ईश्वर करुण की रचनाएँ

गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें

वेदना औ ‘ हर्ष की अभिव्यक्तियाँ गढ़ें
आओ मीत गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें

सिंह पूजने लगा है लोमड़ी की मांद को
दे रहे हैं भोज रोज राहु -केतु चांद को
एक गीत हम प्रणव के मंत्र सा ऐसा लिखें
जिससे लोग भेंट अब न काल की चढ़ें
आओ मीत गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें

रो रहा है क्रौञ्च किन्तु बाल्मीकि मौन है
किसके आंसुओं की आज चिंता करता कौन है
सर्जना के संग करें स्वत्व की गवेषणा
वर्जना से मुक्त नयी सूक्तियाँ गढ़ें
आओ मीत गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें

सूर्यमुखी बेहया के फूल से लजा रही
कृष्ण की मुरलिया छीन पूतना बजा रही
छल रही हमें है आस पास की मरीचिका
कुछ करो कि अब न तमोवृत्तियाँ बढ़ें
आओ मीत गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें

रक्त से विरक्त लोग भक्त बने काल के
कंधे पर झूल रहा विक्रम वैताल के
आज से ये बात अपने मन में चलो ठान लें
इस भुवन में सात्विकी प्रवृत्तियाँ बढ़ें
आओ मीत गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें

नये वर्ष के मंगल क्षण हों

नये वर्ष के मंगल क्षण हों ,नयी नयी हो बातें
नर्तन करते सुप्रभात हों ,गुन गुन करती रातें

आँख- आँख में सुन्दर सपने ,अधर- अधर ‘अमरित’ हो
हाथों में हो शस्त्र भले पर ,मन में ‘राम चरित’ हो
आयुधवाले हाथ सूत तकली पर भी कुछ कातें

शक्ति आणविक भक्ति मानविक व्यक्ति-व्यक्ति पावन हो
बच्चा -बच्चा ध्रुव -नचिकेता , हर नारी चंदन हो
विदुर- नीति अपनायें ,छोड़ें महाभारती घातें

कहर न हो लहरों का धरती नाचे मगन गगन में
शहर- गाँव खुश रहें ,रहे न ज़हर किसी के मन में
सूखे रहें न वृक्ष और भूखी रहें न आँतें

पतझड़ का षड़यंत्र फल गया 

पतझड़ का षडयंत्र फल गया
हिया जुड़ाया काँटों का
मन के ऊपर राज हो गया
निर्वासित सन्नाटों का

जाने क्या कह दिया तुम्हें , उस दिन मैं ने कचनार तले
कोस-कोस उस एक घड़ी को कितने दिन और शाम ढले
अब तक खुला नहीं ताला
क्यों तेरे हृदय कपाटों का

भँवरे तो प्रतिद्वन्द्वी थे ही, फूल भी बैरी बन बैठे
तान भृकुटियाँ तितली भागी,कोयल-पपिहे तन बैठे
नौकाएँ विद्रोह कर गयीं,
साथ दे दिया घाटों का

मान भी जाओ, छोड़ भी दो तुम ओढ़े हुए परायापन
अच्छा नहीं कि जेठ के हाथों बेचें हम अपना सावन
मिले प्रीत तो खिल जाता है,
तन-मन मूर्ख-चपाटों का

गंध का न गाँव पड़े बन्धक

गंध का न गाँव पड़े बन्धक
अनुबन्ध बस इतना
रस की सौगंध खाएँ कंटक
सहबंध बस इतना

दंभ का न युद्ध हो ,न सच से कहीं बैर हो
हो प्रसन्न मित्रता दरिद्रता के पैर धो
व्यक्ति हो न व्यक्ति का आखेटक
प्रतिबंध बस इतना

अपनी अपनी अस्मिता की ओर सब सचेत हों
किन्तु राष्ट्र के लिए जो स्वर हो वे समवेत हों
हो विवेक चरण के नियंत्रक
सम बंध बस इतना

कण कण माँ भारती का पूज्य सब को हो सके
मन में दिव्य दृष्टि लिये सृष्टि भार ढो सके
हो सकें दायित्व के निर्वाहक
स्कंध बस इतना

नेह के नगर में

नेह के नगर में विश्वास की धरोहर
लुटने न पायें कभी ,मीत इसे देखना
काँटे सकुचायें ,गायें सन्नाटे सोहर
मिटने न पाए कभी कोयल की चेतना

डार हरसिंगार की दे मात झंझावात को
रात की चुनौतियाँ छले न सुप्रभात को
बंजरों में भी वसंत ला सकें गुलमोहर
व्यर्थ नहीं जाये अमलतास की उपासना

पीढ़ियों के पुण्य को प्रपंच घेर पाये ना
कान्हा की बाँसुरी को कंस टेर पाये ना
राम-राज वाला हर गाँव हो मनोहर
विहँसती रहे कल की उज्ज्वल सम्भावना

शीत और दूब का समीकरण रहे बना
ऋतुओं के ओठ पर न हो कभी आलोचना
प्रेम की हवा में जियें चंडीगढ़ -अबोहर
हृदय -हृदय बोयें हम आओ सद्भावना

एक पापा की आत्म-स्वीकृति

मेरे बच्चों!

मैंने तुम्हें कश्मीर की घाटियों में देखा था
तुम्हीं तो थे
जो बर्फ से पटी घाटी में
अपनी उष्णता के भरोसे
बर्फ के लोदों से खेल रहे थे.
और मेरी गुजरती कार की
विंडस्क्रीन पर
तुमने अपनी निश्छल मुस्कान
चस्पाँ कर दी थीं

मेरे बच्चों!

तुम्हीं तो थे
बिहार से गुजरती
मेरी बस को देखकर
अनजानी खुशी से चिल्लाते,
एक हाथ से ढीले नाड़े को संभालते
और दूसरे में मिट्टी का लोदा लिये.
फिर उसी अमूर्त लोदे को
अपनी निश्छल बुद्धि से।
मूर्त्त बनाने का प्रयास करते,
निर्माण का बीज वपन करते थे!

मेरे बच्चों !
नागालैंड में छोटी आँखें
पर बड़ा चेहरा औयर उससे भी
बड़ा मन लिये,
गुजरात में
बुजुर्गों वाला बाना धारण किये,
बंगाल में टुनमुन-टुनमुन चलते,
बस्तर में टुक-टुक तकते,
राजस्थानी धोती-मिर्जई में तुम्हीं तो थे.
केरल से गुजरती मेरी रेलगाड़ी को
देखने भी तुम्हीं घरों से
निकल आये थे
अपने हाथ हिलाते, मस्कुराते, शोर मचाते
…..बिलकुल मेरी ‘मुनिया’ मेरे ‘टिंकी’
मेरे ‘सत्तो’, मेरे ‘विशु’ जैसे.
चारमीनार की बगलवाली गली में
मेरे रिक्शे के रुकने पर
तुम्हीं तो किलक रहे थे जोर-जोर से
“अब्बा आ गए पापा आ गए…”
…यही तो लगा मुझे
मेरी अपनी भाषा में!
तब
भाषा की दीवार को छलाँग कर
तुम्हारी संवेदनशीलता ने
मेरी मूँछों के बाल गिनने
शुरू कर दिये थे!
हर जगह मैं अवाक रह गया
… मेरे मुनियाँ! मेरे ही सत्तों ….!!
मेरे बच्चों तुममें जो साम्य की सौम्यता है
जो समन्वय है
और
जो है अपनेपन की मुस्कान
शोर…./ हिलते हाथ….
हैरान हूँ मैं
कैसे बचा रह गया तुममें
मुझमें क्यों नहीं!
मैं, तुम्हारा पापा!
बँटता रहा-
दाढ़ी वाले—- टोपी वाले…
उत्तर वाले….. दक्षिण वाले
और न जाने कितने-कितने वालों में
अपने भले-पूरे वजूद को
कुलबुलाते कीड़ों-जैसे वजूद में
तब्दील होते देखता रहा.
तुम मेरे ऊपर भारी पड़ते रहे
मैं छोटा लगता रहा.
तो क्या समाजशास्त्रीय परिभाषा
सिर्फ तुममें सच है?
“बच्चा पिता का पिता होता है,”

मेरे बच्चों!
मैं एक हिन्दुस्तानी बाप
बाप से पापा में तो ढाल रहा हूँ
पर कहीं, खुद को ही छल रहा हूँ
मेरे बच्चो!
एक नकारा सोच से मुक्ति के लिये
तुम्हारी मदद का
‘याचक’ हो गया हूँ मैं
दोगे?
बदले में
तुम्हें आशीर्वाद देना चाहता हूँ
कि तुम्हारी मुसकाने…
तुम्हारी किलकारियाँ…
तुम्हारा ढीला नाड़ा
तुम्हारे हिलाते हाथ
सलामत रहें
इतने शक्तिशाली हों
कि एक बाप का स्रोत
वहीं से फूटे
और मैं देखता रहूं
तुम्हारे ढीले नाड़े
तुम्हारे हिलाते हाथ…. !

मेरी कविताओं की ओर 

सागर तुम से और तुम सागर से
अपना-अपना भला चाहते हो
और जानते हो कलाएँ भी
अपने से सिलसिलाबद्ध जोड़ लेने की
एक दोसारे से, स्वयं को

जिन्हें तुम रेत समझते हो
वे रेत नहीं
बुरादों में परिणत सिसकियाँ हैं,
जिन पर बैठ समन्दर की ओर
मुँह किये
टाँग देते हो क्षितिज में
तुम अपनी उदासी.
अपनी आँखों के रास्ते
बहान देना चाहते हो
हृदय की समस्त घनीभूत संवेदना!
छिड़क देना चाहते हो
अपनी अभिलाषाओं की राख़!
पसार देते हो अपनी एकरसता के
रिसते हुए कुहासों को
उसकी लहरों पर.
…. फिर लौटने लगते हैं
तुम्हारे पाँव
सिसकियों को कुचलते
वापसी की सुखद अनुभूति लिये.
तुम रह गये उन्नीस!
और तुम्हें पता भी नहीं चल पाया
कि सागर यहाँ भी तुमसे बीस निकल गया.

वह तो स्वयं ऐसे “किसी” की प्रतीक्षा में
था ही
जिसके अंदर
अपनी खलबलाती असीमित वेदनाओं को
उँड़ेल सके
लहरे, जिन्हें तुम दिख भर रहे थे
वे लहरे नहीं
सागर की सारी वेदनाओं को
ढो-ढोकर लाती
उसकी व्यथा-पुत्रियाँ थी
जिनकी चंचला पर मुग्ध
तुम उन्हें देखते रहे….. देखते रहे
भरते रहे सागर की पठाई सौगात से
अपना अन्तर्मन
सागर का क्या, वह तो हल्का हो गया
उसके किनार
सिसकियाँ के बुरादे की थोड़ी
मात्रा और बढ़ गयी
जिन्हें तुम रेट समझ

पाँवों तले रौंदते लौट आये हो-
मेरी कविताओं की ओर….

प्रण 

वक्र सामाजिक मान्यताओं में
घुटकर रह गयी है
मेरी वेदना
और
आकुल अभिव्यक्ति.
नित नूतन
इस वृद्ध का ने
परिस्थितियों की जंजीर से
जकड़ दिया है
मेरे मन-प्राण को
अस्मिता की भूल-भुलैया में.
छाती पर निरंतर
लटक रहे हैं
अभाव,
समस्या और
अनुत्तरित रक्त्वीर्यवंशी
प्रश्नों के त्रिशूल
कागज पर फैलाही स्याही पीकर
विद्वता का दंभ भरने वालों ने
अपनी टपकती लारों की
कालिख से
कागज रंगे हैं
(कागज का कोई कोना कोरा नहीं है)
हर कैनवास पर
पाँवों के चिन्ह पड़े हैं,
मेरे बिम्ब टूट रहे है.
सिर्फ एक चिथड़ा
मेरे मुमूर्षु अंतर ने
जाने किस अंतिम क्षण के लिए
बचा रखा है
इस छोटे से
अंधे आकाश में
सूरज की प्रतीक्षा है
जब मानवता की आँसुओं की बूंदों में
मैं अपनी आशाओं की
जली चिता के
कोयले घिस कर,
लिखुंगा …..
गीत नव-निर्माण का.

चोरे महथा

था
एक चोरे महता.
जाति की उपाधि
चिपकी हुई थी जिसके नाम के साथ.
माँ ने नाम रखा
‘चोरे’

इसलिए नहीं कि वह चोर था
वरन इसलिए कि वह
चोर नहीं बने
यही सोच थी उस बूढ़ी माँ की
उसके नामकरण के पीछे
और था के अनुराग
कि वह उसे सदा बढ़ती
ऊँचाई से न जाने.
जाने तो अपने भोले
चोरे को ‘चोरे’ से जाने
सिर्फ चोरे से.
सचमुच
चोरे ‘चोर’ नहीं हुआ
नाम के प्रभाव ने
उसे कहीं से भी नहीं छूआ
किन्तु उसके नाँव का शोर
कई-कई गाँव में हुआ
क्योकि चोरे का
जैसा अनूठा नाम था,
काम भी,
ग्रामीण संस्कृति की
अजस्र धारा बहती थी
उसके साथ.
बहा ले जाता था वह
गाँव के बच्चे-बूढ़े-जवानों को
अपने भाव में,
कभी बूढ़े वैद्य जी को भूत बनकर
भूत के अस्तित्व पर
विश्वास करने को विवश करता
कभी सोनकी चाची के
उलझे रूखे केश वाले
पोपले मुँह की नकल उतारता,
चिढ़ाता,
कभी राम लीला में बंदर की
सजीव भूमिका निभाता
वह बच्चो को हँसाता
नौजवानो को हँसने-हँसाने के लिए
अपने करतब के किस्से सुनाता.
चोरे को अभावों ने नहीं ढूँढा था
वरन वही
सैकड़ों दीन-दुखियों के अभावों को
ढूँढता और पिछुआता रहता था.
किन्तु
अब चोरे महथा
किसी शहर में खो गया.
अब कोई चोरे महथा हुआ नहीं करता गाँव में…..
और ण उसकी पीढ़ी ही बाकी है
चोरे महथा इतिहास का
हिस्सा बन गया है…
किन्तु उसका किस्सा वर्तमान को
अब भी प्रभावित करने हेतु आतुर है
मैं,
इन पंक्तियों का बुद्धिजीवी लेखक
इस नाम की महता
और गाँव की सत्ता में
चोरे को महसूस तो कर सकता हूँ
किन्तु अपने बच्चे का नाम
चोरे महथा रख नहीं सकता
रखता हूँ- बबलू, डब्लू, टोनी…
सिर्फ कह भर सकता हूँ
‘था एक चोरे महथा’.

ओ पंद्रह अगस्त! मेरे उत्तर?

ओ पंद्रह अगस्त!
स्वाधीनता से मिली
अस्मिता और पहचान
हमने तुममें सामो दिये
उलीच डाला अपना
सर्वस्व तुम्हारे लिये
सारे प्रश्न, सारे उत्तर
कर दिये तुम्हें समर्पित
किन्तु आज
तुम मेरे उत्तर लौटा दो
क्योंकि मेरे सामने ‘प्रश्न’ है
प्रश्न प्रतिष्ठा का नहीं
प्रश्न रोजी रोटी का भी नहीं
और न अस्तित्व का ही है
बल्कि प्रश्न है – हमारी अस्मिता का.
ओ पंद्रह अगस्त !
राष्ट्र का धृतराष्ट्र
कितना विवश खड़ा है!
कौरवी सेना लिये
कितने-कितने मोर्चों पर
दुर्योधन अड़ा है।
कहीं रावणी अट्टाहास है
तो कहीं रक्त बीजी प्यास
हम स्वतंत्र तो हैं
रहेंगे भी
किन्तु मेरी अस्मिता को
परतंत्र बनाने का
जो षड्यंत्र है
हम उससे उबरना चाहते हैं
राम-कृष्ण-दुर्गा
या हजरत या ईसा के
भरोसे नहीं
अपनी उन्हीं उत्तरों के भरोसे
जिसे हमने ही तुम्हें
वर्षों पहले सौंपे थे
ओ पंद्रह अगस्त!
तुम मेरे उत्तर लौटा दो,
बस उत्तर लौटा दो.

आदमकद 

भूख से अधमुँदी
याचना करती आँखे
फैलती सिकुड़ती
एक आशा लिये
अदने से उस अधमुए आदमी की थीं।
उसने फैला दी अपनी हथेलियाँ
बताया, दो दिनो से
कुछ खाया नहीं था,
मुझे वह मेरा हिंदुस्तान लगा,
और
मैंने बड़े जतन से
बिटिया की फटी फ्राक
बदलने की जुगाड़ में बचाई
‘दो टाकिया
रख दिया उसकी सूखी हथेली पर
हथेली रूखी ही रही
किन्तु भेज दिया संदेशा
उसकी अंतरियों को
उसकी भूख को दबाकर
आँखों में उग आया
आशा का पिलपिला-सा बिड़वा।
पुन; आगे बढ़ा तो मिला
आस्था के संकट में जीवित
बापू की अधमैली खादी में लिपटा
कंधे पर अंगोछा रखे
अदना-सा ही एक आदमी
उसने फैला दिया अपना अंगोछा
बताया-
दो दिनों में विकास को
हमारी चेरी बनाना चाहता है
मुझे वह भी मेरा हिंदुस्तान लगा
और
मैंने जतन से बचाकर राखी
लोकतंत्री पूंजी ‘वोट’
उसके अंगोछे में दाल दिया
इस आशा में की मेरा बेटा
रोटियाँ खा सकेगा कल
उसका अंगोछा अधमैला ही रहा
लेकिन भेज दिया संदेशा
उसकी मूछों को,
उसकी मूछें ताँती चली गयीं
वह खास बन गया,
विकास का बिड़वा
उसके तलवे तले दब गया

कल
मैंने अपनी पगड़ी रख दी
उसके ‘नार्थ स्टार’ पहने पाँवों पर
माँग ली अपने हिंदुस्तान के लिए
थोड़ी-सी शांति की भीख
फिर क्या था
मेरी याचना पर
वही नहीं
उसकी पूरी बिरादरी हो गई अशांत
उसके कारिंदों ने
मुझे उठाकर फेंक दिया
मैं अपने ‘हिंदुस्तान’ पर गिरा
धूल झाड़ी, उठ खड़ा हुआ
‘हिंदुस्तान’ के स्पर्श से
चमत्कार हो गया
नुझे मेरा कद बढ़ता दीखने लगा,
अरे, मैं याचक नहीं
दाता हूँ सिर्फ दाता,
मैं प्रतीक्षा में हूँ अब
अपने कद के थोड़ा और बढ़ जाने तक
ताकि मैं स्वयं में
एक ‘हिंदुस्तान’ बन सकूँ
विकास को गढ़ सकूँ।

डूब जाएगा ही मझधार में जाकर नैया

डूब जाएगी ही मझधार में जाकर नैया
जानवर ही मैं चढ़ा हूँ अरी ओ पुरवैया।

रोज हाथों में अपने बेटे की एक लाश लिये
जूझती रहती है उस पार एक बूढ़ी मैया ।

राष्टद्रोही हूँ और न लाश का हूँ सौदागर
मुझको कह लो भले काफिर-विधर्मी-तनखैया ।

जो गिद्ध है वो जश्न मौत की मनाते है
मनाती खैर जिन्दगी की भोली गौरेया।

है कौन मौत से परे ये बख्शती है किसे
तो आओ जिन्दगी के लिए लड़के मरें हम भैया ।

दुश्मन के जवानों से ण एटमबम के निशानो में

दुशमन के जवानों से न एटमबम के निशानों से
डर लगता है बस केवल मजहब की दुकानों से ।

बकरे जीबह के लिए एक जगह मुकर्रर है
हक भी छिन गया है ऐसा बेबस इन्सानों से।

है दाँत हवाओं के पाइने ओर जहरीले
अफवाह उछालों मत चढ़ चढ़ के मचानों से।

रिश्ते आदमीयत के चाहते जो गर कायम रहे
रिश्ते तो अलग कर लो कौवे का ‘कानों’ से1 ।

गाये बुलबुल की या तूती गीत होगा अमन का ही वो
रोंनके गुलसिताँ बढ़ेगी इनके शामिल तरानों से।

‘ईश्वर, जानता है जहां की निस्तनाबूड ही हो गया
जब भी पत्थर चलाया गया शीशे के मकानों से।

सोसती सिरी लिखा ‘ईश्वर’ ने ईद मुबारक यार कलाम

सोसती सिरी लिखा ‘ईश्वर’ ने ईद-मुबारक यार कलाम
रहे बुलंद सितारे और तकदीर चकाचक यार कलाम।

धर्म तुम्हारा, धर्म हमारा माना अलग-अलग लेकिन
जीवन की सच्चाई में हम दोनों पूरक यार कलाम।

दूध-सेवियाँ, टोपी-कुर्ते क्या हिन्दू क्या मुस्लिम के
भूखे नंगों को जकात का सब को है हक यार कलाम

साथ दूर तक चले वही जो दोस्त बने हैं सुख-दुख में
दुश्मन बनकर चल पाया है कौन कहाँ तक यार कलाम।

पैदा हो शक भाई-भाई में ईद-दिवाली लड़ लड़े
हम न सुने ऐसी नीयतवालों की बक-बक यार कलाम।

भाभी हैं कह रही नमस्ते भेज रही हैं माँ आशीष
अम्मा का खत दुआ भरा पहुंचा ‘ईश्वर’ तक यार कलाम।

थोड़ा लिखना, बहुत समझना कलम बंद करता हूँ अब
मानवता के द्वार पे दें हम दोनों दस्तक यार कलाम।

सहमे हुए मौसम में कब गुलाब खिले हैं !

सहमे हुए मौसम में कब गुलाब खिले है
सहमी हुई आँखों में भी क्या ख्वाब पले है !

अनुबंध किनारों से और नदी से छेड़-छाड़
इन ढुलमूली बातों से क्या सैलाब टले है !

लाये जो इंकलाब लंगोटी में ही रहे
पराज के किरदार के किमखाब सिले है !

केसर हो या हो चाय या गेहूं की रोटियाँ
क्या स्वाद दें, कश्मीर और पंजाब जले है !

घर से गली की मोड़ तक आती थी संग हँसी
खतरे में उसके साथ अब जनाब गले है !

रस्ते हों बन्द ‘ईश्वर’ जो सारे मुकाम के
ऐसे में ‘नमस्कार’ और ‘आदाब’ फले हैं !

नये वर्ष में मंगल क्षण हों

नये वर्ष में मंगल क्षण हों
नयी – नयी हों बातें
नर्त्तन करते सुप्रभात हों
चुम्बन लेतीं रातें

रेती में लगे गुलमोहर गुलशन में वीराना है 

रेती में लगे गुलमोहर गुलशन में वीराना है
दरिया से है मुंह फेरे कतरे का फसाना है

दिल अब नहीं धड़केगें आशिक और माशूक के
जज़बात के खेतों में कम्प्युटर उपजाना है

बारूद के साये में पलटे है यहाँ रिश्ते
आदम के ठिकाने पर हौवा का निशाना है

इस दौरे-सियासत में तरक्की का ये नुस्खा है
तुमको यदि खाना है तो हाकिम को खिलना है

इस शब्बे सियाही में एहसासे तनहाई है
कहने को एक ‘ईश्वर’ है सुनने को जमाना है

धुआँ उठा है दिल में मेरे, कमी हुई कुछ मस्ती में 

धुआँ उठा है दिल में मेरे, कमी हुई मस्ती में
लगता है की आग लगी है शायद तेरी बस्ती में ।

लहर चिढ़ाती है मुंह मेरा, भँवर चुनौती देता है
लगता है कि लगा है भरने पानी तेरी कश्ती में ।

फिर कोई इलजाम लगा है तुझ पर दुनियाँवालों का
मुझे पकड़ ले गयी पुलिस, रात चली वो गश्ती में ।

फिर की है खुदखुशी की कोशिश तुमने मेरी फुरकत1 में
दुनियाँ के बाजार बिकी कल मौत बड़ी ही सस्ती में ।

तेरी वफा से दुनियाँ का शायद हर आशिक मात हुआ
कोई नहीं मशगूल मिला मुझको खुदगर्जपरस्ती2 में ।

‘ईस्वर’ पता नहीं चल पाया थका ढूंढकर ‘ईश्वर’ को
सिमट गई है खुदा की हस्ती शायद तेरी हस्ती में ।

तन गयीं हैं मुट्ठियाँ आकाश में 

तन गयी हैं मुट्ठियाँ आकाश में
खोंट आए हैं निकाल विश्वास में !

आज के अस्तित्व को हम रौंदकर
खोजते हैं अस्मिता इतिहास में!

खूं खंजर से हो या की त्रिशूल से
देश मरता है हरेक ही लाश में!

गाने दो बुलबुल को भी कोयले को भी
क्या रखा है इस विरोधभास में !

हों न ‘ईश्वर’ फूल जब कई रंग के
क्या मज़ा तुम ही कहो मधुमास में !

फूलों का एक शहर कोई मुझको तलाश दो

फूलों का एक शहर कोई मुझको तलाश दो
जी जाऊँ जिन्दगी जो बस इतनी सी आश दो।

कितनी है चीड़-फाड़ की रस्मों अदायगी
अब भी तो रहम करके तमन्ना की लाश दो।

तुम ले लो सब अलफाजे-लोगदे है मुझे कुबूल
जी लूँगा मैं खुशी से बस इक लफ्ज ‘काश’ दो ।

मेरी तपिश सहेगा कहाँ गुच्छे हरसिंगार
तपते हुए बदन को दहकता पलाश दो।

हल्की सी है उम्मीद मिलेंगे वफा के फूल
उस शहर के पत्थर में गर मुझको तराश दो।

थोड़ी सी गवाही का है बस मुंतजीर करुण
मेरा नाम अपने हाथ से बुत पर खराश दो।

घुटन ही घुटन है शहरे-ए-वतन में

घुटन ही घुटन है शहर –ए -वतन में
लगी पलने दहशत हर एक जेहन में ।

हवा को मनाही है गुल से न खेले
हुए हुक्मराँ खार अब हर चमन में ।

चटकने की बंदिश लगी हर कली पे
है घेरा अंगारों का इस अंजुमन में ।

हो बुलबुल के खूं से मेरी ताजपोशी
ये ख्वाहिश है जंगल के राजा के मन में ।

दुआ तो हुई कैद वर्के-लोगद 1 में
दवा है नमक आज मजर्रे- जलन में ।

सियासत हुई आज मुफलिस की बेटी
उठा ले गया जिसने चाहा भवन में ।

नीलामी कलम की न होने दो ‘ईश्वर’
बचा एक कतरा जो खूं है बदन में ।

उठा कदम भले कोई, मगर दिल से पूछ ले 

उठा कदम भले कोई मगर दिल से पूछ ले
मुश्किल नहीं कुछ भी, तू खुद मुश्किल से पूछ ले ।

उजड़ना भी है जमाने का चलन, बसना भी
उदास होने में पहले किसी महफिल से पूछ ले ।

थपेड़े सह के भी पीछे कभी नहीं हटता
कभी तो नाव आती ही है ये साहिल से पूछ ले ।

हमेशा भागने की कोशिशें नाकाम हो गयीं
किसी ने छु ही दिया है उसे, मंजिल से पूछ ले ।

‘ईश्वर से मिलने की अगर खाहिश जगे तुममें
राहो-पता मुफलिस के घायल दिल से पूछ ले ।

पंक्तियों में सिमट गया मन (कविता)

मन के विस्तार को
आकाश की नई
होती आवश्यकता
आकाश किसी मन में
सिमानते के लिए होता भर है,
आकाशों की भरमार
हुआ करती है मन में
क्योंकि मन है कि
टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटकर
मेरे तुम्हारे उसके आकाश को
लील जाता है.
और लेता है पचा भी
किन्तु मन का विस्तार
बारह खड़ी के टेढ़े-मेढ़े अक्षरों की
छोटी-छोटी पंक्तियों में
समाने को रहता है तत्पर
और विवश भी
और पंकित्यों है कि
अलग-अलग अपने आकाश का
विस्तार करने लगती है
जिसमें समा जाती है।
वेदनाओं की घनीभूत
अभिव्यंजना वाली नीहारिकाएँ
सुखों के जाने कितने सौर-मण्डल
सौरमण्डल के जाने कितने –कितने ग्रह
लगते हैं लगाने चक्कर
मैं उन्हीं पंक्तियों की सीढ़ियाँ
तय कर जाना चाहता हूँ
तथाकथित स्वर्ग में.
जो सातवें आकाश के
ऊपर है कहीं शायद
या फिर सात तलों के नीचे
कहीं किसी कोने में पड़े
निर्वासित सुख की खोज में
मेरी पूंजी हैं पंक्तियाँ
उन्हीं में सिमटा है मेरा मन
और मना में सियाकड़ों हजारों
आकाश समेटे
जीने को अभिशापित हूँ मैं.
मैं अगर मर गया तो
उन पंक्तियों की भ्रूण-हत्या हो जायेगी,
और लगेगा भरने संसार में शून्यता।
इसलिए मैं जीऊँगा
तुम भी जीना मेरे मित्र।
लिखना कुछ पंक्तियाँ….
और समेटना मन को…. आकाश को।

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