही है मुझे

किस गुनाह की सजा ये मिल रही है मुझे,
यही सवाल मुझे रात दिन सताता रहा |

ज़िक्र मेरा वो कभी चाहे करें या ना करें,
मेरा ख्याल उन्हें बार बार आता रहा |

ग़मों के पार भी तो ज़िन्दगी की बस्ती है,
अश्क बहते गए और मैं मुस्कुराता रहा |

सोचा के दिल की बात तुम्हें ख़त में बयां करूँ,
शब भर तेरा ही नाम लिखता मिटाता रहा |

दस्तूर-ए-दुनिया को निभाये जा रहे हैं हम

दस्तूर-ए-दुनिया को निभाए जा रहे हैं हम,
दिल में लगी है आग बुझाए जा रहे हैं हम.

ये क़र्ज़ हैं जिनके वो नहीं लोग अब बाक़ी,
एक फ़र्ज़ समझ के चुकाए जा रहे हैं हम.

उम्मीद के दिये में बिना तेल की बाती,
जलती नहीं फ़िर भी जलाए जा रहे हैं हम.

उनको न गवारा है कहे सच को सच कोई,
छुपता नहीं है जो छुपाए जा रहे हैं हम.

ये ज़ख़्म पुराने हैं मगर अब भी हरे हैं,
है दर्द ये उनका कराहे जा रहे हैं हम.

जिस राह चले हम वो चले राह ना कोई,
नक़्श-ए-कदम तक मिटाए जा रहे हैं हम.

हम भी हों यूँ परेशां और तुम भी पशेमां हो 

हम भी हों यूँ परेशां और तुम भी पशेमां हो,
ऐ ज़िन्दगी हमारा ऐसा ना इम्तिहाँ हो |

माना के ये बोहोत है वो जानते हैं मुझको,
इसके भी आगे शायद कोई और भी जहाँ हो |

हम तुमसे हैं मुख़ातिब कहने दो दिल की बातें,
कल कौन जाने हम तुम किस हाल में कहाँ हों |

सोचा था जब मिलेंगे कह दूंगा दिल की बातें,
वो सामने खड़े हैं हमसे ना कुछ बयां हो |

जब जब भी मिले हम तुम कुछ दिल में उलझनें थीं,
ऐसे भी मिलें इक दिन जब कुछ ना दरमियाँ हो |

तन्हाई से हमारा है वास्ता पुराना,
ऐ काश रहगुज़र में ना साथ कारवां हो |

चेहरों पे कितने चेहरे दम घुट रहा यहाँ पर,
चल आज मुझे ले चल आवारगी जहाँ हो |

इस भीड़ में हूँ खोया मैं कैसे खुद को पाऊं,
कबसे पुकारता हूँ आवाज़ दो कहाँ हो |

जो कल में जी रहे हैं वो आज खो रहे हैं,
किसको पता है कब तक ये वक़्त मेहरबां हो |

ऐसा मुझे मकां दो जिसमें ना हों दीवारें,
नीचे ज़मीं हो ऊपर तारों का आसमां हो |

ग़र नाम है रिश्ते का तो वो नाम का है रिश्ता,
रिश्ता तो असल वो है कोई नाम जिसका ना हो |

अंदाज़-ए-बयाँ उनका मुश्किल है अब समझना,
ना हमको कह रहे हैं दिल में भले ही हाँ हो |

मेरा साया

दिन भर मेरे आस-पास खेलता रहा मेरा साया,
शाम तक मुझसे भी बड़ा हो गया मेरा साया |

मैं समझता था कि मेरा दोस्त है मेरा साया,
फिर जाना कि है ग़ुलाम रौशनी का मेरा साया |

तरस आता है कितना मजबूर है मेरा साया,
पास रह कर भी कितना दूर है मेरा साया |

बचपन में शरीर था मेरे जैसा ही मेरा साया,
मेरे साथ झुक के अब चलता है मेरा साया |

दिन भर न छोड़े है मुझे एक पल मेरा साया,
जाने कहाँ रात को गुम हो जाए है मेरा साया

बड़ी हैं उलझनें उससे बड़ी ये जिंदगानी है

बड़ी हैं उलझनें उससे बड़ी ये जिंदगानी है,
तुम्हारी या हमारी हो, बड़ी लम्बी कहानी है |

सुनाएँ हाल-ए-दिल क्या और भला घुटते हैं तनहा क्यूँ,
वही बेकार किस्से हैं वही आँखों में पानी है |

हैं आज आकर के बैठे पास पूछें हाल वो मेरा,
बड़ी खुश-किस्मती अपनी और उनकी मेहेरबानी है |

जो होना है वही हो तो करे कोई मशक्क़त क्यूँ,
जो चाहे कर दिखा दे नाम उसका ही जवानी है |

यहीं पर हम मिले थे और वहाँ बैठे थे पहली बार,
चलो इक और जगह जो हमें तुमको दिखानी है |

गुलों से वास्ता अपना है लेकिन ग़ुलफ़रोशी का,
बहार आनी है तो आये ये आनी और जानी है |

इसे देखो लगाए फिर रहे सीने से हम अब तक,
मिला है जो हमें ये ग़म उन्हीं की तो निशानी है |

है इन्सां क्या ना वो जानें समझते खुद को हैं वाइज़,
किताबें रट चुकें और याद उनको सब जुबानी हैं |

आपके दिल में चल रहा क्या है

आपके दिल में चल रहा क्या है,
अब भला हम से कुछ छिपा क्या है |

अभी वाकिफ़ नहीं हुज़ूर हम से,
जान जायेंगे ये बला क्या है |

देख लो जी के ज़िन्दगी मेरी,
ग़र नहीं जानते सज़ा क्या है |

माना मुजरिम हूँ मैं तेरा लेकिन,
ये तो बतलाओ के ख़ता क्या है |

इतने नादां नहीं के ना जानें,
दोस्ती क्या है और दगा क्या है |

अब न भाता है ये शहर हमको,
तेरे बिन अब यहाँ रहा क्या है |

पेश-ए-ख़िदमत है जान भी अब तो,
जीते जी ही हमें मिला क्या है |

आयेंगे मेरे पास वो ख़ुद देखना इक दिन

आयेंगे मेरे पास वो ख़ुद देखना इक दिन,
इस आस में ही मैं कहीं मर जाऊं ना इक दिन |

ऐसे मिले हम दफ्फातन थे पहली पहली बार,
ऐसे हि किसी मोड़ पे मिल जाओ ना इक दिन |

किसने की बेवफ़ाई किसका था ये कुसूर,
फुरसत मिले तो ये भी कभी सोचना इक दिन |

खोया हूँ तेरे ख्व़ाब में बरसों से में अब तक,
ख़्वाबों से हकीकत कभी बन जाओ ना इक दिन |

कहते हो समझता हि नहीं दिल की जुबां मैं,
ख़ामोशियों का मेरी सबब पूछना इक दिन |

आदत सी हो गयी है अंधेरों की मुझे अब,
रोशन सी शमा बन के कोई आओ ना इक दिन |

दिल धड़कता है तो क्यूँ ना आरज़ू होगी

दिल धड़कता है तो क्यूँ ना आरज़ू होगी,
कोई बिछड़ा है तो क्यूँ ना जुस्तजू होगी|

यूँ तो मिलते हैं कई हर रोज़ ही लेकिन,
दिल मिलें तो फिर जुदा ही गुफ्तगू होगी|

ज़ुल्म-ओ-सितम सच को मिटा ना पायेंगे,
गुल मसलने से ख़तम ना रंग-ओ-बू होगी|

इस ओर जो है आग़ जब उस ओर लग जाए,
ये कहानी दर-असल उस दिन शुरू होगी|

बेख़ुदी पे मेरी हँसते हो क्यूँ,
एक दिन हालत तुम्हारी हूबहू होगी|

जब भी देखोगे कभी तुम चाँद को,
देखना वो रात कितनी बे-सुकूँ होगी|

ज़िन्दगी क्यूँ हो गयी बे-रंग इतनी,
मांगती शायद ये फिर मेरा लहू होगी|

बेवफाई जो तुमने की तो कोई बात नहीं

बेवफाई जो तुमने की तो कोई बात नहीं,
इसमें नज़रें चुराने की तो कोई बात नहीं |

दिल ही टूटा है अभी मैं तो नहीं टूटा हूँ,
इतना मातम मनाने की तो कोई बात नहीं |

बात ये तेरे मेरे बीच में ही रहने दो,
ग़ैर को ये बताने की तो कोई बात नहीं |

कितनी कोशिश करो दिल की ख़लिश नहीं जाती,
इतना भी मुस्कुराने की तो कोई बात नहीं |

हमने माना कि अभी वक़्त बुरा है अपना,
फिर भी मायूस होने की तो कोई बात नहीं |

दिल से बेबस हूँ दिल ये बस में नहीं है मेरे,
मुझ पे तोहमत लगाने की तो कोई बात नहीं |

तेरी इस बेरुख़ी से हो गयी है यारी अब,
इसमें हैरत जताने की तो कोई बात नहीं |

हमें लेकर के कितनी दूर तक जाएगी ज़िन्दगी 

हमें लेकर के कितनी दूर तक जाएगी ज़िन्दगी,
अभी और रंग कितने हमको दिखलाएगी ज़िन्दगी|

कभी सोचा न था इक दिन मेरा भी हश्र ये होगा,
मगर अब सोचता हूँ कैसे हाथ आयेगी ज़िन्दगी|

बहुत वीरानगी है अब यहाँ पर दिल नहीं लगता,
न जाने फिर कभी क्या गुनगुनायेगी ज़िन्दगी|

ठहरी ये ज़िन्दगी

ठहरे हुए पानी सि थी ठहरी ये ज़िन्दगी,
पत्थर उछाल कर कोई हलचल सी कर गया |

रहता था कोई दिल में मेरे अब तलक मगर,
हैरान हूँ के दिल को तोड़ कर किधर गया |

कहने को तो जिंदा हूँ मगर लग रहा है क्यूँ,
हिस्सा मेरा कल तक जो था वो आज मर गया |

जो मैं समझ रहा था वो ये शख्स नहीं है,
आइना देख कर मैं खुद ही से ही डर गया |

वादों पे अब नहीं रहा है मेरा ऐतबार,
जिसने भी किया जाने क्यूँ वो फिर मुक़र गया |

अब तक था गुलिस्तान ये बेरंग खिजां में,
कल रात आके कौन इसमें रंग भर गया |

अच्छी भली गुज़र रही थी ज़िन्दगी मगर,
ठहरा जो घडी भर को मैं सब कुछ ठहर गया |

दिल के किसी कोने में छिपाया था कोई ख्वाब,
टूटा जो दिल तो ख्वाब वो गिर कर बिखर गया |

किस पे खंजर है चलाना मुझको

किस पे खंजर है चलाना मुझको,
ख़ुद से ख़ुद को है बचाना मुझको |

याद कर कर के जी रहे थे जिसे.
आज उसको है भुलाना मुझको |

जितने रिश्ते हैं उतनी ही रस्में,
क्या सभी को है निभाना मुझको |

कितनी उम्मीद ले के बैठा हूँ,
कोई ठोकर न लगाना मुझको |

उनसे तार्रुफ़ तो करा दो मेरा,
अजनबी कह के मिलाना मुझको |

मुझको लगते सभी हैं दीवाने,
सब क्यूँ कहते हैं दिवाना मुझको |

आज कुछ फिर पुराना याद आया

आज कुछ फिर पुराना याद आया,
एक भूला तराना याद आया |

घर की छत पर वो धूप जाड़े की,
बारिशों में नहाना याद आया |

कितने अच्छे थे दोस्त बचपन के,
उनके घर रोज़ जाना याद आया |

मौज मस्ती वो आवारागर्दी,
घर में फिर डांट खाना याद आया |

गर्मियों की भरी दुपहरी में,
बाग़ से फल चुराना याद आया |

रोज़ लगती थी ताश की बाज़ी,
हार कर मुँह फुलाना याद आया |

दूर जा कर कहीं पे चोरी से,
रोज़ धुंआ उडाना याद आया |

खिडकियों के छुप के पर्दों में,
उसको चुप-चाप तकना याद आया |

घर के पीछे थी रेल की पटरी,
गाड़ी का छुक-छुकाना याद आया |

दादी नानी की डांट वो मीठी,
और फिर मुस्कुराना याद आया |

घोड़े की ढाई घर की चालें वो,
ऊँट का टेढ़े जाना याद आया |

उसके पीछे घर तलक जाना,
और फिर लौट आना याद आया |

इम्तिहान के भी दिन वो क्या दिन थे,
दिल का वो धुक-धुकाना याद आया |

खेल कर घर वो देर से आना,
रोज़ झूठा बहाना याद आया |

घर में आतीं थीं मेरे दो चिड़ियाँ,
उनका वो चह-चहाना याद आया |

वो भी क्या दिन थे खूब बचपन के,
एक गुज़रा ज़माना याद आया |

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