आशीष त्रिपाठी की रचनाएँ

बेटी का हाथ-1

तुम्हारा हाथ पकड़ना
जैसे बेला के फूलों को लेना हाथों में
जैसे दुनिया की सबसे छोटी नदी को महसूसना क़रीब
जैसे छोटी बहर की ग़ज़ल का पास से गुजरना

जैसे सबसे भोले सवालों को बैठना सुलझाने
जैसे बचपन में छूट गई
अपनी सबसे प्यारी गुड़िया से फिर मिलना

जैसे फिर से गाना
अपने छुटपन के अल्लम-गल्लम गीत

जैसे कंचों के खेल की उमर में
लौटना फिर

जैसे आत्मा के सबसे प्यारे टुकड़े को छूना

बेटी का हाथ-2

तुम्हारा हाथ पकड़कर
दुआ करता हूँ उड़ना सीखते पाखियों के लिए
उन्हें घोंसलों में छोड़कर
दाना बीनने गई उनकी माओं के लिए
काम पर गए
या भीख माँगते बच्चों के लिए

दुनिया से विदा लेती वनस्पतियों
और बोलियों के लिए

गिलहरियों के लिए टकोरियों
मिट्ठुओं के लिए मीठे आमों
मछलियों के लिए जल
धरती के लिए बीजों
की दुआ करता हूँ

नदियों के लिए जल की धार
धरती के लिए हरियाली
आसमाँ के लिए सतरंगी इंद्रधनुष
पर्वतों के लिए मेघों के साथ

दुनिया भर की औरतों के लिए
साँस भर अवकाश
और अकुलाई आत्माओं के लिए
सबसे मीठी धुनों की
दुआ करता हूँ

दुआ करता हूँ
और कहता हूँ – आमीन !

बेटी का हाथ-3

तुम्हारा हाथ पकड़कर
इच्छा जागती है
पृथ्वी को गेंद की तरह देखने की

फिर मैं तुम्हारी उँगली पकड़
दिखाना चाहता हूँ सारी दाग़दार हवेलियाँ
जिनमें रची जाती हैं अम्लीय बारिश की तकनीकें

जहाँ एक बच्चे का भविष्य रचने खातिर
लाखों लोरियों की ज़बान कर दी जाती है बंद
एक उड़ान के लिए
काट लिए जाते हैं अनगिनत परिंदों के पर

जहाँ अनगिनत खेल बच्चों के
रूठे रहते हैं बच्चों से
बच्चों की पोथियों में सब कुछ होता है
सिवा उनके बचपन के

जहाँ बच्चों से ज्यादा प्यारी लगती हैं
बच्चों की तस्वीरें
जहाँ बच्चों से ज्यादा अपने हैं
रंग, जात, धर्म, कुल

फिर मैं तुम्हें सुनाना चाहता हूँ
धूल में भरे
ठुमक-ठुमक चलते
चाँद पकड़ने की जिद करते
ईश्वर के बचपने के गीत

मेरी बच्ची
मैं तुम्हारे बचपन की पूरी उम्र
की कामना करते हुए
तुम्हारे सब संगवारियों के बीच
तुम्हें छोड़ आना चाहता हूँ |

रानी का गीत

रथ पर चढ़कर वह रोती रही
महलों में भी रोई
पैरों के नीचे फूलों के रास्ते
खुशबू से भरी हवायें
आदेश की प्रतीक्षा में
सर झुकाये खड़ी बांदियों की कतार
नहीं ला सकी उसके चेहरे पर
सच्ची मुस्कान का एक क्षण
दुनिया का सबसे अच्छा भोज भी रुचा नहीं उसे

बार-बार कहती रही सबसे
मैं बहुत ख़ुश हूँ, बहुत ख़ुश
उसकी ख़ुशी में
काला-सा हो जाता है उसका चेहरा
उसे शायद मालूम नहीं
मोल में बिकना
(एक अवकाश प्राप्त शिक्षक अपने बेटे से)
गाँव में बिकता है मज़दूर चालीस रुपये रोज में
शहर में उसकी कीमत सत्तर रुपये
महानगर में सौ के आस-पास
यंत्री मज़दूरों के दाम
भारत में आठ हज़ार प्रतिमाह से लेकर तीस
हज़ार तक
कस्बे का नाई सिट डाउन हेयर कटिंग सैलून में
दो हज़ार माह
वहीं का हेयर ड्रेसर छह हज़ार तक
भोपाल में दस हज़ार के आसपास आराम से
कम्प्यूटर कर्मी की कीमत रीवा में चार हजार
प्रतिमाह
बंगलौर में रुपये चौबीस हज़ार
न्यूयार्क में आठ से दस लाख
जो मोल से बिके, वही है आज मोल में
जब बिकना ही है उनके हाथों
तो बेहतर से बेहतर बिकना
देखो कोई कह न सके
कि इसमें तो लच्छन ही नहीं बिकने के
और उसकी तमीज नहीं आयेगी यूँ ही
खूब तैयार करो
शोषण-चक्र में सबसे अच्छे दामों बिकने की
जब तय ही है तो
मोल से बिकना और मोल में रहना
कोशिश करना कि
बिक सको न्यूयार्क, लंदन, वाशिंगटन में
कम से कम हैदराबाद, बंगलौर या मुंबई में बिकना
और जब कुढ़न हो अपने मोल से
अपने बाप के बारे में सोचना
जो बिका नहीं जीवन भर
पर अंत में जीवन के
तुमसे कहता रहा- ‘मोल से बिकना’

कविता में ईश्वर 

एक कवि
रचता है ईश्वर
दूसरा उसे अपना सखा बना लेता है
तीसरा उसमें खोजता है मानुष-सत्य
एक चौथा भी है
जो उसके प्रस्थान की घोषणा करता है

आप जानते होंगे उस पाँचवे को
जिसकी कविता में ईश्वर की कोई जगह नहीं ।

पिता की इच्छाएँ

पिता जीते हैं इच्छाओं में

पिता की इच्छाएँ
उन चिरैयों का झुंड
जो आता है आँगन में रोज़
पिता के बिखराए दाने चुगने

वे हो जाना चाहते हैं हमारे लिए
ठंडी में गर्म स्वेटर
और गर्मी में सर की अँगौछी

हमारी भूख में
बटुओं में पकते अन्न की तरह
गमकना चाहते हैं पिता
हमारी थकान में छुट्टी की घंटी की तरह बजना चाहते हैं वे

पिता घर को बना देना चाहते हैं
सुनार की भट्ठी
वे हमें खरा सोना देखना चाहते हैं

लगता है कभी-कभी
इच्छाएँ नहीं होंगी
तो क्या होगा पिता का

गंगा-जमुना की आख़िरी बूँद तक
पिता देना चाहते हैं चिरैयों को अन्न
पिता, बने रहना चाहते हैं पिता ।

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