उमाकांत मालवीय की रचनाएँ

पल्लू की कोर दाब दाँत के तले

पल्लू की कोर दाब दाँत के तले
कनखी ने किये बहुत वायदे भले ।

कंगना की खनक
पड़ी हाथ हथकड़ी ।
पाँवों में रिमझिम की बेडियाँ पड़ी ।
सन्नाटे में बैरी बोल ये खले,
हर आहट पहरु बन गीत मन छले ।

नाजों में पले छैल सलोने पिया,
यूँ न हो अधीर,
तनिक धीर धर पिया ।
बँसवारी झुरमुट में साँझ दिन ढले,
आऊँगी मिलने मैं पिय दिया जले ।

फूल नहीं बदले गुलदस्तों के 

टूटे आस्तीन का बटन
या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
धूल मेजपोश पर जमी हुई।
जहां-तहां पड़ी दस किताबों पर
घनी सौ उदासियाँ थमी हुई।

पोर-पोर टूटता बदन
कुछ कहने-सुनने का मन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

अरसे से बदला रुमाल नहीं
चाभी क्या जाने रख दी कहां।
दर्पण पर सिंदूरी रेख नहीं
चीज नहीं मिलती रख दो जहां।

चौके की धुआँती घुटन
सुग्गे की सुमिरिनी रटन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

किसे पड़ी, मछली-सी तड़प जाए
गाल शेव करने में छिल गया।
तुमने जो कलम एक रोपी थी
उसमें पहला गुलाब खिल गया।

पत्र की प्रतीक्षा के क्षण
शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री

ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री
मंच पर की भूमिका तो सिर्फ अभिनय है ।

मूल से कट कर रहे
परिशिष्ट में
एक अंधी व्यवस्था की दृष्टि में ।
ज़िन्दगी तो कथ्य में गुज़री
और करनी
प्रश्न से आहत अनिश्चय है ।

क्षेपकों के
हाशियों के लिए हम
दफ़न होते
काग़ज़ी ताजिए हम
ज़िन्दगी तो पथ्य में गुज़री
और मन बीमार का परहेज़ संशय है ।

गुजर गया एक और दिन

गुजर गया एक और दिन,
रोज की तरह ।

चुगली औ’ कोरी तारीफ़,
बस यही किया ।
जोड़े हैं काफिये-रदीफ़
कुछ नहीं किया ।
तौबा कर आज फिर हुई,
झूठ से सुलह ।

याद रहा महज नून-तेल,
और कुछ नहीं
अफसर के सामने दलेल,
नित्य क्रम यही
शब्द बचे, अर्थ खो गये,
ज्यों मिलन-विरह ।

रह गया न कोई अहसास
क्या बुरा-भला
छाँछ पर न कोई विश्वास
दूध का जला
कोल्हू की परिधि फाइलें
मेज की सतह ।

‘ठकुर सुहाती’ जुड़ी जमात,
यहाँ यह मजा ।
मुँहदेखी, यदि न करो बात
तो मिले सजा ।
सिर्फ बधिर, अंधे, गूँगों –
के लिए जगह ।

डरा नहीं, आये तूफान,
उमस क्या करुँ ?
बंधक हैं अहं स्वाभिमान,
घुटूँ औ’ मरूँ
चर्चाएँ नित अभाव की –
शाम औ’ सुबह।

केवल पुंसत्वहीन, क्रोध,
और बेबसी ।
अपनी सीमाओं का बोध
खोखली हँसी
झिड़क दिया बेवा माँ को
उफ्, बिलावजह ।

अहेरी 

नोकीले तीर हैं अहेरी के
कांटे खटिमट्ठी झरबेरी के
टांग चली शोख
तार तार हुआ पल्लू
अंगिया पर बैरी सा
भार हुआ पल्लू
मीठे रस बैन गंडेरी के
झरबेरी आंखों में
झलकी बिलबौटी
खनक उठी नस नस में
काटती चिकौटी
बाल बड़े जाल हैं मछेरी के
चोख चुभन
गोद गयी
पोर पोर गुदना
अंगुली पर नाच रहा
एक अदद फुंदना
चकफेरे छोड़ सातफेरी के

एक चाय की चुस्की 

एक चाय की चुस्की
एक कहकहा
अपना तो इतना सामान ही रहा ।

चुभन और दंशन
पैने यथार्थ के
पग-पग पर घेर रहे
प्रेत स्वार्थ के ।
भीतर ही भीतर
मैं बहुत ही दहा
किंतु कभी भूले से कुछ नहीं कहा ।

एक अदद गंध
एक टेक गीत की
बतरस भीगी संध्या
बातचीत की ।
इन्हीं के भरोसे क्या-क्या नहीं सहा
छू ली है सभी, एक-एक इन्तहा ।

एक क़सम जीने की
ढेर उलझनें
दोनों ग़र नहीं रहे
बात क्या बने ।
देखता रहा सब कुछ सामने ढहा
मगर कभी किसी का चरण नहीं गहा ।

कभी-कभी

कभी-कभी बहुत भला लगता है-
चुप-चुप सब कुछ सुनना
और कुछ न बोलना।

कमरे की छत को
इकटक पडे निहारना
यादों पर जमी धुल को महज बुहारना
कभी-कभी बहुत भला लगता है-

केवल सपने बुनना
और कुछ न बोलना।

दीवारों के उखडे
प्लास्टर को घूरना
पहर-पहर संवराती धूप को बिसूरना
कभी-कभी बहुत भला लगता है

हरे बांस का घुनना
और कुछ न बोलना।

कागज पर बेमानी
सतरों का खींचना
बिना मूल नभ छूती अमरबेल सींचना
कभी-कभी बहुत भला लगता है।

केवल कलियां चुनना
और कुछ न बोलना।

अपने अंदर के
अंधियारे में हेरना
खोई कोई उजली रेखा को टेरना
कभी-कभी बहुत भला लगता है

गुमसुम सब कुछ सुनना
और कुछ न बोलना।

टहनी पर फूल जब खिला

टहनी पर फूल जब खिला
हमसे देखा नहीं गया ।

एक फूल निवेदित किया
गुलदस्ते के हिसाब में
पुस्तक में एक रख दिया
एक पत्र के जवाब में ।
शोख रंग उठे झिलमिला
हमसे देखा नहीं गया ।

प्रतिमा को
औ समाधि को
छिन भर विश्वास के लिये
एक फूल जूड़े को भी
गुनगुनी उसांस के लिये ।
आलिगुंजन गंध सिलसिला
हमसे देखा नहीं गया ।

एक फूल विसर्जित हुआ
मिथ्या सौंदर्य-बोध को
अचकन की शान के लिये
युग के कापुरुष क्रोध को
व्यंग टीस उठी तिलमिला ।
हमसे देखा नहीं गया ।

यह अँजोरे पाख की एकादशी 

यह अँजोरे पाख की एकादशी
दूध की धोयी, विलोयी-सी हँसी ।

गंधमाती हवा झुरुकी चैत की,
अलस रसभीनी युवा मद की थकी
लतर तरु की बाँह में,
चांदनी की छाँह में
एक छवि मन में कहीं तिरछी फँसी
गोल लहरें, जुन्हाई अँगिया कसी ।

हर बटोही को टिकोरे टोंकते,
और टेसू, पथ अगोरे रोकते
कमल खिलते ताल में,
बसा कोई ख्याल में
चंद्रमा, श्रृंगार का ज्यों आरसी,
रात, जैसे प्यार के त्यौहार-सी ।

गुनगुनाती पाँत भँवरों की चली,
लाज से दुहरी हुई जाती कली
धना बैठी सोहती,
बाट प्रिय की जोहती
द्वार पर ज्यों सगुन बन्दनवार-सी
रस भिंगोयी सुघर द्वारा चार-सी ।

झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं

झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,
इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।

जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,
रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।
ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,
रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।

शायद कल मानव की हों न सूरतें
शायद रह जाएँगी, हमी मूरतें ।
आदम के शकलों की यादगार हम,
इसलिए, हमें सहेज लो, डमी सही ।

पिरामिड, अजायबघर, शान हैं हमीं,
हमें देखभाल लो, नहीं ज़रा कमी ।
प्रतिनिधि हम गत-आगत दोनों के हैं,
पथरायी आँखों में है नमी कहीं ?

दिन भले ही बीत जाएँ क्वार के 

दिन भले ही
बीत जाएँ क्वार के
पर नहीं बीते अभी दिन ज्वार के

अभी मैं सागर
अभी तुम चंद्रमा हो
बिछ गई, मेरी लहर पर
चंदरिमा हो
अभी तो हैं सिलसिले त्यौहार के
रातरानी और हरसिंगार के

अभी तो घर बार
घर की सौ नियामत
अभी सीता की रसोई
है सलामत
अभी सारे दिन लगें इतवार के
फुर्सतों के, चुहल के तकरार के

अभी है सम्बन्ध में
ख़ासी हरारत
छेड़खानी, चुटकियाँ
मीठी शरारत
अभी पत्ते हरे वन्दनवार के
परिजनों के भेंट भर अकवार के

फागुनी रंगों भरी बयार 

फागुनी रंगों भरी बयार
आ पहुँची आपके द्वार

ऋतुराज वसंत का आगमन
झंकृत हो उठा मन उपवन।
कण-कण में रंगों की तरुणाई झाँकी
इतराई पुष्पों की छवि बाँकी।
धरती सौंदर्य से इठलाकर
सूर्य किरण आँखों में रचकर
उड़े कभी इस पार, कभी उस पार
फागुनी रंगों भरी बयार।

आलिंगन करता बार-बार
मोहित हो भ्रमर राज
गुन-गुन करता गुंजार
देखकर कलियों का शृंगार।
यही है प्रेम प्रदर्शन
उसके हाथ में चक्र-सुदर्शन
जीवन को पुकार
सुख व स्नेह का आँचल पसार खड़ी हुई
फागुनी बयार आई आपके द्वार।

गंगा मइया 

‘गंगोत्री में पलना झूले
आगे चले बकइयाँ
भागीरथी घुटुरवन डोले शैल-शिखर की छइयाँ

छिन छिपती, छिन हौले किलके
छिन ता झाँ वह बोले
अरबराय के गोड़ी काढ़े
ठमकत-ठमकत डोले
घाटी-घाटी दही-दही कर चहके सोन चिरइया
पाँवों पर पहुड़ा कर परबत गाये खंता-खइयाँ

पट्टी पूज रही है
वरणावृत्त की परिक्रमा कर
बालों में रूमाल फेन का
दौड़े गाये हर हर
चढ़ती उमर चौकड़ी भरती, छूट गई लरिकइयाँ
भली लगे मुग्धा को अपनी ही प्यारी परछइयाँ

दिन-दिन अँगिया छोटी पड़ती
गदराये तरुणाई
पोर-पोर चटखे मादकता
लहराये अँगड़ाई
दोनों तट प्रियतम शान्तनु की फेर रही दो बहियाँ
छूट गया मायका बर्फ का बाबुल की अँगनइयाँ

भूखा कहीं देवव्रत टेरे
दूधभरी है छाती
दौड़ पड़ी ममता की मारी
तजकर सँग-संघाती
गंगा नित्य रँभाती फिरती जैसे कपिला गइया
सारा देश क्षुधातुर बेटा, वत्सल गंगा मइया’

हम टेढ़े-मेढ़े हैं तो क्या 

लड़के: हम टेढ़े-मेढ़े भी हैं तो क्या,
लड्डू हैं घी के।

लड़कियाँ: तुम ऊँची दूकानों वाले,
पकवान निरे फीके।

लड़के: हो लाख भले चूहाखानी,
पर चुहिया से डरती।
मरने से पहले डरपोकों की,
सौ मौतें मरती।
पूछो इन जीने वालों से,
यूँ क्या होगा जी के।
हम टेढ़े-मेढ़े भी हैं तो क्या,
लड्डू हैं घी के।

लड़कियाँ: तुम सौ मुक्के में पापड़ तोड़ो,
तीस मार खाँ जी।
बस पानी पड़े बताशे जैसे,
गल जाते ‘प्रा’ जी।
हम मरने वाले नहीं भले,
कोसो पानी पी के।
तुम ऊँची दूकानों वाले,
पकवान निरे फीके।

लड़के: जनमी लड़की, पर फैशन में,
बनती भाई साहब।
इन लड़केनुमा लड़कियों से,
क्या होगा भी या रब।
जैसे बिल्ली के भाग खुले हैं,
टूट गए छींके!
हम टेढ़े-मेढ़े भी हैं तो क्या,
लड्डू हैं घी के!

लड़कियाँ: जनमे लड़के, पर फैशन में,
तुम हीरोइन बनते।
इन लड़कीनुमा बालकों से
क्या होगा भी भंते।
मूली के पत्ते देख जिन्हें,
आ जाती हैं छींकें।

लड़के: तुम प्यारी प्यारी बहना हो,
हम बीरन हैं जी के।

लड़कियाँ: तुम प्यारे-प्यारे बीरन,
भैया दोयज के टीके।

-साभार: पराग, फरवरी, 1978, 78

कौड़ी एक उधार की

सात समंदर पार की,
कौड़ी एक उधार की।
ले आया नटखट बंदर,
छोड़ दिया भालू के घर।
धन्ना सेठ बना भालू,
अकडूँ खाँ औ’ झगड़ालू।
जिसे नसीब न ठेला था
उसको ज़िद है कार की।
सात समंदर पार की,
कौड़ी एक उधार की।

मचा तहलका

बैठ पेड़ पर मछली सोचे
अब क्या होगा राम,
नज़ला हुआ मगर मामा को
मुझको हुआ जु़काम।

छाँय छाँय कर मेढक जी ने
छींका क्या दो बार,
पोखर भर में मचा तहलका
मेढक जी बीमार।

भागा पोखर से तब कछुआ
सिर पर रखकर पाँव,
लेकिन देखा छाँय-छाँय कर
छींके सारा गाँव।

लंगूर की शादी

शादी है लंगूर की,
दावत मोतीचूर की।
ऊदबिलाव बना सहबाला,
घोड़ा लाया टमटम वाला।
सेहरा सोहे, तन मन मोहे,
बाँकी शकल हुजूर की।
शादी है लंगूर की,
दावत मोतीचूर की।

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