उमाशंकर तिवारी की रचनाएँ

आ गए कुहरे भरे दिन

आ गए,
कुहरे भरे दिन आ गए।
मेघ कन्धों पर धरे दिन आ गए ।

धूप का टुकडा़ कहीं भी
दूर तक दिखता नहीं,
रूठकर जैसे प्रवासी
ख़त कभी लिखता नहीं,
याद लेकर
सिरफिरे दिन आ गए ।

दूर तक लहरा रही आवाज़
सारस की कहीं है,
सुबह जैसे गुनगुनाकर श्वेत
स्वेटर बुन रही है,
आँख मलते
छोकरे दिन आ गए ।

इस शिखर से उस शिखर तक
मेघ-धारा फूटती है,
घाटियों के बीच जैसे
रेलगाड़ी छूटती है,
भाप पीते मसखरे दिन
आ गए ।

एक धुँधला पारदर्शी जाल
धीवर तानता है,
बर्फ़ को आकाश का रंगरेज़
चादर मानता है,
यों बदलकर
पैंतरे दिन आ गए ।

बाँध लेती हर नदी कुछ
सिलसिला-सा हो गया है,
मन पहाड़ी कैक्टस-सा
घाटियों में खो गया है,
नग्न होते
कैबरे दिन आ गए ।

बाक़ी है ईमान अभी भी

हम न रुकेंगे गलियारों में,
हम न बिकेंगे बाज़ारों नें
बाकी है ईमान अभी भी
आधी और गुज़र जाएगी
इतना है सामान है अभी भी

संचय का सुख जान न पाए
जोड़े भी तो सपने जोड़े –
इन हाथों से नीले नभ नें
कितने श्वेत कबूतर छोड़े?

हम विषपायी जनम-जनम के
ज़िन्दा वो पहचान अभी भी।

आग चुराकर सौ दुख झेले
सब कुछ देकर आग बचाई
बन बै ठे चन्दन की समिधा
चारों कोने आग लगाई

जलकर भी ख़ुशबू ही देगें
जलने का अभिमान अभी भी।

बाग़ी, हमदम, दोस्त हमारे
मरजीवों से रिश्ते – नाते
दुनिया हमको समझ न पाती
हम दुनिया को समझ न पाते

लीकें छोड़ें. पत्थर तोड़ें
हम ऐसे तूफ़ान अभी भी।

चैन उड़ाती रातें 

चैन उड़ाती रातें आईं
धूल उडा़ते दिन आए हैं ।
सीधी राह गुज़रना मुश्किल
ऐसे दौर कठिन आए हैं ।

सुख की नींद हमें भी मिलती
जो ख़ुद हम नादान न होते
काश, छ्तों को आँखें होतीं,
दीवारों के कान न होते

फिर भी पूरब की खिड़की से
क्या उजियारे बिन आए हैं ?

बेमानी हैं नाते-रिश्ते
पास-पड़ोस असलहों वाले
आँखें जख़्मी, सपने घायल
और जबानों पर हैं ताले

घर के लोग सयाने कितने
हम उँगली पर गिन आए हैं ।

हम ऐसे राजा के बेटे
जिनके लिए मॄगदाव लिखा है
एक अदद लम्बा निर्वासन
कुनबे का बिखराव लिखा है

फिर भी बन-बन भटकाने को
जब-तब हेम हिरन आए हैं ।

हेमन्त : हिमालय और हम 

आ गए, कुहरों भरे दिन आ गए।
मेघ कन्धों पर धरे दिन आ गए।

धूप का टुकडा़ कहीं भी
दूर तक दिखता नहीं,
रूठकर जैसे प्रवासी
ख़त कभी लिखता नहीं,
याद लेकर सिरफिरे दिन
आ गए।

दूर तक लहरा रही आवाज़
सारस की कहीं है,
सुबह जैसे गुनगुनाकर श्वेत
स्वेटर बुन रही है,
आँख मलते छोकरे दिन
आ गए।

इस शिखर से उस शिखर तक
मेघ-धारा फूटती है,
घाटियों के बीच जैसे
रेलगाड़ी छूटती है,
भाप पीते मसखरे दिन
आ गए।

एक धुंधला पारदर्शी जाल
धीवर तानता है,
बर्फ़ को आकाश का रंगरेज़
चादर मानता है,
यों बदलकर पैंतरे दिन
आ गए।

बाँध लेती हर नदी कुछ
सिलसिला-सा हो गया है,
मन पहाड़ी कैक्टससा
घाटियों में खो गया है,
नग्न होते कैबरे दिन
आ गए।

रोशनी सड़कें

रोशनी, सड़कें सभी
अच्छी लगें-
शहर को ऊँची
जगह से देखिए ।

शहर यह कोणार्क के
मानिन्द है
आग पर्वत की,
सुबह की रोशनी
सिन्धु घाटी की
पताकाएँ लिए
सात मंज़िल तक
गया है आदमी
फैलते आकाश-सा
सागर लगे
लहर को उल्टी सतह से
देखिए ।

उग न आए फिर कहीं
जंगल कोई
चौकसी रखिए
दरोदीवार पर
कंठ-भर पी जाइए
मीठा ज़हर
आँख रखिए
वक़्त की मीनार पर
और कोई तो पचा सकता नहीं
ज़हर को
सबकी वज़ह से
देखिए ।

तीन सागर तीन
जलसाघर यँहा
पत्तनों की बाढ़
चंपा द्वीप तक
झालरें आकाश-द्वीपों की
टँगीं
झिलमिलाहट
रेत, मछली, सीप तक
फिर किसी जलदस्यु का
ख़तरा न हो
इस नगर को नागदह से,
देखिए ।

एक मुश्किल दौर में

चैन उडा़ती रातें आईं
धूल उडा़ते दिन आए हैं।
सीधी राह गुज़रना मुश्किल
ऐसे दौर कठिन आए हैं।
सुख की नींद हमें भी मिलती
जो ख़ुद हम नादान न होते
काश, छ्तों को आँखें होतीं,
दीवारों के कान न होते
फिर भी पूरब की खिड़की से
क्या उजियारे बिन आए हैं?

बेमानी हैं नाते-रिश्ते
पास-पड़ोस असलहों वाले
आँखें जख़्मी, सपने घायल
और जबानों पर हैं ताले
घर के लोग सयाने कितने
हम उँगली पर गिन आए हैं।

हम ऐसे राजा के बेटे
जिनके लिए मॄगदाव लिखा है
एक अदद लम्बा निर्वासन
कुनबे का बिखराव लिखा है
फिर भी बन-बन भटकाने को
जब-तब हेम हिरन आए हैं।

बनारस की सुबह वाले 

शाम की रंगीनियाँ
किस काम की
किसलिए कहवाघरों के
चोंचले?
आचमन करते
उषा की ज्योति से
हम बनारस की सुबह वाले
भले।
मन्दिरों के साथ
सोते – जागते
हम जुड़े हैं सीढियों से,
घाट से
एक चादर है
जुलाहे की जिसे
ओढ़कर लगते किसी
सम्राट से
हम हवा के पालने के
झूलते
हम खुले आकाश के
नीचे पले।

हम न डमरू की तरह
बजते अगर
व्याकरण के सूत्र
कैसे फूटते?
हम अगर शव-साधना
करते नहीं
सभ्यता के जाल से
क्या छूटते?
भंग पीकर भी अमंग
हुए यहाँ
सत्य का विष पी
हुए हैं बावले।

हों ॠचाएँ, स्तोत्र हों
या श्लोक हों
हम रचे जाते लहर से,
धार से
एक बीजाक्षर अहिंसा
का लिए
आ रही आवाज़
वरुणा -पार से
हम अनागत की
अदेखी राह पर
हैं तथागत – गीत
गाते बढ़े चले।

खेतों में आँसू बोते हैं 

वे लोग जो काँधे हल ढोते
खेतों में आँसू बोते हैं-
उनका ही हक़ है फ़सलों पर
अब भी मानो तो
बेहतर है।

जिनके सपने बेग़ैरत हैं
अक्सर जो
चुप रह जाते हैं
झिड़की खाने के आदी हैं
फुटपाथों पर
सो जाते हैं
वे लोग बड़े गुस्से में हैं
रुख़ पहचानो तो
बेहतर है।

जिनके पुरखे भी ‘चाकर’ थे
जिनकी घरवाली
‘बाँदी’ थीं
जिन पर कोड़े बरसाने की
कारिन्दों को
आज़ादी थी
वे लोग खड़े सीना ताने
उनकी मानो तो
बेहतर है।

चलिए, बाज़ार तक चलें 

एक अदद शब्द के लिए
चलिए,
बाज़ार तक चलें…
मौसम का हाल पूछने
ताज़ा
अख़बार तक चलें।

ज़िस्म मेमने का क्या हुआ बेतुका सवाल
छोड़िए
स्वाद के नशे में झूमते
भेड़िए को हाथ
जोड़िए
ज़ुर्म की शिनाख़्त के लिए
आला दरबार तक
चलें।

ऐसी आँधी गुज़र गई
ज़हर हुए वन, नदी,
पहाड़
सगे-सगे लगे हैं हमें
डोलते कबन्ध, कटे
ताड़
लदे हरसिंगार के लिए
छपे इश्तहार तक
चलें।

जोंक जो हुई ये ज़िन्दगी
उम्र है ढहा हुआ किला
तेंदुए मिले कभी-कभी
आदमी कहीं नहीं मिला
आइए, तलाश के लिए
इसी यादगार तक
चलें।

ख़ूबसूरत घर

बहुत चाहा था अपना ख़ूबसूरत
घर बनाऊँगा –
मगर ये क्या हुआ, घर में उगे
बाज़ार के रिश्ते।
जुड़े जो ख़ून से, बेचैन रातों की गवाही से
वही सन्देह के जलते हुए सन्दर्भ गढ़ते हैं
वसीयत हो गई है उम्र की जागीर भी जिनको
वही कानून की नकली इबादत रोज़ पढ़ते हैं

जिन्हें सपने दिए थे और हाथों से
सँवारा था –
वही बेटे हुए बाँटी गई
दीवार के हिस्से।

अजब बदरंग-सा, ख़ामोश ख़स्ता हाल है
इस दौर के सहमे हुए, लाचार कूल्हों का
वही मजमून जैसे ख़ास ऊँची नाक वाले
गाँव के भी तीन घर तैंतीस चूल्हों का

जो अक्सर रू-ब-रू मारीच की
ज़िन्दा हक़ीकत से –
छले जाते वही हर रोज़
सोने के बने मृग से।

डाकिए दिन 

हमारे वास्ते तो गुलमोहर हैं
फूल चेरी के/हमें आशीषते,
सौगात घर-घर बाँट आते
डाकियों से दिन|

ऊँघते बालक सरीखा वो पहाडी़ गाँव
जिसको साधती डोरी चढ़ाये
धनुष जैसी नदी
कुहरों के बने तटबन्ध जिनकी खुली
छ्त पर खडी़ ठिठकी, मुसकराती
सदी
कि जैसे जादूई झीलें
कि जैसे सामने सौ पारदर्शी जाल
कि जैसे बादलों की सरहदें
छूते हुए
बनपाखियौं से दिन।
सीढियों पर फूल,
कौंध फूल, बाहों फूल,
गोदी फूल ज्यों बहते हुए
झरने
हमें देकर सरोपा,
फूल का जामा,अँगरखा,नारियल
आया कोई सब कुछ
सही करने
कि जैसे पद्मगंधी ताल
कि जैसे हर कहीं वशीं
कि आपाधपियों में ठुनकते
वैशाखियौं से दिन।

शाम की रंगीनियाँ 

शाम की रंगीनियाँ
किस काम की
किसलिए कहवाघरों के
चोंचले ?
आचमन करते
उषा की ज्योति से
हम बनारस की सुबह वाले
भले ।

मन्दिरों के साथ
सोते-जागते
हम जुड़े हैं सीढ़ियों से,
घाट से
एक चादर है
जुलाहे की जिसे
ओढ़कर लगते किसी
सम्राट से
हम हवा के पालने के
झूलते
हम खुले आकाश के
नीचे पले ।

हम न डमरू की तरह
बजते अगर
व्याकरण के सूत्र
कैसे फूटते ?
हम अगर शव-साधना
करते नहीं
सभ्यता के जाल से
क्या छूटते ?
भंग पीकर भी अमंग
हुए यहाँ
सत्य का विष पी
हुए हैं बावले ।

हों ॠचाएँ, स्तोत्र हों
या श्लोक हों
हम रचे जाते लहर से,
धार से
एक बीजाक्षर अहिंसा
का लिए
आ रही आवाज़
वरुणा पार से
हम अनागत की
अदेखी राह पर
हैं तथागत- गीत
गाते बढ़े चले ।

शहर को ऊँची जगह से देखिए 

रोशनी, सड़कें सभी
अच्छी लगें-
शहर को ऊँची
ज़गह से देखिए।

शहर यह कोणार्क के
मानिन्द है
आग पर्वत की,
सुबह की रोशनी
सिन्धु घाटी की
पताकाएँ लिए
सात मंज़िल तक
गया है आदमी
फैलते आकाश-सा
सागर लगे
लहर को उल्टी सतह से
देखिए।

उग न आए फिर कहीं
जंगल कोई
चौकसी रखिए
दरोदीवार पर
कंठ-भर पी जाइए
मीठा ज़हर
आँख रखिए
वक़्त की मीनार पर
और कोई तो पचा सकता नहीं
ज़हर को
सबकी वज़ह से
देखिए।

तीन सागर तीन
जलसाघर यँहा
पत्तनों की बाढ़
चंपा द्वीप तक
झालरें आकाश -द्वीपों की
टँगीं
झिलमिलाहट
रेत, मछली, सीप तक
फिर किसी जलदस्यु का
ख़तरा न हो
इस नगर को नागदह से,
देखिए।

आईना चेहरा 

मुझे छूकर ज़रा देखो-
तुम्हारा आईना हूँ मैं।
मुझे भी चोट लगती है
कि शीशे का बना हूँ मैं।
तुम्हारी निस्ब्तों के साथ
मेरा दिल बहलता है
कभी सन्दल महकता है
कभी लावा पिघलता है
चुनौती हूँ, कोई मुठभेड़ हूँ
या सामना हूँ मैं।

तुम्हारे रंग के छींटे
मेरा मौसम बदलते हैं
लचीली डालियों पर
मोगरे के फूल खिलते हैं
पहाडी़ मन्दिरों का जादुई संगीत हूँ
आराधना हूँ मैं।

कभी जो जख़्म से
मजलूम का चेहरा उभरता है
हमारी सोच का ख़ुशरंग
शीराज़ा बिखरता है
कटाए हाथ बायाँ
औ’ अँगूठा दाहिना हूँ मैं

बेचेहरा मैं 

जो चेहरा छोड़कर अपना
कभी घर से निकल जाता-
तो मेरे सामने होते हज़ारों आईना चेहरे……
ठिठक कर भागते चेहरे,
बगल से झाँकते चेहरे।
सफ़र के वक़्त मेरे साथ मेरा घर नहीं होता
कभी शीशा चिटखने का भी मुझको डर नहीं होता
सफ़र में सिर्फ़ चलती साँस, ज़िन्दा पाँव ही होते
कोई मंज़िल, कोई भी मील का पत्थर नहीं होता
यही पैगाम लेकर जो कभी
घर से निकल जाता…
तो मेरे सामने होते हजारों आईना चेहरे-
ख़ुशी से झूमते चेहरे,
शिखर को चूमते चेहरे।
हवाओं से, लहर के साथ अपनी दोस्ती होती,
कभी आँधी, कभी तूफान से भी सामना होत
तभी तो जान पाता आदमी क्या चीज़ होता है
वो चाहे निष्क्रमण होता कि मेरा भागना होता
सुबह के वास्ते जो शाम लेकर
मैं निकल जाता-
तो मेरे सामने होते हज़ारों आईना चेहरे-
समन्दर लाँघते चेहरे,
नया पुल बाँधते चेहरे।

जो हवा में है

जो हवा में है,
लहर में है
क्यों नहीं वह बात,
मुझमें है?

शाम कन्धों पर लिए अपने
ज़िन्दगी के रू-ब-रू चलना
रोशनी का हमसफ़र होना
उम्र की कन्दील का जलना

आग जो
जलते सफ़र में है
क्यों नहीं
वह बात मुझमें है?

रोज़ सूरज की तरह उगना
शिखर पर चढ़ना, उतर जाना
घाटियों में रंग भर जाना
फिर सुरंगों से गुज़र जाना

जो हँसी
कच्ची उमर में है
क्यों नहीं वह बात
मुझमें है?

एक नन्हीं जान चिडि़या का
डा़ल से उड़कर हवा होना
सात रंगों की लिए दुनिया
वापसी में नींद भर सोना

जो खुला आकाश स्वर में है
क्यों नहीं वह बात
मुझमें है?

पहचाने नहीं जाते

ये शहर होते हुए-से गाँव
पहचाने नहीं जाते।
लोग जो फ़ौलाद के मानिन्द थे
अब रह गए आधे,
दौड़ते-फिरते विदूषक-से
मुरेठा पाँव में बांधे,
नाम से जुड़ते हुए कुहराम
पहचाने नहीं जाते।
दाँव पर अन्धी सियासत के, हुए
गिरवी सभी चौपाल,
ख़ून के रिश्ते हुए गुमराह
चलते हैं तुरूप की चाल,
तेज़ नख वाले नए उमराव
पहचाने नहीं जाते।
अब न वे नदियाँ, न वे नावें
हवाएँ भी नहीं अनुकूल,
हर सुबह होती किनारे लाश
पानी पर उगे मस्तूल,
आँधियों के ये समर्पित भाव
पहचाने नहीं जाते।

अकाल के बाद

माँ, नहीं बादल बुलाती
खुली छत से
कुछ न सूरज से, न कुछ
माँगे शरत से

भूल बैठी लोरियाँ,
किस्से कहानी
बाढ़ की गंगा हुई
दो बूंद पानी
रूठकर बैठी हुई है
देवव्रत से

क्या न करवाचौथ के
मेले लेगेंगे?
चूड़ियों के हाट घाटों पर
सजेंगे?
क्या न अब मोती गिरेगा
टूट नथ से?

बैठते हल, कोख सूनी
होंठ नीले
किस तरह हों बेटियों के
हाथ पीले?
चलें हम भी
बात कर आएँ

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