उमा अर्पिता की रचनाएँ

कुछ नहीं बदलेगा

कभी-कभी
मन के भीतर
घनचक्कर की तरह
घूमता है एक सवाल —
आज की रात मैं सोऊँ,
और सोई ही रह जाऊँ,
तब क्या होगा इस घर का/
मेरे बच्चों का/पति का/रिश्तेदारों का/
दफ्तर का/दफ्तर के सहयोगियों का –?

क्या होगा–
जब कल सुबह
आवाज लगाता-लगाता पति
बदहवासी में बड़बड़ाता घूमेगा, कि
इतनी देर कर दी- खाना बनाना है/
बड़े को नाश्ता देना है/छोटे का टिफिन लगाना है
और फिर खुद भी तो तैयार होना है —
समय कहाँ बचा है?
आज क्या हुआ है जो नींद
इतनी लंबी अँधेरे-सी पसर गई है?

बच्चे कहने को तो बड़े हो गए,
पर आज भी घर-गृहस्थी का
क, ख, ग तक नहीं जानते —
पूरा घर एक ही औरत की धुरी पर घूमता है –
अब चाहे उसे बीवी कह लो या माँ!
घड़ी की सूइयों के साथ-साथ
बजते हैं फरमाइशों के घंटे
और ऐसे में कल सुबह
अगर मैं न उठी, तो
घर की किस दिशा में
क्या रखा है, कौन बताएगा?

दफ्तर में
कितनी ही फाइलें हैं,
जो अधूरी छूट जाएँगी –
कहाँ कौन-सा काम बाकी है
यह जान लेना
एकदम तो किसी के लिए भी
मुश्किल हो जाएगा!
मेरे सहयोगी कैसे बुझे-बुझे से हो जाएँगे/
कुछ तो बहुत उदास हो जाएँगे!
क्या रिश्ते-नातेदार भी कुछ अकेलापन महसूस करेंगे?
जब फोन की घंटी टनटनाएगी
तो कौन दौड़-दौड़कर रिसीवर उठाएगा/बतियाएगा
अपने हों या दूर-दराज के
कौन सभी रिश्तों की खबर लेगा?

यह क्या!
लगता है
सब गड्ड-मड्ड हो जाएगा
कहीं कुछ ठीक नहीं चलेगा –
लेकिन तभी जैसे
पलट गया तस्वीर का रुख –
लगा, न ऐसा कुछ न होगा –
पति एक-दो दिन में ही
अभ्यस्त हो जाएगा — ढूँढ़ लेगा घर के
कोने-ठिकाने/माल-असबाब
बच्चे, कुछ-कुछ भीगी-सी आँखें लिए
मन में एक टीस-सी दबाए
धीरे-धीरे
रोजमर्रा की जिंदगी के आदी हो जाएँगे
आखिर कोई कब तक रहेगा उदास?
एक-न-एक दिन तो सबको जाना है,
बहुत जल्द वे भी इस सत्य को
स्वीकार लेंगे
और ढूँढ़ने लगेंगे
खुशियों के नए आयाम!

फिर धीरे-धीरे माँ
एक तस्वीर में तब्दील हो
फोटो एलबम में
कैद होकर रह जाएगी
कभी-कभी देख लेने
और याद कर लेने को!

रिश्तेदार आएँगे रस्म अदायगी करने
और इस बहाने एक-दूसरे से मिल लेंगे –
बस इतना ही!
फिर वे भी ऊब जाएँगे
दो दिन के सोग से!
समय ही कहाँ है किसी के पास?
मरने वाले की चिंता किसे है?
यह तो दुनिया है, यहाँ तो
जो आता है, उसने जाना ही है
फिर रोना-धोना कैसा?
सब लौट जाएँगे, और
बीती यादों की धूल झाड़
व्यस्त हो जाएँगे
अपने-अपने कामों में –
बस, कभी-कभी किसी अच्छी/बुरी चर्चा में
जिक्र बनकर रह जाएगा मेरा होना/न होना!

सहयोगियों में शायद कुछ तो उदास होंगे
मगर कौन कब तक उदासी ओढ़े?
एक अवसर मिला है/आगे बढ़ने का
खाली हुआ है एक पद —
यह तो खुशी की बात है,
इसमें भला उदासी कैसी?
वे आँखों की कोरों में मुस्कराकर कहेंगे –
‘लो अब आया असली सुप्रीम कोर्ट का फैसला,
अब इसके आगे
कोई सुनवाई नहीं,
कोई अपील नहीं’
और –
मैं एक हस्ताक्षर बन
फाइलों में दबी रह जाऊँगी अनंत तक!
कितना भयावना सच है यह –
लेकिन मोह के जाल से निकलना
और असलियत को स्वीकारना ही होगा
कि
कहीं कुछ नहीं बदलेगा
तुम हो या न हो!

बैल-सा जीवन

उस रात, जब
दर्द की वादियों में
बेतरह सिसका था मन
तब,
तुम कहाँ थे दोस्त?

कोल्हू के बैल की तरह
जिम्मेदारियों का जुआ
ढोए-ढोए
मेरे कंधे छिलने लगे हैं!
तुमने भी तो कभी
मेरे छिले कंधों पर
अपने होंठ नहीं रखे
कभी उन्हें पलकों से नहीं सहलाया!
अपने दर्द को आप ही
सहलाते-पुचकारते
थकने लगी हूँ,
पर न जाने क्यों
मेरी बुझती आँखों में
आज भी उम्मीद का
एक दीया टिमटिमाता है,
जिसकी धुँधली-सी
रोशनी में आँखें मूँदे
थोपी गई जिम्मेदारियों के
कोल्हू में घूमती जा रही हूँ
अनवरत–!

व्यर्थ की चाहत

तुम आए तो थे
बड़े उत्साह से समुद्र तक
मगर फिर डर क्यों गए
गहराई से,
पैर भिगोने से पहले ही…?

किनारे की रेत में
पैर धँसाकर
मूँगे और मोतियों से
झोली भरने की चाहत करना
कहाँ तक संगत है–?

सच मानो दोस्त
ऐसी चाहत तो कायरों की
बपौती है, और तुम भी
उन्हीं की पंक्ति में
आ खड़े होंगे,
ऐसा विश्वास तो न था…!

सिक्के के दो पहलू

‘तू’ के भीतर
संपूर्ण ‘मैं’ समाया है, और
‘मैं’ के भीतर
संपूर्ण ‘तू’–
फिर कौन कहता है
कि तू ‘तू’ है और मैं ‘मैं’?
हम दोनों तो, दो पहलू हैं
एक ही सिक्के के–!
लोग चाहे कितना ही
उलट-पलटकर
देखते रहें/गढ़ते रहें
परिभाषाएँ
अपने-अपने अनुरूप,
पर
हमें अलग करने का साहस
न किसी में है/न होगा…!

कलई कभी तो खुलेगी

जो हुआ/जो किया
वो अच्छा था या बुरा
बात यह सोचने की नहीं
बात है समय की/समय की जरूरत की —

तुमने सोच लिया कि
सारी दुनिया तुम्हारे इशारे पर नाचती है
क्योंकि तुम घिरे हो
दासत्व के भार से झुके लोगों से
जिनकी लपलपाती जीभें
हर वक्त तैयार रहती हैं
तुम्हारे तलवे चाटने को —
आश्चर्य होता है कि
उनकी खिसयानी हँसी देखकर
तुम्हें कोफ्त नहीं होती?
तुम्हें भी तो आदत पड़ चुकी है
अपने इर्द-गिर्द नपुंसकों की
भीड़ जमा करने की –!

कभी इसके, कभी उसके
कांधों का सहारा लेकर चलते
तुमने कभी नहीं सोचा था कि
कोई तुम्हारे पैरों के नीचे से
जमीन खींच लेने का साहस
भी रखता है —

याद आती है
बचपन की सुनी कहानी कि
एक राजा के नंग-धड़ंग
शरीर को देखकर भी
नजरअंदाज करते रहे चापलूस
और पढ़ते रहे कसीदा
उसकी पोशाक की तारीफ में –
खुशी से फूला नहीं
समाता था राजा भी…
और कैसे गिरा वो
धड़ाम से जमीन पर,
जब कोई बोल गया सच…
बौखला उठा वो –
क्योंकि सालों-साल उसने जो
झूठ सुना था
अब वही बन गया था
उसके लिए सच…

अहंकार के नशे में चूर
नहीं देख पाते ऐसे लोग
अपना ही कोढ़
लेकिन
ऐसे सत्ता के मद में चूर
लोगों की कलई कभी तो खुलेगी
कोई तो करेगा साहस
उन्हें आईना दिखाने का
तब यह दुनिया होगी
उन लोगों की दुनिया
जो सच को सच कहने का
साहस रखते हैं…!

रीतते हुए 

मेरे दोनों हाथों की
मुट्ठियाँ बंद थीं…
एक में थे अनगिनत
रंगीन सपने
और दूसरी में
आशा और विश्वास के संगम का
निर्मल पानी, जिन्हें सहेजे-सहेजे
पग-पग धरती
धीमे-धीमे चलती रही थी मैं…

लेकिन अचानक उठा था
न जाने कैसा तूफान, कि अनायास ही
खुल गई थीं मेरी मुट्ठियाँ
और बिखर गया था
एक-एक सपना
रीत गया था उँगलियों के पोरों से
आशा और विश्वास का पानी भी…

अब मेरी हथेलियों में चुभती है
उदासी, निराशा और अविश्वास की रेत
तुम्हीं कहो दोस्त–
कब तक सहनी होगी मुझे यह चुभन…?

मोहभंग

क्यों टूट रही हैं
मोह की कड़ियाँ
एक-एक कर?
अब कौन–
किसके लिए जिएगा,
कौन किसके
लिए मरेगा…!

कल और आज

वो कल की बात
आज सपना हो गई है,
जब गुजर जाती थी
रात सोते-जागते
किसी के सपनों में…!
जागते/सोते/जाने-अनजाने
छाई रहती थी
चेहरे पर एक मुस्कराहट…
आने वाली दुनिया के
आकर्षक रंगों से सजी…!
और आज वही रात है, वही आँखें
ये आँखें आज भी
गुजार देती हैं/रात
आँखों में…
लेकिन मन अब सपने नहीं बुनता,
वह लगाता है हिसाब
बच्चों की फीस/मकान का किराया
दूध का बिल/पेपर का बिल
और न जाने कितने ही खर्चों का…!
जिन्हें सारी रात जोड़ता है मन
और घटाता है मिली हुई तनख्वाह में से
तनख्वाह, जिसमें इलास्टिसिटी नहीं होती–
लेकिन इस जोड़-तोड़ के
हिसाब से गुजर ही जाती है रात…!

विराम 

एक तलाश, जो
तुमसे शुरू हुई थी, अब
अँधेरे रास्तों में बदल गई है…
रोक ली हैं उसकी राहें
सामाजिक मान्यताओं की कंटीली बाड़ों ने!

सप्तपदी की लक्ष्मण रेखा
कहीं खिंच जाती है/तन के साथ-साथ
मन पर भी, और तब उसे लाँघ पाना
मुश्किल ही नहीं, असंभव भी होता है!

यह सब जानते हुए भी
क्यों भटक जाता है मन?
क्यों अँधेरी राहों के पार भी
तलाशता है उजाले के बिंदु?
क्यों नहीं मान लेता कि
तुमसे शुरू हुई तलाश पर
अब विराम लगा देना ही बेहतर है!

एक और आशा

मेरी आँखों में
बहुत-से सपने थे
लगता था कि इन्हें
कोई ठौर/कोई रूप
देगा मेरा प्रेमी…
पर वो तो
कहीं दूर/अपने ही सपनों की
दुनिया में निकल गया
आँखों से ओझल/दूर, कहीं दूर
और सपने भटकते ही रह गए
दुनिया के वीरानों में…

फिर आँखों ने देखे
कुछ और सपने
और तब लगा कि
अब इन्हें रंग देगा
मेरा जीवन साथी
पर/अपनी जिंदगी के
रंगों में डूबा
वो भूल गया
मेरे सपनों की दुनिया के रंग
और एक बार फिर
भटकने लगे सपने
अनजान राहों में–
धीरे-धीरे असहाय से…

आँखों ने फिर देखे सपने
खूबसूरत तितलियों से रंग भरे
नन्हें पंछियों से चहचहाते सपने

अब लगने लगा है कि
इन सपनों को
रंग और रूप देंगे मेरे बेटे…
और इसी उमंग में भरी-भरी
भूल जाती हूँ
कि देखा है मैंने
बीते समय के सपनों को
धूल में लोटते,
चुपचाप/धीरे-धीरे सिसकते
लेकिन फिर भी एक आस है…
क्या यही है जीवन?

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