उमाशंकर चौधरी की रचनाएँ

वह औरत उस छोटी खिड़की से 

जबकि इस बड़े शहर में
बड़े-बड़े घर हैं और
इन बड़े-बड़े घरों में हैं बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ, तब
उसके हिस्से इस छोटे से घर में
छोटी खिड़की आई है।
छोटी खिड़की,
जिससे देखता है छोटा आसमान
चंद तारे और बादल का एक टुकड़ा।
वह औरत उस छोटी खिड़की से
देखती है गली में, उस सब्जी वाले को
देती है आवाज गली में खेलते अपने बच्चों को
और करती है इंतजार काम पर से
अपने पति के लौटने का।
छोटी खिड़की कभी बंद नहीं होती।

उस बच्ची को नहीं है मालूम

वह बच्ची, जिसकी उम्र
दस-बारह वर्ष के करीब है और जिसने
अपनी दो कोमल उँगलियों के बीच
फँसा रखे हैं पत्थर के दो चिकने टुकड़े
इस भीड़ भरी बस में
निकालने की करती है कोशिश
अपने गले से
अनुराधा पौडवाल की आवाज।
पत्थर के इन दो चिकने टुकड़ों से
निकालती है वह
ढेर सारी फिल्मी धुनें,
भगवान के भजन और
सफर के गीत।

इस भीड़ भरी बस में भी
लोग सुनते हैं उसके छोटे गले से
अनुराधा पौडवाल की छोटी आवाज
और देखते हैं
बहुत ही तेज गति से चलने वाली
उसकी दो उँगलियों के बीच
पत्थरों का आपस में टकराना।
उस बच्ची को नहीं है मालूम
पत्थर के इन्हीं दो टुकड़ों से, जिनसे
वह निकालती है फिल्मों की धुनें और
जीवित रहने की थोड़ी सी गुंजाइश
उन्हीं पत्थरों के टकराने से निकलती है
चिंगारी।
उस बच्ची को नहीं है मालूम, जब
इस सृष्टि की हुई शुरुआत, तब
लोगों ने बसने से पहले, सबसे पहले
ईजाद की थी आग
इन्हीं दो पत्थरों को टकराकर।

अब ख़ून नहीं डर बह रहा है

हर छोटे से छोटा धमाका भी अगर तुम्हें
लगता है बम का धमाका और
तुम्हारी रुह काँप जाती है, तब समझो तुम कि
तुम्हारी धमनियों में अब
ख़ून नहीं डर बह रहा है ।

वह बच्चा जो क्रिकेट की जीत की ख़ुशी में
फोड़ रहा है एक छोटा-सा पटाखा
और तुम काँप जाते हो
तब समझो तुम कि अब ख़ून नहीं डर बह रहा है ।

क्या तुमने बँद कमरे में सुनी है
राह चलते उस औरत के कान से गिरे झुमके की
झन्न से आवाज़
और उस बच्चे के बारे में क्या कहोगे
जिसका गुब्बारा सिर्फ़ इसलिए फूट जाता है कि
वह हरी दूब की नोंक से टकरा जाता है ।

क्या तुम सचमुच डर नहीं गए थे
जब तुम्हारी टूटियों से महीनों बाद निकल पड़ी थी अचानक
पानी की एक धार ।

सच यह है कि चिड़ियों की चहचहाहट
पत्तियों की सरसराहट या फिर
साइकिल की टायर से निकलने वाली हवा की आवाज़
और फिर दूध पीते बच्चे के मुँह से निकलने वाली
एक पतली सी आवाज़ से अब
जुड़ गई है तुम्हारी धड़कन की तार ।

सच यह है कि अब तुम्हारी धड़कन तक
पहुँचने वाले ख़ून ने अचानक से बदल ली है
अपनी शक्ल ।

अगर तुम बीच चौराहे पर यह कहोगे कि
तुम्हारी धमनियों में अब
ख़ून नहीं डर बह रहा है तब
वह तुमसे पूछेगा डर का रंग और
जब तुम उससे कह दोगे झक्क सफ़ेद,
तब वह बंद कमरे में सिरिंज से निकालेगा ख़ून की दो बूँद
और फिर वह पछाड़ खाकर गिर जाएगा
उसी बँद कमरे में ।

क्या यह बँद कमरा वाकई लोकतंत्र की लेबोरेटरी नहीं है ?

पुरुष की स्मृति में कभी बूढ़ी नहीं होतीं लड़कियाँ

लड़कियाँ अपनी मौत से भी
नहीं मरती है,
पुरुष की स्मृति में
और न ही लड़कियाँ, अपनी ढलती उम्र से
होती हैं बूढी,
पुरुष की स्मृति में

यूँ पत्नियाँ, अपने घर में अक्सर
अपने पतियों पर लगातीं हैं
उसकी स्मृति के कमज़ोर होने का
आरोप
जब पुरुष भूल जाते हैं
शेविंग करवाकर सैलून से लौटते हुए,
पत्नी के बार-बार याद दिलाने के बावजूद
अपने साथ लाना एक किलो दूध और दो रूपए का कपूर

पुरुषों की स्मृति अक्सर
धोखा देती है, तब, जब
रसोई घर में अचानक एक दिन
ढूँढना पड़ जाए चायपत्ती का छोटा-सा
डिब्बा

पुरुष की स्मृति में अब भी है
उस जवान लड़की की देह
जो उसके मकान के ठीक पीछे के मकान में
रहती थी, और जिसे वह
कभी पहले, अपने बाथरूम से बाल्टी के ऊपर खड़े होकर
रोशनदान से झाँका करता था,
इस आह के साथ कि वह लड़की
जिस लोहे की रेलिंग पर
अपने दोनों स्तनों को रखकर खड़ी है,
काश वह लोहा मैं ही होता

वह लड़की जो झुककर खड़ी होती थी
अपनी बाल्कनी की रेलिंग पर और
अपने बाथरूम से झाँक रहे पुरूष को
दिखती थी उसकी छाती में सुरंग की ओर जाती
पतली-सी लकीर
उसका पिछले कई वर्षों पहले निधन हो गया था
तेज जांडिस से
लेकिन सच यह है कि आज भी
रात के घुप्प-अँधेरे में
उस पुरुष को दीखती है जस की तस
ठस्स काले साँप की तरह वह सुरंग
और वह पुरुष अपने बिस्तर पर बेचैन हो उठता है
और फिसल कर
पानी की छोटी-छोटी बूँदों की तरह
घुस जाना चाहता है भीतर
उस सुरंग में

अपनी मौत के कई वर्षों बाद भी
पुरुष की स्मृति में
न ही मर पाई और न ही
बूढ़ी हो पाई वह जवान लड़की ।
पुरुष की स्मृति में न ही
झुर्रियां पड़ पायीं छाती की उन गोरी जगहों पर
और न ही पिचक कर झूल पाए वे
कठोर स्तन आज भी

पुरुष की स्मृति में अपनी मौत के बाद भी
ज्यों की त्यों खड़ी है वह लड़की
ठीक बॉबी की डिम्पल कपाड़िया की तरह
आज के अपने वृद्ध और झुर्रीदार
शरीर के बावजूद
पुरुष की स्मृति में
जिस तरह है वह जवान लड़की और
जिस तरह है डिम्पल कपाड़िया
अपने सुडौल नितम्बों के साथ
पुरुष की स्मृति मे कभी नहीं रहती
अपनी पत्नी के जन्मदिन की
तारीख़

पुरुष की स्मृति में जब तक रहेगी
वह सुरंग
वह काला साँप
वे सुडौल नितम्ब
पुरुष की स्मृति में कभी नहीं टिक पाएगा
अपने घर पर काम करने आने वाली बूढ़ी औरत का
ठीक-ठीक नाम
रसोईघर के डिब्बे में रखी चीज़ों का
ठीक-ठीक पता
पत्नी की धीरे-धीरे गुम होती जा रही
हँसी के पीछे का कारण
और वृद्ध पिता को समय पर देनी
जांडिस की दवा

प्रधानमंत्री को पसीना

लोगों का वह जत्था जो समझते थे
इस लोकतन्त्र में अपने होने का मतलब
उनकी हँसी उड़ाने के लिए सामने पड़ी है उसकी लाश
उसकी लाश जिसने पिछले एक सप्ताह से
प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिश के बाद
हार कर कर लिया है आत्मदाह

प्रधानमंत्री से मिलना कठिन ही नहीं
नामुमकिन है, कहते थे उनके सुरक्षाकर्मी
सुरक्षाकर्मी जिनके सिर पर था सुरक्षाकवच
माथे पर मुकुट और हाथ में भाला और तलवार

वह, जो सात दिनों तक करता रहा मिन्नत
आख़िरी दिन मरने से पहले
दिखलाया था अपना वोटर आई-कार्ड
अपने नागरिक होने का सबूत

तब अपने मरने से ऐन पहले
मरने का निर्णय लिया था इसलिए कि
उसने देखा था खुद अपना वोटर आई-कार्ड
और जिसमें उसके फ़ोटो के बदले चिपकी थी
एक गिलहरी की तस्वीर

वह प्रधानमन्त्री से क्यों मिलना चाहता था
इस सवाल का जवाब ख़त्म हो गया
उसकी मौत के साथ
ऐसा लग सकता है
लेकिन चूँकि सवाल कभी ख़त्म नहीं होते
इसलिए हम बिना जाने ही यह बूझ गए हैं कि
क्यों मिलना चाहता था वह प्रधानमन्त्री से
और हममें से ऐसा कौन है
जो नहीं मिलना चाहता है प्रधानमन्त्री से
इन सवालों के साथ कि
क्यों करवट बदलने पर बजने लगती हैं हड्डियाँ
क्यों पैरों के ज़मीन पर सीधे सटने से
तलुवे पर पड़ जाती हैं ठीक सूखे खेत की तर्ज़ पर दरारें
उस बड़े से पक्षी का नाम क्या है
जो झपट्टा मारकर ले उड़ा है
मेरी-उसकी थाली से रोटियाँ
और पूछने को तो यह भी पूछा जा सकता है कि
कमीज़ के टूट गए बटन को
दुरूस्त करने के लिए कहँ से मिलती है सुई
और कहाँ से मिलता है धागा

जिस समय उसने छिड़क लिया था
अपनी देह पर मिट्टी का तेल
उस समय उच्चस्तरीय बैठक में शामिल थे प्रधानमन्त्री

प्रधानमन्त्री कहते हैं हम नागरिक समाज बनाएँगे
प्रधानमन्त्री कहते हैं हम बन्द कर देगें
फ़सलों में कीड़ों का लगना
प्रधानमन्त्री कहते हैं हम बन्द कर देंगे बच्चों का रोना

वह जिसकी जली लाश हमारे सामने पड़ी है
वह इस लोकतन्त्र पर ही नहीं
प्रधानमन्त्री की इन इच्छाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है
और सबसे बड़ा तो चुनाव आयोग के उस प्रचार पर
जो वोट नहीं करने पर हमें शर्मिंदा करता है
अब भीड़ से निकली इस आवाज़ को कौन दबा सकता है कि
साले और करो वोट

हारने का नहीं भागने का नहीं
यह अक्लमंदी से सोचने का वक़्त है, साथी !
यह सामने जली पड़ी लाश तो सबको दिखती है
लेकिन यह कोई नहीं है जानता कि
जब उसने अपने ऊपर डालकर मिट्टी का तेल
लगा ली थी आग
तब उस आग की धधक से बन्द कमरे में
ए०सी० की उस कृत्रिम हवा के बीच
इस कड़ाके की ठंड में भी प्रधानमंत्री की कान के ठीक पीछे से
चू पड़ी थी पसीने की एक बूँद
और प्रधानमंत्री भौचक रह गए थे

राहुल गांधी की बंडी की जेब

राहुल गांधी की बंडी की जेब को देखकर
अक्सर सोचता हँ कि क्या इसमें भी होती होंगी
स्टेट बैंक का ए०टी०एम० कार्ड
दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट-कार्ड या फिर
दिल्ली से गाजियाबाद या फिर फ़रीदाबाद जाने वाली
लोकल-ट्रेन का मासिक-पास- एम०एस०टी०
क्या राहुल गांधी भी घर से निकलते हुए सोचते होंगे कि
आज नहीं हैं जेब में छुट्टे पैसे और आज फिर ब्लू-लाइन बस पर
पाँच रुपए की टिकट के लिए करनी होगी
हील-हुज्जत
क्या राहुल गांधी की जेब में भी होती होगी
महीने के राशन की लिस्ट

कितना अजीब लग सकता है जब
राहुल गांधी रुकवा दें किसी परचून की दुकान पर अपनी गाड़ी
और ख़रीदने लगें मसूर की दाल
एक किलो चना, धनिया का पाउडर, हल्दी
और गुजारिश कर दें दुकानदार से कि
28 वाला चावल 26 का लगा दो
यह तो बहुत हो गया अजीब तो इतने से भी लग सकता है
जब परचून की दुकान पर पहुँचने से ठीक पहले
स्टेट बैंक के किसी ए०टी०एम० पर अपनी गाड़ी रुकवा कर राहुल गांधी
निकालने लगें दो हज़ार रुपए

सोचता हूँ क्या राहुल गांधी भी करते होंगे जमा
डाकघर में जाकर आवर्ती जमा की मासिक किस्त
क्या उन्होंने भी पूछा होगा किसी डाकघर में कि
इस पासबुक से उनको
कितने दिनों में कितनी मिल सकती है राशि
क्या उन्होंने भी कभी सोचा होगा कि
अभी होम-लोन थोड़ा सस्ता हो गया है और
इस साल द्वारका सै. 23 में लेकर छोड़ दूँ पचास गज ज़मीन
क्या उनके भी सपने में आता होगा उस पचास गज ज़मीन पर
भविष्य में बनने वाला दो कमरों का घर
और उस घर की सजावट

जो राहुल गांधी के क़रीब हैं वे जानते हैं
जो उनके क़रीब नहीं हैं वे भी जानते हैं कि
कुछ नहीं होता है राहुल गांधी की जेब में
एकदम ख़ाली है उनकी जेब
न ही होता है उसमें ए०टी०एम० कार्ड
न ही स्मार्ट-कार्ड
न ही एमएसटी
और न ही राशन की लिस्ट
राहुल गांधी को न ही जाना पड़ा है आज तक
कभी राशन की दुकान पर
और न ही डाकघर
और न ही सस्ते लोन की तलाश में कोई बैंक
उन्होंने नहीं देखा है अभी तक किसी प्रॉपर्टी डीलर का दरवाज़ा
एकदम ख़ाली है राहुल गांधी की बंडी की जेब

कितना अजीब लगता है कि
एकदम ख़ाली है राहुल गांधी की बंडी की जेब
उसमें नहीं है भविष्य की आशंका
उसमें नहीं है वर्तमान को जीने और
भविष्य को सुरक्षित रख ले जाने की कोई तरक़ीब
लेकिन राहुल गांधी ख़ुश हैं
और राहुल गांधी ही क्यों ऐसे बहुत से लोग हैं
जिनकी जेबों में नहीं है कुछ और वे ख़ुश हैं
यह विरोधभास बहुत अजीब है कि जेबें खाली हैं और लोग ख़ुश हैं

लेकिन किसी भ्रम में न पड़ जाएँ
यह विरोधभास सिर्फ चंद लोगों के लिए है वरना
खाली जेबों वाले लोग तो
पटपटा कर मर रहे हैं

बड़ी हो रही है उसकी नफ़रत 

हम आज यह जान लें कि
लाल-बत्ती पर अपने क़रतब दिखाने वाला वह बच्चा
एक दिन बड़ा होकर पूछेगा सवाल

वह पूछेगा वोट डालने का मतलब
वह पूछेगा धूल के नाक से फेफड़े में घुसने से
होने वाली बीमारी का नाम
वह माँगेगा अपने बचपने का हिसाब
वह पूछेगा इस देश को प्यार करने का कारण ।

वह धूल में सना हुआ
क़रतब दिखाता भूखा बच्चा एक दिन बड़ा हो जाएगा
साथ ही बड़ी हो जाएगी उसकी नफ़रत
संभव है वह सीख ले साँपों को पकड़ना
और उसके विष के दाँतों को तोड़ना
संभव है उसके हाथ में इन्हीं क़रतबों से आ जाए
एक बेमिसाल जादू और फिर वह
इस तेज़ भागती दुनिया को कर दे एक जगह स्थिर
संभव है चलाना सीख ले वह गुलेल
और हो जाए उसका निशाना एकदम पक्का
संभव कुछ भी है
निशाना पक्का हो तो उसके हाथ में
आ सकता है और भी कुछ

हम उसे लाल-बत्ती पर देखते हैं
और मुँह फेर लेते हैं
लेकिन एक दिन वह बड़ा होगा
और खूँखार हो जाएगा
तब आप उसे अदेखा नहीं कर पाएँगे।

वह आपकी लम्बी गाड़ी के काँच को
तोड़ देगा एक पत्थर के वार से ।

बुजुर्ग पिता के झुके कन्धे हमें दुख देते हैं 

मेरे सामने पिता की जो तस्वीर है
उसमें पिता एक कुर्ते में हैं
पिता की यह तस्वीर अधूरी है
लेकिन बगैर तस्वीर में आए भी मैं जानता हूँ कि
पिता कुर्ते के साथ सफ़ेद धोती में हैं
पिता ने अपने जीवन में कुर्ता-धोती को छोड़कर भी
कुछ पहना हो मुझे याद नहीं है
हाँ, मेरी कल्पना में पिता
कभी-कभी कमीज़ और पैंट में दिखते हैं
और बहुत अजीब से लगते हैं

मेरी माँ जब तक जीवित रहीं
पिता ने अपने कुर्ते और अपनी धोती पर से
कभी कलफ़ को हटने नहीं दिया
लेकिन माँ की जबसे मृत्यु हुई है
पिता अपने कपड़ों के प्रति उदासीन से हो गए हैं

खैर उस तस्वीर में पिता अपने कुर्तें में हैं
और पिता के कन्धे झूल से गए हैं
उस तस्वीर में पिता की आस्तीन
नीचे की ओर लटक रही हैं
पहली नज़र में मुझे लगता है कि पिता के दर्ज़ी ने
उनके कुर्ते का नाप ग़लत लिया है
परन्तु मैं जानता हूं कि यह मेरे मन का भ्रम है
पिता के कन्धे वास्तव में बाँस की करची की तरह
नीचे की तरफ लटक ही गए हैं

पिता बूढ़े हो चुके हैं इस सच को मैं जानता हूँ
लेकिन मैं स्वीकार नहीं कर पाता हूँ
मैं जिन कुछ सचों से घबराता हूँ यह उनमें से ही एक है

एक वक़्त था जब हम भाई-बहन
एक-एक कर पिता के इन्हीं मज़बूत कन्धों पर
मेला घूमा करते थे
मेले से फिरकी ख़रीदते थे
और पिता के इन्हीं कन्धों पर बैठकर
उसे हवा के झोंकों से चलाने की कोशिश करते थे
तब हम चाहते थे कि पिता तेज़ चलें ताकि
हमारी फिरकी तेज़ हवा के झोंकों में ज़्यादा ज़ोर से नाच सके

हमारे घर से दो किलोमीटर दूर की हटिया में
जो दुर्गा मेला लगता था उसमें हमने
बंदर के खेल से लेकर मौत का कुआँ तक देखा था
पिता हमारे लिए भीड़ को चीरकर हमें एक ऊँचाई देते थे
ताकि हम यह देख सकें कि कैसे बन्दर
अपने मालिक के हुक़्म पर रस्सी पर दौड़ने लग जाता था
हमने अपने जीवन में जितनी भी बार बाइस्कोप देखा
पिता अपने कन्धे पर ही हमें ले गए थे

हमारा घर तब बहुत कच्चा था
और घर के ठीक पिछवाड़े में कोसी नदी का बाँध था
कोसी नदी में जब पानी भरने लगता था
तब साँप हमारे घर में पनाह लेने दौड़ जाते थे
तब हमारे घर में ढिबरी जलती थी
और खाना जलावन पर बनता था
ऐसा अक्सर होता था कि माँ रसोई में जाती और
करैत साँप की साँस चलने की आवाज़ सुनकर
दूर छिटककर भाग जाती
उस दिन तो हद हो गई थी जब
कड़ाही में छौंक लगाने के बाद माँ ने
कटी सब्ज़ी के थाल को उस कड़ाही में उलीचने के लिए उठाया
और उस थाल की ही गोलाई में करैत साँप
उभर कर सामने आ गया

हमारे जीवन में ऐसी स्थितियाँ तब अक्सर आती थीं
और फिर हम हर बार पिता को
चाय की दुकान पर से ढूँढ़ कर लाते थे
हमारे जीवन में तब पिता ही सबसे ताक़तवर थे
और सचमुच पिता तब ढूँढ़कर उस करैत साँप को मार डालते थे

हमारे आँगन में वह जो अमरूद का पेड़ था
पिता हमारे लिए तब उस अमरूद के पेड़ पर
दनदना कर चढ़ जाते थे
और फिर एक-एक फुनगी पर लगे अमरूद को
पिता तोड़ लाते थे
हम तब पिता की फुर्ती को देख कर दंग रहते थे
पिता तब हमारे जीवन में एक नायक की तरह थे

मेरे पिता तब मज़बूत थे
और हम कभी सोच भी नहीं पाते थे कि
एक दिन ऐसा भी आएगा कि
पिता इतने कमज़ोर हो जाएँगे
कि अपने बिस्तर पर से उठने में भी उन्हें
हमारे सहारे की ज़रूरत पड़ जाएगी

मेरे पिता जब मेरे हाथ और मेरे कन्धे का सहारा लेकर
अपने बिस्तर से उठते हैं तब
मेरे दिल में एक हूक-सी उठती है और
मेरी देखी हुई उनकी पूरी जवानी
मेरी आँखों के सामने घूम जाती है

मेरे बुज़ुर्ग पिता
अब कभी तेज़ क़दमों से चल नहीं पाएँगे
हमें अपने कन्धों पर उठा नहीं पाएँगे
अमरूद के पेड़ पर चढ नहीं पाएँगे
और अमरूद का पेड़ तो क्या
मैं जानता हूं मेरे पिता अब कभी आराम से
दो सीढ़ी भी चढ़ नहीं पाएँगे

लेकिन मैं पिता को हर वक़्त सहारा देते हुए
यह सोचता हूं कि क्या पिता को अपनी जवानी के वे दिन
याद नहीं आते होंगे
जब वे हमें भरी बस में अंदर सीट दिलाकर
ख़ुद दरवाज़े पर लटक कर चले जाते थे
परबत्ता से खगड़िया शहर
क्या अब पिता को अपने दोस्तों के साथ
ताश की चौकड़ी जमाना याद नहीं आता होगा
क्या पिता अब कभी नहीं हँस पाएँगे अपनी उन्मुक्त हँसी

मेरे पिता को अब अपनी जवानी की बातें
याद है या नहीं मुझे पता नहीं
लेकिन मैं सोचता हूँ कि
अगर वे याद कर पाते होंगे वे दिन
तो उनके मन में एक अजीब-सी बेचैनी ज़रूर होती होगी
कुछ ज़रूर होगा जो उनके भीतर झन्न से टूट जाता होगा ।

प्रधानमंत्री पर अविश्वास 

आजकल मैं जितनी भी बातों को देखता और सुनता हूँ
उनमें सबसे अधिक मैं
प्रधानन्त्री की बातों पर अविश्वास करता हँ ।

जानने को तो मैं यूँ यह जानता ही हूँ कि
यह जितना आश्चर्य और कौतूहल का समय है
उससे अधिक स्वीकार कर लेने का समय है
पर मैं प्रधानमन्त्री की बातों को स्वीकार नहीं कर पाता हूँ ।

प्रधानमन्त्री जो बोलते हैं
मैं उसे ठीक उसी रूप में नहीं ले पाता हूँ
प्रधानमन्त्री का झूठ मुझे उनके चेहरे पर हर बार दिखता है ।

वैसे तो इस लोकतन्त्र में मुझसे लगभग
यह वचन लिया गया था कि
मैं कम-से-कम प्रधानमन्त्री की बातों पर ज़रूर विश्वास करूँ
लेकिन आजकल देखी-सुनी सारी बातों में मैं
सबसे अधिक प्रधानमन्त्री की बातों पर ही अविश्वास करता हूँ ।

मेरी गहरी नींद को चीरकर घुप्प अँधेरे में
अक्सर मेरे सपने में आते हैं प्रधानमन्त्री ।
सपने में आते हैं प्रधानमन्त्री और मैं उन्हें पहचान लेता हूँ
उस घुप्प अँधेरे वाले सपने में प्रधानमन्त्री
कुछ बुदबुदाते हैं
कुछ ठोस वायदे करते हैं
कुछ सलाह और मशवरे देते हैं और ग़ायब हो जाते हैं
मेरे सपने से ग़ायब हुए प्रधानमन्त्री
मुझे इस देश के सबसे बड़े मसखरे दिखते हैं ।

दिन के उजाले में चाहता हू
प्रधानमन्त्री की ढेर सारी बातों पर विश्वास कर लूँ
चाहता हूँ मान लूँ प्रधानमन्त्री को ठोस प्रतिनिधि
लेकिन ऐसा सोचते ही हर बार करोड़ों भूखी आँखें मुझे घूरने लगती हैं
बन्दूकों की चलने की आवाज़ें मेरे दिमाग़ की नसों को
तड़काने लगती हैं
और फिर मैं अपने ऊपर अविश्वास की चादर ओढ़ लेता हूँ ।

कई बार मैं प्रधानमन्त्री की मजबूरियों को
संजीदगी से सुनना चाहता हूँ
कई बार मैं उनके चेहरे की दयनीयता को
अपने भीतर महसूस करना चाहता हूँ
लेकिन अगले ही क्षण मैं सतर्क हो जाता हूँ
कि ये प्रधानमन्त्री मुझे बहुरूपिया लगते हैं ।

ऐसा हर बार होता है
मैं प्रधानमन्त्री को कैमरे के सामने लाचार देखता हूँ
विवश देखता हूँ
आश्वासन देते देखता हूँ
लेकिन हर बार मुझे लगता है प्रधानमन्त्री उस कैमरे के सामने हैं
पर प्रधानमन्त्री का मस्तिष्क नहीं
प्रधानमन्त्री का दिल नहीं
प्रधानमन्त्री की निगाहें नहीं
प्रधानमन्त्री कहते कुछ हैं और सच में कहना कुछ और चाहते हैं ।

प्रधानमन्त्री की निगाहें जहाँ हैं
उसे हम सब समझते हैं
इसलिए प्रधानन्त्री पर हम अविश्वास करते हैं ।

दौड़ते हुए 

दौड़ते हुए
जो अपनी साँसों की आवाज़ सुनते हैं
उन्हें पहुँचने में अभी वक़्त लगेगा
दौड़ने में
अपने क़दमों का नाप याद रखने वाले को भी
अभी वक़्त लगेगा

वे आएँगे
दौड़ना शुरू करेंगे
और दौड़ते चले जाएँगे

वे जो दौड़गे
गिरते हुए बुज़ुर्ग को थामने के लिए
वे जो दौड़ेंगे
बाढ़ में फँसे बच्चे को बचाने के लिए
या फिर दौड़ेंगे
खेत में बैलों के पीछे-पीछे
उनके भीतर होगी एक आग
और उन्हें अभी साँसों पर ध्यान नहीं होगा

कुर्सी

ऐसा क्यों होता है कि
जब मैं सड़क पर निठल्ला घूमता हूँ
तब मुझे अक्सर लगता है
कि इस सड़क पर निठल्लों की भीड़ बढ़ती जा रही है
मैं आगे बढ़ता हूँ और
निठल्लों का एक हुजूम मुझसे टकराता रहता है
और हमेशा हमें संभलना मुश्किल हो जाता है

मैं पहुँचता हूँ वहाँ, जहाँ
रखी हुई है कुर्सी
थोड़ी उम्मीद
एक निश्चिंतता
पर हर बार मैं निराश होता हूँ
मुझे हर बार वह कुर्सी भरी हुई दिखती है
हर बार मुझे उस कुर्सी पर बैठा दिखता है
वह आदमी, जिसने कल मुझसे पूछा था
इस देश के प्रधानमन्त्री का नाम
हवा में आक्सीजन की मात्रा
राह चलते आदमी की दिशा

मैं वहाँ जाता हूँ
और खड़ा हो जाता हूँ उसके सामने
वह देखता है मेरी ओर
और मुझे पहचानने की करता है कोशिश
और कहता है ऐसे नहीं पंक्ति में जाकर खड़े हो जाओ
और मैं ढूँढ़ने लग जाता हूं पंक्ति का आख़िरी छोर
जहाँ जाकर हो सकूँ खड़ा
और ढ़ूँढ़ता रह जाता हूँ

इस पंक्ति को खींचकर इतना लम्बा किसने बनाया
इसे मैं जानता हूँ
आप सोचने बैठेंगे तो आप भी जान जाएँगे

मुझे कुर्सी पर बैठे हर आदमी का चेहरा
एक जैसा दिखता है
वही दो कान, एक नाक, एक मुँह
वही चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान
मुझे कुर्सी पर बैठे हर आदमी का चेहरा
एक ही चेहरा लगता है
जैसे एक ही आदमी की रूह
बैठी हो इस देश की तमाम कुर्सियों पर
मुझे उन सबमें एकजुटता दिखती है
और एक गहरी योजना

मैं निठल्ला घूमता हूँ
दौड़ता हूँ, पस्त होता हूँ
चाहता हूँ अपने लिए थोड़ी-सी जगह
और हार जाता हूँ
या हरा दिया जाता हूँ
और एक दिन जब मेरी बेरोज़गारी
मेरे भीतर कुलाचें मारती हैं
मेरे पेट की भूखी अंतडि़याँ
जब एक कठोर गोले में परिणत हो जाती हैं तब
मैं उन कुर्सियों में से
सबसे छोटी कुर्सी के सामने जाकर गालियाँ देता हूँ

लेकिन तब भौंचक हो जाता हूँ जब
उस छोटी कुर्सी के बचाव में
सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा आदमी
अपने ओहदे की चिंता किए बग़ैर अपनी कुर्सी से उतरकर
मेरे सामने आ जाता है
वह चट्टान की तरह मेरे सामने खड़ा हो जाता है
और मैं देखता हूँ कि
यह शक़्ल भी उन शक़्लों में से ही एक है
जो इस देश की तमाम कुर्सियों पर बैठी हैं

समूह में 

वे जो मारे गए हैं समूह में
उनकी कोई शिनाख़्त नहीं है
न ही कोई कसूर
वे थे एकत्रित और करना चाहते थे आवाज़ को भी एक़ित्रत
वे जो मारे गए हैं समूह में
उन्हें नहीं मिलेगा मुआवज़ा
न ही कोई पहचान
वे आज ख़बर में भी हैं समूह में
वे जो मारे गए हैं समूह में
वे समझते थे कि समूह की आवाज़ से
वे बदल देगें यह दुनिया
या दुनिया की सोच

वे आज मरे पड़े हैं और दुनिया ठीक वैसी ही चल रही है ।

आग

वह बच्ची, जिसकी उम्र
दस-बारह वर्ष के क़रीब है और जिसने
अपनी दो कोमल उँगलियों के बीच
फँसा रखे हैं पत्थर के दो चिकने टुकड़े
इस भीड़-भरी बस में
निकालने की करती है कोशिश
अपने गले से
अनुराधा पौडवाल की आवाज़

पत्थर के इन दो चिकने टुकड़ों से
निकालती है वह
ढ़ेर सारी फ़िल्मी-धुनें,
भगवान के भजन और
सफ़र के गीत

इस भीड़-भरी बस में भी
लोग सुनते हैं उसके छोटे गले से
अनुराध पौडवाल की छोटी आवाज़
और देखते हैं
बहुत ही तेज़ गति से चलने वाली
उसकी दो उँगलियों के बीच
पत्थरों का आपस में टकराना

उस बच्ची को नहीं है मालूम
पत्थर के इन्हीं दो टुकड़ों से, जिनसे
वह निकालती है फ़िल्मों की धुनें और
जीवित रहने की थोड़ी-सी गुंजाइश
उन्हीं पत्थरों के टकराने से निकलती है
चिंगारी
उस बच्ची को नहीं है मालूम, जब
इस सृष्टि की हुई शुरुआत, तब
लोगों ने बसने से पहले, सबसे पहले
ईजाद की थी आग
इन्हीं दो पत्थरों को टकराकर

छोटी खिड़की

जबकि इस बड़े शहर में
बड़े-बड़े घर हैं और
इन बड़े-बड़े घरों में हैं बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ, तब
उसके हिस्से इस छोटे से घर में
छोटी खिड़की आई है ।
छोटी खिड़की,
जिससे दिखता है छोटा आसमान
चंद तारे और बादल का एक टुकड़ा ।

वह औरत उस छोटी खिड़की से
देखती है गली में, उस सब्जी वाले को
देती है आवाज़ गली में खेलते अपने बच्चों को
और करती है इन्तज़ार काम पर से
अपने पति के लौटने का ।

छोटी खिड़की कभी बंद नहीं होती ।

साँकल 

मेरे दरवाज़े पर
वह एक जो साँकल है,
बड़ी ही मनहूस है ।
जब भी वह बजती है
मेरी माँ चौंक जाती हैं
और पिता छिपने की जगह तलाशने लगते हैं ।

और मुझे एक बार फिर
झूठ बोलने के लिए तैयार होना होता है ।

घर में छिपे हुए पिता के बारे में
कहना पड़ता हैं– वे अभी तो नहीं हैं।
और उस लेनदार की कड़ी आँखों की ज्वाला
मुझे अपने ऊपर सहनी होती है ।

मैं अब गाँव की पाठशाला नहीं जाना चाहता हूँ जहाँ
शिक्षक हमें झूठ नहीं बोलना सिखाते हैं ।

मैं चाहता हूँ बढ़ई का हुनर सीखना
ताकि एक दिन
उस मनहूस साँकल को ही हटा दूँ ।

हवेली का सच

वह हवेली, जितनी पुरानी थी
उससे अधिक पुरानी थी उसकी स्मृतियाँ ।
उसके पुरखे राजा थे, यह
वहाँ के लोगों की स्मृतियों में बसी थी ।
अब जबकि राजतंत्र नहीं रहा
वह हवेली अब भी राजभवन है
और उसमें रहने वाले राजा ।

उस हवेली के दो मुख्य दरवाज़े थे
और दोनों दरवाज़ों के दोनों ओर
एक-एक शेर था ।
उन शेरों के जबड़े खुले थे,
और जीभ के चारों ओर
गिने जा सकते थे उनके दाँत
दो दरवाज़ों के दोनों ओर दो शेर
मतलब चार शेर और चार जबड़े
उन चार जबडों के भीतर थे कई दाँत ।

उस राजा के पास अभी भी थे
दो हाथी, और दो मोर ।

वे हाथी चिंघाडते नहीं थे, लेकिन
मोर कभी-कभी अपने पंख फैलाकर
नाचने की कोशिश करते थे ।

हम यह निरे बचपन से देखते आ रहे थे कि
ठीक दुर्गापूजा के दिन, जो
जात्रा निकलती थी, उसमें इस्तेमाल होते थे
ये हाथी ।
ढोल-नगाड़े के साथ
ठीक दोनों हाथियों के पीछे वाले रथ पर बैठते थे राजा
अपने पुरखों की तलवार के साथ
पुरखों की वह तलवार कभी
इस्तेमाल हुई या नहीं, बग़ैर यह जाने
हम यह मानते थे कि अगर उसे बाहर
निकाला जाए, तो उसके साथ ही निकलेगी
इतिहास में दबी हुई कई चीत्कारें
और ख़ून के कई छींटे ।
हमारे स्कूल के रास्ते में थी वह हवेली
रहस्य और रोमांच से भरपूर ।

बाबा नसीहत देते थे
उस हवेली की ओर नहीं देखने की
लेकिन हम अक्सर देखते थे
उसकी मुँडेर पर दो कबूतर-
जिन्हें लोग कहते थे,
उस राजा की दो बेटियाँ,
जिन्हें उसने जन्मते ही
एक कमरे की ज़मीन में गाड़ दिया था, ऊबकर
जब उसकी पत्नी ने दो बेटियों को
जनने के बाद फिर से
जुडवाँ बेटियों को पैदा किया था ।
हम तनिक ठहरकर
उन कबूतरों की शक़्ल में ढूँढ़ने लगते थे
उन नहीं देखी हुई बेटियों की शक़्लें ।

उस पूरे गाँव की फरियाद
सुनता था वह राजा, अपने राजसी लिबास में ।
कि किसने किसकी ज़मीन हडप ली
कि किसके जानवर ने चर लिया खेत
कि किसने हाथ उठाया अपनी पत्नी पर–
और किसने नहीं रखी
अपनी बूढ़ी माँ की थाली में रोटियाँ

और ऐन निर्णय सुनाने से पहले
राजा चढ जाता था हाथी पर
और बैठ जाते थे फरियादी ज़मीन पर, ताकि
एक माहौल तैयहार हो सके राजभवन का ।

लेकिन सबसे बडा आश्चर्य यह था कि
लगभग बीस वर्ष पहले, जब
राजा ने दफ़नाया था अपनी बेटियों को
अपने घर के तहख़ाने में, तब से
किसी ने नहीं देखा था उसकी पत्नी को
जिसके बारे में दादी कहती थीं
वह एक रूपसी थी, और
जो एक बुलबुल की तरह क़ैद हो गयी थी,
उस पिंजरे में।

अपनी पत्नी को भी मार दिया राजा ने
ऐसा भी लोग सोच सकते थे, लेकिन
ऐसा सोचने में वे दोनों बेटे आड़े आते थे
जो जन्मे थे उसके बाद ।
नौकरों को अंदर प्रवेश का
अधिकार नहीं था ।
लोग कहते हैं महरी भी चुड़ैल थी
जो हवेली से बाहर आते नहीं दिखी
किसी को आज तक ।

आज जब मरी पडी है सबके सामने
राजा की वह पत्नी, तब
सबने देखे हैं उसके चेहरे और शरीर पर
मार के गहरे निशान
और एकबारगी उधड़ गए हैं, रहस्य के कई पर्दे ।

मैं अंदाज़ लगाना चाहता हूँ
हवेली की लम्बाई और चौड़ाई का
आखिर अंतस्थल का वह कौन सा कोना था
जहाँ पीटता था राजा अपनी पत्नी को
और हम स्कूल जाते बच्चों को
उसकी चीत्कार भी सुनाई नहीं पडती थी ।

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