इमाम बख़्श ‘नासिख’ की रचनाएँ

दिल से लूंगा मैं काम रहबर का 

दिल से लूंगा मैं काम रहबर का
क्या पता चाहिए तेरे घर का

हाल लिखता हूं दीद-ए-तर का
मौज-ए-दरिया है तार मुस्तिर है

था जो यूसुफ़ख हुआ न वो भी अज़ीज़
क्या ब्रादर को ग़म ब्रादर का

मस्त कहते हैं जिसको अबर-ए-बहार
गोशा है मेरे दामन तर का

जब हुआ गौर में अज़ाब-ए-फ़शार
ध्यान आया किनार-ए-मादर का

यद-ए-बेज़ा से हाथ आई ये बात
हुस्न मुहताज कब है ज़ेवर का

फ़स्ल-ए-गुल में हो शौक़ से उरियां
वहशियों को हुक्म है पयम्बर का

उम्र-ए-जावेद छोड़ कर ली मौत
देखना हौसला सिकंदर का

नक़्श-ए-पा हो बजाए नक़्श-ए-जबीं
सर है मुश्ताक तेरी ठोकर का

वो सही क़द है मुझ से तलब-ए-दिल
सरो को शौक़ है सनोबर का

क्या है ‘नासिख़’ जवाब-ए-ख़त का जिक्र
न मिला एक पर कबूतर का

जान हम तुझ पे दिया करते हैं

जान हम तुझ पे दिया करते हैं
नाम तेरा ही लिया करते हैं

चाक करने क लिए ऐ नासेह
हम गरेबान सिया करते हैं

साग़र-ए-चश्म से हम बादा-परस्त
मय-ए-दीदार पिया करते हैं

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

संग-ए-असवद भी है भारी पत्थर
लोग जो चूम लिया करते हैं

कल न देगा कोई मिट्टी भी उन्हें
आज ज़र जो कि दिया करते हैं

ख़त से ये माह हैं महबूब-ए-क़ुलूब
सब्ज़े को मोहर गिया करते हैं

दफ़्न महबूब जहाँ हैं ‘नासिख़’
क़ब्रें हम चूम लिया करते हैं

होनी है शहीद एक न इक रोज़ तमन्ना

होनी है शहीद एक न इक रोज़ तमन्ना
मौक़ूफ़ हो क्या मर्सिया-ख़्वानी मिरे दिल की

पीरी में भी मिलता है जो कम-सिन कोई महबूब
करती है वहीं औद जवानी मिरे दिल की

तक़्सीम किए पारा-ए-दिल बज़्म-ए-बुताँ में
हर एक के है पास निशानी मिरे दिल की

इक बात में हो जाए मुसख़्चार वो परी-रू
सुनता ही नहीं सेहर-बयानी मिरे दिल की

है अब्र तो क्या चाहे फ़लक को भी जला दे
बिजली में कहाँ शोला-फ़िशानी मिरे दिल की

ज़ुल्फ़ों में किया क़ैद न अबरू से किया क़ैद
तू ने कोई बात न मानी मिरे दिल की

ये बार-ए-ग़म-ए-इश्क़ समाया है कि ‘नासिख़’
है कोह से दह-चंद गिरानी मिरे दिल की

आ गया जब से नज़र वो शोख़ हरजाई मुझे 

आ गया जब से नज़र वो शोख़ हरजाई मुझे
कू-ब-कू दर दर लिए फिरती है रूस्वाई मुझे

काम आशिक़ को किसी की ऐब-बीनी से नहीं
हुस्न-बीनी को ख़ुदा ने दी है बीनाई मुझे

जौर सहता हूँ बुतों के ना-तवानी के सबब
दिल उठा लूँ इस क़दर कब है तवानाई मुझे

जिस तरह आता है पीरी में जवानी का ख़याल
वस्ल की शब याद रोज़-ए-हिज्र में आई मुझे

गिनती एक इक नाम की हर गोर में मुर्दे हैं दफ़्न
बाद-ए-मुर्दन भी हुई दुश्वार तन्हाई मुझे

मिस्ल-ए-साग़र बज़्म-ए-आलम में मैं कब ख़ंदाँ हुआ
किस लिए देता है गर्दिश चर्ख़-ए-मीनाई मुझे

ऐन दानाई है ‘नासिख़’ इश्क़ में दीवानगी
आप सौदाई हैं जो कहते हैं सौदाई मुझे

आशिक की सआदत है जो सर उसका झुका है

आशिक की सआदत है जो सर उसका झुका है
क़ातिल तेरी तलवार नहीं, बाल-ए-हुमा है

जब वादी-ए-वहशत में गुज़र मेरा हुआ है
हर एक बगोला पए ताज़ीम उठा है

दावाए खुदाई जो बुतों हैं न फिरो दूर
सोचो के रग-ए-जां से भी नज़दीक खुदा है

लैला के तसव्वुर में ये मशगूल है मजनूं
जो नाल-ए-ज़ंजीर है एक बांग-ए-दरा है

तुझ बिन ये अंधेरा है मेरी आँखों के आगे
कहता हूँ शब-ओ-रोज को मैं जुल्फ़-ए-दोता है

ख़ालिक ने ये सुर्ख़ उसके कफ़-ए-पा को बनाया
होता है ज़माने को यक़ीं रंग-ए-हिना है

आलम नज़र आता है तेरे इश्क़ में बीमार
इश्क़ उसका न कहिए ये ज़माने में बवा है

कहिए जो तवील उसको सज़ावार है ‘नासिख़’
जिस बहर में उस जुल्फ़ का मज़मून बंध है

ऐ रोसियह रक़ीब तो डर मेरी आह से

ऐ रोसियह रक़ीब तो डर मेरी आह से
बिजली को होती है रंग-ए-सियाह से

हम आदमी हैं वस्ल मयस्सर नहीं कभी
होता है ग़म नज़ार-ए-मरदम गयाह से

आज़ा तमाम घर गए हैं ग़म से इस क़दर
मस्ल-ए-हबाब सर है हमारा कलाह से

मुझ नातवां से हुस्न दोबाला है यार का
दोना फ़रोग़ आग का होता है काह से

हर एक अपनी आँखों में दे मुझको क्या जगह
सुरमा क्या है यार ने बर्क-ए-निगाह से

कब आऊंगा नज़र न मिलेगी जो तेरी आँख
मैं नातवां असीर हूं तार-ए-निगाह से

रोशन है उसमें आरिज़-ए-ताबां तो उस में दाग़
क्या कम शब-ए-फिराक़ है जुल्फ़-ए-सियाह से

तर दामिनी है आब-ए-ख़जालत से ज़ाहिदा
‘नासिख़’ को अफ़फआल है अपने गुनाह से

चैन दुनिया में ज़मीं से ता फ़लक दम भर नहीं 

चैन दुनिया में ज़मीं से ता फ़लक दम भर नहीं
दाग़ हैं ये गुल नहीं नासूर हैं अख़्तर नहीं

सर रहे या जाए कफछ हम मय-कशों को डर नहीं
कौन सा मीना-ए-मय ऐ मोहतसिब बे-सर नहीं

वो बुत-ए-शीरीं-अदा करता है मुझ को संगसार
ये शकर-पारे बरसते हैं जुनूँ पत्थर नहीं

हो रहा है एक आलम तेरे अबरू पर निसार
कौन गर्दन है जहाँ में जो तह-ए-ख़ंजर नहीं

दम निकलने पर जो आता है नहीं रूकता है फिर
देख लो क़स्र-ए-हबाब ऐ अहल-ए-ग़फ़लत दर नहीं

आदमी तो क्या वो कहता है निशान-ए-पा से भी
क्यूँ पड़ा है मेरे कूचे में तिरा क्या घर नहीं

ऐ तसव्वुर क्यूँ बुतों को जमा करता है यहाँ
दिल मिरा काबा है कुछ बुत-ख़ाना-ए-आज़र नहीं

शिकवा जो बे-नौकरी का करते हैं नादान हैं
आप आक़ा है किसी का जो कोई नौकर नहीं

है ख़राबात-ए-जहाँ में भी वो साक़ी से नुफ़ूर
जो कि ऐ ‘नासिख़’ ग़ुलाम-साक़ी-ए-कौसर नहीं

चल सोवे चमन साक़ी सरमाया गुलाबी

चल सोवे चमन साक़ी सरमाया गुलाबी
ईमाए क़दह नोशी ग़ुंचे की गुलाबी है

ऐ अबर-ए-मज़ा रहमत क्या शिद्दत-ए-बारां है
अफ़लाक का उन रोज़ों जो बरज है आबी है

ऐ आफियत अंदेशो क्या क़सर बनाते हो
आग़ाज़-ए-इमारत का अंजाम ख़राबी है

है कौन जो यहां आ के दो दिन को नहीं भटका
मय खान-ए-आलम में जो है सौ शराबी है

क्या शायर-ए-शैतानी फिक्र अपनी करें आली
हर मिस्रा गर अपना इक तीर शहाबी है

देख ले जोड़ा बसंती जब वो जिस्म-ए-यार में

देख ले जोड़ा बसंती जब वो जिस्म-ए-यार में
फूले क्यों सरसों न चश्म-ए-नर्गिस-ए-बीमार में

लख्त-ए-दिल ग़म ने परोए आँसुओं के तार में
दान-ए-या कूवत भी हैं मोतियों के हार हैं

क्या अजब तार-ए-कफ़न बन जाएँगे गर तार-ए-निगाह
जन निकलती है बदन से हसरत-ए-दीदार में

कुछ न आई न ओ काफिर मुझे तेरी कमर
सालहा उलझी रही तार-ए-निग ज़न्नार में

मार डाला बात में, ठोकर से जिंदा कर दिया
सहर है गुफ़्तार में, एजाज़ है रफ़्तार में

क्या लताफ़त है के मुँह में पान जब उसने लिया
सब्ज़ा ख़त सा नज़र आने लगा रूख़सार में

मौसम-ए-गुल कर गया परवाज़ बाग़-ए-दहर से
यां अभी तिने हैं बहर-ए-आशियां मनक़ार में

तर्ज़ उड़ाई है हमारे नाल-ए-दि दोज़ की
छेद पड़ जाएँ न क्यों मनक़ार-ए-मौसीक़ार में

हमसफ़ीर-ओ-गोश बर आवाज़ और इक दम रहो
लाल-ए-मोज़ों हैं कुछ बाक़र अभी मनक़ार में

जब वो मस्जिद में अदा करते हैं 

जब वो मस्जिद में अदा करते हैं
सब नमाज़ अपनी क़ज़ा करते हैं

जिन की रफ़्तार के पामाल हैं हम
वही आँखों में फिरा करते हैं

तेरे घर में जो नहीं जाते क़दम
क्या मेरे तलुवे जला करते हैं

नहीं होते हैं फ़रामोश सनम
ख़ाक हम याद-ए-ख़ुदा करते हैं

गो नहीं पूछते हरगिज़ वो मिजाज़
हम तो कहते हैं दुआ करते हैं

मौसम-ए-गुल में बशर हैं माज़ूर
गुल तलक चाक क़बा करते हैं

शाद हैं बाग़-ए-फ़ना में वो गुल
अपनी हस्ती पे हंसा करते हैं

चमन-ए-दहर में महबूबों से
क्या ही अशाफ़ वफ़ा करते हैं

गर ख़ज़ां आती है फूलों के साथ
पर अना दिल के उड़ा करते हैं

आज वो तेग़-ए-निगह से ‘नासिख़’
किश्वर-ए-दिल को कटा करते हैं

कौन सा तन है कि मिस्ल-ए-रूह इस में तू नहीं 

कौन सा तन है कि मिस्ल-ए-रूह इस में तू नहीं
कौन गुल है जो मिरा मस्कन ब-रंग-ए-बू नहीं

जाम-ए-नर्गिस में कहाँ शबनम जो निकले आफ़्ताब
यार के आगे मिरी आँखों में इक आँसू नहीं

याद-ए-गेसू में हुआ मेरा ये धज्जी सा बदन
मुझ पे फबती कहते हैं मूबाफ़ है गेसू नहीं

जिस्म ऐसा घुल गया है मुझ मरीज़-ए-इश्क़ का
देख कर कहते हैं सब तावीज़ है बाज़ू नहीं

देखे हैं हँसने में जिस दिन से दुर-ए-दनदान-ए-यार
चैन मिस्ल-ए-ग़ौहर-ए-ग़लताँ किसी पहलू नहीं

इश्क़ में बदमस्त हूँ मैं पर कोई वाक़िफ़ नहीं
नश्शा है जाम-ए-मय-ए-उल्फ़त में लेकिन बू नहीं

ज़ुल्फ़-ए-जानाँ में नहीं कोई दिल-ए-वहशी असीर
ये अजब तातार है जो एक भी आहू नहीं

हो गया है ये क़िरान-ए-आफ़्ताब ओ माह-ए-नौ
यार के रूख़्सार-ए-आतिश-रंग पर अबरू नहीं

हो गया है मिस्ल-ए-मू तार-ए-निगह अपना सियाह
आगे आँखों के सनम जब से तिरे गेसू नहीं

रात दिन नाकूस कहते हैं ब-आवाज़-ए-बुलंद
दैर से बेहतर है काबा गर बुतों में तू नहीं

क़ुमरियाँ दीवानी हैं क्यूँकर गले में हो न तौक़
बाग़ में इक सर्व मिस्ल-ए-क़ामत-ए-दिल-जू नहीं

ख़्याल-ए-यार में दिल शादमां है 

ख़्याल-ए-यार में दिल शादमां है
नहीं है ग़म जो नज़रों से नहां है

तसव्वुर सीम तन का दिल में है गंज
ख़्याल-ए-यार का कुल पासबां है

तकल्लुम ही फ़क़त है उस सनम का
ख़ुदा की तरह गोया बे दहां है

करूं नाले हुई आखिर शब-ए-वस्ल
तुलू-ए-सुबह है वक़्त-ए-अज़ां है

तसव्वुर है जो इक खुर्शीद रो का
कुर्रा दिल का मिसाल-ए-आसमां है

न क्यों इस शमा रो के गर्द हो ख़लक़
के फ़ानूस-ए-ख्याली आसमा है

सितारे झड़ते हैं जो कफ़्श-ए-पा के
ज़मीं फैज़-ए-क़दम से आसमाँ है

बरंग-ए-ताइर-ए-रंग-ए-हिना हूं
कफ़-ए-पाय हसीनां आशियाँ है

हर इक उंगली है इसकी शम-काफ़ूर
हथेली इक बलारें शमा दां है

ग़ज़ल इक और पढ़िए इस ज़मीं में
के सब मुश्ताक़ बज़्म दोस्तां है

पोंछता अश्क अगर गोश-ए-दामां होता 

पोंछता अश्क अगर गोश-ए-दामां होता
चाक करता मैं जुनूं में जो गरीबां होता

माल मिलता जो फ़लक से ज़रर जां होता
सर न होता जो मयस्सर मुझे सामां होता

मुँह को दामन से छुपाकर जो वो रक़सां होता
शोल-ए-हुस्न चराग़-ए-तह-ए-दामां होता

दिल-ए-मुश्ताक़ में गर जलव-ए-जानां होता
रोज़ इस कुंज़-ए-शीदां में चराग़ां होता

ज़ुल्फ़ से उसकी तो तशबीह न देते शायर
ईं क़दर हाल न संबल का परेशां होता

इस तरह मुँह पे जो फिरने नहीं देता है बजा
महव दीनदार से क्यों कर ख़त-ए-कुरां होता

अपने होटों से जो इक बार लगा लेता वो
है यक़ीं साग़र-ए-मै चश्म-ए-हैवां होता

क़ामत-ए-यार को हम याद किया करते हैं 

क़ामत-ए-यार को हम याद किया करते हैं
सरो को सदक़े में आज़ाद किया करते हैं

कूच-ए-याद को हम याद किया करते हैं
जाके गुल ज़ार में फ़रियाद किया करते हैं

कूच-ए-याद को हम याद किया करते हैं
जाके गुल ज़ार में फ़रियाद किया करते हैं

रश्क से नाम नहीं लेते के सुन ले न कोई
दिल ही दिल में उस हम याद किया करते हैं

गुज़र हैं कूच-ए-काकुल से सबा के झोंके
निकहत-ए-गल को जो बर्बाद किया करते हैं

फूँक दें नाल-ए-सोज़ंा से अगर चाहें क़फ़्स
हम फ़क़त खातिर-ए-सैयाद किया करते है

तो वो सैयाद है जो वार के तुझ पर लाखों
ताइर-ए-रूह को आज़ाद किया करते हैं

इंतक़ाम इस का कहीं ले न फ़लक डरता हूं
झूठे वादों से़ जो वो शाद किया करते हैं

तेरा दीवान है क्या सामने उन के ‘नासिख’
जो के कुरान पे एराद किया करते हैं

ज़ोर है गर्मी-ए-बाज़ार तेर क़ूचे में 

ज़ोर है गर्मी-ए-बाज़ार तेर क़ूचे में
जमा हैं तेरे ख़रीदार तेरे कूचे में

देख कर तुझ को क़दम उठ नहीं सकता अपना
बन गए सूरत-ए-दीवार तेरे कूचे में

पाँव फैलाए ज़मीं पर मैं पड़ा रहता हूँ
सूरत-ए-साय-ए-दीवार तेरे कूचे में

गो तो मिलता नहीं पर दिल के तक़ाज़े से हम
रोज़ हो आते हैं सौ बार तेरे कूचे में

एक हम हैं के क़दम रख नहीं सकते वरना
एंँडते फिरते हैं अग़्यार तेरे कूचे में

पास-बानों की तरह रातों को बे ताबी से
नाले करते हैं ऐ यार तेरे कूचे में

आरज़ू है जो मरो में तो यहीं दफ़न भी हों
है जगह थोड़ी सी दरकार तेरे कूचे में

गर यही हैं तेरे अबरू के इशारे क़ातिल
आज कल चलती है तलवार तेरे कूचे

हाल-ए-दिल कहने का ‘नासिख़’ जो नहीं पाता बार
फेंक जाता है वो अशआर तेरे कूचे में

रूए जानां का तसव्वुर में जो नज़ारा हुआ

रूए जानां का तसव्वुर में जो नज़ारा हुआ
दिल में था जो दाग़-ए-हसरत अर्श का तारा हुआ

महफिल मय में जो तू आया बराए मय कशी
था जो शीश जोश-ए-मै से एक फ़व्वारा

गरम है क्या अक्स तेरे रूवे आतिश नाक का
आईने की पश्त का मादूम सब पारा हुआ

रात ग़ायब हो गई ज़ाहिर हुए आसार-ए-सुबह
वस्ल मंे खुर्शीद गोया शाम का तारा हुआ

इस क़दर है तेज़ ज़ाहिर आतिश-ए-रंग-ए-हिना
संग-ए-पालगते हैं बस तलवों से अंगारा हुआ

चैन से सोया न दुनिया में कभी जज़ ख़्वाब-ए-मर्ग
बाद मरने के जनाज़ा मुझ को गहवारा हुआ

ज़ाहिदा हम जानते हैं इश्क़ बाज़ी है गुनाह
घर लुटाया है जो वहशत में वो कफ़्फ़ारा हुआ

हो रहा बुत परस्ती का ये दुनिया में अज़ाब
मुझ को हर दाग-ए-जुनूं दोज़ख का अंगारा हुआ

जब नहाने को हुआ उरियां वो पुतला नूर का
हौज़ में रोशन बरंग-ए-शमा फव्वारा हुआ

दोस्तो जल्दी ख़बर लेना कहीं नासेख़ न हो
क़त्ल आज उसकी गली में कोई बेचारा हुआ

सब हमारे लिए ज़ंजीर लिए फिरते हैं

सब हमारे लिए ज़ंजीर लिए फिरते हैं
हम सर-ए-जुल्फ़-ए-गिरह-गीर लिए फिरते हैं

कौन था सैद-ए-वफ़ादार कि अब तक सय्याद
बाल-ओ-पर उस के तिरे तीर लिए फिरते हैं

तू जो आए तो शब-ए-तार नहीं याँ हर सू
मिशअलें नाला-ए-शब-गीर लिए फिरते हैं

तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत
हम जहाँ में तिरी तस्वीर लिए फिरते हैं

जो है मरता है भला किस को अदावत होगी
आप क्यूँ हाथ में शमशीर लिए फिरते हैं

सरकशी शम्अ की लगती नहीं गर उन को बुरी
लोग क्यूँ बज़्म में गुल-गीर लिए फिरते हैं

तो गुनहगारी में हम को कोई मतऊँ न करे
हाथ में नामा-ए-तक़दीर लिए फिरते हैं

क़स्र-ए-तन को यूँ ही बनवा न बगूले ‘नासिख़’
ख़ूब ही नक़्शा-ए-तामीर लिए फिरते हैं

सनम कूचा तिरा है ओर मैं हूँ 

सनम कूचा तिरा है ओर मैं हूँ
से ज़िंदान-ए-दग़ा है और मैं हूँ

यही कहता है जल्वा मेरे बुत का
कि इक ज़ात-ए-ख़ुदा है और मैं हूँ

इधर आने में है किस से तुझे शर्म
फ़क़त इक ग़म तिरा है और मैं हूँ

करे जो हर क़दम पर एक नाला
ज़माने में दिरा है और मैं हूँ

तिरी दीवार से आती है आवाज़
कि इक बाल-ए-हुमा है और मैं हूँ

न हो कुछ आरज़ू मुझे को ख़ुदाया
यही हर दम दुआ है और मैं हूँ

क्या दरबाँ ने संग-ए-आस्ताना
दर-ए-दौलत-सरा है और मैं हूँ

गया वो छोड़ कर रस्ते में मुझ को
अब इस का नक़्श-ए-पा है और मैं हूँ

ज़माने के सितम से रोज़ ‘नासिख़’
नई इक कर्बला है और मैं हूँ

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