उनवान’ चिश्ती की रचनाएँ

दिल का हर ज़ख़्म मोहब्बत का निशाँ हो जैसे

दिल का हर ज़ख़्म मोहब्बत का निशाँ हो जैसे
देखने वालों को फूलों का गुमाँ हो जैसे

तेरे क़ुर्बां ये तेरे इश्‍क़ में क्या आलम है
हर नज़र मेरी तरफ़ ही निगराँ हो जैसे

यूँ तेरे क़ुर्ब की फिर आँच सी महसूस हुई
आज फिर शोला-ए-एहसास जवाँ हो जैसे

तीर पर तीर बरसते हैं मगर ना-मालूम
ख़म-ए-अबरू कोई जादू की कमाँ हो जैसे

उन के कूचे पे ये होता है गुमाँ ए ‘उनवाँ’
ये मेरे शौक़ के ख़्वाबों का जहाँ हो जैसे

इश्‍क़ फिर इश्‍क़ है आशुफ़्ता-सरी माँगे हैं 

इश्‍क़ फिर इश्‍क़ है आशुफ़्ता-सरी माँगे हैं
होश के दौर में भी जामा-दरी माँगे हैं

हाए आग़ाज-ए-मोहब्बत में वो ख़्वाबों के तिलिस्म
जिंदगी फिर वही आईना-गरी माँगे हैं

दिल जलाने पे बहुत तंज न कर ऐ नादाँ
शब-ए-गेसू भी जमाल-ए-सहरी माँगे हैं

मैं वो आसूदा-ए-जल्वा हूँ कि तेरी ख़ातिर
हर कोई मुझ से मिरी ख़ुश-नज़री माँगे हैं

तेरी महकी हुई ज़ुल्फ़ों से ब-अंदाज़-ए-हसीं
जाने क्या चीज़ नसीम-ए-सहरी माँगे हैं

आप चाहें तो तसव्वुर भी मुजस्सम हो जाए
ज़ौक़-ए-आज़र तो नई जल्वागरी माँगे हैं

हुस्न ही तो नहीं बेताब-ए-नुमाइश ‘उनवाँ’
इश्‍क़ भी आज नई जल्वागरी माँगे हैं

किसी के फ़ैज़-ए-कुर्ब से हयात अब सँवर गई

किसी के फ़ैज़-ए-कुर्ब से हयात अब सँवर गई
नफ़स-नफ़स महक उठा नज़र नज़र निखर गई

निगाह-ए-नाज़ जब उठी अजीब काम कर गई
जो रंग-ए-रूख़ उड़ा दिया तो दिल में रंग भर गई

मेरी समझ में आ गया हर एक राज़-ए-ज़िंदगी
जो दिल पे चोट पड़ गई तो दूर तक नज़र गई

अब आस टूट कर मुझे सुकूँ नसीब हो गया
जो शाम-ए-इंतिजार थी वो शाम तो गुज़र गई

कली दिल-ए-तबाह की खिली न ‘चिश्‍ती’-ए-हज़ीं
ख़िंजाँ भी आ के जा चुकी बहार भी गुज़र गई

जल्वों के बाँक-पन में न रानाइयों में है

जल्वों के बाँक-पन में न रानाइयों में है
वो एक बात जो तेरी अंगड़ाईयों में है

ख़ुद तुझ से कोई ख़ास तआरूफ़ नहीं जिसे
इक ऐसा शख़्स भी तेरे सौदाइयों में है

महसूस कर रहा हूँ रगें टूटती हुई
पोशीदा एक हश्र उन अँगड़ाइयों में है

रक़्साँ नफ़स-नफ़स है फ़रोज़ाँ नज़र नज़र
ये कौन जलवा-जा मेरी तन्हाईयों में है

क़दमों में है ज़मीं तो ख़याल आसमान पर
कितना फ़राज़ इश्‍क़ की गहराईयों में हैं

दिल की जराहतों के चमन दर चमन खुले
क्या सेहर तेरी याद की अँगड़ाईयों में है

रक़्स-ए-जुनूँ से काम है ‘उनवाँ’ उन्हें मुदाम
मेरी अदा अदा मेरी परछाइयों में है

रहने दे तकलीफ़-ए-तवज्जोह दिल को है आराम बहुत

रहने दे तकलीफ़-ए-तवज्जोह दिल को है आराम बहुत
हिज्र में तेरी याद बहुत है ग़म में तेरा नाम बहुत

बात कहाँ उन आँखों जैसी फूल बहुत हैं जाम बहुत
औरों को सरशार बनाएँ ख़ुद हैं तिश्‍ना-काम बहुत

कुछ तो बताओ ऐ फ़रज़ानों दीवानों पर क्या गुज़री
शहर-ए-तमन्ना की गलियों में बरपा है कोहराम बहुत

शुग़्ल-ए-शिकस्त-जाम-ओ-तौबा पहरों जारी रहता है
हम ऐसे ठुकराए हुओं को मय-ख़ाने में काम बहुत

दिल-शिकनी ओ दिलदारी की रम्ज़ों पर ही क्या मौक़ूफ़
उन की एक इक जुम्बिश-ए-लब में पिन्हाँ हैं पैग़ाम बहुत

आँसू जैसे बादा-ए-रंगीं धड़कन जैसे रक़्स-ए-परी
हाए ये तेरे ग़म की हलावत रहता हूँ ख़ुश-काम बहुत

उस के तक़द्दुस के अफ़्साने सब की ज़बाँ पर जारी हैं
उस की गली के रहने वाले फिर भी हैं बदनाम बहुत

ज़ख़्म ब-जाँ हैं ख़ाक बसर है चाक ब-दामाँ है ‘उनवाँ
बज़्म-ए-जहाँ में रक़्स-ए-वफ़ा पर मिलते हैं इनआम बहुत

वो मुस्कुरा के मोहब्बत से जब भी मिलते हैं

वो मुस्कुरा के मोहब्बत से जब भी मिलते हैं
मिरी नज़र में हज़ारों गुलाब खिलते हैं

तिरी निगाह-ए-जराहत असर सलामत-बाद
कभी कभी ये मिरे दिल को ज़ख़्म मिलते हैं

नफ़स नफ़स में मचलती है मौज-ए-निकहत-ओ-नूर
कुछ इस तरह तिरे अरमाँ के फूल खिलते हैं

मैं किस तरह तुझे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई दूँ
रह-ए-वफ़ा में तिरे नक़्श-ए-पा भी मिलते हैं

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