इरशाद अज़ीज़ की रचनाएँ

हर पल की तुम बात न पूछो

हर पल की तुम बात न पूछो
कैसे गुज़री रात न पूछो

बाहर सब-कुछ सूखा-सूखा
अन्दर की बरसात न पूछो

जिसको सुन के पछताओगे
तुम मुझसे वो बात न पूछो

साहिल पे ही डूब गये वो
कैसे थे हालात न पूछो

दुनिया से तो जीत रहा हूँ
ख़ुद से ख़ुद की मात न पूछो

मिलता है ‘इरशाद’ सभी से
उससे उसकी ज़ात न पूछो

रखते है इत्तिफाक जब

रखते है इत्तिफाक जब उनके बयाँ से हम
अब क्या कहें बताइये अपनी जबाँ से हम

जिसमें कि बेवफाई का हरगिज़ न ज़िक्र हो
उनकों सुनाये दास्ताँ ऐसी कहाँ से हम

चलते हैं इसमें ज़मीन पे नीची किये नज़र
किरदार में बलन्द हैं इस आसमाँ से हम

वो लोग क्या गये कि दुनिया उमड़ गई
जाएँगे ऐसे देखना कभी इस जहाँ से हम

तुम दो कद़म चले कि बस लड़खड़ा गये
गुज़रे हैं सौ-सौ बार ऐसे इम्तिहाँ से हम

‘इरशाद’ सौ न जीने की दे दुआ
पल की ख़बर नहीं जियें इतना कहाँ से हम

हम ने तो सब के वास्ते 

हमने तो सब के वास्ते दिल से ही दुआ की
अब देखते हैं आगे क्या म़र्जी है ख़ुदा की

हमसे वफा की आपने उम्मीद क्यूँ न की
जो बेवफा था उससे ही उम्मीदे-वफा की

अपनों मे भी वो रहता है जैसे है अज़नबी
उसको नहीं ज़रूरत अब कोई सज़ा की

ख़ूने ज़िगर मिला के जलाते अगर चराग़
उसको बुझादे क्या थी औकात हवा की

हर शख़्स की क्यूँ उँगली उठी है तेरी तरफ
मुझको बता क्या तूने कोई ऐसी ख़ता की

जिस हाल में वा रखेगा उस हाल में हूँ ख़ुश
मुझको नहीं तलब किसी भी मालोमात की

सोचो तो गुनहगार है हर आदमी मगर
करता कुबुल कौन है कि मैंने ख़ता की

‘इरशाद’ तुम से मिलके ही अच्छा मैं हो गया
मुझको नहीं ज़रूरत अब कोई दवा की

मेरे लिए तू ख़ुद को यूँ ख़ुद से जुदा न कर 

मेरे लिए तू ख़ुद को यूँ ख़ुद से ज़ुदा न कर
अच्छा तो यही है कि तू मुझसे मिला न कर

अपनों के दिये जख़्म हैं दौलत मेरे लिए
रहने दे इनको ताज़ा कोई दवा न कर

मुश्किल से ये बुझ पायें हैं शोले मेरे दिल के
जल जायेगा तू देखले इनको हवा न कर

जितना भी हो सके तू कर लोगों की भलाई
अपनी तरफ से तू किसी का भी बुरा न कर

हर वक्त रहना चाहता हूँ तेरे सामने अदना
अपने ख़्याल में तू मुझको बड़ा न कर

‘इरशाद’ लड़ना है तुझे ख़ुद अपने ऐब से
अपनों से बात-बात पे हरगिज़ लड़ा न कर

तन्हा शुरू किया था जो सफर कैसा है

तन्हा शुरू किया था जो सफर कैसा है
दिल में तेरे छुपा हुआ वो डर कैसा है

घर छोड़ के तो आ गये जंगल में अब बता
बरसों बिताये जिसमें वो घर कैसा है

साये पे जो तुम्हारे रखता था हर कदम
मंजिल के तलबगार हमसफर कैसा है

छाँव में जिसकी बैठके बचपन गुजारा था
कुछ याद है ऐ दोस्त वो शजर कैसा है

अल सुबह एक तारा मुझसे ये कहता है
अच्छा हूँ मैं इधर बता तू उधर कैसा है

‘इरशाद’ हर एक शख़्स को अपना बनाता है
ना जाने उसके पास ये हुनर कैसा है

अब जा के जिन्दगी को समझने लगा हूँ मैं 

अब जा के ज़िन्दगी को समझने लगा हूँ मैं
जब पेचोख़म में इसके उलझने लगा हूँ मैं

पहले ख़ुशी ही रास थी अब हूँ ग़मों में ख़ुश
उनका ख़याल है कि बदलने लगा हूँ मैं

एहसास मेरा आज भी ज़िन्दा है देखिये
तुम धूप में जले तो पिघलने लगा हूँ मैं

तेरी वजह से दुनिया मे मेरा भी है वजूद
किरदार से ही अपने निखरने लगा हूँ मैं

दुनिया के साथ चलके भटकता था रात-दिन
राहे-वफा पे चलके सँभलने लगा हूँ मैं

‘इरशाद’ मुझको आके ज़रा फिर से समेट ले
यूँ तिनका-तिनका देख बिखरने लगा हूँ मैं

तोड़ा है दिल किसने तुम्हारा बता देते

तोड़ा है दिल किसने तुम्हारा बता देते
फिर देखते हम उसको कैसी सज़ा देते

हमको खबर न थी के वो राह-ए-वफा पे हैं
इल्ज़ाम हम भी उसपे कोई लगा देते

वो लोग तो नाबिने थे मंज़िल से बेख़बर
तुमको ख़बर थी राह की उनको दिखा देते

उसका अभी बुलावा आता नहीं अगर
जीते हैं किस तरह से ये तुमको बता देते

बच्चों की थी लड़ाई कहते हम किस को क्या
छोटी सी बात थी उसे कैसे बढ़ा देते

‘इरशाद’ उनके हक में गर देते बयान तुम
बो बेज़बान थे मगर दिल से दुआ देते

सच बोलो मुलाकात हुई क्या

सच बोलो मुलाकात हुई क्या
ख़ुद से ख़ुद की बात हुई क्या

उसने जब मेरा नाम सुना तो
आँखों से बरसात हुई क्या

जब देखो तक रूठे रहते
ये भी कोई बात हुई क्या

सब-कुछ सुना-सुनाया सा है
ये बोलो कोई नात हुई क्या

कुदरत के दस्तूर को छोड़ो
दिल के अन्दर रात हुई क्या

तुम बोलो ‘इरशाद’ कहीं पे
इंसानों की ज़ात हुई क्या

थोड़ी सी बेवफाई करली है ज़िन्दगी से

थोड़ी सी बेवफाई करली है ज़िन्दगी से
क्यूँ देखते हैं मुझको सब लोग बेरूख़ी से

सूरज का है ये दावा कि रोशन जहाँ मुझसे
मैं तिरगी निकाल के लाया हूँ रोशनी से

चलने से पहले सोच लो इस राहे ज़िन्दगी में
है हादसे ही हादसे मिलना है तीरगी से

चेहरे वही तमाम मेरे सामने हैं आज
ख़्वाबो में जो देखा करता था अजनबी से

क्या छोड़के जायेंगें बच्चों के लिए हम
अब वक्त कर रहा है ये सवाल हम सभी से

‘इरशाद’ तुम भी इनकी बातों में आ गये
शैतान सी फ़ितरत हैं दिखते आदमी से

तीरगी अब तो हमें रोशनी सी लगती है

तीरगी अब तो हमें रोशनी सी लगती है
ज़िन्दगी आज हमें ज़िन्दगी सी लगती है

नस्ले आदम के लिए जो भी फना होता है
मौत क्यूँ उसकी हमें ख़ुदकुशी सी लगती है

कैसे कह दूँ कि फरिश्ता है वो देखो उसको
उसकी फितरत तो हमें आदमी सी लगती है

बन के साया जो हमेशा ही मेरे साथ रहा
उसकी सूरत क्यूँ मुझे अजनबी सी लगती है

होश में आएँ तो फिर उन से ज़रा बात करें
उनकी हालत तो अभी बेख़ुदी सी लगती है

दो कदम चल तो सही काँटों पे ‘इरशाद’ कभी
ज़िन्दगी कितनी तुझे मख़मली सी लगती है

वक्त के दरिया में बहता जा रहा है आदमी 

वक्त के दरिया मे बहता जा रहा है आदमी
जाने क्या क्या साथ लेता जा रहा है आदमी

आसमाँ पर हैं सितारे उस कदर हैं ख़्वाहिशें
हर कदम पर हाथ मलता जा रहा है आदमी

सौ बरस की उम्र तक जीने की ख़्वाहिश दिल में है
लम्हा-लम्हा क्यूँ मगर मरता जा रहा है आदमी

मंज़िलो की चाहतों में गुम हुआ क्यूँ इस तरह
सिर्फ ख़्वाबों में ही चलता जा रहा है आदमी

नस्ले आदम को कोई दुश्मन नहीं है दूसरा
ख़ुद से ही दुनिया में लड़ता जा रहा है आदमी

देख कर हैरत तुम्हें होती नहीं ‘इरशाद’ क्यूँ
रंग हर लम्हा बदलता जा रहा है आदमी

आप भी मेरी तरह हर ग़म में मुस्कराइये

आप भी मेरी तरह हर गम में मुस्कराइये
इस तरह हर हाल में जीने का लुत्फ उठाइये

बस्तियों में घर बनाना तो बहुत आसान है
मेरी तरह खण्डहरों में आशियाँ बनाइये

करते हो इंसानियत की बातें इतनी दोस्तो
बेसहारों को ज़रा गले से तो लगाइये

बेवजह ए दोस्तो तुम शोर करते हो बहुत
वक्त आये तो वतन पे जाँ भी लुटाइये

कहता है कौन पत्थर होते हैं बेजुबान
जाकर के खण्डहरों में आवाज भी लगाइये

दिल से अपने गम जमाने का लगाए बैठे हैं

दिल से अपने गम ज़माने का लगाए बैठे हैं
इक अलग ही अपनी दुनिया हम सजाए बैठे हैं

वो ही गर घर से ना निकले तो हमारा क्या कुसूर
हम तो उनके वास्ते पलकें बिछाए बैठे हैं

हम नहीं कहते किसी को हाले दिल अपना मगर
लोग कहते हैं कि हम क्या क्या छुपाए बैठे हैं

मैं ना पूछूँगा सबब उनसे ख़फा होने का अब
ख़ुद ही जब वो गैर को अपना बनाए बैठे हैं

जबके इस अन्जानी दुनिया में कोई उसका नहीं
किसके ख़ातिर फिर वो महफिल को सजाए बैठे हैं

इनका गर ‘इरशाद’ हो तो जान तक दे दें अभी
वो ही अपने होठों पे ताले लगाए बैठे हैं

रोतों का तुम हँसाओगे अच्छा ख़याल है

रोतों को तुम हँसाओगे अच्छा ख़याल है
बिछड़ो को तुम मिलाओगे अच्छा ख़याल है

मुद्दत से जो अँधेरों में डूबे हुए हैं घर
उनमें दीये जलाओगे अच्छा ख़याल है

बचपन से जो नाबिने हैं देखा नहीं है कुछ
उनकों जहाँ दिखाओगे अच्छा ख़याल है

बरसों से जिनके जख़्म सब नासूर हो गये
मरहम उन्हें लगाओगे अच्छा ख़याल है

हकदार थे जो लोग वो कब के ही मर गये
हक उनको अब दिलाओगे अच्छा ख़याल है

‘इरशाद’ तुम तो जी चुके भरपूर ज़िन्दगी
जीना हमें सिखाओगे अच्छा ख़याल है

दुनिया में यूँ भी हमने गुज़ारी है ज़िन्दगी

दुनिया में यूँ भी हमने गुजारी है ज़िन्दगी
अपनी कहाँ है जैसे उधारी है ज़िन्दगी

आवाज़ मुझको ना दे ऐ गुज़रे वक्त सुन
मुश्किल से हमने अपनी सँवारी है ज़िन्दगी

कोई ख़ुशी भी पहलू में आई नहीं कभी
मेरी नज़र में अब भी कुँवारी है ज़िन्दगी

सोचो तो जी रहे है तुम्हारे ही वास्ते
जब चाहो माँग लेना तुम्हारी है ज़िन्दगी

हर एक तन्हा छोड़ के कहता है अलविदा
कितनी ये बदनसीब बेचारी है ज़िन्दगी

कैसा ये बोझ दिल पे तिरे है ज़रा बता
‘इरशाद’ आज इतनी क्यूँ भारी है ज़िन्दगी

आदमी ख़ुद से मिला हो तो गज़ल होती है 

आदमी ख़ुद से मिला हो तो गज़ल होती है
ख़ुद से ही शिकवा-गिला हो तो गज़ल होती है

अपने जज्ब़ात को लफ्जों में पिरोने वालो
डूब कर शेर कहा हो तो गज़ल होती है

गैर से मिलके जहाँ ख़ुद को भूल जाये कोई
कभी ऐसा भी हुआ हो तो गज़ल होती है

दिल के ठहरे हुए ख़ामोश समन्दर में कभी
कोई तुफान उठा हो तो गज़ल होती है

बेसबब याद कोई बैठे-बिठाये आये
लब पे मिलने की दुआ हो तो गज़ल होती है

सिर्फ आती है सदा दूर तलक कोई नहीं
उस तरफ कोई गया हो तो गज़ल होती है

देखो ‘इरशाद’ ज़रा गौर से सुनना उसको
गुनगुनाती सी हवा हो तो गज़ल होती है

मुझको जीने का इक वो हुनर दे गया

मुझको जीने का इक वो हुनर दे गया
मेरी बातों में कैसा असर दे गया

अब तो हर शह ज़माने की अच्छी लगे
जाने कैसी मुझे ये नज़र दे गया

चाहे मिट्टी का कच्चा घरौंदा सही
मैं तो बेघर था मुझको वो घर दे गया

उस से मंज़िल का अपनी पता पूछा था
ख़त्म होता नहीं जो सफर दे गया

मुझसे परवाज़ का हौंसला छीन कर
किस लिए मुझे बालो-पर दे गया

उस पे आख़िर मैं कैसे यकीं न करूँ
वो अना के लिये अपना सर दे गया

मुझसे सब-कुछ मेरा छीन कर ले गया
और बदले में दुनिया का डर दे गया

देखो आते हैं ‘इरशाद’ इधर से भी
हमको झोंका हवा का ख़बर दे गया

ऐ जिन्दगी हम तुमसे मुलाकात करेंगे 

ऐ ज़िन्दगी हम तुमसे मुलाकात करेंगे
जो बात दिल में है वो ही हम बात करेंगे

तुम सोच के ये रखना दोगी जवाब क्या
जब हम सवालात की बरसात करेंगे

सुन कर रो पड़ोगे तुम ख़ून के आँसू
जब पेश अपने दिन के जज्ब़ात करेंगे

अल्लाह करे आदमी इंसान बन जाये
हम दिल से अपने ये दुआ दिन-रात करेंगे

‘इरशाद’ मेरे दिल की हसरत यही है बस
मरने से पहले तुमसे मुलाकात करेंगे

मैं उनके एतबार के काबिल नहीं रहा

मैं उनके एतबार के काबिल नहीं रहा
गोया के अच्छे लोगों में शामिल नहीं रहा

सुन के मैं तड़प उठता हूँ फूलों की दास्ताँ
कहते हैं लोग मुझको मैं संगदिल नहीं रहा

हकबात मुझमें कहने की हिम्मत तो आ गई
अपनी नज़र में आज मैं बुज़दिल नहीं रहा

उनका मेरे करीब से निकला जो काफिला
गोया के अब मैं उनकी मंज़िल नहीं रहा

‘इरशाद’ से मिलेगी अब दरिया की मौज क्यूँ
उसको पता है तूफाँ है साहिल नहीं रहा

तन्हा तन्हा रहते हो 

तन्हा तन्हा रहते हो
क्या ख़ुद से ही मिलते हो

तुम भी अब चुपके-चुपके
नाम किसी का लेते हो

कह भी दो जो कहना है
इतना किससे डरते हो

अब सबको मालूम हुआ
दम तुम किसका भरते हो

मैंने सुना है तुम अक़्सर
अपने आप से लड़ते हो

तुम भी ऐ ‘इरशाद’ सुनो
जिक्र ये किसका करते हो

वो हैं आमादा दिल दुखाने में 

वो आमादा दिल दुखाने में
फायदा है उन्हें भुलाने में

आज अहले ज़मीर का जीना
कितना मुश्किल है इस ज़माने में

मुझसे नज़रे मिला के बात करो
कुछ नही रोज़ के बहाने में

गै़र से दिल की बात करते हो
शर्म आती नहीं बताने में

मैं हूँ ज़िन्दा मेरा यकीन करो
रोज़ मरता हूँ ये बताने में

आपका नाम मैं नहीं लूँगा
मैं भी शामिल हूँ उस फसाने में

ग़ैर पर तुम यकीन करते हो
वो भी ‘इरशाद’ इस ज़माने में

मंजिले दर मंजिले है फासले दर फासले 

मंज़िले दर मंज़िले हैं फासले दर फासले
रास्ते दर रास्ते हैं हादसे दर हादसे

सोचता हूँ होगा क्या मासूम से वो लोग हैं
राहबर भटका रहे हैं आज जिनके काफिले

चलते-चलते रूक गया हूँ मैं भी इस उम्मीद पे
लोग जो बिछड़े हुए हैं मुझसे शायद आ मिले

ज़िन्दगी की राह में कुछ लोग ऐसे भी मिले
लफ्ज शोलों से थे उनके गोया वो थे दिलजले

लड़खड़ाती नस्लें अपनी जा रही है किस तरफ
देख कर उठते हैं मेरे दिन में कितने वलवले

रंग होता और ही ‘इरशाद’ के अशआर में
मिल गए होते अगर उस्ताद उसको आपसे

जीने का हुनर

या रब मुझको ऐसा जीने का हुनर दे
मुझसे मिले जो इंसाँ तू उसको मेरा कर दे

नफरत बसी हुई है जिन लोगों के दिल में
परवर दिगार उनको मुहब्बत से भर दे

मैं ख़ुद के ऐब देखूँ ओ लोगों की खूबियाँ
अल्लाह जो दे तो मुझे ऐसी नज़र दे

बेखौफ जी रहा हूँ गुनहगार हो गया
दुनिया का नहीं दिल को मेरे अपना ही डर दे

जो लोग भटकते हैं दुनिया में दरबदर
मोती का ना सही उन्हें तिनकों का तो घर दे

हर हाल में करते हैं जो शुक्र अदा तेरा
‘इरशाद’ को भी मौला तू बस ऐसा ही कर दे

रोज़ो शब का मुआमला क्या है

रोज़ो शब का मुआमला क्या है
ज़िन्दगी इस के फिर सिवा क्या है

मुझसे नज़रें मिला के बात करो
तुमसे अच्छा कोई हुआ क्या है

हर सज़ा फिर कुबूल है मुझको
पहले बतलाइये ख़ता क्या है

दीनो-दुनिया तो तुझपे वार चुका
मेरे दामन में अब बचा क्या है

दिल को टूटे हुए ज़माना हुआ
टूटा शीशा तू जोड़ता क्या है

दुनिया ‘इरशाद’ इक पहेली है
तू है नादाँ तुझे पता क्या है

पेड़ से होकर जुदा पत्ते ने दी है ये दुआ

पेड़ से होकर जुदा पत्ते ने दी है ये दुआ
जा भला तेरा करेगा ए-हवा मेरा ख़ुदा

किससे अब शिकवा करें हम कौन सुनता है यहाँ
मान ले ऐ दिल तू अब तो जो हुआ अच्छा हुआ

जब पलट के देखता हूँ दूर तक कोई नहीं
रोज़ पीछा करती मेरा जाने है किसकी सदा

बनके नश्तर हर सितारा ज़िस्म में चुभता रहा
पल-दो पल की बात छोड़ो रात भर ऐसा हुआ

तूने ऐ ‘इरशाद’ यूँ ही वक्त जाया कर दिया
ख़्वाब में खो कर के किससे रात भर सोता रहा

कुछ लोग जी रहे हैं वहमों-गुमान में

कुछ लोग जी रहे हैं वहमों-गुमान में
वो सोचते हैं हम ही हैं बस इस जहान में

जब वो नहीं तो अब इसे हम घर ही क्या कहें
दम घुटने लगा है मेरा खाली मकान में

अब देखते हैं उनका निशाना बनेगा कौन
बाकी है तीर आख़िरी उनकी कमान में

वो आसमाँ को छू के ही लौटेंगे अब तो बस
क्या हौंसला है देखिये नन्ही सी जान में

औरों के वास्ते जो करते हैं बद्दुआ
रहता नहीं कोई असर उनकी ज़बान में

‘इरशाद’ दिल का साफ है ये जानता हूँ मैं
सौ ऐब होंगे माना यूँ तो उस नादान में

इक पल की ज़िन्दगी का हम हिसाब क्या करें 

इक पल की ज़िन्दगी का हम हिसाब क्या करें
सुनकर के उनसे अब कोई जवाब क्या करें

कानों में उनके चीखती दुनिया का शोर है
सुनतें नहीं हैं लोग अब ज़नाब क्या करें

जिसमें नहीं अम्नो-वफा प्यार की बातें
रख करके ऐसी हम कोई किताब क्या करें

फूलों को रखने का भी हुनर जाता रहेगा
काँटों बगैर ले के अब गुलाब क्या करें

‘इरशाद’ ज़िन्दगी की हकीकत है सामने
आँखों में अब बसा के कोई ख़्वाब क्या करें

आप अपने गमो का हिसाब रखिये 

आप अपने गमों का हिसाब रखिये
जख़्मे-दिल पे ताज़ा गुलाब रखिये

उनकी हर बात है सवाल की तरह
साथ ख़ामोशी के तुम जवाब रखिये

उसने गर ये पूछा के दुनिया में क्या किया
कुछ तो अपने हिस्से में सवाब रखिये

दूसरों के गम में रोना अच्छी बात है
कुछ ख़्याल अपना भी ज़नाब रखिये

‘इरशाद’ दर्दो-ग़म बेहिसाब ही सही
पीने-पिलाने का कुछ हिसाब रखिये

रिश्तों के दायरे तो सिमटते चले गये 

रिश्तों के दायरे तो सिमटते चले गये
पर दरमियाँ के फासले बढ़ते चले गये

इस ज़िन्दगी के हम न मसाइल समझ सके
सुलझाये जितने उतने उलझते चले गये

सहरा की प्यास है ये बुझाएँ तो किस तरह
बादल तो आवारा थे गरजते चले गये

अपने ही कर रहे हैं मेरी कैसी पैरवी
मेरे बयान सारे बदलते चले गये

इस राहे ज़िन्दगी में हज़ारों फना हुए
हम थे जो गिरते और सँभलते चले गये

‘इरशाद’ मैंन आज तक देखा नहीं जिसे
अरमान उसके ख़ातिर मचलते चले गये

जब भी मिलता है हँस के मिलता है

जब भी मिलता है हँस के मिलता है
उस से तेरा ये कैसा रिश्ता है

आग आती नहीं नज़र लेकिन
ज़िस्म फिर भी मेरा क्यूँ जलता है

ऐसे रिश्तों में बँध गये वरना
मरना चाहें तो जीना पड़ता है

उसकी ख़ामोशी साफ कहती है
दिल में तूफाँ लिए इक दरिया है

वो जो बोला तो मुँह छुपाओगे
जब तक ख़ामोश है वो अच्छा है

मुझको ‘इरशाद’ ने कहा है ये ही
जान दे दूँगा हक पे वादा है

हमसे कसम हर बात पे खाई नही जाती

हमसे कसम हर बात पे खाई नही जाती
लजों से आग दिल में लगाई नही जाती

पहले तो हर ख़ुशी में हम गाते थे झूम के
अब क्या हुआ वो रस्म निभाई नही जाती

गर ज़िस्म जख़्मी हो तो दिखाई दे वो सबको
हो रूह लहू-लहू तो दिखाई नहीं जाती

सब की ज़बाँ पे है यहाँ अपनी ही दास्ताँ
ये और बात है कि सुनाई नहीं जाती

अपने ही घर में जो हम दोनों को बाँट दे
ऐसी कोई दीवार उठाई नहीं जाती

‘इरशाद’ तेरी कोशिशें कुछ काम आ सके
नफरत की आग हम से बुझाई नहीं जाती

ये सच है कि हरेक से मिलता नहीं हूँ मैं

ये सच है कि हरेक से मिलता नहीं हूँ मैं
अपने मयार से कभी गिरता नहीं हूँ मैं

मुझ से हैं कई लोग इसी बात से ख़फा
चलता हूँ सर उठा के यूँ झुकता नहीं हूँ मैं

दुनिया के इस बाज़ार में ख़रीदार है बहुत
कीमत लगाते हैं पर बिकता नहीं हूँ मैं

मंज़िल पे अपनी जो के पहूँचे नहीं है ख़ुद
उनकी बताई राह पे चलता नहीं हूँ मैं

जो कुछ दिया है मुझको एहसान है उसका
औरों को ख़ुश देख के जलता नहीं हूँ मैं

‘इरशाद’ जो भी होना है होकर रहेगा वो
अफसोस कर के हाथों को मलता नहीं हूँ मैं

क्या हुआ क्यूँ आपका चेहरा है उतरा हुआ 

क्या हुआ क्यूँ आपका चेहरा है उतरा हुआ
छोड़िये क्या सोचना जो हुआ अच्छा हुआ

मत बुझाओ तुम मुहब्ब्त के चरागों को अभी
नफरतों का है अँधेरा दूर तक फैला हुआ

रहनुमाँ बनकर लो आये हैं लुटेरे सामने
गौर से देखो तुम इनको रूप है बदला हुआ

जिसकी ख़ातिर बहता पानी रूक गया है देखिये
उस तरफ दरिया किनारे कौन है बैठा हुआ

लाख चाहे तुम छुपा लो आग रिश्तों में लगी
सब हकीकत खोल देगा ये धुआँ उठता हुआ

ज़िन्दगी ‘इरशाद’ तुम को गर मिले तो पूछना
फूल चेहरे पर खिला था आज क्यूँ सहरा हुआ

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