उज्जवला ज्योति तिग्गा की रचनाएँ

धरती के अनाम योद्धा 

इतना तो तय है कि
सब कुछ के बावजूद
हम जिएँगे जंगली घास बनकर
पनपेंगे / खिलेंगे जंगली फूलों-सा
हर कहीं / सब ओर
मुर्झाने / सूख जाने / रौंदे जाने
कुचले जाने / मसले जाने पर भी
बार-बार,मचलती है कहीं
खिलते रहने और पनपने की
कोई ज़िद्दी-सी धुन
मन की अन्धेरी गहरी
गुफ़ाओं / कन्दराओं मे
बिछे रहेंगे / डटे रहेंगे
धरती के सीने पर
हरियाली की चादर बन
डटे रहेंगे सीमान्तों पर / युद्धभूमि पर
धरती के अनाम योद्धा बन
हम सभी समय के अन्तिम छोर तक

बाँस की नन्ही-सी टहनी 

जड़ों का
सघन जाल
रच देता है
एक अद्भुत दुनिया
ज़मीन के अंदर
काफ़ी गहरे तक
कोमल तंतुओं का जाल
कि बाँस की नन्ही-सी टहनी
सब कुछ भुलाकर
खेलती रहती है आँख-मिचौली
उन जड़ों के
अनगिन तंतुओं के
सूक्ष्म सिरों की भूलभूलैया में छिपकर
उस अन्धेरी दुनिया में बरसो तक
बग़ैर इस बात की चिंता किए
कि क्या यही है लक्ष्य
उसके जीवन का
क्योंकि जीवन तो
जी्ना भर है
हर हाल में

यह बात वो बाँस की टहनी
जानती है शुरू से ही
इसलिए रहती है निश्चिन्त
कि तयशुदा वक़्त के बाद
उसका भी समय बदलेगा
कि रखेगी वो भी क़दम
रोशनी की दुनिया में किसी दिन
और अपने लचीलेपन पर मजबूत
इरादों से रचेगी एक
अद्भुत दुनिया
वो कमजोर नाज़ुक मुलायम-सी टहनी

उसे अक्सर सुन पड़ती है
अजीब-सी सरसराहट और सुगबुगाहट
अपने आस-पास की दुनिया में
जो हँसती खिलखिलाती
बढ़ती जा रही है
अन्धेरों से रोशनी की ओर
उस नई दुनिया के
कितने ही सपने संजोए
वहाँ पहुँचने की जल्दी में
एक दूसरे से
धक्का-मुक्की करती
लड़ती-झगड़ती
जिसका सपना
न जाने कबसे
घुमड़ रहा है उनके
चेतना के फ़ेनिल प्रवाह में

पर छोटे से झुरमुट
की ख़ामोश दुनिया में
बाँस की टहनी
रहती है अपनी जड़ों के क़रीब
अपनी दुनिया की सच्चाईयों से सराबोर
कि टिकी रहे
हर चुनौती के सामने
अपने मजबूत इरादों के साथ
वो कमज़ोर मुलायम-सी टहनी

जंगली घास

नहीं चलता है तुम्हारा
या किसी का
कोई भी नियम / कानून
जंगली घास पर
भले ही काट-छाँट लो
घर / बगीचे की घास
जो साँस लेती है
तुम्हारे ही
नियम कानून के अधीन

पर / बेतरतीब
उबड़-खाबड़ उगती घास
ढक देती है धरती की
उघड़ी देह को
अपने रूखे आँचल से
और गुनगुनाती है कोई भी गीत
मन ही मन
हवा के हर झौंके के साथ

जंगली घास तो
हौसला रखती है
चट्टानों की कठोर दुनिया में भी
पैर जमाने का दुस्साहस
और उन चट्टानों पर भी
अपनी विजय पताका
फ़हराने का सपना
जीती है जंगली घास

उपेक्षा तिरस्कार और वितृष्णा से
न तो डरती न सहमती है
बल्कि उसी के अनुपात में
फैलती और पनपती है
अपने ही नियम कानून
बनाती जंगली घास…

कन्फ़ेशन- मिय कल्पा….

तो फ़िर बचता क्या है विकल्प
सिवाय कहने के / मान लेने के / कि
जी मंज़ूर है हमें / आपके सब आरोप
शिरोधार्य है आपकी दी हर सज़ा
जहाँ बांदी हो न्याय / सत्ता के दंड-विधान की
जिसमें नित चढ़ती हो निर्दोषों की बलि
दुष्ट / दोषी हो जाते हों बेदाग बरी
गवाह / दलील / अपील / सभी तो बेमानी है यहाँ
कि जिसमें तय हो पहले से ही फ़ैसले
जिनके तहत / यदि जब-तब
ज़िन्दगी के भी हाशिए से अगर / बेदख़ल कर
धकिया जाते हैं लोग / और
मनाही हो जिन्हें / सपने तक देखने
मनुष्य बने रहने की
नैराश्य और हताशाओं की
काल-कोठरी में / जुर्म साबित होने से पहले ही
काला पानी की सज़ा / आजीवन भुगतने को अभिशप्त

पानी का बुलबुला

मेरे आँसू हैं महज
पानी का बुलबुला
और मेरा दर्द
सिर्फ़ मेरा दिमागी फ़ितूर
उनके तमाम कोशिशों के बावजूद
मेरे बचे रहने की ज़िद्द के सामने
धराशायी हो जाते हैं
उनके तमाम नुस्खे और मंसूबे
अपने उन्हीं हत्यारों की ख़ुशी के लिए
रोज़ हँसती हूँ गाती हूँ मैं
जिन्हें सख़्त ऐतराज है
मेरे वजूद तक से
उन्हीं की सलामती की दुआ
रोज़ माँगती हूं मैं
अजनबी होते देश में
रहने की क़ीमत
रोज़ अपना सिर कटा कर
चुकाती हूँ मैं।

उजाले से 

अक्सर सुना है लोगो को शिकायत करते
उजाले से भला क्या मिला हमें आज तक
उजाले ने तो आकर हमारे सामने
कर दी कितनी ही परेशानियाँ खड़ी
भला किसे जरूरत है उजाले की अब
जब अन्धेरों से ही काम चल जाता है अब
और फिर अब तो
आदत-सी हो गई है अन्धेरों की
सीख लिया है अब तो उजाले के बिन जीना

उजाला तो महज भटकाता है
जाने किन उलजलूल सवालों में उलझाता है
अब भला कौन उसके बहकावे में आए
अपनी हरी-भरी ज़िन्दगियों में
बबूल और ऊँटकटारे बोए
और लहूलुहान पैरों से
बाक़ियों की तरह ज़िन्दगी की दौड़ दौड़े

जब से अन्धेरों में सिमट आई है मंज़िलें
उनके भी पहुँच के भीतर
जब औरों की तरह
उठाकर फ़ायदा अन्धेरों का
उन्होंने भी खोज ली है
काफ़ी मशक्कत के बाद
सुरंगो भरी वो चोर गली
और खोद ली है अपने घरों तक
कई नई सुरंगो का मकड़जाल
चोरी छिपे उस चोर गली तक
जिसके मुहाने पर है मौजूद
बेलगाम समृद्धि का अकूत खजाना
जिसपर था कब्ज़ा अब तक
चन्द चुने हुए लोगो और घरानो का
अब वे भी तो हो गए हैं हिस्सेदार
उन चमकीले चटकीले सपनो का
और हाथ बढाकर छू क़ैद कर सकते हैं उन्हें
अपनी रूखी खुरदुरी हथेलियों में
अपने ही बूते अपनी बुद्धि बल कौशल से

अन्धेरों की चाहत में
छलबल और झूठ प्रपंच से
हाथ मिलाकर
देशनिकाला दे दिया जबसे
गदहे पर बिठलाकर
सच्चाई ईमानदारी और मेलप्रेम जैसे
उज्जड गँवारों को जिन्हें नहीं है तमीज
बदलते समयो के रंगरूप में / खुद-ब-खुद
ढल जाने की
कितना चैन है हर तरफ़
कहीं कोई अप्रिय असहज तान की गूँज नहीं
जो कर दे रंग में भंग मस्ती भरी महफ़िल का

पर उजाले ने दबे पाँव आकर
कर दिया है सब कुछ चौपट
और लेकर आया है वो साथ अपने
कीड़े-मकोड़े सा रेंगते
अनगिनत दावेदारों का
एक अंतहीन हुजूम
जिन्होंने ठानी है
बरसो की भूख मिटाने की
सब कुछ को हजम कर जाने की
किसी छापेमार दस्ते-सा
तहस नहस करने की
चोरी छिपे सेंधमारी के
उन तमाम बेहतरीन और नायाब मंसूबो का
ताकि हो पर्दाफ़ाश अन्धेरों की करतूतों का
और साकार हो उजाले का सपना हर दिल हर घर में

शिकारी दल अब आते हैं 

शिकारी दल अब आते हैं
खरगोशों का रूप धरे
जंगलो में / और
वहाँ रहने वाले
शेर भालू और हाथी को
अपनी सभाओं में बुलवाकर
उन्हें पटाकर
पट्टी पढ़ाकर
समझाया / फ़ुसलाया
कि / आख़िर औरों की तरह
तरक्की उनका भी तो
जन्मसिद्ध अधिकार है / कि
क्या वे किसी से कम हैं / कि
दुनिया में भले न हो
किसी को भी उनका ख़याल / पर
वे तो सदा से है रहनुमा
उन्हीं के शुभचिंतक और सलाहकार
लोग तो जलते हैं
कुछ भी कहेंगे ही / पर
इस सब से डरकर भला
वे क्या अपना काम तक छोड़ देंगे

ये तो सेवा की सच्ची लगन ही
खींच लाई है उन्हें
इन दुर्गम बीहड़ जंगलों में
वर्ना कमी थी उन्हें
क्या काम धन्धों की

विकास के नए माडल्स के रूप में
दिखाते हैं सब्ज़बाग
कि कैसे पुराने जर्जर जंगल
का भी हो सकता है कायाकल्प
कि एक कोने में पड़े
सुनसान उपेक्षित जंगल भी
बन सकते है
विश्वस्तरीय वन्य उद्यान
जहाँ पर होगी
विश्वस्तरीय सुविधाओं की टीम-टाम
और रहेगी विदेशी पर्यटकों की रेल पेल
और कि / कैसे घर बैठे खाएगी
शेर हाथी और भालू की
अनगिन पुश्तें

पर शर्त बस इतनी / कि
छोड़ देना होगा उन्हें
जंगल में राज करने का मोह
और ढूँढ लेना होगा उन्हें
कोई नया ठौर या ठिकाना / कि
नहीं हैं उनके पास
नए और उन्न्त कौशल का भंडार
जिनके बिना नहीं चल पाता/ आजकल
कोई भी कार्य-व्यापार / और
कम्पनी के पालिसी के तहत
बन्धे है उनके हाथ भी
मजबूर हैं वे भी / कि
भला कैसे रख लें वे / उन
उजड्ड गँवार और जाहिलों को
उन जगमग वन्य उद्यानों में
आखिर उन्हें भी तो
देना पड़ता है जवाब
अपने आकाओं को

पर फ़िर भी
अगर बहुत जिद करेंगे तो
चौकीदारों / चपरासियों
और मज़दूरों की नौकरियों पर
बहाल किया जा सकता है उन्हें
कई विशेष रियायतों
और छूट देने के बाद
पर अयोग्य साबित होने पर
छोड़ना होगा
अपने सारे विशेषाधिकारों का दावा !!!

जंगल चीता बन लौटेगा

जंगल आख़िर कब तक ख़ामोश रहेगा
कब तक अपनी पीड़ा के आग में
झुलसते हुए भी
अपने बेबस आँसुओं से
हरियाली का स्वप्न सींचेगा
और अपने अंतस में बसे हुए
नन्हे से स्वर्ग में मगन रहेगा
….
पर जंगल के आँसू इस बार
व्यर्थ न बहेंगे
जंगल का दर्द अब
आग का दरिया बन फ़ूटेगा
और चैन की नींद सोने वालों पर
कहर बन टूटेगा
उसके आँसुओं की बाढ़
खदकती लावा बन जाएगी
और जहाँ लहराती थी हरियाली
वहाँ बयावान बंजर नज़र आएँगे
….
जंगल जो कि
एक ख़ूबसूरत ख़्वाब था हरियाली का
एक दिन किसी डरावने दु:स्वपन-सा
रूप धरे लौटेगा
बरसों मिमियाता घिघियाता रहा है जंगल
एक दिन चीता बन लौटेगा
….
और बरसों के विलाप के बाद
गूँजेगी जंगल में फ़िर से
कोई नई मधुर मीठी तान
जो खींच लाएगी फ़िर से
जंगल के बाशिंदो को उस स्वर्ग से पनाहगाह में

टिड्डियों सा दल बाँधे लौटेंगे वे

ज़िन्दगी भर रेंग घिसट कर
कीड़े-मकोड़ों-सा जीवन जिया
हर किसी के पैरों के तले
रौंदे जाने के बावजूद
हर बार तेज़ आँधियों में
सिर उठाने की हिमाकत की
और समय के तेज़ प्रवाह के ख़िलाफ़
स्थिर खड़े रहने की मूर्खता (जुर्रत) की
और जीवन की टेढ़ी मेढ़ी
उबड़ खाबड़ पगडंडियो पर
रखते रहे / राह में पड़े
कंकड़ और काँटो से घायल
अपने थके-हारे / लहुलुहान क़दम
और सतह पर बने रहने के संघर्ष में
बुरी तरह से घायल / क्षत-विक्षत
आत्मा के घाव रूपी हलाहल को
अमृ्त और आशीष मान
जीवन भर चुपचाप पिया
तो क्या व्यर्थ जीवन जिया

अन्धी गलियों के बंद मोड़ों पर
क्या व्यर्थ ही अपना सिर फ़ोड़ा
कि दीवारों में छुपे बन्द दरवाज़े
खुल जाएँ हरेक के लिए
न कि हो चन्द लोगों का कब्जा
उन चोर-दरवाज़ों के मकड़जाल पर
जिनका सर्वाधिकार सर्वथा सुरक्षित
उनकी आगामी अनगिन पीढ़ियों के लिए
और सेंधमारी में सिद्धहस्त
कायर चापलूसों और चाटुकारों का
लालची हुजूम
चोर-दरवाज़ों की फाँको और छेदों से
झलकते जगमग संसार की चमक से चौंधियाकर
अपने आकाओं के नक्शे-क़दमों पर चलते हुए
दूसरो को रौंदकर और कुचलते हुए
आगे बढ़ने में जिन लोगों को
कभी भी न रहा कोई गुरेज
और नहीं कोई भी परहेज
और अपने तथाकथित
आदर्श और संस्कारों के
ढकोसलों को
अपने हाथों की तलवार और
तीरों की नोक बना
छलनी करता रहा
आस-पास मंडराती भीड़ की
देह-प्राण आत्मा तक को
जिन्होंने भी की हिमाकत
चुनौती बनने की
उनके विश्वविजय के
संकल्प की धज्जियाँ उड़ाने की

बढ़ता रहा बेख़ौफ़ और बेरोकटोक
उनका हुजूम
विलासितापूर्ण समृद्धि के
जगमग राजपथ पर
गर्व से गर्दन अकड़ाए
अपनी तथाकथित
बमुश्किल मिली उपलब्धियों पर
किसी गैस भरे गुब्बारे सा फ़ूला हुआ
हवा के झौंको के साथ साथ
जहाँ-तहाँ उड़ते लहराते

टिड्डियों-सा दल बान्धे लौटेंगे वे
और तहस-नहस कर देंगे
समृद्धि के राजमार्ग की
हर चमक-दमक को
दीमक बन खोखला कर देंगे
चोर-दरवाज़ों के मकड़जाल के
बदौलत बनी हर इमारत की नींव

कीड़े मकोड़ों-सा
अब नहीं रौंदे जाएंगे वे
किसी भी ऐरे गैरों के बूट तले
रेंगना घिसटना छोड़
अब वे उड़ेंगे मुक्त आकाशों में
और दौड़ेंगे वे हिरण सदृश
जीवन की जंगली पगडंडियो पर

चोर-दरवाज़ों के मकड़जाल को
हर तरफ़ से काट-चीर कर
आंखे नोच लेंगे वे
बेनकाब कर उन पाखण्डी रहनुमाओं की
जिन्हें बलि देते रहे वे
अपने बहुमूल्य जीवन को कौड़ियों-सा

अन्धेरों का गीत

मूक बाँसुरी गाती है
मन ही मन
अन्धेरों के गीत
मूक बाँसुरी में बसता है
सोई हुई उम्मीदों
और खोए हुए सपनों का
भुतहा संगीत
देखती है मूक बाँसुरी भी
सपने, घने अन्धेरे जंगल में
रोशनी की झमझम बारिश का
मूक बाँसुरी में क़ैद है
अन्धेरे का अनसुना संगीत

आजादी के नाम एक पाती 

मैं
हवा हूं
धूप हूं
पानी हूं
….
गुदगुदाती हूं हवा बन
अपनी उंगलियों से
किसी बच्चे का
कोमल सा गाल
….
छू लेती हूं फिर धूप बन
अंधेरों से घिरे
हर अनाम चेहरों को
….
टपक पड़ती हूं बूंदे बन
फूलों पर, पत्तियों पर
नन्हीं कोंपलों, अंकुरों पर
….
चाहती हूं
….
श्वास बनू मैं
रक्त बन बहूं शिराओं में
मुस्कान सी बिखर बिखर जाऊं
….
मैं
हवा
धूप
पानी
….
मत रोको मुझे
मैं रूकना नहीं चाहती
मत बांटो मुझे
मै बंटना भी नहीं चाहती
मत बांधो मुझे
मैं बंधना भी नहीं चाहती
….
मैं
हवा
धूप
पानी
….
मेरा न रंग कोई
न कोई रूप मेरा
न कोई भाषा मेरी
न कोई धर्म मेरा
….
मैं
हवा
धूप
पानी
….
फिर क्यों बांध लेना चाहते हो
मुझे क्यों तुल जाते हो बांटने को
क्यों उठा देते हो हर जगह पर दीवारें
क्यों बढ़कर बीच रास्ते में रोक लेते हो
….
मैं
हवा
धूप
पानी
….
मैं स्वछंद निर्द्वन्द
मैं निर्मल उजली
मैं निर्भय शुचि
….
मैं
हवा
धूप
पानी
….
परिचित, अपरिचित
देश, विदेश
हर सीमा के परे
हर बंधन को तोड़
बहती हूं / चलती हूं
….
मैं
हवा
धूप
पानी
….
मत रोको मुझे
मत बांधो मुझे
मत बांटो मुझे

अन्धेरी दुनिया

हमारे हिस्से का उजाला
न जाने कहाँ खो गया
कि आज भी मयस्सर नहीं
हमें कतरा भर भी आसमाँ
ज़िन्दगी जूठन और उतरन
के सिवा कुछ भी नहीं
चेहरे पर अपमान और लाँछन
की चादर लपेट
भटकते हैं रोज़ ही
ज़िन्दगी की गलियों में
आवारा कुत्तों और
भिखारियों की तरह

औरो के दुख है बहुत बड़े
और हमारे दुख हैं बौने
तभी तो हथिया ली है
सबने ये पूरी दुनिया
जबकि हम जैसों को
नहीं मयस्सर जरा सा एक कोना

दुख और ग़रीबी
जिनके लिए हैं
महज लफ़्फ़ाजी या बयानबाजी
..
सो अपने अनझरे आँसू समेटे
हँसते-गाते है सबके लिए
खुजैले कुत्ते-सा
बार-बार दुरदुराए जाने के बावजूद
फिर-फिर लौटते हैं
नारकीय अन्धकूपों में
ताकि अन्धी सुरंग से ढके दिन-रात में
कर सकें नन्हा-सा छेद
कि मिल सके
जरा-सी हवा
जरा-सा आसमान
हमारे बच्चों के बच्चों को भी

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