उज्ज्वल भट्टाचार्य की रचनाएँ

कैकेयी

रनिवास में मैं गोटी खेलती थी
सुमित्रा के साथ.
कौशल्या को फ़ुर्सत ही कहाँ,
वह तो पटरानी थी,
पता नहीं उसे क्या-क्या करना पड़ता था ।

कह सकते हो कि मैं सुखी थी,
या फिर मुझे पता ही नहीं था
कि सुख होता क्या है.
हाँ, मेरा पति वैसा ही था जैसा वह था,
लेकिन वह राजा था ।

और फिर
वह तो हम तीनों रानियों की क़िस्मत थी
गनीमत है कि
कोख भर गई –
कैसे भरी यह मत पूछना ।

और फिर मन्थरा आई ।
मैं तो यही सोचते हुए व्यस्त थी
कि युवराज राम के अभिषेक में
साड़ी कौन सी पहनी जाए ।

मन्थरा की बातों से
मेरे अन्दर कुछ जग उठा –
जो कभी-कभी
एक साए सा दिखकर फिर ग़ायब हो जाता था ।

फिर वो सबकुछ हुआ,
जो तुम कहानियों में पढ़ते हो.
मुझे उन कहानियों में कोई दिलचस्पी नहीं ।

इससे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
जब तुम कहते हो
मैं सौतेली माँ बन गई –
मुख से सुख देकर बूढ़े राजा को मैंने बस में कर लिया ।

इससे क्या आता-जाता है
गद्दी पर मेरा बेटा है या खड़ाऊँ –
मैं राजमाता हूँ ।

मैं न होती
तो रामायण ही नहीं होती ।

ज़राथुस्त्र 

उस बूढ़े ने मुझसे कहा :
हाँ, तुम वही हो,
जो कभी इसी रास्ते से निकल पड़े थे
कहीं दूर जाने को

और फिर तुम कहीं खो गए
वापसी के रास्ते पर
देखता हूँ तुम्हें ।
तुम कितना बदल गए !

मैंने उससे कहा :
हाँ, मैं बदल गया,
क्योंकि
मैं वही हूँ,
जो कभी
रास्ते पर निकल पड़ा था ।

ताकि सिलसिला जारी रहे 

धीरे-धीरे
बिना रुके
ऊपर से
ख़ाली होती जाती है
रेतघड़ी ।

सबकी नज़रों में
रहता है
उसका ख़ाली होना
और वे नहीं देखते
नीचे से वह
भरती जा रही है ।

देर या सबेर
आएगा
वह लमहा
ऊपर जब
ख़ाली होने को
कुछ भी न बचेगा
और इतिहास का कठोर हाथ
उसे पलट देगा

ताकि
सिलसिला जारी रहे ।

न हन्यते 

अपनी बालकोनी से
बाहर फैली हरियाली देखता हूँ ।

कभी न कभी
मुझे भी हरियाली का हिस्सा बनना है,

जो
कड़ी धूप में
या बर्फ़ के नीचे
मुरझा जाने के बाद

खिल उठेगा
बार-बार ।

पहला और आख़िरी

वह पहली घड़ी थी
जब मैंने पूछा था :
तुम कौन हो ?

और मेरा सवाल
गूँजते हुए
जवाब बन गया :

मैं तुम हूँ !

बाक़ी ज़िन्दगी गुज़र गई
तुम और मैं के इस खेल में ।

मन्थरा का उल्लसित विलाप

पीटो, और पीटो !
बुढ़िया हो गई हूँ,
एक अरसे से किसी ने पीटा नहीं ।

राजपुत्र, तुम्हें क्या पता,
इस रनिवास में क्या-क्या होता रहता है ।
दवा बनकर दर्द ऊब से उबरने देता है ।
पीट-पीटकर तुम्हारे हाथ ही थक जाएँगे ।
अकेले कमरे में अपने घावों को सहलाते हुए
कुछ देर के लिए
मैं जवानी के दिनों में लौट जाऊँगी ।

हर चोट मुझे बताएगी
वह चोट मेरी नहीं
कैकेयी की है,
जिसे पीटना
तुम्हारी मर्यादा के विपरीत होता ।

हाँ-हाँ,
पीटो, और पीटो !
एक अरसे के बाद
मुझे छू रहे हैं
राजघराने के हाथ ।

हादसा

“राजीव चौक,
कृपया दरवाज़ों से दूर हटकर खड़े हों.”
मशीनी आवाज़ के बाद
सारी भीड़ हरकत में आ जाती है.
और तभी अचानक पूरे दम के साथ
ट्रेन ब्रेक लगाती है,
सब एक-दूसरे पर गिर पड़ते हैं,
एक परेशानी का माहौल,
कई मिनट तक दरवाज़े बंद ही रहते हैं,
सारे लोग बेचैन हैं,
फिर पता चलता है –
कोई शख़्स ट्रेन के सामने कूद पड़ा था.
यानी कि हमारी शाम अब बरबाद हो चुकी,
जबकि टेलिविज़न में
टी-ट्वेंटी का मैच दिखाया जाने वाला है.

आख़िर क्यों
उसे हमारी ही गाड़ी चुननी थी ?
आख़िर क्यों
उसे यहीं अभी मरना था ?

उसके जिस्म के लोथड़े बन चुके होंगे,
एक भयानक दृश्य होगा,
जिसके अंदर उसकी मौत की कहानी छिपी होगी.
लेकिन उस कहानी से
मेरा क्या वास्ता ?
हज़ारों लोग प्लैटफ़ार्म पर हैं,
बहुतों को टी-ट्वेंटी देखने की बेचैनी सताती होगी,
बिल्कुल मेरी तरह.

उनकी दुनिया मेरी दुनिया है
ज़िंदा लोगों की दुनिया है
यहां मौत की कहानी की कोई जगह नहीं,
कुछ ही देर में
टेलिविज़न पर टी-ट्वेंटी का मैच होने वाला है.

पेरुमल मुरुगन

शहर के चौक के बीच खड़े होकर
उस शख़्स ने कहा :
मुझे पता है
धरती घूमती है
घूमती रहेगी.
मैं पेरुमल मुरुगन हूं.
और मैं ज़िंदा हूं
लेकिन मेरे अंदर का लेखक मर चुका है.
मैं कुछ नहीं लिखूंगा,
मैं कुछ नहीं बोलूंगा.

पास खड़े दोस्त से मैंने पूछा :
कौन है यह पेरुमल मुरुगन ?
उसने कहा : लेखक था,
अब पता नहीं.
क्या लिखता है, मैंने पूछा.
उसने जवाब दिया : पता नहीं,
फिर उसने पूछा : जानना चाहते हो ?
मैंने कहा : पता नहीं,
लेकिन इतना ज़रूर जानना चाहता हूं
कि इसकी अहमियत क्या है ?

उसने कहा :
अहमियत सिर्फ़ इतनी है
कि वह शख़्स चीखते हुए कहता है
कि वह अब नहीं बोलेगा
और सड़क के दोनों ओर सारे मकानों में
खिड़कियां बंद हो जाती हैं,
खिड़कियों के पीछे पर्दे खींच दिये जाते हैं,
पर्दों के पीछे बत्तियां बुझा दी जाती हैं,
तुम और मैं
हम दोनों सड़क के किनारे खड़े रहते हैं.

बयाबां और बस्ती 

मैंने सुना था
बयाबां की सरहद पर
शुरू होती है बस्ती
जहां मिलते हैं
अपने भी.

मैंने बस्ती देखी
और लेौट चला बयाबां की ओर.

टिम्बकटू 

मुझे मालूम है
अफ़्रीका के किसी मुल्क में
कोई शहर है
नाम है टिम्बकटू
वहां के लोग
मुझसे कुछ अलग दिखते हैं
उनकी भाषा अलग है
जो मैं नहीं समझता
वे भी मेरी भाषा नहीं समझते
इन बाशिंदों के लिये
टिम्बकटू अपना है
मेरे लिये पराया है
और इसीलिये मैं वहां होना चाहता हूं.

लेकिन हो सकता है
मैं वहां होऊं
सड़क पर टहलता होऊं
लोग मुझे देखते रहे
दिलचस्पी के साथ
चाय की दुकान पर
जब मैं पहुंचूं
बेंच पर मेरे लिये वे जगह बनावें
मुझसे कुछ कहना चाहें
लेकिन मेरी भाषा उन्हें न आवे
वे सिर्फ़ मुस्कराकर रह जायं
और मैं भी मुस्करा दूं
और वो पराया शहर
टिम्बकटू
अचानक अपना सा लगने लगे…

इसी डर से
मैं टिम्बकटू नहीं गया.

रिजेक्टेड माल 

कहीं कोई कमी रह गई थी
सादी आंखों से पकड़ में भी नहीं आने वाली
लेकिन वो
एक्सपोर्ट के काबिल नहीं रह गया
साहबों के चमचमाते शोकेस के बदले
उसे जगह मिली फ़ुटपाथ पर
अचानक वो
लगभग हर किसी की पहुंच के अंदर आ गया
बेचने वाले शातिर थे
ख़रीदने वाले भी शातिर
दोनों एक-दूसरे को बेवकूफ़ बना रहे थे
वो उनके धंधे का हिस्सा बन गया
दोनों को पता था
वो रिजेक्टेड है
लेकिन है बेशक काम का

बेशक वो काम का है
और रहेगा
अगर पतलून नहीं
तो फिर झोला बनकर

ब्रह्मज्ञान

यह सच है
तुम्हारी हवस के मारे
मुझे भागते फिरना पड़ रहा है
और जिधर भी मैं भागती हूं
तुम्हारा एक चेहरा उभर आता है —
पर इतना जान लो :
मैं नहीं पैदा हुई
तुम्हारे ध्यान से…
तुम्हें धरती पर लाया गया
मेरी जांघों के बीच से…

वो और उसकी कविता

बेचारी औरत का दर्द
दुनिया के सामने रखने की ख़ातिर
एक कविता लिखनी थी
अपनी तसव्वुर से
सहूलियत के मुताबिक
करीने से बनाई
बेचारी औरत की तस्वीर
एक ज़बरदस्त कविता बनी
और मेरी ओर देखते हुए
मुस्कराने लगी

कौरव सभा में 

द्रौपदी की साड़ी खुलती जा रही है
और लिपटती जा रही है
मेरे जिस्म पर
वह शर्म से पानी-पानी हुए जा रही है
नंगी होने के डर से
मैं भी शर्म में डुबा हूं
पुंसत्व का अभिमान खोकर
और टकटकी लगाकर
हम दोनों को देखते हुए
कुत्सित मुस्करा रहा है
हस्तिनापुर !

एक ताकतवर महिला नेता की कविता 

मैं जान चुकी थी
औरत होना मेरी कमज़ोरी थी
और सारे मर्द इसका फ़ायदा उठाते थे
चुनांचे मैंने औरत होना छोड़ दिया
और मुझे सबकुछ मिलती गई —
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
सिर्फ़ कभी-कभी
रात को अकेले
सितारों से भरे आसमान की ओर
बांहे फैलाकर अरज करती हूं —
इज़्ज़त, ताकत, धन-दौलत…
एकबार औरत बनकर इन्हें पा लेने दो !

बेचारा मर्द

मां के गर्भ से निकलने के बाद से ही
वह परेशान है
छूट चुका है
उसका बसेरा
जहां उंकड़ू मारकर
घर जैसा महसूस किया जा सके
अब हाथ-पैर फैलाने हैं
धरती-आसमान-समंदर
हर कहीं बनाने हैं बसेरे
डाह भरी नज़रों से
वह देखता है औरत को
उसे बसेरे नहीं बनाने हैं —
बसेरा बनना है !

अपनी लाश देखकर 

जब वह सुबह घर से बाहर निकला तो दरवाज़े के बाहर उसकी लाश पड़ी थी। पन्नी से ढकी लाश, पास में एक पुलिसवाला खड़ा था। बताया, तीसरी मंज़िल की खिड़की से उसकी लाश नीचे गिर पड़ी थी। क्यों, उसने पूछा। पता नहीं, कंधे उचकाकर पुलिसवाले ने जवाब दिया। सुबह 9 बजे, पुलिसवाले ने कहा, उस समय गिरजे का घंटा बज रहा था।

नीचे गिरने से पहले उसकी लाश ने विदा ली थी : सलमान रुशदी से, अमरीकी राष्ट्रपति से, किसी अफ़्रीकी देश में आई भुखमरी से, अपनी बीवी से। बच्ची का माथा सहलाते हुए उसकी आँखें छलछला आई थीं। ठिठककर एक लमहे के लिए उसने कुछ सोचा था।
पर पूरब की ओर खुली हुई खिड़की उसे न्योता दे रही थी।

बगल की दीवार पर उसकी किताबें लगी हुई थीं, कोने में म्युज़िक बाक्स था, मेज़ पर कविताएँ, संपूर्ण-असंपूर्ण, अधकचरे नोट। मेरे बाद सब कुछ ख़त्म हो जाएगा, ठहरकर उसने सोचा था। लेकिन जब वह खुद ही ख़त्म हो चुका है, फिर क्या सारी चीज़ें ख़त्म नहीं हो गई हैं ?

एक मरे हुए आदमी को लाश बनते कितनी देर लगती है ? चौंककर उसने सोचा था :
अब सब जान जाएँगे कि वह मर चुका है। दो दिन पहले मौसम के बारे में अपनी राय देनेवाला पड़ोसी अब क्या सोचेगा ? मौसम कैसा भी हो, क्या लाश के लिए कोई फ़र्क पड़ता है ? उसे थोड़ा नज़ला सा था और उसने सोचा था : क्या नज़ले के साथ नीचे कूद पड़ना ठीक रहेगा ?

उसने सोचा था, लोग सोचेंगे, इसीलिए वह मुस्कराया करता था, इसीलिए वह इतना बोलता था, इसीलिए वह चुप रहता था।

अपनी लाश को देखकर वह सोचने लगा : लाश बनने का फ़ैसला उसने क्यों लिया था ?
क्या उसने वाकई कोई फ़ैसला लिया था ? क्या मरा हुआ आदमी कोई फ़ैसला ले सकता है ? लेकिन अगर उसने फ़ैसला लिया, फिर क्या वह सचमुच मरा नहीं था ? अगर वह मरा नहीं था, फिर उसने लाश बनने का फ़ैसला क्यों लिया ? क्या यह सिर्फ़ एक ग़लतफ़हमी थी ?

उसने सोचा, पुलिसवाले से पूछा जाए। लेकिन पुलिसवाले के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।

उसका जीवन 

बचपन से ही मां-बाप कहते थे
बेटी को पढ़ाऊंगा
एक अच्छे घर में शादी होगी
और ऐसा ही हुआ
आनर्स में उसे फ़र्स्ट डिवीज़न मिला था
फिर शादी हो गई
ससुराल में उलाहने
लगभग नहीं के बराबर मिले
पति के साथ
छुट्टी पर जाने का मौका मिला
एकबार जयपुर
एकबार तो दस दिनों के लिये साउथ की टूर
दो बच्चे हुए
नौकरी का इरादा छोड़कर
घर संभालना पड़ा
पति साहब हो गए
एकबार सेक्रेट्री से इश्क का लफ़ड़ा चला था
जल्द ही ठीक हो गया
बेटे को मैनेजमेंट में डिग्री के बाद
अच्छी नौकरी मिल गई
बेटी की भी शादी हो गई
जीवन भरा-पूरा था
शाम को वह सीरियल देखती थी
अचानक एक छोटी सी बीमारी के बाद
वह चल बसी

अब वह लेटी हुई थी
पड़ोस की औरतें कह रही थीं
भागवंती है
सुहाग लेकर चली गई

थका हुआ क्रांतिकारी

जाड़े का मौसम है
ठंड के मारे बुरा हाल है
थका हुआ क्रांतिकारी
कम्बल लपेटकर
बिस्तर पर बैठा है
उसका सिद्धांत है —
दौड़-धूप करने से
पसीना आता है
पसीना ठंडा हो जाय
तो कंपकंपी होने लगती है

वो कहता है :
सिद्धांत को समझे बिना
सड़क पर मत उतरो
ठंड लग जाएगी
मुझे बिस्तर में रहने दो
कम्बल के नीचे

मैं सिद्धांत तैयार करता हूं
मुझे छेड़ो मत
छेड़ो मत

हमारा रहनुमा 

जब वह झूठ बोलता है,
लोग उसे सच मानते हैं
जब वह सच बोलता है,
तब भी लोग सच मानते हैं
और वह परेशान हो सोचता है :
वह सच बोल रहा है या झूठ ?

लोग जब उससे ख़ुश होते हैं,
उसकी जय-जयकार करते हैं
लोग जब परेशान रहते हैं,
उसकी जय-जयकार करते हैं
और वह मायूस हो सोचता है :
लोग परेशान हैं या ख़ुश ?

जब वह झूठ बोलता है,
उसे सच बनाना चाहता है
जब उसे सच बोलना होता है,
वह ख़ामोश रह जाता है
वह हमेशा डरता रहता है,
उसका सच कहीं झूठ ना हो जाय

वह सबकुछ कर सकता है,
सिर्फ़ सच नहीं बोल सकता

पीढ़ियों के दरमियान

अपनी उम्र की घमंड के साथ
बच्चों से कहता हूं :
जानते हो, कितने सालों का तजुर्बा है
मेरी बेवकूफ़ियों का
ये बाल धूप में नहीं पके हैं,
यह कुर्सी
तुम्हारे लिये नहीं,
मेरे लिये बनी है.
कुर्सी में धंसा हुआ मेरा चेहरा –
उसे देखो –
कुछ सीखो –
तुम्हारा भी वक़्त आएगा,
लेकिन अभी नहीं

बच्चे खड़े-खड़े मुझे देखते रहे,
मुझे देखते रहे
और मुस्कराते रहे,
फिर वो निकल पड़े
बाहर की ओर

अब मैं अकेला हूं,
कुर्सी में धंसा हुआ

बेहद अकेला

ऐतिहासिक प्रक्रिया

जहाँ मैं हूँ
मुझे होना नहीं है
पसंद भी शायद नहीं है
लेकिन वह भरोसा दिलाता है
वहां तक के रास्ते का
जहां मुझे पहुंचना है

वहां मुझे पहुंचना होगा
लेकिन जब मैं वहां होउंगा
वहां मुझे होना नहीं होगा
पसंद भी शायद नहीं होगा
लेकिन वह भरोसा दिलाएगा
वहां तक के रास्ते का
जहां मुझे पहुंचना होगा

इतिहास का पहिया

चुटकुला कुछ यूँ था :
एक आदिम विज्ञानी ने
चौकोर पहिये का इजाद किया था
उसका कहना था
गोल पहिये पीछे भी सरक सकते हैं

बात में दम तो है

इतिहास का पहिया गोल है
हर पहिये की तरह
वह आगे सरकता है
जब जनता
उसे सामने की ओर धकेलती है
ख़ासकर जब रास्ता चढ़ाई का हो
वर्ना वह पीछे सरक सकती है

इतना तो ख़ैर तय है

दिक़्क़त सिर्फ़ इतनी है
उसे धकेलने वालों की अगली पाँतों में
कुछ ऐसे भी शख़्स हैं
जिनके दिमाग चौकोर हैं
और वे हमेशा इस फ़िराक़ में रहते हैं
गोल पहिये को चौकोर बना दिया जाय
ताकि वह पीछे की ओर न सरके

एक पुराना अफ़ेयर

वह मिली
दस साल बाद

मैं अधेड़ था
वह मुझसे काफ़ी छोटी थी
जैसी कि
बुद्धिजीवियों की प्रेमिकाएँ हुआ करती हैं
छिपकर मुझसे मिलती थी
और हम पहचानने की कोशिश करते थे
एक-दूसरे को
हर तरीके से
यानी जो भी तरीके मुमकिन हैं
पता नहीं हमने पहचाना कि नहीं
पता नहीं हमें प्रेम था या नहीं
लेकिन कुछ था
और हम ख़ुश थे

आज वह भी दहलीज पर खड़ी है
अधेड़ होने के लिए
ख़ूबसूरत है
कहवे की प्याली में चुस्की लेते हुए मैंने देखा —
जिस्म कुछ भरा-भरा-सा है
लेकिन
अल्हड़ बनने की कोशिश भी नहीं करती है

अपना हाल बताओ
क्या करते रहे ?
उसने पूछा
क्या कहता मैं
कन्धे उचकाकर रह गया
सिगरेट का पैकेट निकालना चाहा
फिर याद आया
अब यहाँ सिगरेट पीना मना है
‘इतना घूमते रहते हो
इतने लोगों से मिलते हो
और कहने को कुछ भी नहीं ?‘
उलाहना देते हुए उसने कहा।

मैंने कहा —
तुम्हीं बताओ।
फिर पता चला
उसके पति को एक बाईपास हो चुका है
बेटे को बोस्टन में स्कॉलरशिप मिला है
और उसे गुरू —
‘बड़ी शान्ति मिलती है‘
उसने कहा

कहवा खत़्म हुआ
मुलाक़ात का वक़्त भी
उठकर जाने से पहले
अचानक उसने मेरे हाथ पर हाथ रखा
फिर कहा :
अपना ख़याल रखना
और देखो
सिगरेट छोड़ दो
शायद उसे अपने पति की चिन्ता थी
या शायद मेरी भी ?

फिर हम उठकर चल दिए
पहले की तरह पूछा नहीं —
अगली मुलाक़ात कब हो सकती है ?

कशमकश 

देख न पाना
सुन न पाना
देखते हुए
सुनते हुए
समझ न पाना
जितना समझा
उसे समझा न पाना
गुस्सा न आना
बेवजह गुस्से से
रास्ते से भटक जाना
मायूस हो जाना
फिर उससे उबरकर
एक क़दम
हाँ, एक क़दम ही सही
आगे बढ़ाना।

कामयाब

बार-बार मैं उस शख़्स को देखता हूँ :
कभी यहाँ, कभी वहाँ
उसके पैर थिरकते रहते हैं,
उसके होंठों पर मुस्कराहट रहती है,
मक्कार आँखों में
महान होने का दावा,
उसके पैरों के नीचे
ज़मीन नहीं, दलदल है।
दलदल में धँसा हुआ
वह ख़ुश है, बेहद ख़ुश है।

वह सोचता है,
वक़्त की धार को
उसने पहचान लिया है.
वक़्त ने उसे बेमानी बना दिया है।

और वह ख़ुश है, बेहद ख़ुश है।

कायाकल्प 

देखते ही देखते
मेरी आँखों के सामने
ए० टी० एम० मशीन
सुन्दरी राजकन्या बन गई।
मैंने उसे बाँहों में भर लिया।

सुन्दरी राजकन्या ने
मुझे अपनी बाँहों में भर लिया।

और मैं ए० टी० एम० मशीन बन गया।

कुछ तो है 

नीले आसमान के नीचे
एकबार प्यार का मौक़ा मिला था
उसका कमसिन जिस्म
मेरे ऊपर झुका हुआ था
उसे मेरा चेहरा दिख रहा था
मुझे आसमान

बात कुछ पुरानी हो चली है
मुझे याद नहीं है
उसका अहसास
सिर्फ़ रह गई है
उसकी मिठास

कुछ है लेकिन

आसमान की नीली आँखें बन्द हैं
झर झर झर झर झरते हैं आँसू
कुदरत की मायूस होने की कोशिश
ख़ूबसूरत है – ख़ूबसूरत है

मुझे तुमसे प्यार है — मैंने कहा
मैंने कहा — भरोसे के साथ
सहलाने का अहसास, लेकिन
तुम्हारे जिस्म का नहीं, हथेली का था

तुम्हारी आँखें मुझ पर टिकी थीं
मेरी नज़र में तुम ही तुम थी
तुम्हारी आँखें तुम्हें तलाशती थीं
मेरी आँखें मुझे खोज रही थी

आसमान की आँखें, आँखें नहीं हैं
झरते हुए आँसू, आँसू नहीं हैं
जो कुछ है, मेरी ख़ातिर नहीं है
ख़ूबसूरत है, पर मेरा नहीं है

ख़ूबसूरत मोड़

ख़ूबसूरत मोड़ पर
इनसान अकेला होता है
पिछले सारे रास्ते
उनके सारे क़िस्से
ख़त्म हो चुके होते हैं
सामने का रास्ता
कुछ कहता नहीं

ख़ूबसूरत मोड़ पर
संगी-साथी छूट जाते हैं
वे, वे नहीं रह जाते
मैं, मैं नहीं रह जाता

बेहद ख़तरनाक़ है
ख़ूबसूरत मोड़।

गूंगे बोलते नहीं हैं

(गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक को समर्पित)

गूँगों की बस्ती में
अचानक एक शख़्स को बोलना आ गया
और वह चीख़ उठा :
मैं गूंगा हूँ।
मैं तुम्हारा हूँ।

सारे गूँगों ने उसकी ओर देखा
सिर हिलाते हुए उन्होंने कहना चाहा :
नहीं, तुम बोलते हो।
तुम अब हमारे नहीं रह गए,
लेकिन उनके गले से आवाज़ नहीं निकली।
और उस शख़्स को कुछ भी सुनाई न दिया।

चुम्बन 

मेरे होंठ
उतर आते हैं
पराये होंठों पर
और एक लमहे के अन्दर
मैं भूल चुका होता हूँ
मेरे साथ कौन है
सिर्फ़ उसके होंठ रह जाते हैं

मेरे अपने होंठ भी
अपने नहीं रह जाते
मुझसे आज़ाद होकर
उन पराये होठों के साथ
शुरू कर देते हैं
एक ख़तरनाक़ खेल
जो मेरे काबू में नहीं है

जल्द ही
इसका नतीजा भुगतना है

अष्टावक्र 

दुनिया की नज़रों में झाँकने के बाद
उसे पता चला
कि वह वक्र है।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई
दुनिया उसे ख़ूबसूरत लगी।
उसने कहा :
हाँ, मुझे यह चाहिए।
फिर उसने अपने जिस्म की ओर देखा।
उसने कहा :
यह मेरा जिस्म है।
आख़िरकार वह अपने अन्दर झाँकने लगा।
अन्दर से बदलने लगा।
अब उसे फ़ख़्र है,
अन्दर हो या बाहर
वह अष्टावक्र है।

मंगलेश डबराल 

उसकी कविता
प्रतिबद्धता के साथ
शहरी निस्संगता में भटकते हुए
अपने वजूद की तलाश है

उसकी कविता शहरी है
जो पहाड़ से आई है

उसके मुहावरे शहर में पैदा हुए
लेकिन बासी हो जाने पर
उनमें पहाड़ की गन्ध आती है।

शहर में रहते हुए
वह सीख चुका है
कैसे हकलाना छिपाया जाता है
लेकिन जब भी हकलाता है
उसमें से कविता फूट पड़ती है।

अस्सी का काशी 

आपको जब भी देखता हूं
बुश्शर्ट पहनकर
लाल सायकिल पर सवार
एक नौजवान
इतराता फिरता नज़र आता है
उमर तो बढ़ती गई
लेकिन वरिष्ठ होने का शऊर नहीं आया
मेरी बात मानो
आप जवान ही बने रहो
भले ही
आपको कसिया कहनेवालों की
तादाद घटती जा रही हो।

भदेस होने का बहाना करते हुए
मीठी-मीठी बातें करते होते हो
और मैं समझ जाता हूँ
यह सब झूठ है
जिन्हें धकेलकर
सच्चाई पीछे से झाँक रही है
और वह झाँकती रहेगी
मकसद आपका कुछ भी हुआ करे।

आत्मकथा 

मैंने प्यार किया।
लड़खड़ाया।

मुँह के
बल गिरा।

उठकर
खड़ा हुआ।
और मैंने प्यार किया।

आदिम यज्ञ

अनादि काल से होता रहा सिलसिला
एक रहस्यमय उपचार बन गया
दोनों आमने-सामने थे
नज़र चुराते हुए
एक-दूसरे को भाँप रहे थे
उनके बदन पर कपड़े नहीं थे,
क्योंकि कपड़ा होना अश्लील होता।
फिर उन्होंने एक-दूसरे को देखा
भरपूर।
वहाँ ख़ामोशी छाई हुई थी
उन्हें लग रहा था
वे एक घने जंगल में हैं
सभ्यता से
बिल्कुल-बिल्कुल दूर।
और उन्हें लगा
दूर कहीं नगाड़े बज रहे हैं
जिनकी आवाज़
लगातार
नज़दीक आती जा रही है
नज़दीक आते-आते
धड़कन बनती जा रही है।
उन्हें पता था
इसके बाद
वो, वो नहीं रह जाएगी
वो, वो नहीं रह जाएगा
एक अजीब-सी सिहरन
जिसके चलते वे खो जाना चाहते थे
और खो जाने के लिए
सिर्फ़ एक-दूसरे का जिस्म था।

और वे खो गए।

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