इब्ने इंशा की रचनाएँ

इंशाजी उठो अब कूच करो 

इंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।
वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥

इस दिल के दरीदा[1] दामन को देखो तो सही सोचो तो सही।
जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली को फैलाना क्या॥

शब बीती चाँद भी डूब गया ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में।
क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या॥

फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी।
जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या॥

उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है।
उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या॥

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें।
जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या॥

उसको भी जला दुखते हुए मन एक शोला लाल भभूका बन।
यूं आंसू बन बह जाना क्या यूं माटी में मिल जाना क्या॥

जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूं बन में न जा बिसराम करें।
दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या॥

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें

उस शाम वो रुख़सत का समा

उस शाम वो रुख़सत का समाँ याद रहेगा
वो शहर, वो कूचा, वो मकाँ याद रहेगा

वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगा
वो दर्द कि उठा था यहाँ याद रहेगा

हाँ बज़्मे-शबाँ में हमशौक़ जो उस दिन
हम तेरी जानिब निग्रा याद रहेगा

कुछ मीर के अबियत थे, कुछ फ़ैज़ के मिसरे
एक दर्द का था जिन में बयाँ याद रहेगा

हम भूल सकें हैं न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

बज़्मे-शबाँ = रात की महफ़िल ; हमशौक = बड़े शौक से ; निग्रा = देखने वाले ; अबियत = शेर ; मिसरे = शेर की पंक्तियाँ

रेख़्ता

(एक)

लोग हिलाले-शाम से बढ़कर पल में माहे-तमाम हुए
हम हर बुर्ज में घटते-घटते सुबह तलक गुमनाम हुए
उन लोगों की बात करो जो इश्क में खुश-अंजाम हुए
नज्द में क़ैस यहां पर ‘इंशा’ ख़्वार हुए नाकाम हुए
किसका चमकता चेहरा लाएं किस सूरज से मांगें धूप
घोर अंधेरा छा जाता है ख़ल्वते-दिल में शाम हुए
एक से एक जुनूं का मारा इस बस्ती में रहता है
एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बदनाम हुए
शौक की आग नफ़स की गर्मी घटते-घटते सर्द न हो?
चाह की राह दिखा के तुम तो व़क़्फ़े-दरीचो-बाम हुए
उनसे बहारो-बाग़ की बातें करके जी को दुखाना क्या
जिनको एक ज़माना गुज़रा कुंजे-क़फ़्स में राम हुए
इंशा साहब पौ फटती है, तारे डूबे सुबह हुई
बात तुम्हारी मान के हम तो शब-भर बेआराम रहे

हिलाले=दूज का चांद ; माहे-तमाम= पूर्णचंद्र ; नज्द=वह नगर जहां मजनूं रहता था ; कुंजे-क़फ़्स= पिंजरे का कोना ; राम= अधीन

कबित्त (कवित्त)

(एक)

जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी
अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना ।
पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है
पीत बुरा रोग भी है, लगे तो लगाओ ना ।।
गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से
जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना ।
आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल- पूछो
एक-दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना ।।

(दो)

रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें
तुम्हें न जो पास देखें, आओ पास आओ ना ।
रूप-रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें
कहो तुम्हें जान दे दें, मांग लो लजाओ ना ।।
और भी हज़ार होंगे, जो कि दावेदार होंगे
आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना ।
शे’र में ‘नज़ीर’ ठहरे, जोग में ‘कबीर’ ठहरे
कोई ये फ़क़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना ।।

इंतज़ार की रात

उमड़ते आते हैं शाम के साये
दम-ब-दम बढ़ रही है तारीकी
एक दुनिया उदास है लेकिन
कुछ से कुछ सोचकर दिले-वहशी
मुस्कराने लगा है- जाने क्यों ?
वो चला कारवाँ सितारों का
झूमता नाचता सूए-मंज़िल
वो उफ़क़ की जबीं दमक उट्ठी
वो फ़ज़ा मुस्कराई, लेकिन दिल
डूबता जा रहा है – जाने क्यों ?

सावन-भादों साठ ही दिन हैं 

सावन-भादों साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात कहाँ
अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी-सी बरसात कहाँ

चाँद ने क्या-क्या मंज़िल कर ली निकला, चमका, डूब गया
हम जो आँख झपक लें सो लें ऎ दिल हमको रात कहाँ

पीत का कारोबार बहुत है अब तो और भी फैल चला
और जो काम जहाँ को देखें, फुरसत दे हालात कहाँ

क़ैस का नाम सुना ही होगा हमसे भी मुलाक़ात करो
इश्क़ो-जुनूँ की मंज़िल मुश्किल सबकी ये औक़ात कहाँ

हम उनसे अगर मिल बैठते हैं

हम उनसे अगर मिल बैठते हैं क्या दोष हमारा होता है
कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उनका इशारा होता है

कटने लगीं रातें आँखों में, देखा नहीं पलकों पर अक्सर
या शामे-ग़रीबाँ का जुगनू या सुबह का तारा होता है

हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके
ऎ बंजारो हम लोग चले, हमको तो ख़सारा होता है

दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए, कुछ शे’र कहे कुछ काफ़ी पी
पूछो जो मआश का इंशा जी यूँ अपना गुज़ारा होता है

जसारत= दिलेरी; ख़सारा=नुक़सान; मआश=आजीविका

(रचनाकाल : )

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा 

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा।

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा।

तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ,
हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा।

हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र,
रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा।

दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए,
अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा।

हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं,
इस शख़्स के अश‍आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा।

बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,
तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा।

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा।

देख हमारे माथे पर 

देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तेरा उसूल मियां
हम क्यों छोड़ें इन गलियों के फेरों का मामूल मियां

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियां

अब तो हमें मंज़ूर है ये भी, शहर से निकलें रुसवा हों
तुझ को देखा, बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियां

इंशा जी क्या उज्र है तुमको, नक़्द-ए-दिल-ओ-जां नज़्र करो
रूपनगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियां

दश्त-ए-तलब: इच्छा का जंगल, मामूल: दिनचर्या, नाका: चुंगी, महसूल: चुंगी पर वसूला जाने वाला टैक्स.

ऐ मुँह मोड़ के जाने वाली

ऐ मुँह मोड़ के जाने वाली, जाते में मुसकाती जा
मन नगरी की उजड़ी गलियाँ सूने धाम बसाती जा

दीवानों का रूप न धारें या धारें बतलाती जा
मारें हमें या ईंट न मारें लोगों से फ़रमाती जा

और बहुत से रिश्ते तेरे और बहुत से तेरे नाम
आज तो एक हमारे रिश्ते मेहबूबा कहलाती जा

पूरे चाँद की रात वो सागर जिस सागर का ओर न छोर
या हम आज डुबो दें तुझको या तू हमें बचाती जा

हम लोगों की आँखें पलकें राहों में कुछ और नहीं
शरमाती घबराती गोरी इतराती इठलाती जा

दिलवालों की दूर पहुँच है ज़ाहिर की औक़ात न देख
एक नज़र बख़शिश में दे के लाख सवाब कमाती जा

और तो फ़ैज़ नहीं कुछ तुझसे ऐ बेहासिल ऐ बेमेहर
इंशाजी से नज़में ग़ज़लें गीत कबत लिखवाती जा

यह बच्चा किसका बच्चा है

यह नज़्म एक सूखाग्रस्त, भूखे, मरियल बच्चे ने कवि से लिखवाई है

1.

यह बच्चा कैसा बच्चा है

यह बच्चा काला-काला-सा
यह काला-सा, मटियाला-सा
यह बच्चा भूखा-भूखा-सा
यह बच्चा सूखा-सूखा-सा
यह बच्चा किसका बच्चा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पर तन्हा बैठा है
ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके सर पर टोपी है
ना इसके पैर में जूता है
ना इसके पास खिलौना है
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है कोई झूला है
ना इसकी जेब में धेला है
ना इसके हाथ में पैसा है
ना इसके अम्मी-अब्बू हैं
ना इसकी आपा-खाला है
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है

2.

यह सहरा कैसा सहरा है
ना इस सहरा में बादल है
ना इस सहरा में बरखा है
ना इस सहरा में बाली है
ना इस सहरा में खोशा[1] है
ना इस सहरा में सब्ज़ा है
ना इस सहरा में साया है

यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का सहरा है

3.

यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किसकी दुनिया है

4.

इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है
कहीं बादल घिर-घिर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं
कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे
यह रेशम है, यह दीबा[2] है
कहीं गल्ले के अम्बार लगे
सब गेहूँ धान मुहय्या है
कहीं दौलत के सन्दूक़ भरे
हाँ ताम्बा, सोना, रूपा है
तुम जो माँगो सो हाज़िर है
तुम जो चाहो सो मिलता है
इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सपना है ?
वो किस धरती के टुकड़े हैं ?
यह किस दुनिया का हिस्सा है ?

5.

हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
वह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बन्दे हैं
सब बन्दों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क़ नहीं
इस धरती पर हक़ सबका है

6.

यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहाँ बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
{क्या मुश्किल है, हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है)
इस बच्चे का कोई तन ढाँके
(क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा[3] है ?)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इन्सान जो अब तक ज़िन्दा है)
फिर देखिए कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है

7.

इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है, वह सबका है
सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं
हर चीज़ में सबका साझा है
जो बढ़ता है, जो उगता है
वह दाना है, या मेवा है
जो कपड़ा है, जो कम्बल है
जो चाँदी है, जो सोना है
वह सारा है इस बच्चे का
जो तेरा है, जो मेरा है

यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा सबका बच्चा है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें अनाज का गुच्छा या अनाज की बाली
  2. ऊपर जायें बारीक रेशमी कपड़ा
  3. ऊपर जायें अभाव

ये बातें झूठी बातें हैं 

ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई[1] हैं?

हैं लाखों रोग ज़माने में, क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा
हैं और भी वजहें वहशत[2] की, इन्सान को रखतीं दुखियारा
हाँ बेकल-बेकल रहता है, हो प्रीत में जिसने दिल हारा
पर शाम से लेके सुबह तलक, यूँ कौन फिरे है आवारा
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं?

गर इश्क़ किया है तब क्या है, क्यूँ शाद नहीं आबाद नहीं
जो जान लिये बिन टल ना सके, ये ऐसी भी उफ़ताद[3] नहीं
ये बात तो तुम भी मानोगे, वो क़ैस नहीं फ़रहाद नहीं
क्या हिज्र का दारू मुश्किल है, क्या वस्ल के नुस्ख़े याद नहीं
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं

जो हमसे कहो हम करते हैं, क्या इंशा को समझाना है
उस लड़की से भी कह लेंगे, गो अब कुछ और ज़माना है
या छोड़ें या तकमील[4] करें, ये इश्क़ है या अफ़साना है
ये कैसा गोरख धंधा है, ये कैसा ताना बाना है
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें पागल
  2. ऊपर जायें घबराहट
  3. ऊपर जायें अचानक आई हुई कोई विपत्ति
  4. ऊपर जायें अंजाम तक पहुँचायें

अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम ऐ सनम अच्छा

अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम ऐ सनम अच्छा,
लो हम भी न बोलेंगे ख़ुदा की क़सम अच्छा|

मश्ग़ूल क्या चाहिए इस दिल को किसी तौर,
ले लेंगे ढूँढ और कोई यार हम अच्छा|

गर्मी ने कुछ आग और ही सीने में लगा दी,
हर तौर घरज़ आप से मिलना है कम अच्छा|

अग़ियार से करते हो मेरे सामने बातें,
मुझ पर ये लगे करने नया तुम सितम अच्छा|

कह कर गए आता हूँ, कोई दम में मैं तुम पास,
फिर दे चले कल की सी तरह मुझको दम अच्छा|

इस हस्ती-ए-मौहूम से मैं तंग हूँ “इंशा”|
वल्लाह के उस से दम अच्छा|

ख़याल कीजिये क्या काम आज मैं ने किया

ख़याल कीजिये क्या काम आज मैं ने किया|
जब उन्ने दी मुझे गाली सलाम मैं ने किया|

कहा ये सब्र ने दिल से के लो ख़ुदाहाफ़ीज़,
के हक़-ए-बंदगी अपना तमाम मैं ने किया|

झिड़क के कहने लगे लब चले बहुत अब तुम,
कभी जो भूल के उनसे कलाम मैं ने किया|

हवस ये रह गई साहिब ने पर कभी न कहा,
के आज से तुझे “इंशा” ग़ुलाम मैंने किया|

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों 

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ

जी मचलता था हर इक शय पे मगर
जेब खाली थी, कुछ मोल न ले सका

लौट आया, लिए हसरतें सैंकड़ों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों

खैर मेहरूमिओं के वोह दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से

जी में आता है इक इक दुकान मोल लूं
जो मैं चाहूं तो सारा जहां मोल लूं

नारसाई का अब जी में धड़का कहाँ
पर वोह छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ ?

चल इंशा अपने गाँव में

यहाँ उजले उजले रूप बहुत
पर असली कम, बहरूप बहुत

इस पेड़ के नीचे क्या रुकना
जहाँ साये कम, धुप बहुत

चल इंशा अपने गाँव मैं
बेठेंगे सुख की छाओं में

क्यूँ तेरी आँख सवाली है ?
यहाँ हर एक बात निराली है

इस देस बसेरा मत करना
यहाँ मुफलिस होना गाली है

जहाँ सच्चे रिश्ते यारों के
जहाँ वादे पक्के प्यारों के

जहाँ सजदा करे वफ़ा पांव में
चल इंशा अपने गाँव में

जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में 

जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में
लैला तो ऐ क़ैस मिलेगी दिल के दौलत-ख़ाने में

जनम जनम के सातों दुख हैं उस के माथे पर तहरीर
अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में

महफ़िल में उस शख़्स के होते कैफ़ कहाँ से आता है
पैमाने से आँखों में या आँखों से पैमाने में

किस का किस का हाल सुनाया तू ने ऐ अफ़्साना-गो
हम ने एक तुझी को ढूँढा इस सारे अफ़्साने में

इस बस्ती में इतने घर थे इतने चेहरे इतने लोग
और किसी के दर पे पहुँचा ऐसा होश दिवाने में

जब दहर के ग़म से अमाँ न मिली हम लोगों ने इश्क़ ईजाद किया

जब दहर के ग़म से अमाँ न मिली हम लोगों ने इश्क़ ईजाद किया
कभी शहर-ए-बुताँ में ख़राब फिरे कभी दश्त-ए-जुनूँ आबाद किया

कभी बस्तियाँ बन कभी कोह-ओ-दमन रहा कितने दिनों यही जी का चलन
जहाँ हुस्न मिला वहाँ बैठ रहे जहाँ प्यार मिला वहाँ साद किया

शब-ए-माह में जब भी दर्द उठा कभी बैत कहे लिखी चाँद नगर
कभी कोह से जा सर फोड़ मरे कभी क़ैस को जा उस्ताद किया

यही इश्क़ बिल-आख़िर रोग बना कि है चाह के साथ बजोग बना
जिसे बनना था ऐश वो सोग बना बड़ा मन के नगर में फ़साद किया

अब क़ुर्बत-ओ-सोहबत-ए-यार कहाँ लब ओ आरिज़ ओ ज़ुल्फ़ ओ कनार कहाँ
अब अपना भी ‘मीर’ सा आलम है टुक देख लिया जी शाद किया

जल्वा-नुमाई बेपरवाई हाँ यही रीत जहाँ की है

जल्वा-नुमाई बेपरवाई हाँ यही रीत जहाँ की है
कब कोई लड़की मन का दरीचा खोल के बाहर झाँकी है

आज मगर इक नार को देखा जाने ये नार कहाँ की है
मिस्र की मूरत चीन की गुड़िया देवी हिन्दोस्ताँ की है

मुख पर रूप से धूप का आलम बाल अँधेरी शब की मिसाल
आँख नशीली बात रसीली चाल बना की बाँकी है

‘इंशा’ जी उसे रोक के पूछें तुम को तो मुफ़्त मिला है हुस्न
किस लिए फिर बाज़ार-ए-वफ़ा में तुम ने ये जिंस गिराँ की है

एक ज़रा सा गोशा दे दो अपने पास जहाँ से दूर
इस बस्ती में हम लोगों को हाजत एक मकाँ की है

अहल-ए-ख़िरद तादीब की ख़ातिर पाथर ले ले आ पहुँचे
जब कभी हम ने शहर-ए-ग़ज़ल में दिल की बात बयाँ की है

मुल्कों मुल्कों शहरों शहरों जोगी बन कर घूमा कौन
क़र्या-ब-क़र्या सहरा-ब-सहरा ख़ाक ये किस ने फाँकी है

हम से जिस के तौर हों बाबा देखोगे दो एक ही और
कहने को तो शहर कराची बस्ती दिल ज़दगाँ की है

उस शाम वो रूख़्सत का समाँ याद रहेगा

उस शाम वो रूख़्सत का समाँ याद रहेगा
वो शहर वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा

वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगी
वो दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा

हम शौक़ के शोले की लपक भूल भी जाएँ
वो शम-ए-फ़सुर्दा का धुआँ याद रहेगा

हाँ बज़्म-ए-शबाना में हमा शौक़ जो उस दिन
हम थे तिरी जानिब निगराँ याद रहेगा

कुछ ‘मीर’ के अबयात थे कुछ ‘फ़ैज़’ के मिसरे
इक दर्द का था जिन में बयाँ याद रहेगा

आँखों में सुलगती हुई वहशत के जिलू में
वो हैरत ओ हसरत का जहाँ याद रहेगा

जाँ-बख़्श सी उस बर्ग-ए-गुल-ए-तर की तरावत
वो लम्स अज़ीज़-ए-दो-जहाँ याद रहेगा

हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो

दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो
इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँकर हो

इक भीक के दोनो कासे हैं इक प्यास के दोनो प्यासे हैं
हम खेती हैं तुम बादल हो हम नदियाँ हैं तुम सागर हो

ये दिल है जलते सीने में इक दर्द को फोड़ा अल्लहड़ सा
ना गुप्त रहे ना फूट बहे कोई मरहम कोई निश्तर हो

हम साँझ समय की छाया है तुम चढ़ती रात के चन्द्रमाँ
हम जाते हैं तुम आते हो फिर मेल की सूरत क्यूँकर हो

अब हुस्न का रूत्बा आली है अब हुस्न से सहरा खाली है
चल बस्ती में बंजारा बन चल नगरी में सौदागर हो

जिस चीज़ से तुझ को निस्बत है जिस चीज़ की तुझ को चाहत है
वो सोना है वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो

अब ‘इंशा’ जी को बुलाना क्या अब प्यार के दीप जलाना क्या
जब धूप और छाया एक से हों जब दिन और रात बराबर हो

वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं
अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर

देख हमारी दीद के कारण कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ

देख हमारी दीद के कारण कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ
एक सितारा बैठे बैठे ताबिश में ख़ुर्शीद हुआ

आज तो जानी रस्ता तकते शाम का चाँद पदीद हुआ
तू ने तो इंकार किया था दिल कब ना-उम्मीद हुआ

आन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई
लब पर उस के नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद हुआ

हाँ उस ने झलकी दिखलाई एक ही पल को दरीचे में
जानो इक बिजली लहराई आलम एक शहीद हुआ

तू ने हम से कलाम भी छोड़ा अर्ज़-ए-वफ़ा के सुनते ही
पहले कौन क़रीब था हम से अब तो और बईद हुआ

दुनिया के सब कारज छोड़े नाम पे तेरे ‘इंशा’ ने
और उसे क्या थोड़े ग़म थे तेरा इश्क़ मज़ीद हुआ

अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हजार करें 

अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हजार करें
‘मीर’ की बात कहाँ से पाएँ आख़िर को इक़रार करें

आप इसे हुस्न-ए-तलब मत समझें ना कुछ और शुमार करें
शेर इक ‘मीर’ फ़क़ीर का हम जो आप के गोश गुज़ार करें

आज हमारे घर आया लो क्या है जो तुझ पे निसार करें
इल्ला खींच बग़ल में तुझ को देर तलक हम प्यार करें

कब की हमारे इश्क़ की नौबत क़ैस से आगे जा पहुँची
रस्मन लोग अभी तक उस मरहूम का ज़िक्र अज़कार करें

दुर्ज-ए-चश्म में अश्क के मोती ले जाने हैं उन के हुज़ूर
चोखा रंग लहू का दे कर और उन्हें शहवार करें

दीन ओ दिल ओ जाँ सब सरमाया जिस में अपना सर्फ़ हुआ
इश्क़ ये कारोबार नहीं क्या और जो कारोबार करें

जितने भी दिल रीश हैं उस के सब को नामे भेज बुला
उस बे-मेहर वफ़ा दुश्मन की यादों का दरबार करें

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