ईश्वरदत्त अंजुम की रचनाएँ

तुम को रोना है तो महफ़िल न सजा कर रोना

तुमको रोना है तो महफ़िल न सजा कर रोना
दिल का हर दर्द ज़माने से छुपा कर रोना।

वो भी रोएंगे तो रोने का मजा आएगा
रोने वालो कभी उनको भी रुला कर रोना।

रोने धोने के भी दस्तूर हुआ करते हैं
अपने अश्कों में लहू दिल का मिला कर रोना।

जिस को चाहा है दिलो-जान से अब तक तूने
दिल वो तोड़े तो चराग़ो को बुझा कर रोना।

यूँ ही बर्बाद न कर अश्कों को अपने ‘अंजुम’
रूबरू उनको कभी अपने बिठा कर रोना।

शाम उतरी तो शाम के साए

शाम उतरी तो शाम के साए,
साथ अपने उदासियां लाए।

दर्द भी आया यास भी आई
जिन को आना था वो नहीं आए।

लम्हें खुशियों के आरिज़ी निकले
कुछ पलों ही के वास्ते आए।

उस का मिलना मुहाल है लेकिन
दिले-नादाँ को कौन समझाए।

चौंकता हूँ हर एक आहट पर
भूल कर ही कोई इधर आए।

उसकी आँखों ने कुछ कहा तो था
हम ही नादाँ समझ नहीं पाए।

अपनी तक़दीर में कहाँ ‘अंजुम’
उसकी ज़ुल्फ़ों के दिल नशीं साए।

आप आए तो हर ख़ुशी आई 

आप आये तो हर ख़ुशी आई
ज़र्द पत्तों पे ताज़गी आई।

जिस की आमद का था यकीन हमें
लौट कर वो न ज़िंदगी आई।

यूँ रुलाया मुझे ज़माने ने
फिर न लब पर कभी हँसी आई।

प्यार तुम को मिला जमाने का
मेरे हिस्से में बेकसी आई।

दिल निशाना बना इताबों का
चार जानिब से अबतरी आई।

ग़म तो आता है रोज़ ऐ ‘अंजुम’
और मुसर्रत कभी कभी आई।

रंग उल्फ़त का दिलों में भर दे

रंग उल्फ़त का दिलों में भर दे
खुश्क सहरा को समुन्दर कर दे।

दिल की बस्ती में क़दम रख आ कर
तीरा राहों को मुन्नवर कर दे।

दोलतो-जर न अता कर बेशक
दिल में इक दर्द का तूफां भर दे।

अपने जलवों की अता कर दौलत
दामने-दिल को किसी दिन भर दे।

हो न हालात से मायूस ‘अंजुम’
क्या ख़बर कब वो इनायत कर दे।

तू अगर हम-कलाम हो जाता

तू अगर हम-कलाम हो जाता
ग़म का किस्सा तमाम हो जाता।

तेरी तस्वीर आँख में रहती
दिल में तेरा क़ियाम हो जाता।

झूम जाती ख़ुशी से शामे-ग़म
जो नज़र से सलाम हो जाता।

गुंचा गुंचा चमन का झूम उठता
तू जो महवे-ख़िराम हो जाता।

वो नज़र ही नहीं उठी वरना
कुछ सलामो-कयाम हो जाता।

फिर वो आ जाते बाम पर ऐ दिल
फिर मुन्नवर वो बाम हो जाता।

उन का दीदार कर के ऐ ‘अंजुम’
शेर कहते तो नाम हो जाता।

शबाब ललित

ईश्वर दत्त अंजुम जागती आंखों और खुली ज़िहन के शायर हैं। “भीगी पलकें” उन की ग़ज़लों और कतआत का मजमूआ है जिस के मुसव्वदे की वरक़-गर्दानी राकिमुलसुतूर (इस लेख के लेखक) को हुई है। अंजुम हिंदुस्तान के ज़हीन और कामिल उस्तादे-फ़न शायर जनाब राजेन्द्र नाथ रहबर के बिरादरे-अकबर (बड़े भाई) हैं।

इस अदब-पारा पर इज़हारे-राय करने से पहले इस बसीर (अक्लमन्द) और खुश-नज़र शायर के अदबी पस-मंज़र पर निगाह डालना ज़रूरी है। अंजुम की विलादत पंजाब के ज़िला गुरदासपुर के एक तहसीली सदर मक़ाम शकरगढ़ में 5 जुलाई 1924 को हुई जो तक़सीमे-वतन के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गई। अंजुम को अपने माता पिता और कुनबे के हमराह हिजरत कर के भारतीय पंजाब के शहर पठानकोट में पनाह लेनी पड़ी। उन के पूज्य पिता पं. त्रिलोक चंद शकरगढ़ की कोर्ट में वकालत करते थे। ज़ाहिर है कि ईश्वर दत्त अंजुम माहिरे-कानून और फ़ाज़िल अदीबों के खानदान से तअल्लुक रखते हैं। अंजुम के चचा पं. गिरधारी लाल शायर थे और ‘दर्द’ तख़ल्लुस करते थे।

अंजुम मौसूफ़ ने “बारह-मंगा” तहसील के शकरगढ़ के हाई स्कूल से मैट्रिकुलेशन पास करने के बाद विक्टोरिया डायमंड जुबली इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट लाहौर में मकैनिकल इंजीनियरिंग डिप्लोमा क्लास में दाखिला ले लिया। पाकिस्तान से हिजरत के बाद वो “दिल्ली इलेक्ट्रिक सप्लाई अण्डर टेकिंग” की सर्विस में आ गये और रिटायरमेंट के बाद मुस्तकिल तौर पर दिल्ली के हो कर रह गये। कभी कभी बेटे के पास लुधियाना आ जाते हैं। अंजुम के दो बेटे हैं सुधीर कुमार और नवीन कुमार। कुछ बरस पहले अंजुम एक सड़क हादिसा में शदीद ज़ख़्मी हो गये थे और दो बरस तक साहिबे-फिराश (बीमार) रहे।

अंजुम की शायरी का आग़ाज़ तब से हुआ जब आप लाहौर में तकनीकी तालीम का डिप्लोमा कोर्स कर रहे थे। वो उन की उठती जवानी का दौर था, लिहाजा ग़ज़ल की जादुई अदाएं उन को भा गयीं। ग़ज़ल एक सदाबहार सिंफे-अदब है जो अंजुम साहिब का पसन्दीदा वसीला-ए-इज़हार (अभिव्यक्ति माध्यम) है। फ़न का चश्मा हमेशा उबलता रहता है। इसी तरह उर्दू ग़ज़ल का सरचश्मा ढलती उम्र के कड़े मौसमों तक भी उबलता मचलता नहीं छोड़ता। अंजुम के ग़ज़लिया कलाम में रूमान और महब्बत की प्यासी दुनिया से ले कर तसव्वुफ़ और रूहानियत (वेदान्त, आध्यात्मिकता) की ख़ुश्क वादी तक का सफ़र क़दम क़दम रौशन है। उन का डिक्शन रिवायत और तरक़्क़ी पसन्दी के दरमियान एक पुल की तरह खड़ा है।

क्लसीकियत की रूमानी फ़ज़ा का उर्दू ग़ज़ल की अदबी रिवायत के साथ गहरा तअल्लुक है। शायर इस से कतई तौर पर मुंह नहीं मोड़ सकता। रिवायत के भरे पुरे ख़ज़ाने से कुछ न कुछ इक्तिसाब (प्राप्ति) शायर को करना पड़ता है और कला पर कुदरत हासिल करने के लिए इन ज़ीनों (सोपान) को उबूर करना नागुज़ीर है। बच्चा अपने वाप की उंगली थाम कर ही क़दम क़दम चलना सीखता है। जो फ़नकार या हक़ीक़त से मुन्किर है वो सरासर झूठ बोलता है। रूमान और राज़ो-नियाज़े-इश्क़ के मुआमलात में सोज़ो-गुदाज़ और दर्द-मंदी की अक्कासी (प्रति बिम्बन) में अंजुम रिवायती अल्फ़ाज़ वा अस्तुआरात (शब्दों और बिम्बों) को भी अपने उसलूब से नया निखार देते हैं और उन के लहजे का मख़्सूस धीमापन इन अशआर को और भी काटदार बना देता है। देखिये उन के कुछ अशआर:-

• झुकती ही चली जाती हैं क्यों बारे-हया से
देती नहीं क्यों दावते-दीदार निगाहें

• न लब हिले न कोई बात ही हुई लेकिन
पयाम आंखों ही आंखों में दे गया कोई

• तू कि आकाश में उड़ता हुआ इक बादल है
रुक के इक लम्हा मेरे खेत को पानी दे जा

महबूबा की बेवफ़ाई, बेरुखी औए हिज्र के जांकाह लम्हों की तस्वीर कशी मुलाहज़ा हो-

• रोने धोने के भी दस्तूर हुआ करते हैं
अपने अश्क़ों में लहू दिल का मिला कर रोना
जिस को चाहा है दिलों-जान से अब तक तू ने
दिल वो तोड़े तो चरागों को बुझा कर रोना

• उस का मिलना मुहाल है लेकिन
दिले-नादां को कौन समझाए
अपनी तक़दीर में कहां ‘अंजुम’
उन की ज़ुल्फो के दिन नशीं साए।

अदब बराए अदब का ज़माना लद चुका। समाजी और सियासी तब्दीलियों के कारण रवय्यों ने भारत और पाकिस्तान दोनों में नये नये रूप लिए हैं। जुराइम-पेशा और आपराधिक तत्वों ने सियासत का लिबादा ओढ़ लिया है। मफाद-परस्त सियासत दानों और भ्रष्ट अफसरों की मिली भगत अवामी बजट का बहुत ही कम हिस्सा अवामी भलाई के कामों तक पहुंचने देती है। अंजुम का सियासी शऊर उसे सियासत दानों से बराहे-रास्त कुछ कहने की तलक़ीन करता है। वो यूँ कहते हैं:-

• मेरे खेत हैं अब भी प्यासे
सुनता हूँ बरसात हुई है

• हम मसीहा नफ़स कहेंगे तुम्हे
ज़र्द चेहरों पे ताज़गी लाओ

• वो पुजारी है नफ़रतों का मगर
परचमे-अम्न ले के चलता है

यए अशआर मकरूह सियासत के उस चेहरे को बे-नक़ाब करते हैं जो कई मस्नूई मुखोटे ओढ़ लेता है। इस के बावजूद वतन परस्ती का अज़ली जज़्बा शायर के दिल की गहराई में पैवस्त है। वतन की ख़ातिर जान निसार करने की आरज़ू जवान के ख़मीर में है:-

• वतने-अज़ीज़ तुझ पे मेरी ज़िन्दगी निसार
होंटो पे तेरे ग़म में हमेशा फुगां रहे

• शाख़ की खैर मांगता हूँ मैं
शाख़ पर मेरा आशियाना है

• ऐ ख़ुदा अम्न, चैन, खुश हाली
मेरे हिन्दोस्तान के रखना

• अपने वतन की इज़्ज़तो-हुरमत के वासिते
क़ुर्बान होने वालों को मिलती है ज़िन्दगी।

अंजुम को जिस क़दर उम्र की कम मायगी (संक्षिप्त) का एहसास है उसी क़दर उस की पाकीज़गी के वो काइल हैं बल्कि उन के लिए ये ख़ालिक़ का वरदान और प्रसाद है। वो मानते हैं:-

• हमें भी साबिका गर्दिश से है तो क्या ‘अंजुम’
ये चांद तारे ये सूरज भी तो सफ़र में हैं

• कैसे करें गुरेज़ भला ज़िन्दगी से हम
आइना ले के हाथ में बैठी है ज़िन्दगी
अंजुम ख़ुदा के फ़ैज़ से मायूस तो न हो
जामे कई बदल के फिर आती है ज़िन्दगी

• शेर में उस को ढाल लेता हूँ
जो मुझे ज़िन्दगी से मिलता है

• शान से जीना, शान से मरना
ज़िन्दगी में कोई अदा रखना

शायरी फ़ने-शरीफ है। फारसी शायर ने कहा है “शायरी जुज़वीस्त अज़ पैग़म्बरी”। इस लिए वो पूरी खुद-एतमादी (आत्म विश्वास) और फख्र से कहते हैं :-

• कोई भी अंजुमन हो उस में मुझे
मर्तबा शायरी से मिलता है

• हक़ नवाई न छोड़ना ‘अंजुम’
फ़र्ज़ शायर का ध्यान में रखना
मेरी फ़िक्र-सुख़न के शहबाज़ो
खुद को ऊँची उड़ान में रखना।

शायर अपने पाठक की ज़ेहनी तर्बियत और किरदार साज़ी (चरित्र निर्माण) का फ़र्ज़ भी अदा करता है। मानव की भलाई और नैतिक मूल्यों के विकास की तड़प , इंसान, दोस्ती, मुसावात ( समता), तंगदिलाना फ़िरक़ा परस्ती से गुरेज़, हमदर्दी, ईमानदारी, अद्ल और इंसाफ़ के औसाफ़ शायरों के मन पसन्द विषय रहे हैं। और उन का स्रोत है ख़ौफ़े-ख़ुदा और परमात्मा के बनाए अद्ल (न्याय) पर भरोसा और ज़िन्दगी और मौत का अचूक निज़ाम जिस के हाथ में है। ‘अंजुम’ की राय में वही प्रभु इंसान का एक मात्र आसरा है। उन के कुछ चुने हुए रूमानी शेर देखिये जो उन के विश्वास की तर्जुमानी करते हैं:-

• उस रहीमो-करीम का ‘अंजुम’
शुक्र है आस्तान बाक़ी है

• आंख से वो नज़र नहीं आता
देखना है तो बंद कर आंखें

• उस की रहमत हो मेहरबाँ ‘अंजुम’
अपनी आंखों में कुछ नमी लाओ

• उस की रहमत की कर दुआ दिल से
ज़र्रे ज़र्रे में जिस का डेरा है।

उपरोक्त शेरों में जहां अंजुम यादे-ख़ुदा और इबादत को ज़रूरी समझते हैं वहां वो इंसानी भाई चारा, फ़िरक़ा वाराना यगानागत और हम-आहंगी के प्रवक्ता भी हैं जिस के चश्मे ख़ुदा परस्ती और ख़ौफ़े-ख़ुदा से फूटते हैं, फरमाते हैं:-

• दामे-नफ़रत से रहो दूर महब्बत सीखो
प्यार इंसान को इंसान बना देता है

• बुगजो-कोना से दूर तर रह कर
बिखरे तिनके संवारते रहना
सर को रखना ख़ुदा के सजदे में
नाम उस का पुकारते रहना

अंजुम को ज़िन्दगी की बुनियादी हक़ीक़तों का इरफान है। मुआशरे के साथ उन के मजबूत रिश्ते हैं। आज माज़ी की अख़लाक़ी कद्रो के विनाश से इंसान और इंसान के दरमियान दूरी बढ़ती जा रही है। खून के रिश्ते भी इस शिकस्तो-रेख़्त ( टूट-फूट) की ताब नहीं ला सके। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच फ़िक्री और जज़्बाती टकराव खुल कर सामने आ रहा है। शायर इस से आंखें नहीं चुरा सकता। अंजुम फरमाते हैं:-

• तहज़ीबे-कुहन अपना अनमोल असासा थी
अब पास हमारे वो अलमास नहीं बाकी

• करता है इंहिराफ लहू से लहू यहां
खुद अपने खून ही से मैं हारा कभी कभी

• बुढापा कहता है बेटे के घर में जा के रहो
मगर बड़े ही मज़े में हम अपने घर में हैं

• कच्चा धागा तो नहीं खून का रिश्ता होता
ऐसे रिश्ते को बहर तौर निभाना होगा
गर बशर चाहे कि शाइस्ता नज़र वो आये
रंगे-तहज़ीबे-कुहन उस को दिखाना होगा

इन अशआर में कुछ जग बीती है और कुछ शायद आप बीती लेकिन वो खुशनसीब हैं कि अंजुम को नेक और नेक नाम वालिदैन मिले और नेक औलाद मिली और सोने पर सुहागा राजेन्द्र नाथ रहबर जैसा नामवर शायर और अदीब एक मुख्लिस और जां-निसार भाई के रूप में मिला जिस के मुतमल्लिक खुद वो फरमाते हैं:-

– न भूलेगा कभी मुझको खुशी का वो हसीं लम्हा
कि भाई बन के ‘रहबर’ जब मिरी दुनिया में आया था

अंजुम ने ग़ज़ल के पैकर में कुछ नज़्मों की भी तजसीम की है, जैसे ज़ेरे-नज़र मज़मूए में “साले-नौ”, “कश्मीर”, “शिमला” और कलयुगी इंसानों की “कारोबारी दोस्ती” के हवाले से कही गई नज़्में। उन की ग़ज़लें हों चाहे नज़्में या कतआत ‘अंजुम’ ने ज़िन्दगी की खुशियों और महरूमियों, शीरिनियों का तलज़्ज़ज़ (रसास्वादन) या तल्खियों के ज़हरनाक घूंटों की जलन को जैसे भोगा और महसूस किया वैसे ही उन्हें शेरी पैकर (कलेवर) में ढाला है। जज़्बात की सदाक़त और मासूमियत, लबो-लहजा की नरमी और घुलावट, क्लासिकी रचाव, अंदाज़े-बयान की सादगी और बे-तअल्लुफी पाठक के मन को मोहती है। कलाम में कोई मस्नूई पेचीदगी या उलझाव नहीं। बंदिश की चुस्ती, मिसरों की रवानी और रँगा रंगी, रूहानियत, इंसान दोस्ती, ख़ुदा परस्ती देश भक्ति, कनाइत, संजीदगी और समाजी भलाई के सरोकार, रिश्तों का एहमिराम, ज़िन्दगी की उम्दा कद्रों की बहाली, फ़िरक़ावाराना अम्न वा आशनी की तलक़ीन, ये सब अजज़ा उन की शायरी का ऐजाज़ का ऐजाज़ भी हैं और ऐजाज़ भी।

शोभा पाराशर

कविता भावों का मूर्त रूप है। कवि भाव सागर में गहरे उतर कर अनुभूत सत्य को शब्दों का कलेवर देता है तो वही भावनाएं काव्य के देदीप्यान मोती बन जाती हैं।। वस्तुतः कविता अथवा शायरी एक ऐसी विधा है जिस में अनुभूति और अभिव्यक्ति, कोमलता और परखरता का मणिकांचन संयोग होता है। यथार्थ के धरातल पर पांव रखते हुए भी कवि कल्पनाओं के आकाश में अपने परों को उड़ान भरने का भरपूर अवसर दे पाता है। इसी दिशा में श्री ईश्वर दत्त ‘अंजुम’ का प्रस्तुत संकलन एक ऐसा सुप्रयास है जिस में भावुकता के लम्हे चिरंजीवी हो गये हैं। संप्रेषणीयता को दृढ़ता से थामे हुए सटीक शब्दों में अपनी बात को बेनक़ाब और बेबाक़ हो कर कह देना शायर की मौलिकता है। जीवन के रंगों से सजी इस शायरी में सहजता है, सजगता है और सौन्दर्य है। अस्तित्व की पहचान की तड़प है व्यक्ति है समाज है, और राष्ट्र है। अंजुम के दिल में प्रेम का अथाह सागर हिलोरें ले रहा है। ये प्यार प्राणीमात्र के लिए भी है और आध्यात्मिक भी…

• उस के जलवे को देख ले दिल में
ऐसी तो हर नज़र नहीं होती
वो तो बैठा है छुप के हर दिल में
दिल को लेकिन ख़बर नहीं होती

लेकिन प्यार में व्यापार का अनुभव भी अजीब ऐ कसक बन कर उभरा और शैली भी व्यंग्यात्मक हो गई…

• हो सके तो प्यार को भी कारोबारी कीजिये
जिस जगह से जो मिले उस को खुशी से लीजिये
मिलने जुलने का बनाएं सिलसिला लोगों से आप
पूछ लें उन का पता, अपना पता मत दीजिये।

शायर भले ही व्यंगबाण चला ले लेकिन किसी तरह का रक्तपात वो नहीं चाहता इसी लिए दिल टूटने पर भी कोई शिकवा नहीं, कहीं वफ़ा का इज़हार नहीं, प्रेम का इश्तिहार नही…

• जिया को चाहा है दिलो-जान से अब तक तू ने
दिल वो तोड़े तो चरागों को बुझा कर रोना

ज़माने के बदलते दौर में उदास शायर निराश नहीं है और आशावादिता का स्वर नई चेतना भरता है…

• कैसी भी हप खजां मगर रुकती नहीं बहार
सिहने-चमन में फूल खिलाती है ज़िन्दगी
‘अंजुम’ ख़ुदा के फ़ैज़ से मायूस तो न हो
जामे कई बदल के फिर आती है ज़िन्दगी

नफ़रत की आग बुझा कर शांति की स्थापना की कोशिश और भड़काऊ प्रवृत्ति वाले लोगों को सचेत करने में शायर ने कोई कसर नहीं छोड़ी…

नफ़रत की आग पहले ही भड़की है शहर में
कोई ख़ुदा के वासिते इसको हवा न दे

ज़िन्दगी के झंझावातों से जूझ कर अपने को छुपा के जीने वालों का ही दुनिया स्वागत करती है, क्यों कि जीना भी एक कला है। इसे शायर बख़ूबी पहचानता है…

• ज़िन्दगी में जो मुस्कुराये गा
वो ज़माने को रास आये गा
सख़्त दुश्वारियां के आलम में
अज़्मे-पुख्ता ही काम आये गा।

सम्बन्धों में बढ़ती स्वार्थ और फ़रेब से वाकिफ़ शायर , कभी कभी प्यार पर भी विराम लगाने को बेबस सा हुआ नज़र आता है..

• पायदारी कहां है रिश्तों में
प्यार में भी छुपी है अय्यारी।

अंजुम का ख़ुदा पर अटूट विश्वास अभिभूत कर जाता है और ये शेर देखिये जिस में अधिकार और विश्वास का योग अनोखी सामर्थ्य दिखा रहा है…

– है मुझे अपने ख़ुदा पर ही भरोसा ‘अंजुम’
जब मैं गिरता हूँ तो वो आ के उठाता है मुझे

यथार्थवादी दृष्टि क्व धनी अंजुम जहां जीवन की नश्वरता को “काम सारा मुसाफ़िराना” कह कर स्प्ष्ट करते हैं, वहीं पद प्रतिष्ठा और ऊंचाइयां छूने वलोंबको सचेत करना भी नहीं भूलते…

-जब क़दम आसमान में रखना
कुछ तवाजुन उड़ान में रखना

आधुनिकता की होड़ और पैसे की दौड़ ने संयुक्त परिवार तो तोड़े ही हैं, संस्कारों की भी बलि दे दी है। आज भौतिक सुविधाओं के पीछे भागते भागते मां बाप भी कहीं बहुत पीछे छूट गये हैं, इसी दर्द को बेहद संवेदनशीन हो कर शायर ने क्या ख़ूब कहा है…

बुढापा कहता है बेटे के घर में जा के रहो
मगर बड़े ही मज़े में हम अपने घर में हैं

घनिष्ठ सम्बन्धों को भी पैसे की आंच ने पिघला कर समाप्त कर दिया है। ऐसे बुनियादी फ़रेब का असर शायरी में यहां वहां बिख़रा है। शायर चाह कर भी उस एहसास से मुक्त नहीं हो पाता…

निकले हैं आज फेर के मुंह बेरुखी के साथ
वो जिन की जिंदगी का मुक़द्दर रहे हैं हम

आहत मन की पीड़ा की ऊंचाई और वेदनानुभूति इस शेर में देखने योग्य है, जिस में आंखें भीगती नहीं पर भोगती है विरह के दर्द को…

दिल ही रोता है आंख के बदले
आंख अब अपनी तर नहीं होती

ईश्वरीय अनुकम्पा पर दृढ़ विश्वास रखते हुए शायर एक शर्त भी रखता है और वो है सच्ची निष्ठा और समर्पण…

जो झुका देता है अज़-राहे-अक़ीदत सर को
अपनी अज़मत का वो ऐजाज़ दिखा देता है।

शायर के दिल में ‘प्रेम’ एक उच्च आसन पर आरूढ़ है। चाहे रूहानी प्रेम हो या दुनियावी या प्रेम हो अपने वतन से उस के निगहबानों से…

मिलजुल के कर रहे हैं हिफाज़त वतन की हम
अफ़ज़ल मगर सभी से तो फौजी जवान है

देश के जंगल, पहाड़, खेत और दरियाओं की प्राकृतिक छटा दिखाता हुआ शायर स्वदेशाभिमान में इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उस में ललकारने की भी सामर्थ्य मुखरित हो उठी है…

है पाक इरादा तो पाकीज़ा बना दिल को
क्यों बुगजो-कदूरत को तू ने अपनाया है
एटम की लड़ाई में तू जीत न पायेगा
पहले भी तुझे हम ने हर बार हराया है।

संकलन का प्रत्येक शेर बहुत वज़नदार है। आस्था, प्रेम, विश्वास की त्रिधाराओं ने इसे बहुत समृद्ध के दिया है। अपने व्यक्तित्व और अस्तिव की साख रखते हुए शायर विश्वास दिलाता है…

-वफ़ा की कसौटी पे उतरेंगे पूरे
हमें भी कभी आज़मा कर तो देखो
सितारों को कदमों में रख देंगे ला कर
कभी हम को अपना बना कर तो देखो

प्रेरणा और संदेश के अभाव में ‘साहित्य’ मात्र नकली फूलों का गुच्छा भर रह जाता है। यथार्थ और आदर्श का वास्तविक स्वरूप स्प्ष्ट करते हुए
जीवन शैली के प्रति नवीन संचेतना आवश्यक संदेश संकेत भी दिये हैं। वर्तमान परिपेक्ष्य में उदासी, मलिनता को हटा कर जागरूकता जीवन की प्रेरणा देती यह पंक्तियाँ सचमुच नया जोश भरती है…

ग़मे-दुनिया न रौंद दे तुझ को
ग़म उठाने का हौसला रखना
शाम से जीना, शान से मरना
ज़िन्दगी में कोई अदा रखना

निसंदेह शायरी के प्रेमियों और जिज्ञासुओं को यह संकलन भरपूर खुराक देगा। आदरणीय राजेन्द्र नाथ रहबर जी की प्रेरणा और दिशानिर्देश पर आज पठानकोट का प्रत्येक शायर अपना मौलिक अधिकार समझता है तो ‘अंजुम’ जी के भाव सागर के अन्य अनेक मोतियों का इंतज़ार भविष्य में भी रहेगा।

खदशों में, वसवतों में बसर कर रहे हैं हम

खदशों में, वसवतों में बसर कर रहे हैं हम
खुद आज अपने साये से भी डर रहे हैं हम

माथे से पोंछते हैं पसीना बहर-क़दम
तय ज़िन्दगी का ऐसे सफ़र कर रहे हैं हम

हासिल निजात होगी शबे-ग़म से भी कभी
मुद्दत से आरज़ूए-सहर कर रहे हैं हम

आया है ले के बीच भँवर के वही हमें
जिस बहरे-ज़िन्दगी के शनावर रहे हैं हम

साक़ी की हम पे ख़ूब नवाज़िश है इन दिनों
अश्क़ों से अपना जामे-तही भर रहे हैं हम

कुछ पल बसर किये थे तिरी ज़ुल्फ़ के तले
बरसों ही खुशबुओं से मुअत्तर रहे हैं हम

निकले हैं आज फेर के मुंह बे-रुखी के साथ
वो जिन की ज़िन्दगी का मुक़द्दर रहे हैं हम

कैसी है ये बिसात जहाने-ख़राब की
‘अंजुम’ हर एक चाल यहां हर रहे हैं हम।

कभी तो तीरगी में हैं कभी सहर में हैं 

कभी तो तीरगी में हैं कभी सहर में हैं
हमें ये लगता है जैसे किसी सफ़र में हैं

हमारा हाले-सफ़र पूछते हो क्या हम से
समेत कश्ती के हम आजकल भंवर में हैं

हर एक बर्क़ हमारे ही घर पे गिरती है
अज़ल से हम तो बलाओं ही की नज़र में हैं

वो लाख खुद को कहे गो अज़ीमो-शाइस्ता
हज़ार नक्स मगर आज के बशर में हैं

हुजूमे-यास में तन्हा न थे कभी इतने
कि आज जितने अकेले हम अपने घर में हैं

हमें भी साबिका गर्दिश से है तो क्या ‘अंजुम’
ये चांद, तारे, ये सूरज भी ति सफ़र में हैं।

ग़म रसीदा बहार है दुनिया 

जाने वाले कोई अनमोल निशानी दे जा
बीते लम्हों की कोई याद पुरानी दे जा

ताज़गी दिल में रहे तेरी मुलाक़ातों की
मेरे ठहरे हुए अश्क़ों को रवानी दे जा

मेरी आंखों की तपिश इस से हो शायद कुछ कम
इन सुलगती हुई आंखों को तू पानी दे जा

तू कि आकाश में उड़ता हुआ इक बादल है
रुक के इक लम्हा मिरे खेतों को पानी दे जा

राहे-उल्फ़त में बढ़ें पांव हमेशा मेरे
मेरे एहसास को इक ऐसी रवानी दे जा

जो मिरे अश्क़ों ने लिख लिख के मिटा दी आखिर
तू वही फिर से अधूरी सी कहानी दे जा

अहले-महफ़िल सदा अशआर सराहें मेरे
मेरे जज़्बात को तू जादू-बयानी दे जा

उस को ता-उम्र न भूलेगा ये तेरा ‘अंजुम’
कोई पैग़ाम निगाहों की ज़बानी दे जा।

वक़्त ने कैसी चोट लगाई जिससे दिल रंजूर हुआ 

वक़्त ने कैसी चोट लगाई जिससे दिल रंजूर हुआ
विश्वासों की साख मिली तो हर नाता काफ़ूर हुआ

हाल कहूँ क्या माज़ी का फ़र्दा भी अब तो साथ नहीं
भटक रहा हूँ सहरा सहरा साहिल कितना दूर हुआ

कैसी है ये खाना दारी और ये कैसा जोम यहां
पल भर ठहरूँ दम घुटता है हर बंधन काफ़ूर हुआ

बोझ उठा कर रिश्तों का अब क़दम क़दम चलना मुश्किल
रिश्तों ने जो जख़्म दिया है बढ़ कर वो नासूर हुआ

वक़्त का धारा तेज़ है कितना पल में निकला दूर कहीं
सर के झुकाया वक़्त ने उसके जो भी कोई मग़रूर हुआ

कितने सच्चे लोग थे वो जो अपने पन के साथ चले
अक्स ही अब बाकी है उनका अस्ल तो चकनाचूर हुआ

प्यार का दर्स ज़माने को सिखाना होगा 

प्यार का दर्स ज़माने को सिखाना होगा
फिर से बुझती हुई शमओं को जलाना होगा

रूखे-रोशन पे जो पर्दा है हटाना होगा
चांद से चेहरे का दीदार कराना होगा

गर बशर चाहे की शाइस्ता नज़र आये वो
रंगे-तहज़ीबे-कुहन उसको दिखाना होगा

सारे बोसीदा ख़यालात मिटा कर दिल से
राहे-दुश्वार को आसान बनाना होगा

तुम जो चाहो कि असर उसपे हो कुछ अश्क़ों का
अपने अश्क़ों पे लहू दिल का मिलना होगा

कच्चा धागा तो नहीं खून का रिश्ता होता
ऐसे रिश्तों को बहर तौर निभाना होगा

कतआत 

तेरी फुरकत का खंज़रे-खूं-रेज़
करता रहता है तार तार मुझे
अपनी खैरो-खबर का ख़त लिखना
ख़त का रहता है इंतज़ार मुझे

तेरी हर बात मुझ पे रोशन है
तेरा हर राज़ से शनासा हूँ
तेरी चाहत की है तलब मुझको
तेरे दीदार का मैं प्यासा हूँ

फूल से फूल मिलाना होगा
एक गुलसितां सजाना होगा
हर तनफ्फुर को मिटा कर दिल से
इत्तिहाद अपना बनाना होगा

चाहतों के गुलाब क्या क्या हैं
और फिर लाजवाब क्या क्या हैं
अम्ने-आलम की चाह, खुशहाली
मेरी आंखों में ख़ाब क्या क्या हैं

मेरी बातों में गुलफिशानी है
मेरे अशआर में रवानी है
ज़ख़्मे-दिल पर निसार हूँ अंजुम
उनकी बख्शी हुई निशानी है

सुब्ह मिलता है शाम मिलता है
मय से लबरेज़ जाम मिलता है
मयकदे की फ़ज़ा ऐ रंगी में
हर खुशी को दवाम मिलता है

बेबसी की फसुर्दगी की है
दास्तां सारी बेकसी की है
मेरे बस की ही बात थी अंजुम
जिस तरह मैंने ज़िन्दगी की है

काम आता है अपना दिल आखिर
अपने ही दिल को आसरा करना
बेवफाओं को सोचना कैसा
बेवफाओं का ध्यान क्या करना

आ भी जो की रुत गुलाबी है
आज आने में क्या खराबी है
आज मौसम शरारती है बहुत
तुमको जाने की क्या शताबी है

आरज़ू थी कि बहर गाम मिले मुझको खुशी
रंज हम राह रहे रोग मिरे साथ चलें
जब तलक ज़िंदा था चलता था मैं तन्हा अंजुम
बाद मरने के कई लोग मिरे साथ चले

ओढ़ कर ग़फ़लत की चादर मयकशी में सूद है
गर्द दिल की जामो-मीना से कभी धुलती नहीं
प्यार में टूटा हुआ दिल फिर नहीं जुड़ता कभी
प्यार में जब गांठ पड़ जाये कभी खुलती नहीं

बनी अहले-दुनिया की कैसी ये सूरत
है बातों में उल्फ़त दिलों में कुदूरत
बहुत ही सियह कारनामे हैं इनके
बज़ाहिर तो लगते हैं सब ख़ूबसूरत।

घबरा के ग़म से तुमको पुकारा कभी कभी

घबरा के ग़म से तुमको पुकारा कभी कभी
दिल में तुम्हारा नक़्श उतारा कभी कभी

तड़पा हूँ किस क़दर की मिरा दिल भी रो दिया
देखा है आंसुओं का नज़ारा कभी कभी

अपना रहा न होश ज़माने की कुछ खबर
यूँ बेख़ुदी में तुम को पुकारा कभी कभी

सजदे में सर को रख दिया फिर आजिज़ी के साथ
सदका हुज़ूर का यूँ उतारा कभी कभी

फूलों से भी मिली है मसर्रत कभी मुझे
कांटों में भी किया है गुज़ारा कभी कभी

अपने न काम आये कभी जिस मक़ाम पर
ग़ैरों का भी लिया है सहारा कभी कभी

मौजों ने मेरा रास्ता रोक तो बार बार
फिर भी मिला है मुझ को किनारा कभी कभी

करता है इंहिराफ लहू से लहू यहां
खुद अपने ही खून से में हारा कभी कभी

मैं मात खाने वाला तो अंजुम न था मगर
कुदरत की मार ने मुझे मारा कभी कभी।

दिल फसुर्दा है आंख भी नम है

दिल फसुर्दा है आंख भी नम है
ये बता दिल में कौनसा ग़म है

जैसे रोया हो रात भर कोई
दामने सुब्ह बे-तरह नम है

बुझने वाला है अब चरागे-उम्मीद
रोशनी इस में किस क़दर कम है

झेल सकता हूँ हर मुसीबत को
मेरे दम में अभी बहुत दम है

आंख रखता है वो उकाबी सी
लेकिन अपनी उसे ख़बर कम है

याद करता है क्या मुझे वो भी
जिसका मुझको ख़याल हर दम है

क्यों बुझा सा है दिल तिरा अंजुम
कौनसी बात पर तू पुर ग़म है

रुसवा किया है तूने महफ़िल में खुद बुला के

रुसवा किया है तूने महफ़िल में खुद बुला के
छोड़ेंगे हम भी ऊनी हस्ती को अब मिटा के

कहते थे आएंगे हम बरसात आयेगी जब
बरसात भी गयी है आखिर हमें रुला के

ऐ दिल तुझे ये तेरी खुद्दारियां मुबारक
चलता हूँ हर जगह में दुनिया से सर उठा के

ये सिसक सिसक के जीना कोई ज़िन्दगी नहीं है
तुम तो न जाओ हमसे दामन को यूँ छुड़ा के

कश्ती का अब ख़ुदा ही आकर बने मुहाफ़िज़
बचना है ग़ैर मुमकिन आसार हैं फ़ना के

आती तो होगी तुमको उन मौसमों की यादें
गाते थे गीत हम तुम मिल जुल के जब वफ़ा के

तूफां के बीच अंजुम जिसने मुझे बचाया
मारा उसी ने आखिर साहिल पे मुझको ला के।

जब वफ़ा का चराग़ जलता है 

जब वफ़ा का चराग़ जलता है
प्यार हर सू फ़ज़ा में पलता है

पैर इंसान का जब फिसलता है
कारे-दरिया में जा निकलता है

रौंद देता है ये जहां उसको
गिरने वाला कहां सम्भलता है

ज़िंदा रहने के फ़न से है वाकिफ़
वक़्त के साथ जो बदलता है

जो पुजारी है नफ़रतों का मगर
परचमे-अम्न ले के चलता है

लोग करते थे कल सलाम जिसे
आज वो सर झुका के चलता है

चल तो निकले हैं देखना है मगर
रास्ता किस जगह निकलता है

पा ही लेता है अपनी मंज़िल को
बांध कर क़स्द जो निकलता है

हर परस्तिश के वो बशर क़ाबिल
रुख़ हवाओं के जो बदलता है

प्यार का सिलसिला न रख जारी

प्यार का सिलसिला न रख जारी
प्यार दिल पर हुआ है अब भारी

ख़ौफ़े-दहशत है दिल पे अब तारी
हम हैं और एक तेग़ दो धारी

चोट दिल पर लगा कोई कारी
ताकि रग रग से खून हो जारी

ज़ब्ते-ग़म की रही है ताब कहां
दिल पे अब दुख का बोझ है भारी

पायदारी कहां है रिश्तों में
प्यार में भी छुपी है अय्यारी

आन वाहिद में हो गया ओझल
आह ज़ालिम की बर्क़ रफ्तारी

खुद नहीं आये न भेजा कोई पैग़ाम तक

खुद नहीं आये न भेजा कोई पैग़ाम तक
राह उनकी हमने देखी ज़िन्दगी की शाम तक

ज़िन्दगी के पेचो-खम से तक चुका हूँ इस क़दर
कब पहुंचता है सफ़र ये देखिये अंजाम तक

आप से रग़बत है हमको आओ से है वास्ता
लोग वरना राबिता रखते हैं अपने काम तक

मैं कभी भूला नहीं हूँ फ़र्ज़ की तक्लीम को
और लड़ा हूँ ज़िन्दगी से ज़िन्दगी की शाम तज

थरथराई ये ज़मीं सकते में आया आसमां
ग़म से घबरा के बढ़ा जब हाथ मेरा जाम तक

याद रहता है फ़क़त हम को उसी का नाम अब
बेख़ुदी में भूल बैठे हैं हम अपना नाम तक

मतलबी दुनिया में अंजुम तेरे ग़म बांटेगा कौन
राबिता रक्खेंगे तुम से लोग अपने काम तक।

कल तक थी जो आमादा-ए-ईसार निगाहें

कल तक थी जो आमादा-ए-ईसार निगाहें
शर्मिंदा हैं क्यों आज वो ग़म ख़्वार निगाहें

मजबूर है कि आज वो खुद्दार निगाहें
जो कर न सकी प्यार का इज़हार निगाहें

झुकती ही चली जाती है क्यों बारे-हया से
देती नहीं क्यों दावते-दीदार निगाहें

आइने- दिल में जो किया अपना नज़ारा
मायूस से चेहरा था तो बीमार निगाहें

करते हैं निगाहों ही निगाहों में जो हम बात
देती है हमें मात वो हुशियार निगाहें

पूछी है निगाहों ने निगाहों से कोई बात
इकरार करे या करे इंकार निगाहें

सरमस्त बना देती है माहौल को यकसर
उठ जाती है जिस सम्त हो मयख़्वार निगाहें

अंजुम जो लुटाती थी कभी फूल हंसी के
क्यों आज है अफसुर्दा वो गुलबार निगाहें।

आज़ाद गुरदासपुरी 

मुझे ये जान कर मसर्रत हुई कि जनाब ईश्वर दत्त अंजुम का शेरी मजमूआ “भीगी पलकें” शाया होने जा रहा हैं जनाब ईश्वर दत्त अंजुम साहिब किसी तआरूफ के मुहताज इस लिए नहीं है कि मौसूफ़ मोतबर उस्ताद शायर जनाब राजेन्द्र नाथ रहबर क्व बिरादरे-अकबर तो हैं ही, इस के बावजूद बज़ाते-खुद खुश-गो वा खुश फ़िक्र जाने पहचाने शायर हैं। उन्होंने उर्दू शेरी रिवायत की उस खास रौ को आगे बढ़ाने की कोशिश की है जिस में मज़्मून-आफरीनी और ज़बान की लताफतें जल्वागर होती हैं और ये चीज़ हर किसी को आसानी से मयस्सर नहीं आती। वो खुद फरमाते हैं:-

-मेरी फ़िक्र-ए-सुख़न के शहबाज़ो
खुद को ऊँची उड़ान में रखना

देखा आप ने अंजुम साहिब ग़ज़ल का कितना सुथरा मज़ाक़ रखते हैं। मौसूफ़ ने मंदर्जा-बाला शेर की तख़लीक़ में अपनी जिस नाज़ुक खयाली और शाइस्ता-मिज़ाजी से शेर की सूरत में जो पैकर ( आकार) तराशा है वो लाइके-तहसीन (प्रशंसनीय) भी है और क़ाबिले-सद-सताइश (श्लाघा योग) भी।

ईश्वर दत्त अंजुम साहिब के अशआर पढ़ कर जदीद शायरी की पैदा-कर्दा बद-गुमानियां दूर हो जाती हैं क्योंकि उन्होंने अपने अशआर को किसी बात, किसी मक़सद के तहत तख़लीक़ (निर्माण) कर के और सजा सँवर के आप की ज़ियाफते-तबअ ( मनोरंजन) के लिए आप की खिदमते-अक़दस में पेश किया है।

जब कि आज के बेशतर शोरा हज़रात खुद को हर क़ैद-ओ-बंद से आज़ाद मुतसव्वुर ( ख़याल) करते हुए ऐसी ऐसी अजीबो-गरीब मूशीगाफियों के मुतर्किब (कर्ता) हो रहे हैं कि उन के कलाम को पढ़ कर दिल को कैफो-सुरूर के एहसास की बजाये कोफ़्त (घुटन) महसूस होने लगती है लेकिन ईश्वर दत्त अंजुम साहिब ने आने अशआर में ख़याल की नुदरत (नवीनता) परवाज़े-तख्ययुल (कल्पना की उड़ान) की बुलंदी, ज़बान की शिरीनी (मिठास) ताज़गी, शिगुफगी, नगमगी, बर्जस्तगी को बरूए-कार (काम में) ला कर अंदाज़े-बयान को इस क़दर पुर-कशिश (आकर्षक) और पुर-असर बना दिया है कि ये शेरी मजमूआ “भीगी पलकें” बजा तौर पर इस बात का हक़ रखता है की इसे क़द्र की नज़र से देखा जाये, पढ़ जाये और जनाब ईश्वर दत्त अंजुम की क़द्र-दानी की जाये।

मैं जनाब ईश्वर दत्त अंजुम साहिब की पेशगी मुबारकबाद देता हूँ और दुआ करता हूँ कि मौसूफ़ का ये शेरी मजमूआ मक़बूल और सरसब्ज़ हो।

आमीन!

हसीब सोज़

ईश्वर दत्त अंजुम ने अपनी ग़ज़ल को प्लास्टिक के फूलों से नहीं सजाया है। उन की शायरी के सारे किरदार सहरा की धूप की तरह हैं, जिन्हें किसी तौर झुटलाया नहीं जा सकता। उन्होंने मौजूआत को ज़रीया-ए-दाद बनाने के लिए शायरी को “आईटम सॉन्ग” नहीं बनाया है। बल्कि इस खुरदुरे पत्थर को इंतिहाई नरमी से छूने की कोशिश की है और यही नरमी तहज़ीबे-इश्क़ की रिवायत भी रही है। मुलाहज़ा कीजिए चंद अशआर:-

• जिस को चाहा है दिलो-जान से अब तक तूने
दिल वो तोड़े तो चरागों को बुझा कर रोना

• अब भी तन्हाई में उस को याद कर लेता हूँ मैं
जिस ने हाले-दिल न मुझ को आज तक कहने दिया

• हासिल निजात होगी शबे-ग़म से भी कभी
मुद्दत से आरज़ू-ए-सहर कर रहे हैं हम

• दिल का उजाला मिट गया जल्दी
रात से पहले रात हुई है

• आजज़ी से मिलो ति फिर जानो
क्या मज़ा आजज़ी से मिलता है

• मेरी फ़िक्र-ए-सुख़न के शहबाज़ो
खुद को ऊँची उड़ान में रखना

अंजुम साहिब के शेरी अफ़कार में दिल से दिल तक पहुंचने की यात्रा भी मौजूद है। हक़ीक़त ये है कि अगर ज़िन्दगी गर्दे-वफ़ा से आलूद है तो भी बेवफ़ाई के उजले पन से बेहतर है। कुछ और शेर मुलाहज़ा कीजिये:-

• हुजूमे-यास में तन्हा न थे कभी इतने
कि आज जितने अकेले हम अपने घर में हैं

• ये बुढापा भी क्या क़ियामत है
फिर से बचपन से जोड़ता है मुझे

• कोई कितना सगा भी बन जाये
फ़ासिला दरमियान में रखना

मैं तीसरे चौथे दर्ज़े का तालिब इल्म इस अक़ीदे पर यकीन रखता हूँ कि शेर अपने आप में एक “फाईनल डिसीजन” की हैसियत रखता है और उसे किसी तौसीफ वा तारीफ की ज़रूरत नहीं होती।

राजेन्द्र नाथ रहबर

ईश्वर दत्त अंजुम साहिब और मुझ में बहुत सी समानताएं हैं। कुछ एक का वर्णन यहां करता हूँ। अंजुम साहिब का जन्म पंजाब के ज़िला गुरदासपुर के क़स्बा शकरगढ़ के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। क़स्बा शकरगढ़ इसी नाम की एक तहसील का सदर मक़ाम था। मेरा जन्म भी इसी क़स्बा के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्हों ने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड मॉडल मिडल स्कूल शकरगढ़ में शिक्षा प्राप्त की, मैं भी इसी स्कूल का विद्यार्थी था। श्री अंजुम के पिता पं. त्रिलोक चंद शकरगढ़ में वकालत करते थे, मेरे पिता जी भी शकरगढ़ में वकील थे। अंजुम साहिब की छोटी बहन का नाम शकुन्तला था, मेरी बड़ी बहन का नाम शकुन्तला था। हम दोनों उर्दू शायरी में गहरी रुचि रखते थे। समानताएं और भी बहुत सी हैं किन्तु मैं प्यारे पाठकों को ज़ियादा देर भ्रम में नहीं रखूंगा। श्री ईश्वर दत्त अंजुम मेरे सगे बड़े भाई हैं। जब वह लाहौर के विक्टोरिया डायमंड जुबली टेक्निकल इंस्टिट्यूट में मकैनिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कोर्स कर रहे थे तो उर्दू शायरी की बहुत सी किताबें और मैगज़ीन शकरगढ़ लाया करते थे और अपने बहुत प्यारे तरन्नुम में झूम झूम के पढ़ा करते थे। मैं सुनता तो मुझे बहुत अच्छा महसूस होता। उर्दू के शब्द मुझे अच्छे लगते थे। वहीं से मेरे दिल में उमंग पैदा हुई कि मैं शायर बनूँगा। खैर! वक़्त बड़े मज़े से गुज़र रहा था । हर एक छोटे से पुर-अम्न क़स्बा में रह रहे थे। सभी क़स्बा वासी एक दूसरे को जानते थे और एक दूसरे के लिए हमदर्दी भरे जज़्बात रखते थे। हिन्दू थे, मुसलमान थे, एक घर सिक्खों का भी था। आबादी बढ़ हज़ार के करीब थी। कभी कोई फसाद नहीं हुआ। अचानक मुस्लिम लीग के सियासी किस्म के जलसे होने लगे। धुआं धार तकरीरें होने लगीं, माहौल गर्माने लगा। मैं कोई तक़रीर सुनता तो इतना ही समझ पाता कि ” इके मुर्ग है खुश-लहजा कि कुछ बोल रहा है”।

पाकिस्तान का क़ियाम अमल में आया। खून की नदियां बहने लगीं। हिन्दू मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये। रास्तों पर कुश्तों के पुश्ते लग गये। ज़ालिमों के ज़ुल्म से चंगेज़ियत भी शर्मा गई। मकीनों को ज़मीन के हाल पर खून रोने लगा। “ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को”। ज़ुल्म की आंधियां चल रही थीं। बस्तियां नज़रे-आतिश हो रही थी। नन्हें बच्चों और औरतों पर खंजर आज़माई हो रही थी। मां बहन के पैरहन उतारे जा रहे थे। जिन छातियों से दूध पी कर जवान हुए थे, उन्हें काटा जा रहा था। नौजवान लड़कियों का अपहरण हो रहा था। वक़्त की आंख ने कत्ल और खूं-रेज़ी का यर नज़ारा भी देखा कि इंसानी सिरों का हार रेलवे इंजन के गले में पहना कर रेल गाड़ियां रवाना की जा रही थीं और जवाब में वैसी ही गाड़ियां मौसूल हो रही थीं। सभ्य और पढ़े लिखे लोगों की ज़बानें भी शोले उगल रही रही थीं। “कोई हिन्दू कोई सिख कोई मुसलमां निकला / एक चालीस करोड़ों में न इंसां निकला”। फिर आबादी के तबादला (स्थान्तरण) का दौर शुरू हो गया। बंटवारे में तहसील शकरगढ़ पाकिस्तान को मिल गई। भारत से पलायन कर के जाने वाले मुहाजिरों ने हमारे घरों को घेर लिया। दरवाजों पर हथियार-बन्द मुहाजिर बैठ गये। हम ने अंदर से दरवाजों को ताले लगा लिए। शकरगढ़ की हिन्दू आबादी की हिफाज़त के लिए नौजवान हिन्दू लड़कों का एक जत्था बनाया गया। श्री अंजुम उस जत्थे के मुखिया बनाए गये। ऐसे में हमारा एक संस्कृत टीचर पं. शिव नन्दन शर्मा रंग रेज़ का भेस बना कर शकरगढ़ से निकलने में कामयाब हो गया। और अमृतसर में पं. नेहरू से मिला और हालात की जानकारी दी। अगली सुब्ह एक हवाई जहाज ने शकरगढ़ पर उड़ानें भरीं। लोगों के हौसले बुलन्द हुए। दहशत गर्द घबराये। शाम होते होते फ़ौज़ की सोलह जीपें जिन में 48 फोजी जवान थे शकरगढ़ के सरकारी डाक बंगले में ख़ैमा-ज़न हो गये। अंग्रेज़ कमांडर ने इलाके का निरीक्षण किया और कस्बे के लोगों को 23 अगस्त 1947 को डाक बंगला पहुँचने के लिए कहा। फ़ौज़ की हिफाज़त में लोगों का काफ़िला रियासत जम्मू-कश्मीर के बॉर्डर की और रवाना हुआ। घर से हम ऐसे आलम में निकले,-” कुछ ऐसे मुज़तरिबुल-हाल-ओ-दिल-मलूल गये / कि घर की खिड़कियां भी बन्द करना भूल गये”। यहां तक कि हम अपने चचा स्व. पं. गिरधारी लाल दर्द की बयाज़ ( वह नोट बुक जिस में शायर अपने शेर नोट करता है) भी साथ लाना भूल गये। इस प्रकार हमारे चचा का कलाम हमेशा हमेशा के लिए हमारे हाथों से निकल गया और हम उन की शायरी से हमेशा के लिए महरूम हो गये। शकरगढ़ से पैदल चल कर हम अपने माता पिता और दूसरे सदस्यों के साथ सांबा, कठुआ, माधोपुर, सुजानपुर से होते हुए 2 सितम्बर 1947 को पठानकोट पहुंचे “दर्द के मारे हुए हिन्दोस्तां में आ गये / ज़िंदा रहने के लिए बागे-अमां में आ गये” (पं. रतन पंडोरवी)

पठानकोट में कुछ मुद्दत बे-कार घूमने के बाद मैं न हिन्दू कॉलिज, अमृतसर में दाखिला ले लिया। अंजुम साहिब को देहली इलेक्टिक सप्लाई अण्डर टेकिंग में सर्विस मिल गई। पिता जी पठानकोट में वकालत करने लगे। मेरी बड़ी बहन पठानकोट में बयाही हुई थी, इसी कारण हम यहां आए थे और यहीं के हो गये।

आइये! श्री अंजुम की शायरी का जायज़ा लें। उन की शायरी के आइना में उन की सूरत देखें। ईश्वर दत्त अंजुम साहिब का शेर है-

कोई भी अंजुमन हो उस में मुझे
मर्तबा शायरी से मिलता है।

बहुत ख़ूब शेर है और सच्चाई पर निर्धारित है। अब मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर मुलाहिज़ा हो। फरमाते हैं “सौ साल से है पेशाए-आबा सिपह गरी / कुछ शायरी ज़रीयाए-इज़्ज़त नहीं मुझे”। मिर्ज़ा ग़ालिब के पूर्वज फ़ौज़ में होने के कारण तलवार के धनी थे। मिर्ज़ा के विचार में तलवार के धनी का दर्जा एहले-क़लम से ज़ियादा है। वह अपने बाप दादा के जंगी कारनामों पर गर्व करते थे। मिर्ज़ा ग़ालिब के पिता मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग खाँ अलवर के राजा की फ़ौज़ में थे और 1802 में एक लड़ाई में मारे गये थे। मिर्ज़ा ग़ालिब के चचा नसरुल्ला बेग मरहट्टों की ओर से आगरा के किलादर थे। बाद में वह अंग्रेज़ फ़ौज़ में 400 सवारों के रसालदार मुक़र्रर हुए और 1806 में एक लड़ाई में मारे गये। मिर्ज़ा ग़ालिब फरमाते हैं कि सौ साल से मेरे पूर्वजों का पेशा सिपाह गरी है, शायरी मेरे लिए कोई इज़्ज़त का ज़रीया नहीं। इस शेर में मिर्ज़ा ग़ालिब ने अस्ल में बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद शैख़ इब्राहिम ज़ौक़ देहलवी पर चोट की है। ज़ौक़ शायरी में बादशाह के तनख्वाह-दार थे और इस नौकरी को इज़्ज़त का ज़रीया समझते थे। मिर्ज़ा ने लतीफ़े अंदाज़ में इज़्ज़त के इस ज़रीया को एक तरह से ठुकरा दिया है। बहरहाल दोनों शेर अपनी अपनी जगह ख़ूब हैं। यहां स्व. अर्श मलसियानी का एक ऐसा शेर दर्ज करता हूँ ” जी चाहता है ‘अर्श’ करूँ तर्के-शायरी / लेकिन यही ज़रीया-ए-इज़्ज़त है क्या करूँ”। बहुत ख़ूब।

आज कल ज़िन्दगी करना कितना कठिन हो गया है उस का नक़्शा अंजुम साहिब ने बड़े उम्दा तरीके से और बहुत अच्छे शब्दों में इतनी सलीक़ा-शआरी से खेंचा है कि हक़ीक़त खुल कर सामने आ गई है। फरमाते हैं-

माथे से पोंछते हैं पसीना ब-हर कदम
तय जिंदगी का ऐसे सफ़र कर रहे हैं हम

सच है आज कल ज़िन्दगी को दो कदम चल कर पसीना आ जाता है, यह बात जब सब पर रोशन है। एक और शेर में फरमाते हैं:-

रज़्ज़ाके-दो जहां मुझे देता है रिज़्के-ग़म
वो दे रहा है और लिये जा रहा हूँ मैं

शायर को परमात्मा से जो कुछ मिल रहा है वह उसे प्रभु की रिज़ा समझ कर क़ुबूल करता है और होंटो पर कोई शिकवा गिला नहीं लाता। शायर की कनाअत ( निस्पृहता) की दाद देनी चाहिए। अंजुम जी का एक और शेर देखें:-

वो पुजारी है नफ़रतों का मगर
परचमे-अम्न ले के चलता है

यानी “हुशियार कि आये हैं सरे-मंज़रे-आम / गुर्गाने-कुहन साल नये जामे में”। पुराने भेड़िये नये लिबास में औए हैं, सभी भेडें हुशियार रहें। “नये लिबास में निकला है रहज़नी का जुलूस”।

ज़िन्दगी की ना-पायदारी और नश्वरता की तरह इशारा करते हुए क्या ही अच्छे अशआर कलम-बन्द किये हैं, कहते हैं:-

– चंद ही रोज़ चहचहाना है
चंद ही दिन का आबो-दाना है
इक सराय है ये जहाँ सारा
काम सारा मुसाफ़िराना है

– जो भी आया है जायेगा आखिर
आरज़ी इस जगह बसेरा है

– था यकीं जिन की पायदारी का
वो फ़क़त बुलबुले थे पानी के।

अंजुम साहिब का विचार है कि पुख्ता इरादे से ही इंसान को कामयाबियां मिलती हैं, मंज़िलें कदम चूमते हैं। मज़बूत इरादे वाले लोगों के दिये तेज़ रौ आंधियां में भी जलते हैं।

– अज़्मे-रासिख ही देखना इक दिन
आंधियां मव दीया जलायेगा

– कट ही जायेगी रात भी ग़म की
मेरी नज़रों में इक सवेरा है।

कुछ चेहरे ऐसे खुश बख़्त,खुश इक़बाल, बख्तावर और इक़बाल मन्द होते हैं कि उन के दर्शन कर के काम पर निकलें तो सभी काम सिद्ध हिट चले जाते हैं। कुछ चेहरे मनहूस और मकरूह होते हैं, बने बनाए काम बिगाड़ने वाले। अंजुम साहिब फरमाते हैं-

उन का दीदार कर के ऐ अंजुम
शेर कहते तो नाम हो जाता

देश प्रेम के विषय पर शायरों ने हर दौर में शेर कहे हैं और रंगा रंगी पैदा करने कज कोशिश की है, लेकिन अंजुम साहिब का अंदाज़ जुदागाना हैसियत का हामिल है।

– शाख़ की खैर मांगता हूँ मैं
शाख़ ओर मेरा आशियाना है

यहां शाख़ से मुराद प्यारा भारत है।

ज़िन्दगी इंसान को अपने कई रंग दिखाती है, कभी अच्छा कभी बुरा किन्तु अंजुम को ख़ुदा की ज़ात, ख़ुदा के फ़ैज़ पर पूरा विश्वास है

अंजुम ख़ुदा के फ़ैज़ से मायूस तो न हो
जामे कई बदल के फिर आती है ज़िन्दगी

एक शेर देखिये! किस शान का मज़ेदार शेर है-

शान से जीना, शाम से मरना
ज़िन्दगी में कई अदा रखना

वक़्त की गर्दिश से अंजुम निराश नहीं होते, बल्कि यह कह कर दिल को तसल्ली देते हैं-

हमें भी साबिका गर्दिश से है तो क्या अंजुम
ये चांद तारे ये सूरज भी तो सफ़र में हैं

“शिमला” पर अंजुम साहिब ने शेर कहे हैं। मुलाहज़ा फरमाएं-

– इक सवेरा है गुनगुनाता हुआ
एक शादाब शाम है शिमला
है ये ‘शौक़’ ओ ‘शबाब’ का मसकन
कितना आली मकान है शिमला

शौक़ यानी सुरेश चंद्र शौक़ और शबाब यानी डॉ. शबाब ललित।

रोने वालों के लिए भी अंजुम के पास पैग़ाम है-

तुम को इना है तो महफ़िल न सजा कर रोना
दिल का हर दर्द ज़माने से छुपा कर रोना
वो भी रोयेंगे तो रोने का मज़ा आयेगा
रोने वाले कभी उनको भी रुला कर रोना

लूट खसूट और भ्रष्टाचार के इस मौसम में अंजुम बड़ी विनम्रता से अपना हक़ मांगते हैं कि मेरे हिस्से की टूटी फूटी झोंपड़ी या कोई क्षति ग्रस्त मकान तो रहने दो:-

छोटी सी झोंपड़ी हो कि ख़स्ता मकां रहे
कुछ तो मिरे लिए भी ऐ हिन्दोस्तां रहे

और फिर बेबसी और बेचारगी का इज़हार इस प्रकार करते हैं-

कैसी है ये बिसात जहाने-खराब की
अंजुम हर एक चाल यहां हर रहे हैं हम

आखिर में अंजुम साहिब के कुछ और अशआर पेश कर के इस दास्ताने-दिल पज़ीर को यहीं खत्म करता हूँ। इन अशआर में शायर की आत्मा को भिन्न भिन्न रंगों में देखा जा सकता है-

-शाम उतरी तो शाम के साये
साथ अपने उदासियाँ लाये

-उस ने मानी न एक भी इन की
अर्ज़ करती ही रह गयी आंखें

– गर्दे-ग़म में रस्ते गुम हैं
मंज़िल मंज़िल मात हुई है

– दामे-नफ़रत से रहो दूर महब्बत सीखो
प्यार इंसान को इंसान बना देता है

– करते हैं निगाहों ही निगाहों में जो हम बात
देती हैं हमें मात वो हुशियार निगाहें

– हंसते हुए गुलों की कतारों के दरमियाँ
अफसुर्दगी में ख़ूबी हुई इक कली मिली

– ऐ दिल तुझे ये तेरी खुद्दारियां मुबारक
चलता हूँ हर जगह मैं दुनिया में सर उठा के

– ऐ नसीम-ओ-सबा मिरे घर की
खिड़कियों से भी राबिता रखना

ख़ुदा करे अंजुम साहिब का कलाम दूर दूर तक अपनी शुहरतों की बस्तियां क़ायम करे और उन का फानूसे-सुख़न हमेशा हमेशा जगमगाता रहे।

तकती रहती है सूए-दर मुझको

तकती रहती है सूए-दर मुझको
यूँ भी करती है शब बसर आंखें

आंख से वो नज़र नहीं आता
देखना है तो बन्द कर आंखें

वो तो रहता है मेरे दिल में जिसे
ढूंढ़ती हैं इधर उधर आंखें

वो तिरे इंतज़ार का आलम
हो गयीं संग, सर-बसर आंखें

वक़्ते-रुख़्सत नमी सी आंखों में
लोहे-दिल ओर नक़्श तर आंखें

मौसमे-बरशगाल हो जैसे
ऐसे बरसी हैं टूट कर आंखें

उस के जल्वों की ताब ला न सकीं
हो गयीं मेरी बे-बसर आंखें

किस को अब ढूंढती हैं ऐ ‘अंजुम’
कुल ज़माने से बे-ख़बर आंखें।

नामाबर भी न मोतबर निकला

नामाबर भी न मोतबर निकला
राज़दां हो के पुर-ख़तर निकला

प्यार में हम ने वो कशिश देखो
ज़हर नफ़रत का बे-असर निकला

मेरी किस्मत में थी वो तारीकी
एक तारा न रात भर निकला

बारहा हम ने सर को टकराया
फिर भी दीवार में न दर निकला

मौत आई न थी तो खटका था
मौत आई तो दिल से डर निकला

शहर की भीड़ में मुझे लाया
रास्ता कितना पुर-ख़तर निकला

मैं समझता था जिस को दूर-अंदेश
पास आया तो कम-नज़र निकला

उस की रहमत में कुछ कमी न थी
मेरा दामन ही तंग-तर निकला

आंख पुर-नम न हो सकी ‘अंजुम’
दामने-दिल तो तर-बतर निकला।

राह तकती ही रह गयीं आंखें

राह तकती ही रह गयीं आंखें
सदमा फुरकत का सह गयीं आंखें

खुद ही बरपा किया था सैले-अश्क़
और खुद उस में बह गयीं आंखें

कर न पाई मिरी ज़बां जो बात
उस को चुपके से कह गयीं आंखें

कोई भी तो न कुछ समझ पाया
सरे-महफ़िल जो कह गयीं आंखें

उस ने मानी न एक भी उन की
अर्ज़ करती ही रह गयीं आंखें

उम्र भर राह देखते रहना
जाते जाते ये कह गयीं आंखें

तुम हो क्यों अब उदास ऐ ‘अंजुम’
जो भी कहना था कह गयीं आंखें।

आदमी वो भला नहीं होता

आदमी वो भला नहीं होता
जिस को ख़ौफ़े-ख़ुदा नहीं होता

नहीं होता है मोतबर वो प्यार
जिस में रंगे-वफ़ा नहीं होता

याद करता हूँ उस की रहमत को
जब कोई आसरा नही होता

बात करने को दिल तो करता है
हां मगर हौसला नहीं होता

ये तो हालात की है मजबूरी
वरना कोई बुरा नहीं होता

इश्क़ की बार-गाह में ‘अंजुम’
कुछ ज़बां से अदा नहीं होता।

शब अंधेरी है रौशनी लाओ 

शब अंधेरी है रौशनी लाओ
उस के जल्वों की चांदनी लाओ

ऐ हवाओं! वो खो गया है कहां
उस की ख़ुशबू ही तुम कभी लाओ

छुप के बैठे हो लाख पर्दों में
रूबरू आ के हर खुशी लाओ

दूर माहौल की हो बेरंगी
उन की आंखों से दिलकशी लाओ

हम मसीहा-नफ़स कहेंगे तुम्हें
ज़र्द चेहरों पे ताज़गी लाओ

जो तरसते हैं मुस्कुराने को
ऐसे होंटो पे नग़मगी लाओ

उस की रहमत हो मेहरबाँ ‘अंजुम’
अपनी आंखों में कुछ नमी लाओ

ग़म दे के मुझे आपने बख्शी है ज़िन्दगी

ग़म दे के मुझे आपने बख्शी है ज़िन्दगी
अब मेरी ज़िन्दगी मुझे लगती है ज़िन्दगी

हंसने का नाम ज़िन्दगी और ख़ामुशी का मौत
दोनों के बीच ही तो भटकती है ज़िन्दगी

हर शय करीब आ के बहुत दूर ही गयी
कितनी उदास अब मुझे लगती है ज़िन्दगी

बैचैन दिल का सजदा भी होता नहीं क़ुबूल
दिल में हो जब सुकून हसीं लगती है ज़िन्दगी

कैसे करे गुरेज़ भला ज़िन्दगी से हम
आइना ले के हाथ में बैठी है ज़िन्दगी

अपने वतन की इज़्ज़तो-हुरमत के वास्ते
क़ुर्बान होने वालो को मिलती है ज़िन्दगी

क्यों अपनी बेबसी में तुम अंजुम उदास हो
हंसती भी है कभी अगर रोती है ज़िन्दगी।

आप आये तो हर ख़ुशी आई

आप आये तो हर ख़ुशी आई
ज़र्द पत्तों पे ताज़गी आई।

जिस की आमद का था यकीन हमें
लौट कर वो न ज़िंदगी आई।

यूँ रुलाया मुझे ज़माने ने
फिर न लब पर कभी हँसी आई।

प्यार तुम को मिला जमाने का
मेरे हिस्से में बेकसी आई।

दिल निशाना बना इताबों का
चार जानिब से अबतरी आई।

ग़म तो आता है रोज़ ऐ ‘अंजुम’
और मुसर्रत कभी कभी आई।

हर लम्हा आह आह किये जा रहा हूँ मैं 

हर लम्हा आह आह किये जा रहा हूँ मैं
हर लहजा खून दिल का पिये जा रहा हूँ मैं

पाले हुए हैं कांटे भी बादे-बहार के
कांटों से भी निबाह किये जा रहा हूँ मैं

है आंख अश्क़ बार तो दिल सोग बार है
जीने का इक गुनाह किये जा रहा हूँ मैं

रज़्ज़ाके-दो जहां मुझे देता है रिज़के-ग़म
वो दे रहा है और लिए जा रहा हूँ मैं

गो शायरी ज़रीयाए-इज़्ज़त नहीं है अब
फिर भी इसी की चाह किये जा रहा हूँ मैं

अंजुम हुजूमे-ग़म पे किसी का चला है ज़ोर
उसकी रज़ा से फिर भी जिये जा रहा हूँ मैं

जम्हूरियत के साथ ही भारत की शान है

जम्हूरियत के साथ ही भारत की शान है
छब्बीस जनवरी है बड़ा दिन महान है

सारे जहाज में इस की अनोखी ही शान है
मशहूर कुल जहान में हिंदुस्तान है

आजादिए-वतन का है शैदा हर इक बशर
अपने वतन पे सब की निछावर ये जान है

हरगिज़ ये बरतरी में किसी से नहीं है कम
मेहनत कशी में आगे सभी से किसान है

मिल जुल के कर रहे हैं हिफाज़त वतन की सब
अफ़ज़ल मगर सभी से तो फौजी जवान है

जंगल, पहाड़, खेत हैं, दरिया भी हैं रवां
ये देश वो है जिस पे ख़ुदा मेहरबान है

‘अंजुम’ निगाहे-बद से बचाये इसे ख़ुदा
किस दर्जा दिल-नशीं ये तिरंगा निशान है।

रात ग़म की बसर नहीं होती

रात ग़म की बसर नहीं होती
ऐ ख़ुदा क्यों सहर नहीं होती।

उसके जलवे को देख ले दिल में
ऐसी तो हर नज़र नहीं होती

वो तो बैठा है छुप के हर दिल में
दिल को लेकिन ख़बर नहीं होती

दिल ही रोता है आंख के बदले
आंख अब अपनी तर नहीं होती

वो शबें भी गुज़र ही जाती हैं
जिन शबों की सहर नहीं होती

अपने असरात छोड़ जाती है
इल्तिजा बेअसर नहीं होती

रास्ते भी भटक गये अंजुम
राह भी हमसफ़र नहीं होती।

दिल के अरमान जब मचलते हैं 

दिल के अरमान जब मचलते हैं
हसरतों के भी पल निकलते हैं

टूटे दिल भी कहीं बहलते हैं
वो तो बस आंसुओं में ढलते हैं

ठेस लगती है उस घड़ी दिल को
लोग जब रास्ते बदलते हैं

है वही कामयाब दुनिया में
वक़्त के साथ जो बदलते हैं

मौसमे-बरशगाल हो जैसे
अश्क़ आंखों से यूँ निकलते हैं

जब ज़मीं पर क़ियाम है सब का
लोग क्यों कितना फिर उछलते हैं

जब भी होता है सामना उनका
जिस्मो-जां एक साथ जलते हैं

अज़्म उकता अगर वो ऐ अंजुम
रास्ते खुद ब-खुद निकलते हैं।

शब की जब तक नहीं सहर होगी

शब की जब तक नहीं सहर होगी
ये नज़र जुज़्वे-संगे-दर होगी

ले के जाये जो मुझको मंज़िल पर
ऐसी कोई तो रहगुज़र होगी

हादिसों से भरी है ये दुनिया
आज कुछ कल को कुछ खबर होगी

ऐ कनखियों से देखने वाले
ये अदा कितनी पुर-ख़तर होगी

दर्द बक्शा है उसकी यादों ने
आंसुओं में ही अब बसर होगी

जिसकी यादों में गुम है तू अंजुम
क्या उसे भी तेरी ख़बर होगी

खुद्दारियां मिरी वो यूँ पल में गिरा न दे

खुद्दारियां मिरी वो यूँ पल में गिरा न दे
खदशां है दिल में दर पे वो आके सदा न दे

हर कोई दे रहा है बहर गाम इक फ़रेब
डरता हूँ दिल में वो कहीं मुझको दग़ा न दे

मजबूर ज़ब्ते-हाल पर इतना न कर मुझे
दिल की घुटन कहीं मिरे दिल को जला न दे

आंखें मिरी तरसती रहे दीद के लिए
संगीन इस क़दर भी वो मुझको सज़ा न दे

सिहने-चमन में अब तो शिगुफ्ता है हर कली
शादाबए-चमन को कोई अब सदा न दे

नफ़रत की आग पहले ही भड़की है शहर में
कोई ख़ुदा के वास्ते उसको हवा न दे

लिखता हूँ तेरा नाम समंदर की रेत पर
डरता हूँ कोई लहर उसे आकर मिटा न दे

अंजुम यूँही बने रहे दिल प्यार मेहर के
मजबूरियां वो अपनी मुझे फिर गिना न दे।

मैं जिसे ढूंढा किया हर सू वो मेरे दिल में है 

मैं जिसे ढूंढा किया हर सू वो मेरे दिल में है
मैंने जिस दिलबर को चाहा वो इसी महफ़िल में है

कर गया हम से किनारा और जुदाई दे गया
उसको क्या मालूम क्या कोई किस क़दर मुश्किल में है

देखिये अब दार मिलती है हमें या उसका दर
कामयाबी इस की अब जज़्बा-ए-कामिल में है।

मंज़िलें सब तय हुई और अब कोई मंज़िल नहीं
प्यार मेरा अब तो अंजुम आखिरी मंज़िल में है

सफ़ा-ओ-सिद्क़ का पौदा किसी ने जब लगाया था

सफ़ा-ओ-सिद्क़ का पौदा किसी ने जब लगाया था
हवस से दूर उल्फ़त का दिया दिल में जलाया था।

जब आंखों से कोई आकर मिरे दिल में समाया था
मिरे हक़ में महब्बत का तराना उसने गाया था

खुशी के अश्क़ निकले थे हुई थी आंख भी रोशन
न भूलेगी वो साइत जब कोई दिल में समाया था

हमारे प्यार का पौदा तरो-ताज़ा रहे हर दम
हवाए-गर्म-ए-दुनिया से इसे हम ने बचाया था

न भूलेगा कभी मुझको खुशी का वो हसीं लम्हा
कि भाई बन के जब ‘रहबर’ मिरी दुनिया में आया था।

हर दिल हम को सर्द मिला है

हर दिल हम को सर्द मिला है
अरमानों में दर्द मिला है

जख़्म जिगर के जब भी कुरेदे
उनमे तेरा दर्द मिला है

दर से तुम्हारे कुछ तो लाये
तुम न मिले तो दर्द मिला है

प्यार की गर्मी नहीं दिलों में
दहर में हर दिल सर्द मिला है

मेरे दिल का दर्द जो बांटे
कोई न ऐसा फर्द मिला है

मायूसी का है ये आलम
इक चेहरा ही ज़र्द मिला है

दर्द कहां मिलता है सबको
दिल वालों को दर्द मिला है

किसे ढूंढता फिरे जहां में
दिल आवारा गर्द मिला है

सच्चे लोग कहां अब अंजुम
जो भी मिला बेदर्द मिला है।

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