‘आशुफ़्ता’ चंगेज़ी की रचनाएँ

अजब रंग आँखों में आने लगे 

अजब रंग आँखों में आने लगे
हमें रास्ते फिर बुलाने लगे

इक अफ़वाह गर्दिश में है इन दिनों
के दरिया किनारों को खाने लगे

ये क्या यक-ब-यक हो गया क़िस्सा-गो
हमें आप-बीती सुनाने लगे

शगुन देखें अब के निकलता है क्या
वो फिर ख़्वाब में बड़बड़ाने लगे

हर इक शख़्स रोने लगा फूट के
के ‘अशुफ़्ता’ जी भी ठिकाने लगे.

धूप के रथ पर हफ़्त अफ़लाक

धूप के रथ पर हफ़्त अफ़लाक
चौबारों के सर पर ख़ाक

शहर-ए-मलामत आ पहुँचा
सारे मनाज़िर इबरत-नाक

दरियाओं की नज़र हुए
धीरे धीरे सब तैराक

तेरी नज़र से बच पाएँ
ऐसे कहाँ के हम चालाक

दामन बचना मुश्किल है
रस्ते जुनूँ के आतिश-नाक

और कहाँ तक सब्र करें
करना पड़ेगा सीना चाक

घरोंदे ख़्वाबों के सूरज के साथ रख लेते

घरोंदे ख़्वाबों के सूरज के साथ रख लेते
परों में धूप के इक काली रात रख लेते

हमें ख़बर थी ज़बाँ खोलते ही क्या होगा
कहाँ कहाँ मगर आँखों पे हाथ रख लेते

तमाम जंगों का अंजाम मेरे नाम हुआ
तुम अपने हिस्से में कोई तो मात रख लेते

कहा था तुम से के ये रास्ता भी ठीक नहीं
कभी तो क़ाफ़िले वालों की बात रख लेते

ये क्या किया के सभी कुछ गँवा के बैठ गए
भरम तो बंदा-ए-मौला-सिफ़ात रख लेते

मैं बे-वफ़ा हूँ चलो ये भी मान लेता हूँ
भले बुरे ही सही तजरबात रख लेते

गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे

गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे
तमाम दरिया किसी रोज़ डूब जाएँगे

सफ़र तो पहले भी कितने किये मगर इस बार
ये लग रहा है के तुझ को भी भूल जाएँगे

अलाव ठंडे हैं लोगों ने जागना छोड़ा
कहानी साथ है लेकिन किसे सुनाएँगे

सुना है आगे कहीं सम्तें बाँटी जाती हैं
तुम अपनी राह चुनो साथ चल न पाएँगे

दुआएँ लोरियाँ माओं के पास छोड़ आए
बस एक नींद बची है ख़रीद लाएँगे

ज़रूर तुझ सा भी होगा कोई ज़माने में
कहाँ तलक तेरी यादों से जी लगाएँगे

ख़बर तो दूर अमीन-ए-ख़बर नहीं आए 

ख़बर तो दूर अमीन-ए-ख़बर नहीं आए
बहुत दिनों से वो लश्कर इधर नहीं आए

ये बात याद रखेंगे तलाशने वाले
जो उस सफ़र पे गए लौट कर नहीं आए

तिलिस्म ऊँघती रातों का तोड़ने वाले
वो मुख़बिरान-ए-सहर फिर नज़र नहीं आए

ज़रूर तुझ से भी इक रोज़ ऊब जाएँगे
ख़ुदा करे के तेरी रह-गुज़र नहीं आए

सवाल करती कई आँखें मुंतज़िर हैं यहाँ
जवाब आज भी हम सोच कर नहीं आए

उदास सूनी सी छत और दो बुझी आँखें
कई दिनों से फिर ‘अशुफ़्ता’ घर नहीं आए

परेशाँ हुए थे न हैरान थे

परेशाँ हुए थे न हैरान थे
कई दिन से बारिश के इम्कान थे

ये कैसी कहानी सुनाई गई
सभी सुनने वाले पशेमान थे

इशारे में जो अपना घर फूँक दें
कभी शहर में ऐसे नादान थे

सभी वलवले दिल के दिल में रहे
मुसलसल इधर अहद ओ पैमान थे

लरज़ते थे घर से निकलते हुए
कभी राह में इतने मैदान थे

ज़माना हुआ धूप सेंके हुए
बहुत बंद कमरे के अरमान थे

पता कहीं से तेरा अब के फिर लगा लाए

पता कहीं से तेरा अब के फिर लगा लाए
सुहाने ख़्वाब नया मशग़ला उठा लाए

लगी थी आग तो ये भी तो उस की ज़द में थे
अजीब लोग हैं दामन मगर बचा लाए

चलो तो राह में कितने ही दरिया आते हैं
मगर ये क्या के उन्हें अपने घर बहा लाए

तुझे भुलाने की कोशिश में फिर रहे थे के हम
कुछ और साथ में परछाइयाँ लगा लाए

सुना है चेहरों पे बिख़री पड़ी हैं तहरीरें
उड़ा के कितने वरक़ देखें अब हवा लाए

न इब्तिदा की ख़बर और न इंतिहा मालूम
इधर उधर से सुना और बस उड़ा लाए

सभी को अपना समझता हूँ क्या हुआ है मुझे

सभी को अपना समझता हूँ क्या हुआ है मुझे
बिछड़ के तुझ से अजब रोग लग गया है मुझे

जो मुड़ के देखा तो हो जाएगा बदन पत्थर
कहानियों में सुना था सो भोगना है मुझे

मैं तुझ को भूल न पाया यही ग़नीमत है
यहाँ तो इस का भी इम्कान लग रहा है मुझे

मैं सर्द जंग की आदत न डाल पाऊँगा
कोई महाज़ पे वापस बुला रहा है मुझे

सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ
तेरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे

अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी
कल एक राह-गुज़र का पता लगा है मुझे

तमाम शह्र से नज़रें चुराए फिरता है

तमाम शह्र से नज़रें चुराए फिरता है
वो अपने शानों पे इक घर उठाए फिरता है

हज़ार बार ये सोचा कि लौट जाएँगे
न जाने क्यों हमें दरिया बहाए फिरता है

हुदूद से जो तजावुज़ की बात करता था
वो अपने सीने में पौदे लगाए फिरता है

थे आज तक इसी धोके में सबसे वक़िफ़ हैं
जिसे भी देखो कोई शै छिपाए फिरता है

अब एतमाद कहाँ तक बहाल रक्खेंगे
कोई तो है जो हमें यूँ नचाए फिरता है

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