आस्तीक वाजपेयी की रचनाएँ

विध्वंस की शताब्दी 

इस शताब्दी के आगमन पर
काल प्रवाह ने मनुष्य देख,
तुझे क्या बना दिया है
मैं अपनी आहुति देता हूँ,
मैं मर गया हूँ और
मेरे श्राद्ध पर अनादरपूर्वक आमन्त्रित हैं
सब जीव-जन्तु, पुष्प और पत्थर ।

मेरे देवताओं, पीछे मत छूट जाना
ऐसा इसलिए हूँ क्योंकि तुमने ऐसा बनाया है
मैं रूख़सत लेता हूँ अपने अनुग्रहों से और
वासना और लोभ और आत्मरक्षा के व्यर्थ विन्यासों से
और अपने किंचित व्यय से ।

शुरू में कुछ नहीं था ।
फिर हिंसा आयी
रक्त की लाल साड़ी पहने
हमारे समय में सफलता की शादी हो रही है
आओ हिंसक पुरुषों और बर्बर राजनेताओं
समय उपयुक्त है और यह समय ऐसा हमेशा से था, याद रखना ।

तुमने इसे भी नहीं बनाया है
तुम भोले जानवरों को भी
मूर्ख नहीं बना पाए हो
लेकिन यह सही है
कि श्मशान अब नए उद्यान बन गए हैं।
मुझे सड़क से भय है
जहाँ इतने सारे मनुष्य
और जीव और अपमानित अनुभूतियाँ रहती हैं ।

गाड़ी की खिड़की के बाहर
हम सब में समय और आकांक्षा और प्रतिद्वंद्विता
और विफल सपनों के भीतर मर्यादाहीन लिप्सा
और क्रूरता और अहंकार,
(पंक्ति के अन्त में खड़े हो जाएँ,
जैसे पता ही है आपको
यहाँ अपमान समय लेकर हो पाता है।)

और महाभारत के यक्ष और स्तब्ध गायें
और लाचार महिलाएँ और बनावटी चित्रकार …
कुर्ता नया प्रचलन है,
कविता हो न हो कुर्ता होना चाहिए,
कविता का यह सत्य है ।
संकोच की तरह सच,
प्रमाण की तरह सच,
आदर की तरह सच,
दुःख की तरह सच,
झूठ की तरह सच ।
बोलो कि मैं निर्दोष हूँ
और फिर और ज़ोर से बोलो
क्योंकि जेल के अन्दर की
पिटाई दिमाग में होना शुरू हो गयी है ।

परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाओ
क्योंकि सफलता या कम से कम सफलता की गुंजाइश
परीक्षा का कवच पहने खड़ी है,
सम्भोग कवच उतार कर होगा ।
हिंसा के बाद मशीन आई
और अनन्तकाल से बेख़बर मनुष्य को
पता चला पहली बार कि वह बेख़बर था ।
अच्छा हुआ कि ख़ुशी का जादू
लम्बी गाड़ी और अच्छे जूतों में मिल गया
आखिर गांधी और बुद्ध और युधिष्ठिर
आत्म-प्रश्न में तो डूबे ही थे,
क्या मिल गया ?

जूते की चमक के ऊपर
टेसू के पेड़ में
फूल नहीं अँतड़ियाँ और गुर्दे
उग रहे हैं,
इन्हें निचोड़ लेते हैं,
होली आने वाली है ।
जब ज़मीन पर हाथ रखते हैं बुद्ध हर बार,
तो वह पूछती है यदि सत्य है
तो पूछते क्यों हो ।
क्योंकि मैंने कोशिश की है
और समझ नहीं पाया हूँ
कि फल और कर्म क्यों मिल जाते हैं
मनुष्य के सपने में,
क्योंकि मैं नहीं समझ पाता कि जीवन की
अर्थहीनता सहते हुए भी रोज़मर्रे की निराशा क्यों तोड़ देती है,
क्योंकि मृत लोगों की आकांक्षाओं का भार भी
न उठा पाने के कष्ट को संतोष से
ढँकना कठिन हो रहा है,
क्योंकि अपनी उम्मीदों के टोकरे को
सिकोड़ कर मैंने एक अंगूर बना दिया है
वह जब सड़ जाएगा, तो इसकी शराब पीते हुए
देखूँगा कि क्या अन्य भाग गए हैं
यह कहकर – ‘पता नहीं ऐसा क्यों हुआ ?’

मुझे बेचारा मत कहो बेचारों,
मुझे मृत कहो,
मृत्यु ही पिछली शताब्दी की
सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है,
तुम रुककर देखो अपने दुःख दूसरों के आँसुओं में
और जानो कि परिष्कार यही है ।
हिंसा की मशीन बत्ती जाने पर
और तेज़ चलती है
और अकारण विश्वयुद्धों में
करोड़ों का नरसंहार वह खेल था
जो प्रकृति ने रचा था
यह बतलाने के लिए कि मूलतः
कुछ नहीं बदलता और मनुष्य
हर क्षण बदलता रहता है ।

मशीन के बाद शक्ति आई
और याद रखो कि सत्य को जो मार पाए
वह बड़ा सत्य होता है,
हमें एतराज़ है उन लोगों से
क्योंकि भिन्न सोचते हैं
हिम्मत का प्याला सबसे पहले हमारे पास आ गया था
और हमने ही सबसे ज़्यादा पिया है
ज्ञान वही है जो हमें हो, प्रेम वही जो हमसे हो
क्योंकि लोग यदि मुझे पसन्द करेंगे
तो मैं सच हूँ ।
या कम से कम वह हूँ
जो सच का उत्स है, आधार हैं,
जैसे सूरज रोशनी का इस ब्रह्माण्ड में ।

मुझे नहीं पता सच क्या है,
हो सकता है आपको भी न पता हो
इसलिए धर्म और कानून और विज्ञान का विष
सुकरात को पिला देते हैं ।
आखिर प्रश्न से बड़ा है उत्तर,
संकोच से बड़ा है सन्देह,
अनिश्चित अंतःकरण से बड़ा है आत्मविश्वास,
रात में आसमान अन्धेरे में नहीं खिलता,
नये बल्ब से सब जगमगा जाता है !

तिलक प्रश्न करते हैं कि क्या मेरा
खामोश बलिदान चाहिए
मेरे देश को
हम उत्तर देते हैं
कि यह काफ़ी है
वैसे भी हम खुश हैं
सभ्यता जाए चूल्हे में ।
तिलक देश की और
हम अपनी लाज बचाकर
चले जाते हैं।
शक्ति के बाद आती है क्रान्ति
जिस पर सिर्फ़ हमारा अधिकार है
क्योंकि दूसरे झूठे हैं,
केवल हमारा भगवान सच है
क्योंकि केवल हममें दूसरों को गाली देने की हिम्मत है ।
हम सबके लिए लड़ रहे हैं
आखिर हम पर आक्षेप तो
रेगिस्तान की रेत पर ओस की तरह है ।
और क्रान्ति में हिंसा तो शेर की दहाड़ की तरह है ।

मूर्ख, शिकार करते समय शेर दहाड़ता नहीं ।
यदि हिंसा के विरूद्ध अहिंसा जीत भी जाए
तो उसे इतना अपमानित करो कि
वह विकृत हो जाए और लोग पहले
दूसरों के प्रति अपने सम्मान से और फिर
खुद से नफ़रत करने लग जाएँ ।
आख़िर सफलता ऐसे ही नहीं आती,
मेहनत करनी पड़ती है ।
मैं जीने के कारण मर रहा हूँ,
किसानों को देख रहा हूँ
मैं उनकी फ़सल हूँ
इस साल भी ठीक से नहीं उग पाया हूँ,
वे निराश हैं, मैं निराश हूँ,
यह क्षमाप्रार्थी नियति है और
असम्भव आकाँक्षाएँ हैं,
इन्हें मैं बाँट नहीं पा रहा ।

क्रान्ति के बाद आता है सन्देह
जो अब पाप है और जिसे पवित्रता की
दरकार भी नहीं
क्योंकि एक समाज ऐसे भी चल रहा है ।
अख़बारों और संसदों से परे
यह समाज ऐसे ही चल रहा है ।
यह नया पागलपन है क्योंकि
बाकी सारे पागलपन अब आदर्श हो गए हैं ।

हम ख़ुद के कल्याण के रास्ते में
ख़ुद पर समय व्यर्थ नहीं कर सकते,
जीवन का आकाश अब परछाईं है
सिर्फ़ एक क़दम दूर, हमेशा।
चलो, इसका इलाज हो सकता है
इतना सोचने से कुछ नहीं मिलता
और जो नहीं मिल सकता
वह पाने योग्य नहीं है ।

इतिहास

हरे आइने के पीछे खड़े लोगों
मुझे क्षमा कर दो।
कोई भाग गया था
शायद मैं,
कोई भाग गया था ।
इतिहास की कोठरी से
मुझे निकाल दो ।
कहीं यह सर्वगत परिष्कार
मुझे खा न ले ।

तुम कहते तो रूक जाता
मेरी याद भाग गई ।
काली सड़क पर,
मन्दिर के भीतर फूलों में
पानी में डूबे पाईप पर
खिलौनों के जीवन में
धूप की याद में ।

मुझसे एक बार तो कह देते कि
यहाँ तेरे लिए भी जगह है ।
तो शायद रूक ही जाता
फिर यह थमा समय
बिल्ली के बच्चे की आँख के
हर आँसू में जमा न होता ।
गर्मी के कटे पेड़ों के बीच
उसके लिए जगह नहीं थी,
धूप में खड़ी
गाय को मैंने एक रोटी
खिलाई थी ।

उस समय भी खटकता था यह ब्रह्माण्ड
देवताओं जो तुमने बताया नहीं था कि
ज़िद पर बदलता है और फिर नहीं
हम बदलने न देते
यदि पता होता
कि यह हमसे हो गया
तो किसी कटे पेड़ से
चिपक भी जाते
जिसमें गिलहरी की याद है ।
और चिडि़यों से हर बार
स्वर्ग में उड़ जाने की
कामना नहीं करते ।

कविता वह समय है
जिसे इतिहास देख भले ले,
पर दोहरा नहीं सकता ।

मौज़ूदगी

जब चन्द्रमा की आहट
आसमान में होती,
चिड़ियों के शोर और
पत्तियों की सरसराहट के बीच,
हम तालाब के किनारे
अब फिर टहल रहे हैं ।

अब पता चला,
इस समय की मौज़ूदगी
के लिए हमारी नामौजूदगी
ज़रूरी थी ।

हिमालय

हिमालय की बहती मिट्टी,
पर सवार गंगा प्रयाग जा रही है
आसमान में उड़ती चील के टूटे पंख से
मिलने ।

एक पत्ती पर
पंख अटक गया है ।

जो ओस उसे रोके है
वह गिर पड़ेगी उसे लिए ।

शंकर की चोटी ढीली हो गई ।

आँसू 

मेरे आँसू तुम्हें देखकर
थम जाते हैं,

मेरा चेहरा हिमालय की
एक भीषण चोटी की तरह
उन्हें जमा लेता है ।

मुझे पता नहीं कि तुम सामने हो,

या आँसुओं ने आँखों पर दया कर
भ्रम पैदा कर दिया ।

यमन 

हवा की चाल को पहचानकर,
पूर्व की ओर उड़ती गोरैयों का झुण्ड
एक नया क्षितिज बना रहा है ।

कुछ धूल उड़ गई है
अब थमने के लिए
पत्ते थम गए हैं,
पेड़ हिलते हैं हौले-हौले
पहाड़ से निकलकर
रात आसमान को ख़ुद में समेट रही है ।

काले पानी में मछलियाँ
हिल रही हैं, सोते हुए खुली आँखों से
एक समय का बयाँ करती
हिल रही हैं हौले-हौले ।

बुढ़ापे को छिपाती आँखें
हँसती हैं ।
कौन सुनता है, कोई नहीं
कौन नहीं सुनता, कोई नहीं ।

सदियों पहले
अकबर के दरबार में बैठे
सभागण उठते हैं,
तानसेन के अभिवादन में
दरी बिछी, तानपुरे मिले
सूरज थम गया
संगीत की उस एकान्तिकता प्रतीछा में
जो हमारी एकान्तिकता को हरा देती है ।

सब मौन, सब शान्त, सब विचलित
तानपुरे के आगे बैठे बड़े उस्ताद
एक खाली कमरे में वीणा उठाते हैं
निषाद लगाते हैं ।
सभा जम गई है ।

ऐसा ही होता है 

ऐसा ही होता है ।
समय में भागता अश्वत्थामा
भूल जाएगा कि वह क्यों भागता है,
भागना ही बच जाएगा, सब ख़त्म हो जाएगा ।

‘प्रेम‘ — किससे किया था ?
वह कौन है जो मुझे देखती है ।
मैं भूल चुका हूँ ।

‘मृत्यु‘ — वह शुरू हो गई थी मेरे पैदा होते ही,
ख़त्म हो पाएगी या नहीं इस घास पर पड़ी
ओस की चमक।

यह अन्धकार मेरा पहला अन्धकार
नहीं है, इसके पीछे से मेरी यादें
मुझे, भाले मार रही हैं । कुत्तों की तरह झुँड में
धावा बोलती हैं, किसी एक का भी चेहरा नहीं
देख पाता ।

हत्या सिर्फ़ मैंने ही नहीं की है।
मुझे ही क्यों दण्डित करता है यह मैं ।
किससे करवाऊँ बचाव ख़ुद से अपना ।
ऐसा ही होता है ।

‘अफसोस‘-पहले दूसरों पर होता है
फिर ख़ुद पर, फिर इस बात पर
कि यह सोचते-सोचते कितना समय बीत गया ।

मासूमियत छीन ली है भगवानों ने
जानवरों को देने के लिए ।
हमारे लिए इच्छाएँ छोड़ दी हैं ।
कुछ ऐसा करूँ जो मुझे अच्छा लगता हो,
मैं क्यों भाग रहा हूँ ?
यह मैंने खुद के लिए चुना है या दूसरे ने ।

अगला कदम क्या एक सदी पार कर रहा है
या एक क्षण या ये सारी सदियाँ ही एक क्षण थीं ।
कितना समय बीत गया ।
यह कुरूक्षेत्र ही है क्या ?
कोई सपना लगता है, या कोई भ्रम
मैं इससे क्यों नहीं भाग पाता ।

यह पाताल है या स्वर्ग ।
यह भीड़ क्यों लड़ती है,
मैं क्यों नहीं लड़ता ।

घास के ऊपर तैर रही ओस पीकर ज़िन्दा रहतीं
ये मृतकों की चीख़ें ।
क्या वास्तव में मर गये सिर्फ़ वे लोग
या हम भी चलते मुर्दे हैं ।

इस रण में ही छिपी है शान्ति
हँस रही है धूप, पसीने और रक्त
से लिप्त खड़ी रण के बीच ।
कुत्तों और गिद्धों की आँखें लाल हो गई हैं
रक्तचाप से योद्धाओं की कल्पनाएँ लाल हो गई हैं ।

इतिहास हम हैं या वेदव्यास या गणेश जो
लिखते हैं महाभारत या जीत की सम्भावना जो छिप
गई है मनुष्यों की इच्छाओं में ।
ऐसा ही होता है ।

हम क्या लड़ें, क्यों लड़ें, किससे लड़ें
कुछ भी स्मरण नहीं ।
हम सत्ता के लिए नहीं लड़े थे,
न ही ईर्ष्या से, न ही समृद्धि के लिए
हम लड़े क्यों ?
क्या वास्तव में लड़े थे ?

सम्भव है कि यह देवताओं की चाल हो,
लेकिन यह भूमि लाल है
कुरूक्षेत्र, हाय कुरूक्षेत्र जिसे छलनी किया
भयावह सेनाओं ने, असंख्य योद्धाओं ने
क्या यह तुम्हारे द्वारा रचा एक स्वप्न था ?
हमें क्यों कौशल इतना अधिक मिला
और इच्छाएँ इतनी कम ।

रात्रि में स्वप्न नहीं मिले, सूर्यास्त
पर सन्तुष्टि नहीं मिली ।
मैं थक गया हूँ, थक गया हूँ, थक गया हूँ ।
कहाँ जा रहा हूँ ? आँखें सूज गई है
नहीं सो पाता हूँ, मृत्यु भी क्षमा नहीं करती है ।

यह फूल अभी उगे ही हैं, भीष्म की
तरह पता है इन्हें भी मृत्यु का समय ।
धन्य हैं ।
अपनी इच्छाओं से बहुत पहले पल्ला
झाड़ चुका हूँ दूसरों की इच्छाओं को ढोता हूँ
कभी अर्जुन बनकर द्रोपदी की कामना करता हूँ,
कभी धृतराष्ट्र बनकर अपने पुत्रों की,
कभी अश्वत्थामा बनकर मृत्यु की,
ऐसा ही होता है ।

तथास्तु

बुद्ध देखते है शेर की आँखों में
सूर्य की किरणों से लिप्त
धूल बह रही है बग़ीचों के कटे-फटे
पेड़ों के बीच ।

अभिमन्यु देखता है उन योद्धाओं को
जिनकी मृत्यु की कल्पना उसकी
मृत्यु से उपजी है ।

गाँधी देखते हैं उसे
सदियों पार से और पुकारते हैं
हे राम !

घास की कटी हुई नोक के
ऊपर से एक टिड्डे पर घात
लगाए बैठा है गिरगिट ।
वह जीभ चटकारता है ।

अर्जुन के तरकश में छिपा
बाण पुकारता है
‘जयद्रथ कहाँ हो तुम
सामने आओ !‘

तुम लोग मुझे घेर कर क्यों मारते हो
कर्ण, तुम शूर हो, पीछे से वार क्यों करते हो
नहीं किया है मैंने किसी पर पीछे से वार ।
इन भुजाओं पर मेरे पिता का
आशीर्वाद सवार है, इन्हें तुम
कैसे मारोगे ।
कर्ण, सूर्यपुत्र कर्ण, तुम क्यों पीछे
से वार करते हो ।

पलट कर कहता है सीज़र,
मेरे दोस्त, ब्रूट्स तुम भी
इस चक्रव्यूह में आए हो ।
समय देखता है मनुष्य को
उसकी यादों को अपनी ढाल
बनाकर जाता है उसके सामने
और माँगता है स्वर्ण कवच-कुण्डल ।

बूढ़ा देखता है सड़क
और आखिरी बार सहलाता है
अपनी सोई हुई शक्ति की याद को
अपनी विपन्नता को समझाता है,
यह आखिरी बार है ।

अभिमन्यु भागता है चक्र लेकर,
देखता है वह मृत्यु को
चीख़ता है, छल, छल किया है
तुमने मेरे साथ ।
मृत्यु कहती है, कुमार, छल तुम्हारे साथ
हर सूर्योदय ने किया है जिसे तुमने
देखा है, उन रातों में छला है तुम्हें
जब तुम सोए थे, यह छल तुम्हारे पहले से
तुम्हारे साथ था,
तुम्हारे बाद इसे कल्पना और समय ढोएँगे,
तुम्हारा वध नहीं हो सकता अभिमन्यु
तुम हमेशा से मृत थे ।

तुम्हारे जीवन से ज्यादा, जीवित है
यह मृत्यु !
तुम कभी नहीं मर सकते ।
क्योंकि तुम अनन्तकाल से यहीं थे
और अनन्तकाल तक यहीं रहोगे ।
यह चक्र उठाए, देखते मृत्यु
तथास्तु !

दृष्टि

क्या मैं अकेला हो गया ?
कहाँ गये सब लोग ?
उस पेड़ के पीछे से वह चिड़िया
क्या मुझे देख रही है ?

नहीं !
कोई किसी को नहीं देखता,
इन पेड़ों के ऊपर नहीं बैठे यक्ष ।
इस शताब्दी की देह में
छिप गया है अन्धकार ।
कुछ कुण्ठित नहीं,
हवा भी अन्धी है ।
हर ईंट लाल नहीं है,
है ना ?

वह किसी कुत्ते की भौंक है,
या किसी वज्र की गर्जन ?
मैंने देखा था अपनी कल्पना में छिपा,
स्मृति को पकड़े वह बादल जो एक क्षण में गुज़र गया ।
आँखों में आँसू, अन्तहीन दृष्टि,
रेगिस्तान के भीतर छिपे चीटों की
कल्पना से शापित ।

संजय बोलते हैं, ‘‘महाराज न विजय हुई,
न पराजय, न धर्म हुआ न अधर्म ।‘‘
ध्रतराष्ट्र देखते हैं रंग ।

रात के अन्धेरे में बारिश हो रही है ।
भूमि लाल हो गई है ।

गीता 

सब खत्म हो गया ।
यह मैंने क्या कर दिया ?

तुमने कहा था कि यह सब तुम ही थे
फिर क्यों रोते हैं ये अनाथ ?
ये विधवाएँ, तुम तो यहीं हो।
धर्म की जीत के लिए तुमने मुझसे
कैसा अनर्थ करवा दिया ?

सुनो यह बारिश के बादलों की गर्जन नहीं है ।
यह प्रकृति का रूदन है ।
उसे मैंने चोटिल किया है ।
ये गिद्ध जो रण को ढँके हैं,
यह उन मृत-योद्धाओं के स्वप्न हैं, जिन्हें
मैंने अपूर्ण अवस्था में ध्वस्त कर दिया है ।
तुमने मुझसे यह क्यों करवाया
मैं शापित हूँ, इतनी जीतों का भार
उठाकर हार गया हूँ ।
यह मैंने क्या कर दिया ।

देखो उन कुत्तों को, वे भी रो रहे हैं।
मैंने मनुष्यों का विषाद इतना अधिक
बढ़ा दिया कि वह जानवरों में फैल गया ।
यह बारिश की बूँदें अब इस धरती को
गीला नहीं करती, इसके आँसू सूख चुके हैं ।

मैं ही क्यों, मुझे ही तुमने क्यों समझायी गीता,
मुझसे ही क्यों करवाईं हत्याएँ ।

यशोदानन्दन बोलते हैं, ‘‘क्योंकि विध्वन्स जीवन का
आरम्भ है, मैं ही था तुममें जब तुमने इन योद्धाओं
को ध्वस्त किया लेकिन पहले ही जानते हो तुम गीता ।‘‘

हाय ! अब तुम मुझे सीधे जवाब भी नहीं देते
यह पाप तुमने मुझसे क्यों करवाया
इतनी हत्याएँ कि तीनों लोक इसकी
गन्ध से लिप्त हो गए, मैं ही क्यों ?

क्योंकि तुम ही मुझपर विश्वास कर सकते थे,
तुम ही मुझपर सन्देह ।

प्रेम की कविता

मैं जब सब भूल जाता हूँ
तब भी कुछ बच जाता है ।
हार से अधिक
वे वाक्य बच जाते हैं जो
तुमसे कभी कह नहीं पाया,
या शायद ख़ुद से नहीं कह पाया ।
हर परछाई में मैं ख़ुद को
तुमसे छिपा लेता हूँ ।
और छिपने से ख़ुद में छिप जाता हूँ

वहाँ जहाँ रोशनी की जगह
मेरी उम्मीद आती है लालटेन पकड़ कर
शायद प्रेम वह जगह है यहाँ
हमारी विफलताएँ आती हैं सुस्ताने,
फिर से भाग जाने, और बच जाते हैं
हम फिर एक दूसरे से स्वप्न में
मिल जाने ।

शायद

हर दिन हर पल ऐसा
कुछ सम्भव है जो मुझसे परे भी है ।
जो मेरे अन्दर से मुझे देखता है
और पूछता है, तुम कौन हो ?

जीत

हम वही करते रहे जो आपने कहा था
तलवार उठाओ
तलवार उठाई,
सिर काटो
सिर काटे,
करो बलात्कार
बलात्कार किए ।
हमें बताया गया था कि शायद मर सकते हैं ।
नहीं बताया किसी ने कि जी सकते हैं, हार के साथ,
अपमान के साथ,
साथ एक जीत की उम्मीद के
जो हक़ीक़त के दरवाज़े खटखटाकर थक जाएगी ।
कुछ बच्चे होंगे जो कहेंगे कि इसके अलावा
कुछ नहीं था जो हमने किया था ।
कुछ यादें जिनमें जीत या यश नहीं
पसीना सना है जो धुल जाएगा
और ख़ून लिथड़ा है जो कभी नहीं धुलेगा ।
कुछ बूढ़े अकेले जो बच गए
अपनी जवानी का हिसाब माँगकर
कहते हैं — हम वही करते रहे जो आपने कहा था‘

आकांक्षा

शायद सितारे आज टूट जाएँगे
उसकी अस्त-व्यस्तता के बीच
कहीं कुछ ऐसा, मवाद ही तो
पर हो ज़रूर जो प्रतिभाहीन मनुष्य के साथ
भी रह जाएगा
समय के अन्त तक ।

कुछ ऐसा जो चमकेगा
किसी पहाड़ के ऊपर
एक अदृश्य बिजली की तरह ।

हर स्वप्न हर बार एक चमक
एक बात एक स्वप्न हर बार।

एक विषम अथाह विस्तार
यह मनुष्य, यह मृत्यु, हाहाकार ।
जहाँ हम जाएँगे वहीं से कभी आ रहे थे ।
करूण कर्म, ध्वस्त कपाल
प्रज्वलित स्वप्न, स्मृतियाँ अपार ।

कुर्सी से उठकर एक तरफ जाते हुए,
जाकर आते हुए
हमसे रात छूट गई ।
मैं यह करूँ, मैं वह करूँ
मैं क्या करूँ ?
उसे रोना ही था जिसे
हँसना ही था ।

कुछ तो बचना ही था,
कुछ तो बच ही गया ।

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