आशुतोष दुबे की रचनाएँ

देखने वालों के दो हिस्से हो जाते हैं 

यह नदी दोनों तरफ़ बह रही है
तुम जिस तरफ़ देखते रहोगे
बह जाओगे उसी तरफ़

देखते रहना ही बह जाना है
अक्सर देखने वालों के दो हिस्से हो जाते हैं
एक साथ अलग-अलग दिशाओं में बहते हुए
उनका आधा हमेशा अपने दूसरे आधे की तलाश में होता है
दो अधूरेपन विपरीत दिशाओं में बहते हुए
एक-दूसरे को खोजते रहते हैं
समुद्र इस नदी का इन्तज़ार करता रह जाता है

सिर्फ मौन की लिपि है यह

इबारत पूरी हो जाने के बाद भी
शेष है पँक्ति
उसमें अब अक्षर नहीं होंगे
कुछ बिन्दु होंगे…..
डगमगाते- लड़खड़ाते
वे पूर्ण विराम की खोज में हैं
हर बिन्दु का अपना अर्थ
अपनी प्रतीक्षा, अपनी पुकार
अक्षरों की इबारत के बाद और उसके बावजूद
सिर्फ मौन की लिपि है यह
ओझल हो जाएगी
जादुई स्लेट पर
देखते – देखते.

स्पर्श

मेरे आसपास का संसार
आविष्ट है
एक छुअन की स्मृति से

आकाश में से थोड़ा
आकाश लेता हूँ
पृथ्वी में से लेता हूँ
थोड़ी सी पृथ्वी

एक आवाज़ की
ओस भीगी उंगलियों से
छुआ गया हूँ

एक दृष्टि की कहन में
जैसे घोर वन में
घिरा हुआ
रास्ता ढूँढता हूँ

असमाप्त स्पन्दनों की
लगतार लय में
बह निकलने के पहले
सितार के तारों में
उत्सुक प्रतीक्षा का तनाव है

थोड़े से आकाश में उड़ता हूँ
थोड़ी सी पृथ्वी पर रहता हूँ

उसकी देह में रखे हैं मेरे पंख
मेरी देह उसके स्पर्श का घर है.

मौत के बाद

फिर सूरज निकलता है
हम फिर कौर तोड़ते हैं
काम पर निकलते हैं
धीरे-धीरे हँसते-मुस्कुराते हैं
बहाल होते जाते हैं
एक पल आसमान की ओर देखते हैं
सोचते हैं अब वह कहीं नहीं है
और फिर ये कि अब वह कहाँ होगा ?

यक़ीन और शक में डूबते- उतराते
हम उस कमरे की ओर धीरे-धीरे जाना बन्द कर देते हैं
जो हमारे मन में है
और जहाँ रहने वाला वहाँ अब नहीं रहता
पर ताला अभी भी उसी का लगा है.

शिकायतें 

वे बारूद की लकीर की तरह सुलगती रहती हैं भीतर ही भीतर
हमें दुनिया से दुनिया को हमसे बेशुमार शिकायतें हैं

एक बमुश्किल छुपाई गई नाराज़गी हमें जीवित रखती है
वह मुस्कुराहट में ओट लेती है और आँख की कोर में झलकती है पल भर

वे आवाज़ के पारभासी पर्दे में खड़ी रहती हैं एक आहत अभिमान के साथ
वे महसूस होती हैं और कही नहीं जातीं

ईश्वर जिसे हमारे भय और आकांक्षाओं ने बनाया था
शिकायतों से बेज़ार शरण खोजता है हमारी क्षमा में

हममें से कुछ उन्हीं के ईंधन से चलते हैं उम्र भर
हममें से कुछ उन्हीं के बने होते हैं

मां-बाप से शिकायतें हमेशा रहीं
दोस्तों से शायद सबसे अधिक
भाई-बहनों से भी कुछ-न-कुछ रहा शिकवा
शिक्षकों और अफसरों से तो रहनी ही थीं शिकायतें
उन्हीं की धुन्ध में विलीन हुए प्रेमी-प्रेमिकाएं
बीवी और शौहर में तो रिश्ता ही शिकायतों का था

सबसे ज़्यादा शिकायतें तो अपने-आप से थीं
क्योंकि उन्हें अपने आप से कहना भी इतना मुश्किल था कि
कहते ही बचाव के लचर तर्क न जाने कहाँ से इकट्ठा होने लगते
देखते देखते हम दो फाड़ हो जाते
और अपने दोनों हिस्सों से बनी रहती हमारी शिकायतें बदस्तूर.

अन्धे का सपना

मैं एक अन्धे का सपना हूँ
एक रंग का दु:स्वप्न
एक रोशनी मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते-देते थक जाती है
जो आकार मेरे भीतर भटकते हैं वे आवाज़ों के हैं
जो तस्वीरें बनतीं-बिगड़ती हैं वे स्पर्शों की हैं

मेरी स्मृतियाँ सूखे कुएँ से आतीं प्रतिध्वनियाँ हैं
वे खंडहरों में लिखे हुए नाम हैं जिनका किसी और के लिए कोई अर्थ नहीं है

मेरे भीतर जो नदी बहती है वह एक आवाज़ की नदी है
और मेरी हथेलियों में जो गीलापन उसे छूने से लगता है
वही पानी की परिभाषा है

मेरी ज़मीन पर एक छड़ी के टकराने की ध्वनि है
जो किसी जंगल में मुझे भटकने नहीं देती.

धूल 

धूल अजेय है.

बुहार के ख़िलाफ़ वह खिलखिलाते हुए उठती है और जब उसे हटाने का इत्मीनान होने लगता है तब वह धीरे-धीरे फिर वहीं आ जाती है. वह चीज़ों पर, समय पर, सम्बन्धों पर, ज़िन्दा लोगों और चमकदार नामों पर जमती रहती है. उसमें अपार धीरज है. वह प्रत्येक कण, प्रत्येक परत की प्रतीक्षा करती है जिससे वह चीज़ों को ढँक सके. वह शताब्दियों से धीरे-धीरे छनती रहती है और शताब्दियों पर छाती रहती है.

वह कहीं नहीं जाती और हमेशा जाती हुई दिखाई देती है.

धूल उड़ाते हुए जो शहसवार गुज़रते हैं वे उसी धूल में सराबोर नज़र आते हैं.

धूल और स्त्रियों की आज तक नहीं बनी. जब एक स्त्री आँगन में धूल बुहार रही होती है तो धूल उसकी छत पर जाकर खेलने लगती है. आईने पर जमी धूल हटती है तो अपने चेहरे की रेखाओं में जमी धूल दिखाई देती है. वह तब भी रहती है जब दिखाई नहीं देती. कहीं से धूप की एक लकीर आती है और उसके तैरते हुए कण सहसा दिखाई देने लगते हैं.

एक दिन आदमी चला जाता है, उसके पीछे धूल रह जाती है.

जाना 

जाना ही हो,
तो इस तरह जाना
कि विदा लेना बाक़ी रहे
न ली गई विदा में इस तरह ज़रा सा
हमेशा के लिए रह जाना !

अपनी आवाज़ में

शुरू के बिल्कुल शुरू में
एक शुरू अन्त का भी था
और अन्त का काम तमाम करने वाला
एक बिल्कुल अन्तिम भी था ही

होना लगातार शुरू हो रहा था
और ख़त्म होना भी
पैदा होना और मरना
एक ही बार में
कई-कई बार था

लोग एक-दूसरे के पास आते
और दूर जाते थे
रिश्तों की धुरी बदलती रहती थी
पुराने किनारों के बीच
एक नई नदी बहती थी

एक आदमी जहाँ से बोलता था
उसकी बात पूरी होते-न-होते
धरती वहाँ से कुछ घूम जाती थी
और उसका पता बदल जाता था

पेड़ ख़ुद को ख़ाली कर देने के बाद की उदासी
और फिर से हरियाने की पुलक के बीच
भीतर ही भीतर
कई-कई जंगल घूम आते थे

एक देह थी
जो एक दिन गिर जाती थी
और एक मन था
जो एक और मन होकर थकता न था
चौतरफ़ा शोर के बीच
अपनी आवाज़ में कहने वाला
समझा भले न जाता हो,
सुन लिया जाता था

अपनी छोटी-सी सुई से
सिले गए रात-दिन
कोई अपने हाथों उधेड़कर
घूरे पर फेंक जाता था

घर को बनाने वाला
घर में लौट नहीं पाता था ।

सूत्रधार 

अन्त में सभी को मुक्ति मिली
सिर्फ़ उसी को नहीं
जिसे सुनानी थी कथा
कथा से बाहर आकर

अपने ही पैरों के निशान मिटाते हुए
उसे जाना होगा उन तमाम जगहों पर
जहाँ वह पहले कभी गया नहीं था
देखना और सुनना होगा वह सब
जो अब तक उसके सामने प्रगट नहीं था
और इसलिए विकट भी नहीं

इस मलबे से ऊपर उठकर
उसे नए सिरे से रचना होगा सबकुछ
उन शब्दों में जिन्हें वह पहचानेगा पहली बार
जैसे अंधे की लाठी रास्ते से टकराकर
उसे देखती है

और बढ़ते रहना होगा आगे
कथा के घावों से समय की पट्टियाँ हटाने

अन्त में सभी को मुक्ति मिलेगी
सिर्फ़ उसी को नहीं ।

आदमी की तरह

डूबने से बचने की कोशिश में
हाथ-पैर मारते-मारते
वह सीख गया तैरना

और जब सीख गया
तो तैरते-तैरते
ऐसे तैरने लगा
कि अचम्भा होने लगा
कि वह आदमी है या मछली

यहाँ तक कि
ख़ुद उसे भी लगने लगा
कि पानी में जाते ही
उसमें समा जाती है
असंख्य मछलियों की
व्यग्रता और चपलता
लेकिन मछलियाँ आदमी नहीं होतीं
और पानी के स्वभाव के बारे में
वे मछलियों की तरह जानती हैं

इस बात का पता उसे तब चला
जब वह मछलियों की तरह तैरते हुए
वहाँ जा पहुँचा
जहाँ जाना नहीं था

मछलियाँ देखती रहीं उसे
आदमी की तरह डूबते हुए ।

आदत

वह धूल की तरह है
जिद्दी और अजेय

कई बार हम उसका मुक़ाबला करना चाहते हैं
मगर एक पस्त कोशिश
और फिर उसकी अनदेखी
और उसके बाद
घुटने टेकते हुए
अपनी पराजय का बेआवाज़ इकरारनामा
यही आदत का मानचित्र है

दिलचस्प हैं आदत के खेल
मसलन, हालाँकि मरना जन्म लेते ही शुरू हो गया था
पर मारने की आदत नहीं पड़ती
जीने की पड़ जाती है
और जीवन कैसा भी हो
मरना मुश्किल होता जाता है

साथ की आदत हो जाती है
जैसे उम्मीद की
और इन्तज़ार की भी

लेकिन कभी-कभी
उससे अपने-आप में
अचानक मुलाकात होती है
हम उसे स्तब्ध से पहचानते हैं
कि वह इतने दिनों से
रही आई है हममें
और हम पहली बार जान रहे हैं
कि वह हमारी ही आदत है ।

अश्वमेध

उसकी धौंकनी से दम फूलता है इच्छाओं को

स्वप्न उसकी टापों में लगातार बजते हैं
वह एक कौंध की तरह गुज़रता है
पण्य-वीथियों में श्रेष्ठि उसे मुँह बाए देखते हैं

हर गुज़रते लक्ष्य के साथ
सुनहरी होती जाती है उसकी अयाल
वह अधिक रम्य होता जाता है
और अधिक काम्य

संभव नहीं रहता उस
सदेह चुनौती की ताब में ला पाना
पुरवासियों की श्वासलय उखड़ने लगती है
जैसे गिरती हो गरज के साथ बिजली
और ठठरी हो जाता है सब्ज पेड़
ऐसे कूदता है वह
मल्टी नेशनल की आठवीं मंज़िल से
सात समंदर पार धुर देहात में
और घास के बजाए चबाने लगता है नीम

देखते-देखते स्वाद बदलने लगते हैं अर्थ
ताज्जुब के लिए बहुत देर हो चुकती है
बात की बात में ढह जाते हैं दुर्जय किले
गर्दन का खम किसी का साबुत नहीं बचता

पीछे-पीछे आते हैं प्रधान ऋत्विज
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सीढ़ियाँ उतरकर
राजपुरुष, सेनानायक और वित्तमंत्री के दूत
न्यौतते हैं पुरवासियों को यज्ञभूमि में
पुण्य और प्रसाद पाने के लिए

पता नहीं कब, कौन थामेगा
इस साक्षात गति की वल्गाएँ
बाँधा जाएगा किस यूप से
किन तलवारों से छुआ जाएगा
कौन लेगा आहुति की धूम्रगंध विधिपूर्वक

अभी तो यह नाप रहा है समूची पृथ्वी
चमक रही हैं इसकी आँखें
जिधर से भी गुज़रता है
वनस्पतियाँ झुलस जाती हैं
गाढ़ा हो जाता है लालसा का रंग
चारण विजयगीत गाते हैं

कुछ न कुछ बदल ही जाता है
सबके भीतर

एक दिन आप

एक दिन आप ऐसा करते हैं
चश्मा पहन लेते हैं
और आँखों को रख देते हैं
चश्मे के घर में

जूतों को पहनने के बाद
ख़याल आता है
कि अरे,
पैरों को तो भूल आए रास्ते में
एक छींक होते-होते रह जाती है
राहत मिलते-मिलते ठिठक जाती है
नाक के बारे में याद आता है
कि वह तो रह गई
घर पर टँगी पतलून की
जेब के रूमाल में

कुछ कहना चाहते हैं
किसी के कान में निहायत गोपनीय
और आवाज़ का ढूँढे पता नहीं चलता
और ग़ौर से देखते हैं
फ़ोन के रिसीवर में

आप मौजूद हैं किसी महफ़िल में
हाथ मिलाते, गपियाते, हँसते-मुसकुराते
अचानक आपको आता है ख़याल
बाथरूम में जिसे पीछे छोड़ आए आप
उसकी शक्ल कितनी मिलती थी आपसे।

नाटक के बाहर 

शाकुंतल के पन्नों से निकलती है शकुंतला
मृच्छकटिकम से वसंतसेना
दोनों नदी के तट पर
पेड़ की छाँह में बैठकर
देर तक करती रहती हैं
कालिदास और शूद्रक की बातें

जाल डालकर वह मछेरी भी वहीं बैठा होता है
लगभग जान ही ले डाली थी जिसकी
राजा की अँगूठी ने
और बाद में बमुश्किल छूट पाया था जो
राजसेवकों से पान-फूल का शिष्टाचार
निभाने के बाद
दोनों बतियाती हैं देर तक पुरानी सखियों की तरह
छेड़ती हैं यहाँ-वहाँ के किस्से
शकुंतला बताती है कि किस तरह
चौथे अंक के चौथे श्लोक ने
सोने नहीं दिया था कालिदास को चार रातों तक

वसंतसेना याद करती है कि कैसे सुनते रहे
थे शूद्रक
मिट्टी की गाड़ी की ध्वनि
नाटक के समाप्त हो जाने के बाद भी
इसके बाद शकुंतला कहती है
बड़ी देर हो गई, चलती हूँ अब
सातवें अंक के मरीचाश्रम से आई थी
पर भारत को वहीं छोड़
लौटना होगा मुझे
प्रथम अंक के कण्व आश्रम में
जहाँ गौतमी मेरी प्रतीक्षा में होंगी
ऋषि गए होंगे सोमतीर्थ
और तपोवन में चले आ रहे होंगे राजपुरुष

उधर वसंतसेना को खोजते आ जाता है शकार
कहते हुए, तुम कहाँ थी अब तक
मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा
यहाँ तक कि चारुदत्त के घर भी गया
उसी ने बताया कि तुम यहीं कहीं होगी
तब लौट गई शकुंतला आश्रम में
और चली गई वसंतसेना शकार के साथ

वह बूढ़ा मछेरा मगर लौटा नहीं नाटक में
तजुर्बे से सीख चुका था वह
अँगूठी यदि निकले मछली के पेट से तो भी
दूर रहना चाहिए राजा के दरबार से!

पाठक की निगाह

कभी आप लिखते हैं कोई ख़त
कभी निजी डायरी
कभी महीने के खर्च का हिसाब
कभी-कभी कविताएँ भी

कभी आपको लिखना पड़ता है
स्पष्टीकरण
कभी आप बनाते हैं
किसी क्षमा-पत्र का मसौदा
फिर अचानक एक दिन पढ़ने पर
अपनी लिखी चिट्ठी
किसी भूल की तरह लगती है
खर्च का हिसाब भयभीत कर देता है
कविताएँ घोर असंतोष से भर देती हैं
निजी प्रसंगों पर निजी टिप्पणियाँ
व्याकुल कर देती हैं भीतर ही भीतर
स्पष्टीकरण के कच्चे मसौदे
भर देते हैं अपराध-बोध और ग्लानि भाव से

फिर आप उधेड़ने लगते हैं
अपने बुने हुए को
और लच्छियों को उलझने से बचाना
एक मुश्किल काम होता है

देखा आपने,
चीज़ें किस तरह बदलती हैं
पाठक की निगाह से देखने पर।

सुनिए तो 

बहुत-सी चीज़ों के पास है
बहुत कुछ कहने के लिए

एक फूल को कभी सुनिए
सुनिए खिलने के क्षण की वह निःशब्द ध्वनि
बड़े और छोटे होते दिनों के बीच
उसके होने और होते-होते रह जाने को सुनिए

कभी बात कीजिए एक पके हुए फल से
वब बताएगा आपको कि कहाँ तक चले गए हैं
रक के स्रोत पृथ्वी के नीचे
उसी से पता चलेगा संबंध
पकने की रफ़्तार से स्वाद का
और यह उतावलेपन के विरुद्ध
एक प्रमाणिक टिप्पणी होगी

कभी फ़ुरसत से एक तरफ़ रखकर काग़ज़ को
मुख़ातिब होइए कलम से
जानिए तफ़सील से कितनी बार आए
ठिठकने के क्षण
कितने शब्द जन्मे और कितने वफ़ात पा गए
उसा के ज़रिए
कितनी-कितनी चीज़ें
बस आते-आते ओझल हो गईं
कहाँ ख़याल भागते रहे उससे आगे
कहाँ-कहाँ जब्त करती रही थकान
और जम्हाइयाँ

कभी हाथ रखिए कुर्ते के कंधे पर
वह बता देगा साफ़गोई से
कहाँ आप सबसे बेहतर महसूस करते हैं
और कहाँ जाने भर के ख़याल से
भीग जाते हैं पसीने से
और इस चाय के दाग़ का पूरा किस्सा
उसके पास होगा और होगा
न जाने कितने अंतरंग क्षणों का वृत्तांत
बहुत-सी चीज़ों के पास है
बहुत कुछ कहने के लिए
आप सुनिए तो सही

प्रेक्षक 

जैसा वह था
नहीं रहा
बत्तियाँ जल जाने के बाद
वह, जो सिर झुकाए उठ रहा है
बाहर निकलने के लिए
कहीं का कहीं निकल गया है
जल में गिरा है कंकर
बन रहे हैं वर्तुल
अन्त में क्या थिरेगा
अन्त में क्या रहेगा
घर जो पहुँचेगा
कौन होगा ?

वह जो बोलेगा
उसमें किसकी आवाज़ होगी ?

वह, जो किसी और की कथा
देख आया है अंत तक
अपनी कथा अधबीच से
बदल सकेगा ?

चाहे भी,तो
सिर्फ प्रेक्षक रह सकेगा ?

किसी दिन

बहुत पुरानी चाबियों का एक गुच्छा है
जो इस जंग लगे ताले पर आजमाया जाएगा
जो मैं हूँ
मुझे बहुत वक़्त से बंद पड़ी दराज़ की तरह खोला जाएगा
वह ढूँढ़ने के लिए जो मुझमें कभी था ही नहीं

जो मिलेगा
वह ढूँढ़ने वालों के लिए बेकार होगा

जो चाबी मुझे खोलेगी
वह मेरे बारे में नहीं, अपने बारे में ज़्यादा बताएगी

मैं एक बड़ी निराशा पर जड़ा एक जंग लगा ताला हूँ
मुझे एक बाँझ उम्मीद से खोला जाएगा
झुँझलाहट में इस दराज़ को तितर-बितर कर दिया जाएगा
शायद उलट भी दिया जाए फ़र्श पर
कुछ भी करना,
झाँकना, टटोलना, झुँझलाना,
फिर बन्द कर देना
मैं वहाँ धड़कता रहूँगा इन्तज़ार के अन्धेरे में

मुझे एक धीमी-सी आवाज़ खोलेगी किसी दिन

सेंध

मन में सेंध लगाने में
जान से ज़्यादा का ख़तरा है

पढ़ने के बाद
बन्द करके नहीं रखी जा सकती
किसी और की डायरी
हमेशा फड़फड़ाते रहेंगे
अन्धेरे में कुछ सफ़े

डसेंगे अक्षर वे
साँपों की तरह लहराते-चमकते हुए

प्यास से सूखेगा कण्ठ
पसीना छलछला आएगा माथे पर
रह जाएगा जीवन
पँक्तियों के पहाड़ के उस तरफ़
और लौटना होगा असम्भव

आख़िरी वक़्त होगा यह
जो बहुत लम्बा चलेगा
आखिरी साँस तक

यह वह नहीं
उसकी लिखत है

माफ़ नहीं करेगी यह

स्थगन

(उस अभिनेत्री के लिए, जो अब ख़ुद को भी दिखाई नहीं देना चाहती)

अदृश्य होने के लिए मृत्यु के अलावा कोई मददगार नहीं होता
और अगर वहाँ से इमदाद न मिले तो
घर को ही ताबूत में बदला जा सकता है
ख़ुद को एक धड़कते हुए शव में

यह न लौटना है, न आगे बढ़ना है
यह एक स्थगन में रहना है
कोई घूमता है प्रेत की तरह
बीत चुके के रेगिस्तान
और मौजूद के बियाबान में
जबकि आगत के लिए सारे दरवाज़े बन्द कर दिए गए हैं
और उनसे सिर टकराते हुए वह
ज़ख़्मी और मायूस हो चला है
दिमाग़ की खिड़कियों के शीशों पर
गुज़रे हुए कल की बारिशों का शोर है
उसमें खड़े रहना है
ज़रा भी भीगे बग़ैर

बाहर का संसार दरवाज़े पर कान लगाए है
कि कोई हलचल, कोई आहट सुनाई दे
भीतर यह जानलेवा कोशिश
कि किसी सेंध से कुछ भी न आ सके–
न तालियों की गड़गड़ाहट,
न किसी की पुकार
न कोई याद
भीतर से बन्द दरवाज़ों से एक प्रार्थना टकराती रहती है
संसार की याददाश्त चली जाए

वह दरवाज़े खोल दे
और कोई उसे पहचान न पाए

कितने एकान्त ! 

हमारी बेख़बरी में
हमारे एकान्त इतने क़रीब आ गए
कि हम ज़रा-ज़रा एक-दूसरे के एकान्त में भी आने-जाने लगे
इस तरह हमने अपने सुनसान को डरावना हो जाने से रोका
निपटता की बेचारगी से ख़ुद को बचाया
और नितान्त के भव्य स्थापत्य को दूर से सलाम किया
दोनों के एकान्त की अलबत्ता हिफाज़त की दोनों ने
उनके बीच की दीवार घुलती रही धीरे-धीरे
फिर एक साझा घर हो गया एकान्त का
उसकी खिड़कियों से दुनिया का एकान्त दिखता था
हम टहलते हुए उस तरफ भी निकल जाते हैं अक्सर
ताज्जुब से देखते हुए
कितने एकान्तों की दीवारें विसर्जित होती हैं लगातार
तब कहीं संसार का एकान्त होता है

रंगों की आहट 

जब रंगों की आहट सुनाई दे,
खोलना होता है दरवाज़ा

जगह देनी पड़ती है
उन्हें खिलने के लिए अपने भीतर

वरना वे गुज़र जाते हैं चुपचाप
बिना कोई दस्तक दिए
और फिर हम उन्हें ढूँढते रहते हैं

कस्तूरी-रंग

जिस गन्ध में यह फूल खिला है
वह एक रंग की है

अपने कस्तूरी-रंग में डूबा हुआ
यह फूल उगता है मन की डाल पर

आप उसे दूर से पहचान लेते हैं
जो भीतर से महक रहा है इस रंग की गन्ध से

रंगों का समवाय

रंगों का कोई एकांत नहीं
उनका एक समवाय है

वे अपनी सामूहिकता में खुश हैं
उन्हें अकेला न करें

अकेलेपन में वे दम तोड़ देते हैं
और आप अकेले रह जाते है

एक रंगहीन संसार में

रंगों का अभिज्ञान 

रंगों के संगीत पर सिर हिलाते हुए
आपने उन्हें सहसा मौन होते हुए देखा है?

वे कभी-कभी सहम कर चुप भी हो जाते हैं
और सफेद पड़ जाते हैं डर से

या स्याह हो जाते हैं
आप जब उनका उत्सव मना रहे होते हैं

वे सुबक रहे होते हैं धीरे-धीरे
काँप रहे होते हैं आशंकाओं मे

वे अपने विसर्जन को जान रहे होते हैं

जंगल में आग

जंगल में आग लगने पर
पेड़ जंगल छोड़ कर भाग नहीं जाते
जब आग उनका माथा चूमती है
उनकी जड़ें मिट्टी नहीं छोड़ देतीं

जब पंछियों के कातर – कलरव से
विदीर्ण हो रहा होता है आसमान
चटकती हैं डालियाँ
लपटों के महोत्सव में
धधकता है वनस्पतियों का जौहर
उसी समय घोंसले में छूट गए अंडे में
जन्म और मृत्यु से ठीक पहले की जुम्बिश होती है
धुँए, लपट, आँच
चटकती डालियों का हाहाकार
और ऊपर आसमान में पंछियों की चीख-पुकार सच है
और उतनी ही सच है
संसार के द्वार पर एक नन्हीं-सी चोंच की दस्तक.

किनारे

किनारे हमेशा इंतज़ार करते हैं

वे नदियों के दुख से टूटते हैं
और उनके विलाप में बह जाते हैं

जब सूखने लगती है नदी
किनारे भी ओझल हो जाते हैं धीरे-धीरे

वे एक लुप्त नदी के अदृश्य किनारे होते हैं
जो चुपचाप अगली बारिश की प्रतीक्षा करते हैं

लगातार बहते हुए वे अपने थमने का इंतज़ार करते हैं
जिससे वे हो सकें

वे अपने होने का इंतज़ार करते हैं

धावक 

तेज़ दौड़ता हुआ धावक
कुछ देख नहीं रहा था
सिर्फ दौड़ रहा था
उसके पीछे कई धावक थे
उससे आगे निकलने की जी-तोड़ कोशिश में
अचानक वह धीमा हो गया
फिर दौड़ना छोड़कर चलने लगा
फिर रुक गया
फिर निकल गया धीरे से बाहर
बैठ गया सीढियों पर
जो कभी उससे पीछे थे
बन्दूक की गोली की तरह सनसनाते दौड़ते रहे
उसे देखे बगैर
एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की कोशिश में

उसने पहली बार दौड़ को देखा
दौड़ने वालों को देखा
दौड़ देखने वालों को देखा

उसने पहली बार अपने बगैर मैदान को देखा
और पहचाना

जानना बचना नहीं है 

राम जानते हैं कि
सोने का हिरण हो नहीं सकता
फिर भी उन्हें उसके पीछे – पीछे
जाना है

किससे कहें कि हिरण झूठा था
पर इच्छा सच्ची थी
थके – हाँफते, पसीने में लथपथ, सूखे गले और धड़कते हृदय से राम
खाली हाथ जब लौटेंगे

क्या जानते होंगे कि अब
प्रियाहीन
होना है

रोना है

जागना है
एक अधूरी इच्छा के प्रेत से
बचते हुए
फिर से
भागना है

पुरानी बात 

हर बार का गिरना
कुछ फर्क से गिरना होता है

पहली बार शायद वेग की वजह से
गिरकर उठ जाते हैं जल्दी ही
और कोशिश होती है
जहाँ से जितने गिरे थे
उसी के नज़दीक –
उसी के आसपास –
पहुँच जाएँ फिर
उसके बाद का गिरना
उस तेज़ी को क्रमश:
खो देना है
जो पहली बार फिर से उठ खड़े होने में थी
अंत में हम पाते हैं
उठने का हर संकल्प ही भूमिसात हो जाता है
गिरना पुरानी बात हो जाती है
लुढ़कना सहज होता जाता है

अब 

बहुत दिनों से मेरी क्षमा-याचिका मेरे पास लंबित थी
आखिर ऊबकर मैंने उसे खारिज कर दिया.
अब किसी भी सुबह यह धुकपुकी खामोश हो सकती है
कि मैं अपने इंतज़ार में हूँ…

इंतज़ार

स्कूल के बच्चे की तरह
सबसे पिछली बैंच पर बैठा मैं
अपनी बेजारी और ऊब से जूझते हुए
लम्बी घंटी के इंतज़ार में हूँ

उसी घर में 

मेरे आगे-आगे चल रही है
एक चीख़ गुपचुप-सी

अभी-अभी निकल कर आया हूँ
एक आत्मीय घर से
जहाँ पूछी सभी की कुशल-क्षेम
अपनी बताई
चाय पी, हँसा-बतियाया
और अच्छा लगा कि यहाँ आया

मेरे निकलने से पेश्तर
शायद वहीं से निकली है
यह गुपचुप-सी चीख़
मेरे आगे-आगे चलती हुई
मेरा पीछा करते हुए

और अब
मुझसे पहले
मेरे घर के दरवाज़े पर
दस्तक दे रही है ।

खोई हुई चीज़ें

खोई हुई चीज़ें जानती हैं
कि हम उन्हें ढूँढ़ रहे हैं
और यह भी
कि अगर वे बहुत दिनों तक न मिलीं
तो मुमकिन है
वे हमारी याद से खो जाएँ

इसलिए कुछ और ढूँढ़ते हुए
वे अचानक हाथ में आ जाती हैं
हमारे जीवन में फिर से दाख़िल होते हुए

हम उन्हें नए सिरे से देखते हैं
जिनके बग़ैर जीना हमने सीख लिया था

जैसे हम एक खोए हुए वक़्त के हाथो
अचानक पकड़े जाते हैं

और ख़ुद को नए सिरे से देखते हैं

जल्दी से आईने के सामने से हट जाते हैं

जलाशय

तालाब में डूबते हुए
उसने सोचा
उसके साथ उसका दुःख भी डूब जाएगा

वह ग़लत था

उसके डूबते ही
तिर आया उसका दुःख सतह पर

कहा जा सकता है
कि वह जलाशय दरअसल एक दुखाशय था
जहाँ हल्के और भारी
बड़े, छोटे और मझोले दुःख तैरते रहते थे

जो देख पाते थे
वे अपने से बड़े दुखों को देख लेते थे
और लौट जाते थे

जो नही देख पाते थे
वे अपने भी दुःख उसी को सौंप जाते थे

कहने की ज़रूरत नही
कि वह बहुत सदाशय था

डर

पृथ्वी के दो अक्षाँशो पर
अपने-अपने घरों में सोए हुए
दो व्यक्ति
एक जुड़वाँ सपना देखते हैं

यह एक डरावना सपना है

दोनों घबराकर उठ बैठते हैं
दोनों का कण्ठ सूखता है
दोनों पानी पीते हैं
पर शुक्र मनाते हैं
कि जो कुछ भी हुआ
सपने में हुआ

दोनों अगली सुबह अपने
काम पर जाते हैं
सपने को भूल जाते हैं

डर, पृथ्वी के इर्द-गिर्द
एक उपग्रह की तरह
मँडराता है

पुल 

दो दिनों के बीच है
एक थरथराता पुल
रात का

दो रातो के दरमियाँ है
एक धड़धड़ाता पुल
दिन का

हम बहते हैं रात भर
और तब कहीं आ लगते हैं
दिन के पुल पर

चलते रहते हैं दिन भर
और तब कहीं सुस्ताते हैं
रात के पुल पर

वैसे देखें तो
हम भी एक झूलता हुआ पुल ही हैं
दिन और रात जिस पर
दबे पाँव चलते हैं

शोकसभा में एक हँसी

कण्ठ के गुलेल से
वह जो छूटा हुआ एक शब्द है
कँटीले तारो के पार जाता है

मर्मस्थल से निकली
वह जो एक यातना-दीप्त चीख़ है
अनन्त में लिखती है एक मृत्यु-लेख

गाढ़े अन्धेरे में देहों के बीच
वह जो चुप्पी है निथरती हुई
आत्माओं में रिसती है

लगातार गूँजती हुई
वह जो शोकसभा में एक हँसी है दुर्निवार
आदिम सन्देह से भर देती है दिशाओं को

सब एक-दूसरे को देखते हैं
और एक-दूसरे से बचते हैं

और जो नहीं रहा
इस तरह रह जाता है
सबके बीच

जगह

एक संकुल संसार में
जो चला गया
वह अपने पीछे छोड़कर नही गया
कोई ख़ाली जगह

उसी की जगह ख़ाली रही
जो अब तक नही आया

बनी हुई जगहें
ईर्ष्या से देखती हैं

किस तरह
अनुपस्थिति बुनती है एक जगह
जो प्रतीक्षा करती है

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