उदय कामत की रचनाएँ

उम्र बस बढ़ती गयी पर जीना क्यों कम हो गया

उम्र बस बढ़ती गयी पर जीना क्यों कम हो गया
यार हैं कुछ कम नहीं, याराना क्यों कम हो गया

वो अदा, अंदाज़, इख़्लास-ओ-सलीक़ा अब कहाँ
शर्म आती तो है पर शर्माना क्यों कम हो गया

अब न गहराई रही रिश्तों में ना जज़्बात में
सब तआलुक रखते हैं, अपनाना क्यों कम हो गया

खेल था वह चील का, जज़्बा था बच्चों में अलग
काटते थे डोर सब, लहराना क्यों कम हो गया

या हुकूमत, या वह साक़ी, या वह वाइज़, दोस्तो
क्यों लगे हैं सब झुकाने, झुकना क्यों कम हो गया

आज आई वह शाम क्यों साक़ी

आज आई वह शाम क्यों साक़ी
ले हरीफ़ों का नाम क्यों साक़ी

मिलती हो तुम तो बेरहम बन कर
जाते जाते सलाम क्यों साक़ी

ज़िक्र पर तेरे सजदे होते हैं
सब ही तेरे ग़ुलाम क्यों साक़ी

मौत तय तिरी इक झलक से है
बाकी ये इंतिज़ाम क्यों साक़ी

मुख़्तसर-सा तिरा तआरूफ हो
रोज़ के ताम-झाम क्यों साक़ी

हम भी तो उस खुदा के बंदे हैं
हम से अब राम-राम क्यों साक़ी

जपते रहते हैं रात दिन ज़ाहिद
नाम तेरा हराम क्यों साक़ी

सारे आशिक़ है तिरे महफ़िल में
आज खाली ये जाम क्यों साक़ी

वस्ल के सब सवाब रहने दो 

वस्ल के सब सवाब रहने दो
हिज्र के सब अज़ाब रहने दो

तज्रबे मेरे काम आएंगे
सब किताब-ए-निसाब रहने दो

तग-ओ-दौ से नीँद आई मुझे
देखने दो ना ख़्वाब, रहने दो

क़ुफ़्ल होटों पर लग न जाये फिर
वो मुकम्मल जवाब रहने दो

ये ग़लत-फ़हमी है या ख़ुश-फ़हमी
रुख़ पर उनके नक़ाब रहने दो

दूर ‘मयकश’ से जब ख़िरद वाले
मीना में अब शराब रहने दो

आया वह याद हम को बोसा क़ज़ा से पहले

आया वह याद हम को बोसा क़ज़ा से पहले
लम्हे नवाज़िशों के जैसे सज़ा से पहले

आया न बाज़ आदम क्यों हर ख़ता से पहले
तू कर सवाल ये अब वाइज़ ख़ुदा से पहले

अंदाज़-ए-इश्क़ उनका देखो तो क्या अजब था
करते रहे जफ़ा वह हर इक वफ़ा से पहले

जब निकहत-ए-सबा का पूछा सबब तो बोली
गुल पुर-शमीम था इक बाद-ए-सबा से पहले

जब पी चुका था मैं ग़म और ज़िन्दगी की तल्ख़ी
लाज़िम था अब के पीना मय को दवा से पहले

उसकी बस इक झलक से ये नब्ज़ थम चुकी थी
जुम्बिश लबों पर आई रोज़-ए-जज़ा से पहले

ग़म, कश्मकश, अज़ाब, गिला याद आ गया

ग़म, कश्मकश, अज़ाब, गिला याद आ गया
ख़लवत में हमको फिर वह समा याद आ गया

ज़ुलमत-कदे में आज दिया याद आ गया
काफ़िर को आज फिर वह ख़ुदा याद आ गया

ज़िक्र-ए-वफ़ा पर दिल ये हुआ और ग़मज़दा
बरसों पुराना तर्क-ए-वफ़ा याद आ गया

यूँही गुज़र रहा था जो तेरी गली से मैं
बरसों के बाद ख़ुद का पता याद आ गया

जब प्यास और तलब लगी पानी की आज फिर
क़िस्सा-ए-कर्बला क्यों भला याद आ गया

उम्र भर तो तिरी ख़िदमात ने रोने न दिया 

उम्र भर तो तिरी ख़िदमात ने रोने न दिया
मौत में तल्ख़ी-ए-हालात ने रोने न दिया

हिज्र के वक़्त गले मिलके बहुत रोना था
उस घडी भर की मुलाक़ात ने रोने न दिया

राह में इश्क़ ने मुश्किल से मसाइल जो रखे
चुभते, नोकीले सवालात ने रोने न दिया

गीली मिट्टी की हमें याद सताने थी लगी
आई बरसात तो बरसात ने रोने न दिया

अब ना रोता है कोई संग किसी के भी यहाँ
इस सदाक़त से भरी बात ने रोने न दिया

जब हरम तक गया पाने को सुकूँ ऐ ‘मयकश’
बे-असर, हाए, मुनाजात ने रोने न दिया

भुलाए उनको तो बरसों बीते फिर आज तक दिल फ़िगार क्यों है 

भुलाए उनको तो बरसों बीते फिर आज तक दिल फ़िगार क्यों है
न आएंगे वो, तुम्हें भला बेक़रारी से इंतिज़ार क्यों है

भुला चुके जब मुहब्बतों को, क़राबतों को, मसाफ़तों को
तो सजदे में भी ज़ुबान पर आता नाम वह बारबार क्यों है

था वह नशा उनकी आँखों में या वह ज़ाइक़ा उनके होटों का था
कि मयकदों की तमाम बादा से अब न मिलता ख़ुमार क्यों है

ये ज़ख्म दिल के छुपाता आया है झूटी मुस्कान से तू ‘मयकश’
फिर आज भी लिखता शेर अहद-ए-वफ़ा पर तू बेशुमार क्यों है

वो मुझ में है उसे ढूंडू में क्यों दुनिया-ए-फ़ानी में 

वो मुझ में है उसे ढूंडू में क्यों दुनिया-ए-फ़ानी में
उसे तहरीर में ढूंडू, उसे ढूंडू बयानी में

कभी हर्फों की सूरत में, कभी शेरों की म’ आनी में
कभी मिसरा-ए-उला में, कभी मिसरा-ए-सानी में

कभी लफ़्ज़ों में मख़फ़ी तो, कभी आँखों के पानी में
कभी मेरी हक़ीक़त में, कभी मेरी कहानी में

ठहर जाओ घड़ी भर के लिए ये इल्तिजा है बस
मदद होगी मिरे दिल को सुकूँ में और रवानी में

तुम्हारी याद जब हमको सताएगी, गुज़ारेंगे
कभी हम रूह में बस कर, कभी वह आस्तानी में

गुज़ारी उम्र हमने इस तरह दर पर तेरे ज़ालिम
कभी दहलीज़ तकने में, कभी यूँ पासबानी में

किनारे रंज की रेतों में दब कर खो गए लेकिन
कभी इक मौज गुज़री थी यहाँ से शादमानी में

भला ये जिस्म मर जाए मगर ज़िंदा रहे ‘मयकश’
कभी क़िस्सा-कहानी में, कभी सादा बयानी में

क्यों सच की सस्ती इज़्ज़त होती है

क्यों सच की सस्ती इज़्ज़त होती है
हर अश्क की मंफ़ी क़ीमत होती है

औरों के लिए जीना औ मरना तो
ज़ाहिद की कहाँ ये फ़ितरत होती है

तुम सिर्फ़ हो मेरे और बस हो मेरे
सुनकर ये कहाँ अब हैरत होती है

ख़ुश्बू को लुटाना तो फूलों की महज़
मीरास में हासिल आदत होती है

हर क़ैस की मजनू में तब्दीली तय
हर लैला कि क्यों ये क़िस्मत होती है

जो पहले सदा बे-मोजिब मिलते थे
क्यों मिलते हैं अब जब फुर्सत होती है

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