आसी ग़ाज़ीपुरी की रचनाएँ

आशिक़ी में है महवियत दरकार 

आशिक़ी में है महवियत दरकार।
राहते-वस्ल-ओ-रंजे-फ़ुरक़त क्या?

न गिरे उस निगाह से कोई।
और उफ़्ताद क्या, मुसीबत क्या?

जिनमें चर्चा न कुछ तुम्हारा हो।
ऐसे अहबाब, ऐसी सुहबत क्या?

जाते हो जाओ, हम भी रुख़सत हैं।
हिज्र में ज़िन्दगी की मुद्दत क्या?

ताबे-दीदार जो लाये मुझे वो दिल देना

ताबे-दीदार जो लाये मुझे वो दिल देना।
मुँह क़यामत में दिखा सकने के क़ाबिल देना॥

रश्के-खुरशीद-जहाँ-ताब दिया दिल मुझ को।
कोई दिलबर भी इसी दिल के मुक़ाबिल देना॥

अस्ल फ़ित्ना है, क़यामत में बहारे-फ़रदौस।
जुज़ तेरे कुछ भी न चाहे मुझे वो दिल देना॥

तेरे दीवाने का बेहाल ही रहना अच्छा।
हाल देना हो अगर रहम के क़ाबिल देना॥

हाय-रे-हाय तेरी उक़्दाकुशाई के मज़े।
तू ही खोले जिसे वो उक़्दये-मुश्किल देना॥

चन्द शेर 

तुम नहीं कोई तो सब में नज़र आते क्यों हो?
सब तुम ही तुम हो तो फिर मुँह को छुपाते क्यों हो?

फ़िराके़-यार की ताक़त नहीं, विसाल मुहाल।
कि उसके होते हुए हम हों, यह कहाँ यारा?

तलब तमाम हो मतलूब की अगर हद हो।
लगा हुआ है यहाँ कूच हर मुक़ाम के बाद।

अनलहक़ और मुश्ते-ख़ाके-मन्सूर।
ज़रूर अपनी हक़ीक़त उसने जानी॥

इतना तो जानते हैं कि आशिक़ फ़ना हुआ।
और उससे आगे बढ़के ख़ुदा जाने क्या हुआ॥

यूँ मिलूँ तुमसे मैं कि मैं भी न हूँ।
दूसरा जब हुआ तो ख़िलवत क्या?

इश्क़ कहता है कि आलम से जुदा हो जाओ।
हुस्न कहता है जिधर जाओ नया आलम है?

वहाँ पहुँच के यह कहना सबा! सलाम के बाद।
“कि तेरे नाम की रट है, ख़ुदा के नाम के बाद”॥

यह हालत है तो शायद रहम आ जाय।
कोई उसको दिखा दे दिल हमारा॥

ज़ाहिर में तो कुछ चोट नहीं खाई है ऐसी।
क्यों हाथ उठाया नहीं जाता है जिगर से?

ता-सहर वो भी न छोड़ी तूने ऐ बादे-सबा!
यादगारे-रौनक़े-महफ़िल थी परवाने की ख़ाक॥

वो कहते हैं–“मैं ज़िन्दगानी हूँ तेरी”।
यह सच है तो इसका भरोसा नहीं है॥

कमी न जोशे-जुनूँ में, न पाँव में ताकत।
कोई नहीं जो उठा लाए घर में सहरा को॥

ऐ पीरेमुग़ाँ! ख़ून की बू साग़रे-मय में।
तोड़ा जिसे साक़ी ने, वो पैमानये-दिल था॥

कुछ हमीं समझेंगे या रोज़े-क़यामतवाले।
जिस तरह कटती है उम्मीदे-मुलाक़ात की रात॥

गु़बार होके भी ‘आसी’ फिरोगे आवारा।
जुनूँने-इश्क़ से मुमकिन नहीं है छुटकारा॥

हम-से बेकल-से वादये-फ़रदा?
बात करते हो तुम क़यामत की॥

साथ छोड़ा सफ़रे-मुल्केअदम में सब ने।
लिपटी जाती है मगर हसरते-दीदार हनूज॥

हवा के रुख़ तो ज़रा आके बैठ जा ऐ क़ैस।
नसीबे-सुबह ने छेड़ा है ज़ुल्फ़े-लैला को॥

बस तुम्हारी तरफ़ से जो कुछ हो।
मेरी सई और मेरी हिम्मत क्या॥

न कभी के बादापरस्त हम…

न कभी के बादापरस्त हम, न हमें यह कैफ़े-शराब है।
लबेयार चूमें हैं ख़्वाब में, वही जोशे-मस्तिये-ख़्वाब है॥

दिल मुब्तिला है तिरा ही घर, उसे रहने दे कि ख़राब कर।
कोई मेरी तरह तुझे मगर न कहे, कि ख़ानाख़राब है॥

उन्हें किब्रे-हुस्न की नख़वतें, मुझे फ़ैज़े-इश्क़ की हैरतें।
न कलाम है, न पयाम है, न सवाल है, न जवाब है।।

दिले-अन्दलीब यह शक नहीं, गुलो-लाला के यह वरक़ नहीं।
मेरे इश्क़ का वो रिसाला है, तेरे हुस्न की यह किताब है॥

नहीं होता कि बढ़कर हाथ रख दें

नहीं होता कि बढ़कर हाथ रख दें।
तड़पता देखते हैं, दिल हमारा॥

अगर क़ाबू न था दिल पर, बुरा था।
वहाँ जाना सरे-महफ़िल हमारा॥

यह हालत है तो शायद रहम आ जाय।
कोई उसको दिखा दे दिल हमारा॥

वे तेरे, जीने की किस जी से…

वे तेरे, जीने की किस जी से तमन्ना करते?
मर न जाते जो शबे-हिज्र तो हम क्या करते?

तूने दावाए-ख़ुदाई न किया खूब किया।
ऐ सनम! हम तेरे दीदार को तरसा करते॥

दिले-बीमार से दावा है मसीहाई का।
चश्मे-बीमार को अपने नहीं अच्छा करते॥

भला किस दिल से हम इनकारे-दर्दे-इश्क़ करें।
नहीं कुछ है तो क्यों रह-रहके दिल पर हाथ धरते?

एक रुबाई

दागे़दिल दिलबर नहीं, सिने से फिर लिपटा हूँ क्यों?
मैं दिलेदुश्मन नहीं, फिर यूँ जला जाता हूँ क्यों?
रात इतना कहके फिर आशिक़ तेरा ग़श कर गया।
“जब वही आते नहीं , मैं होश में आता हूँ क्यों?

वहाँ पहुँच के ये कहना 

वहाँ पहुँच के ये कहना सबा सलाम के बाद
के तेरे नाम की रट है ख़ुदा के नाम के बाद

वहाँ भी वादा-ए-दीदार इस तरह टाला
के ख़ास लोग तलब होंगे बार-ए-आम के बाद

गुनाह-गार की सुन लो तो साफ़ साफ़ ये है
के लुत्फ़-ए-रहम-ओ-करम क्या फिर इंतिक़ाम के बाद

तलब तमाम हो मतलूब की अगर हद हो
लगा हुआ है यहाँ कूच हर मक़ाम के बाद

वो ख़त वो चेहरा वो ज़ुल्फ़-ए-सियाह तो देखो
के शाम सुब्ह के बाद आए सुब्ह शाम के बाद

पयाम-बर को रवाना किया तो रश्क आया
न हम-कलाम हो उस से मेरे कलाम के बाद

अभी तो देखते हैं ज़र्फ बादा-ख़्वारों का
सुबू ओ ख़ुम की भी ठहरेगी दौर-ए-जाम के बाद

इलाही ‘आसी’-ए-बेताब किस से छूटा है
के ख़त में रोज़-ए-क़यामत लिखा है नाम के बाद

क़तरा वही के रू-कश-ए-दरिया 

क़तरा वही के रू-कश-ए-दरिया कहें जिसे
यानी वो मैं ही क्यूँ न हूँ तुझ सा कहें जिसे

वो इक निगाह ऐ दिल-ए-मुश्ताक़ उस तरफ़
आशोब-गाह-ए-हश्र-ए-तमन्ना कहें जिसे

बीमार-ए-ग़म की चारा-गरी कुछ ज़रूर है
वो दर्द दिल में दे के मसीहा कहें जिसे

ऐ हुस्न-ए-जलवा-ए-रुख़-ए-जानाँ कभी कभी
तसकीन-ए-चश्म-ए-शौक़-ए-नज़ारा कहें जिसे

इस ज़ोफ़ में तहम्मुल-ए-हर्फ़-ओ-सदा कहाँ
हाँ बात वो कहूँ के न कहना कहें जिसे

ये बख़्शिश अपने बंदा-ए-ना-चीज़ के लिए
थोड़ी सी पूँजी ऐसी के दुनिया कहें जिसे

हम-बज़्म हो रक़ीब तो क्यूँकर न छेड़िए
आहंग-ए-साज़-ए-दर्द के नाला कहें जिसे

पैमाना-ए-निगाह से आख़िर छलक गया
सर जोश-ए-ज़ौक़-ए-वस्ल-ए-तमन्ना कहें जिसे

‘आसी’ जो गुल से गाल किसी के हुए तो क्या
माशूक़ वो के सब से निराला कहें जिसे

कलेजा मुँह को आता है

कलेजा मुँह को आता है शब-ए-फ़ुर्क़त जब आती है
अकेले मुँह लपेटे रोते रोते जान जाती है

लब-ए-नाज़ुक के बोसे लूँ तो मिस्सी मुँह बनाती है
कफ़-ए-पा को अगर चूमूँ तो मेंहदी रंग लाती है

दिखाती है कभी भाला कभी बरछी लगाती है
निगाह-ए-नाज़-ए-जानाँ हम को क्या क्या आज़माती है

वो बिखराने लगे ज़ुल्फ़ों को चेहरे पर तो मैं समझा
घटा में चाँद या महमिल में लैला मुँह छुपाती है

करेगी अपने हाथों आज अपना ख़ून मश्शाता
बहुत रच-रच के तलवों में तेरे मेंहदी लगाती है

न कोई जोड़ उस अय्यार पर अब तक चला अपना
यहाँ दम टूटता है और दम में जान जाती है

तड़पना तिलमिलाना लोटना सर पीटना रोना
शब-ए-फ़ुर्क़त अकेली जान पर सौ आफ़त आती है

पछाड़ें खा रहा हूँ लोटता हूँ दर्द-ए-फ़ुर्क़त से
अजल के पाँव टूटें क्यूँ नहीं इस वक़्त आती है

जो रही और कोई दम…

जो रही और कोई दम यही हालत दिल की।
आज है पहलु-ए-ग़मनाक से रुख़स्त दिल की॥

घर छुटा, शहर छुटा, कूचये-दिलदार छुटा।
कोहो-सहरा में लिये फ़िरती है वहशत दिल की॥

रास्ता छोड़ दिया उसने इधर का ‘आसी’।
क्यों बनी रहगुज़रे-यार में तुरबत दिल की॥

इश्क़ ने फ़रहाद के परदे में…

इश्क़ ने फ़रहाद के परदे में पाया इन्तक़ाम।
एक मुद्दत से हमारा ख़ून दामनगीर था॥

वोह मुसव्वर था कोई या आपका हुस्नेशबाब।
जिसने सूरत देख ली, इक पैकरे-तसवीर था॥

ऐ शबेगोर! वो बेताबि-ए-शब हाय फ़िराक़।
आज अराम से सोना मेरी तक़दीर में था॥

कोई तो पीके निकलेगा…

कोई तो पीके निकलेगा, उडे़गी कुछ तो बू मुँह से।
दरे-पीरेमुग़ाँ पर मैपरस्ती चलके बिस्तर हो॥

किसी के दरपै ‘आसी’ रात रो-रोके यह कहता था–
कि “आखि़र मैं तुम्हारा बन्दा हूँ, तुम बन्दापरवर हो”॥

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तुम्हीं सच-सच बता दो कौन था शिरीं की सूरत में।
कि मुश्तेख़ाक की हसरत में कोई कोहकन क्यों हो॥

टुकडे़ होकर जो मिली, कोहकनो-मजनूँ को।
कहीं मेरी ही वो फूटी हुई तक़दीर न हो॥

कुछ कहूँ कहना जो मेरा कीजिए

कुछ कहूँ कहना जो मेरा कीजिए
चाहने वाले को चाहा कीजिए

हौसला तेग़-ए-जफ़ा का रह न जाए
आईए ख़ून-ए-तमन्ना कीजिए

फ़ितना-ए-रोज़-ए-क़यामत है वो चाल
आज वो आते हैं देखा कीजिए

किस को देखा उन की सूरत देख कर
जी में आता है कि सजदा कीजिए

फ़ितने सब बरपा किए हैं हुस्न ने
मेरी उल्फ़त को न रुसवा कीजिए

हुर-ए-जन्नत उन से कुछ बढ़ कर सही
एक दिल क्या क्या तमन्ना कीजिए

कर दिया हैरत ने मुझ को आइना
बे-तकल्लुफ़ मुँह दिखाया कीजिए

जोश में आ जाए रहमत की तरह
एक इक क़तरे को दरया कीजिए

नाम अगर दरकार है मिस्ल-ए-नगीं
एक घर में जम के बैठा कीजिए

मिल चुके अब मिलने वाले ख़ाक के
क़ब्र पर जा जा के रोया कीजिए

कौन था कल बाइस-ए-बे-पर्दगी
आप मुझ से आज पर्दा कीजिए

कल की बातों में तो कुछ नरमी सी है
आज फिर क़ासिद रवाना कीजिए

राह तकते तकते ‘आसी’ चल बसा
क्यूँ किसी से आप वादा कीजिए

सारे आलम में तेरी ख़ुशबू है 

सारे आलम में तेरी ख़ुशबू है
ऐ मेरे रश्क-ए-गुल कहाँ तू है

बरछी थी वो निगाह देखो तो
लहू आँखों में है कि आँसू है

एक दम में हज़ार दफ़्तर तय
चश्म-ए-हसरत ग़ज़ब सुख़न-गो है

तू ही तू और बाल बाल अपना
फ़ाख़्ता और शोर-ए-कू-कू है

तुझ को देखे फिर आप में रह जाए
दिल पर इतना किसी को क़ाबू है

जोश-ए-अश्क ओ तसव्वुर-ए-क़द-ए-यार
सर्व गोया खड़ा लब-ए-जू है

हद न पूछो हमारी वहशत की
दिल में हर दाग़ चश्म-ए-आहू है

जिस ने मोमिन बना लिया हम को
वो तुम्हारा ही मसहफ़-ए-रू है

जिस के कुश्ते हैं ज़िंदा-ए-जावेद
वो तुम्हारी ही तेग़-ए-अबरू है

दिल जो बे-मुद्दआ हो क्या कहना
यही वीराना आलम-ए-हू है

पुल भी है फ़ख़्र-ए-जौनपुर ‘आसी’
ख़्वाब गाह-ए-जनाब-ए-शेख़ू है

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