उमेश चौहान की रचनाएँ

सुनो, सुनो, सुनो ! 

पैदा हुए उन्नीस बोरे धान
मन में सज गए हज़ारों अरमान
लेकिन निर्मम था मण्डी का विधान
ऊपर था खुला आसमान
नीचे फटी कथरी में किसान
रहा वह कई दिनों तक परेशान
फिर भी नहीं बेच पाया धान
भूखे-प्यासे गई जान
सुनो, यह दु:ख-भरी दास्तान !
सुनो कि इस देश में कैसे मरता है किसान !

मेरे देश के हुक़्मरानो !
यहाँ के आला अफ़सरानो !
गाँवों और किसानों के नुमाइन्दो !
चावल के स्वाद पर इतराने वाले
छोटे-बड़े शहरों के बाशिन्दो !
सुनो, सुनो, सुनो !
ध्यान लगाकर सुनो !
इस कृषि-प्रधान देश का यह दु:खद आख्यान सुनो !
कि पिछले महीने ओडिशा की मुंडरगुडा मंडी के खुले शेड में
सरकारी ख़रीदी के इन्तज़ार में
भूखे-प्यासे अपने धान के बोरों की रखवाली करने को मजबूर
कालाहांडी के कर्ली गाँव का नबी दुर्गा
कैसे मर गया बेमौत
सुनो, सुनो, सुनो !

लेकिन रुको और गौर से सुनो नेपथ्य की यह आवाज़ भी
कि नबी दुर्गा वास्तव में मरा नहीं, मारा गया
सच को स्वीकारने की इच्छा है तो सुनो !
सुनो, कि वह पीने का पानी खोजते-खोजते
मंडी के पड़ोस वाले घर तक पहुँचकर भी
प्यास से तड़पकर मर गया यह केवल आधा सच है
पूरा सच यही है कि उसे बड़ी बेदर्दी से मार डाला
हमारी गैर-संवेदनशील व्यवस्था ने
मेरी और आप सबकी निर्मम निस्संगता ने ।

यह देश की किसी मंडी का कोई इकलौता ज़ुर्म नहीं था
यह धान को बारिश के कहर से बचाने की
देश के किसी अकेले किसान की जद्दोज़हद नहीं थी
यह देश में सरकारी गल्ला-खरीदी की नाकामी की
कोई अपवाद घटना नहीं थी
यह महानगरों में हज़ारों करोड़ रुपयों के पुल बनाने वाले इस देश में
बिना किसी शेड के संचालित कोई इकलौती मण्डी नहीं थी
यह पेशाबघर, खान-पान और पेयजल की सुविधा के बिना ही स्थापित
देश का कोई अकेला सरकारी सेवा-केन्द्र नहीं था
यह कोई अकेला वाकया नहीं था भारत का
जिसमें किसी सार्वजनिक जगह पर
अपने माल-असबाब की रखवाली करते-करते
भूख और प्यास से मर गया हो कोई इन्सान
नबी दुर्गा की मौत तो बस उसी तरह की लाचारी के माहौल में हुई
जिसमें इस देश में रोज़ बेमौत मरते हैं हज़ारों बदक़िस्मत किसान ।

उस दिन भूख-प्यास से न मरा होता तो
शायद सरकारी ख़रीदारों के निकम्मेपन के चलते
पानी बरसते ही धान के भीगकर सड़ जाने पर मर जाता नबी दुर्गा
या शायद तब,
जब ख़रीद के बाद उसके हाथ में थमा दिए जाते
उन्नीस के बजाय बस पन्द्रह बोरे धान के दाम
या फिर तब,
जब उसे एक हाथ से उन्नीस बोरे धान की क़ीमत का चेक देकर
दूसरे हाथ से वापस रखा लिया जाता
बीस फीसदी नकदी वापस निकाल लिए जाने का चेक
यदि नबी दुर्गा न भी मरा होता मंडी में उस दिन
और उसके साथ बिना बिके ही वापस लौट आए होते उसके धान के बोरे
तो शायद पूरा परिवार ही पीने के लिए मजबूर हो गया होता
खेत में छिड़कने के लिए उधार में लाकर रखी गई कीटनाशिनी ।

सुनो, सुनो, सुनो !
यह दु:ख भरी दास्तान सुनो !
ओडिशा की ही नहीं,
झारखंड, आन्ध्र प्रदेश, बंगाल, असम, बिहार और उत्तर प्रदेश के
लाखों-लाख नबी दुर्गाओं की यह दु:ख-भरी कहानी सुनो !

पानी से भरे खेतों में खड़ी दोपहरी
कतारों में कमर झुकाए धान की रोपाई करती औरतों के
गायन के पीछे छिपी कंठ की आर्द्रता को सुनो !

हमारा पेट भरने को आतुर दानों से लदी
हवा में सम्मोहक खुशबू घोलती
धान की झुकी हुई बालियों की विनम्र सरसराहट को सुनो !

काट-पीटकर सुखाए गए दानों को बोरों में भर-भरकर
ब्याही गई बेटी को विदा किए जाने के वक़्त से भी ज्यादा दु:खी मन से
मण्डी में बेंचने के लिए ले जाते हुए किसानों के मन की व्यथा को सुनो !

धान के बिकने का इन्तज़ार करती
बिस्तर से लगी किसान की बूढ़ी बीमार माँ की
प्रतीक्षा के अस्फुट स्वर को सुनो !
पैरों में चाँदी की नई पायलें पहनने को आतुर
किसान की पत्नी के मन में गूँजती रुन-झुन को सुनो !
महीनों से नया सलवार-सूट पहनने की आस लगाए बैठी
किसान की बेटी के दिल की हुलकार को सुनो !

चलो, अब पूरी संजीदगी से इन नबी दुर्गाओं से क्षमा माँगते हुए
और इस देश के किसी किसान को नबी दुर्गा न बनना पड़े
इसकी व्यवस्था सुनिश्चित कराने की लड़ाई लड़ने का संकल्प लेते हुए
इस दु:ख भरी दास्तान को बार-बार सुनो !

दाना चुगते मुरगे

कुछ मुरगे दाना चुगने निकले
सामने बिखरे दाने
बाँट लिए उन्होंने अपनी-अपनी सुविधानुसार
और चुगने लगे जी भरकर
जैसे उन्हें सर्वाधिकार मिल गया था
मनचाहे तरीके से दाने चुगने का
मुझे अपना देश याद आया ।

थोड़ी देर में एक मुरगे को लगा
जो दाने वह चुग रहा है
वे शायद घटिया हैं
दूसरे दानों के मुकाबले
उसने शोर मचाया कि उसे भी
कुछ अच्छे दाने मिलने चाहिए
सबको चुपचाप अच्छे दाने मिलते रहें
इसलिए समझौता हुआ
उसे भी दे दिए गए कुछ अच्छे दाने चुगने के लिए
मुझे अपने देश की राजनीति याद आई ।

चुगते-चुगते एक मुरगे ने
दूसरे मुरगे के सामने का दाना खा लिया
फिर क्या था
लड़ने लगे दोनों मुरगे
अपने-अपने क्षेत्राधिकार को लेकर
अंत में उनके मुखिया ने निष्कर्ष निकाला
ग़लती शायद दाने की ही थी
उसे नहीं पता था कि
किस मुरगे के सामने उसे होना चाहिए था
और फिर शांति से चुगने लगे मुरगे अपने-अपने दाने
मुझे याद आई साझा सरकारों की ।

दाने कम होते देखकर
और दानों की माँग की मुरगों ने
पेट भरा था उनका
फिर भी दानों का लालच विवश किए था
यह जानकर कि शायद और दाने न मिल सकें
सब चुग लेना चाहते थे अधिकाधिक बचे-खुचे दाने ।
दानों की कमी संघर्ष का कारण बनने लगी
कुछ मुरगों के सामने बचे थे बस ख़राब ही दाने ।
अच्छे दानों पर एकाधिकार जमाने के लिए
चोंचों से वार होने लगे
एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो चले थे मुरगे
मुझे याद आई लखनऊ, पटना, दिल्ली की ।

कुछ मुरगे होशियार निकले
दाने चुगने का मज़ा ले चुके हैं वे
समझ चुके हैं कि दाने तो फ़सल से ही मिलते हैं ।
फिर फ़सल ही खाने का मज़ा क्यों न लिया जाए
ऐसे मुरगे खेतों की तरफ़ बढ़ चुके हैं
फ़सलों को खाने में रम चुके हैं ।
उन्हें इसकी चिंता भी नहीं
कि अब उनके साथियों को दाने कैसे मिलेंगे
और अंततोगत्वा उन्हें भी फ़सलें कैसे मिलेंगी

फ़सलें ख़त्म होती जा रही हैं ।
मुरगे फिर लड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं
मुझे अपने देश के भविष्य की चिंता हो रही है ।

कूड़ेदान

शहर के मोहल्लों में
जगह-जगह रखे कूड़ेदान
सुबह-सुबह ही बयाँ कर देते हैं
इन मोहल्लों के घरों का
सारा घटित-अघटित,
गंधैले कूड़ेदानों से अच्छा
कोई आइना नहीं होता
लोगों की ज़िन्दगी की
असली सूरत देखने का ।

मसलन,
कूड़ेदान बता देते हैं
आज कितने घरों में
उतारे गए हैं
ताज़ा सब्ज़ियों के छिलके
कितने घरों में निचोड़ा गया है
ताज़ा फलों का रस
कितने घरों ने
पैक्ड-फूड के ही सहारे
बिताया है अपना दिन और
कितने घरों में खोले गए हैं
रेडीमेड कपड़ों के डिब्बे ।

झोपड़पट्टी के कूड़ेदानों से ही
हो जाता है अहसास
वहाँ कितने घरों में
दिन भर
कुछ भी काटा या खोला नहीं गया
यह अलग बात है कि
झोपड़पट्टियाँ तो
स्वयं में प्रतिबिंबित करती हैं
शहर के सारे कूड़ेदानों को
क्योंकि इन्हीं घरों में ही तो
सिमट आता है
शहर के सारे कूड़ेदानों का
पुनः इस्तेमाल किए जाने योग्य समूचा कूड़ा ।

कूड़ेदान ही बताते हैं
मोहल्ले वालों ने
कैसे बिताई हैं अपनी रातें
खोली हैं कितनी विदेशी शराब,
कितनी देशी दारू की बोतलें,
किन सरकारी अफ़सरों के मोहल्लों में
पी जाती है स्काच और इम्पोर्टेड वाइन,
किस मोहल्ले में
कितनी मात्रा में इस्तेमाल होते हैं कंडोम,

कभी-कभी
किसी मोहल्ले के कूड़ेदान से
निकल आती हैं
ए के 47 की गोलियाँ और बम भी,
कभी-कभी किस्मत का मारा
माँ की गोद से तिरस्कृत
कोई बिलखता हुआ नवजात शिशु भी ।

अर्थशास्त्रियों!
तुम्हें किसी शहर के लोगों के
जीवन-स्तर के आँकड़े जुटाने के लिए
घर-घर टीमें भेजने की कोई जरूरत नहीं
बस शहर के कूड़ेदानों के सर्वे से ही
चल जाएगा तुम्हारा काम
क्योंकि कूड़ेदानों से हमेशा ही
झाँकता रहता है
किसी भी शहर का असली जीवन-स्तर ।

बौनों के देश में 

बौने क़द के लोगों में
एक अकेला था वह
लंबा-सा इनसान
दूर देश से आया था ।

हुए इकट्ठे सारे बौने और तय किया
काटो इसके पैर
कि छोटा हो बेचारा
गए पास राजा के बोले
इसके पैर बहुत लंबे हैं
चाल बहुत ही तेज़ कि
छीने राज्य तुम्हारा ।

राजा बोला बहुत सही है
बड़े पते की बात कही है
मैं हूँ राजा इन बौनों का
पैर काटकर इस लंबे के बौना कर दो
और नहीं तो इसे देश से बाहर कर दो ।

फिर क्या था
आरियाँ निकालीं
पकड़ीं टाँगें परदेसी की
परदेसी भी बड़ा गज़ब का
झटक रहा था, पटक रहा था
सहज नहीं था पैर काटना
आरी में भी धार नहीं थी ।

कट न सके जब पैर तो सोचा
देश निकालो
घेरो इसको सभी तरफ़ से
लेकिन कुछ ऐसी भी विधि थी
घेर न पाए ।

लिये खरोंचें पूरे तन पर
वह लंबा इनसान
न्याय की प्रत्याशा में
यहाँ-वहाँ तक रहा दौड़ता
लंबे छल के उन बौनों से
बच जाए बस इस आशा में
शहर-बदर की अभिलाषा में ।

पिताजी 

पिताजी अभी-अभी तो
बैठे थे यहीं तख़त पर
प्रातःक्रियाओं से निवृत्त होकर
ध्यान-मुद्रा में
भूत और भविष्य दोनों को
वर्तमान में विलीन करते हुए
अपनी भौतिक अनुपस्थिति को सर्वथा झुठलाते हुए ।

पिताजी अक्सर चले आते हैं
स्मृतियों से अटे पड़े दरवाज़े पर
यूँ ही बरसों पुरानी बातें दुहराते हुए
कभी रंगों में सराबोर होली के फाग गाते
कभी दंड-बैठक पेल, मुद्गल भाँजते
कभी क्यारियों में फूलों की पौध लगाते
उन पर सुबह-शाम पानी दँवारते
कभी लाठी उठाकर बगीचे से आवारा जानवर भगाते
कभी हांथ में डंडा दबाकर खेतों के चक्कर लगाते
कभी गाँव के शैतान बच्चों को
अच्छी कबड्डी खेलने के गुर सिखाते
कभी देश-विदेश के अहं मसलों पर
बहस-महावसों के अंबार लगाते ।

वैसे तो काम-काज करना
नियति में नहीं था पिताजी की,
हमारे लिए सपनों जैसे ही थे वे दिन
जब अम्मा की बीमारी के चलते
पिताजी ही सुलगाते थे चूल्हे की लकड़ियाँ
उबालते थे दाल और सेंकते थे रोटियाँ
लाते थे लादकर क़स्बे से
हमारे लिये थैले में सब्जियाँ व घरेलू सामान
मँगाकर उस साप्ताहिक बाज़ार से
जहाँ आत्मसम्मानवश
क़दम भी नहीं रखा था उन्होंने कभी भी,
हमें दशहरे का रावण-दहन दिखाने के समय भी,

उनके थैले से निकली जलेबियाँ
खाकर ख़ुश हो जाने वाले हम
खेल-कूदकर थक जाने पर
अक्सर लेट जाते थे जाकर
चारपाई पर लेटे पिताजी की तोंद को तकिया बनाकर,

वक़्त के थपेड़ों में
हमारी यादों की खिड़की से
अभी भी फिसला नहीं है बचपन और
पिताजी की वह मोहक मुस्कान ।

मुझे हमेशा यही लगता है कि
पिताजी वहीं तो लेटे हैं
शाम के धुंधलके में
बिस्तर के कोने में दबे ट्रांजिस्टर पर
चल रहे कविता-पाठ का आस्वादन करते हुए
सो जाने की प्रतीक्षा में रजाई में पैर दुबकाते ।

पिताजी आज भी कभी-कभी ढूँढे मिल जाते हैं
उन फटी-पुरानी बहुमूल्य क़िताबों के बीच
जिन्हें उन्होंने पढ़-पढ़ कर
बरसों तक संभाल कर रखा था,

सनेही जी की ‘सुकवि’ के उन पुराने पन्नों के बीच
जिनमें छपे थे उनके समकालीन सरोकारों वाले छंद,
कविताई के शौक से भरे उन काग़ज़ों के बीच भी
जिन पर अक्सर अंकित करते रहते थे वे
अपनी अन्तरात्मा की भावनाएँ ।

पिताजी की इच्छा-शक्ति व लगन का
सतत साक्षी बना दरवाज़े का हैन्ड-पंप
जब भी चलाया जाता है हमारे द्वारा
‘खट-खट-खट’ कर पानी उड़ेलते हुए
वे आज भी नज़र आ जाते हैं अकेले
सामने खिली फूलों की क्यारियों में मँडराती
रंग-बिरंगी तितलियों के बीच
चबूतरे पर स्थापित शंकर जी की बटिया के ऊपर
अपनी सारी संचित तरलता अर्पित करते हुए।

सच्चा प्रेम

प्रेम का दीप शाश्वत जगमगाता है हृदय के कोटर में
बाहर कितना ही अन्धकार फैला हो निराशा का

सच्चा प्रेम भूखा नहीं होता प्रत्यानुराग का
सच्चा प्रेम विकल भी नहीं होता प्रकट होने के लिए

विषम परिस्थितियों में प्रेम निःशब्द छुपा रहता है
हृदय के भाव-संसार में
किसी अनकही कविता की उद्विग्न पंक्तियों की तरह

सच्चा प्रेम समेटे रहता है
अपनी सारी मादकता व सृजनात्मकता भीतर ही
खिलने को बेताब किसी फूल की कोमल कली की तरह

सच्चे प्रेम को दरकार नहीं होती
प्रस्फुटन की प्रतीक्षा के पूर्ण होने की
वह संतुष्ट रहता है गूलर की कलियों की तरह
देह के भीतर ही भीतर खिलकर भी

यह ज़रूरी नहीं होता कि प्रेम
दीवानगी का पर्याय बनकर सरेआम संगसार ही हो
वह सारे आघात मन ही मन सहता हुआ
अनुराग की प्रतिष्ठा की वेदी पर
प्रायः अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है

सच्चा प्रेमी वही होता है जो अपने सारे विषाद को भीतर ही भीतर पचाकर
नीलकंठ की भाँति इस दुनिया में सबके लिए एक कतरा मुस्कान बाँटता फिरता है ।

सूर्यघड़ी 

बड़े जोश में आते हैं
तरह-तरह के लोग
देश के कोने-कोने से
भाँति-भाँति के बैनर व तख्तियाँ थामे,
विस्थापित कश्मीरी पंडित
अधिकारों से वंचित आदिवासी
घर से उजड़े नर्मदा घाटी के निवासी
भूखे-प्यासे मजदूर-किसान
जंतर-मंतर के इस मोड़ पर
अपनी-अपनी मांगें पूरी कराने के लिए धरना-प्रदर्शन करने।

लेकिन यहाँ से गूँजते नारों की आवाज़
नहीं पहुँचती प्रायः
पास में ही स्थित संसद-भवन के गलियारों तक
या फिर शायद सुन कर भी अनसुनी कर देने की ही ठाने रहते हैं
इन आवाजों को
भारत के भाग्य-विधाता,
ये बेचारे जन-गण
अपने मन को मसोस कर रह जाते हैं
‘जय हे!’ की ड्रम-बीट पर तने खड़े जवानों से डर कर
इस आशा में अपने आक्रोश को ज़ब्त करते हुए कि
उनके अधिनायकों का बहरापन कभी तो ख़त्म होगा ही।

जंतर-मंतर की सूर्यघड़ी
नित्य साक्षी बनती है
समय के उन पड़ावों की
जहाँ पर तख़्तियों और बैनरों पर लटकी होती हैं
उस समय के तमाम सताए हुए लोगों की उम्मीदें और विश्वास,
लेकिन भारत के भाग्य-विधाताओं की तरह ही
यह सूर्यघड़ी भी
दिन के किसी भी पहर नहीं थमती
समय के किसी भी ऐसे पड़ाव पर सहानुभूति से भर कर,
भले ही शहर में
कितनी भी दहला देने वाली वाली कोई दुर्घटना घटित हो
जिसमें सहम कर थम जाएं
बाकी की सब कलाई अथवा दीवार की घड़ियां।

अगर देश के कोने-कोने से आने वाले लोगों को
दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए
थाम लेना है जंतर-मंतर की सूर्यघड़ी को
समय के किसी भी महत्वपूर्ण पड़ाव पर
तो या तो उन्हें अपनी मुट्ठियों में जकड़ लेना होगा लपक कर सूर्य के रथ को
या फिर इंतज़ार करना होगा सूरज के डूब जाने का
क्योंकि अँधेरे में जरूर थम जाती है यह सूर्यघड़ी
और फिर चालू होती है नए सिरे से
पुनः सूर्योदय होने पर
एक नए दिन की शुरुआत होने के साथ ही।

जरूरी होता है 

तैरना है तुम्हें धारा के विपरीत तो
बढ़ानी ही पड़ेगी अपनी बाजुओं की ताक़त
काटने को पानी का बहाव,
साहस और आत्मबल भी,
यह भी समझ लेना होगा भली-भांति कि
क्यों नहीं तैरना चाहते हो तुम
औरों की तरह ही धारा के संग,
ताकि सुदृढ़ हो जाय निश्चय तुम्हारा
तथा विचलित न हो जाओ तुम
भंवर-जालों में फंसकर जूझते समय।

उड़ना है अगर आकाश में तुम्हें
हवाओं के विपरीत अनजान दिशाओं में
अनछुई ऊँचाइयों तक पहुँचने का लक्ष्य बनाकर तो
भरनी ही होगी तुम्हें अपने डैनों में
कभी न क्षीण होने वाली वह शक्ति
जो मिलती है केवल एक मजबूत संकल्प लेने और
निरन्तर संघर्ष का अभ्यस्त होने पर ही।

जीवन में सुखी होने के लिए जरूरी नहीं होता
धारा के विपरीत तैरना अथवा
हवाओं के विरुद्ध उड़ना,
किन्तु बना रहे संतुलन और
भर सकें कुछ खुशियां यहाँ
मुसीबतजदां लोगों के दामन में
इसके लिए जरूरी होता है
कुछ लोगों का लगातार
आसमान में सुराख़ बनाने की कोशिशें करते रहना।

अनपढ़ 

उसके अनपढ़ होने में
कोई कसूर नहीं था उसका
यह उन लोगों के गुनाहों का सबूत भर था
जो पढ़े-लिखे होकर भी
इस बात के गवाह बने हैं कि

वह अनपढ़ है
भले ही वे इसके पक्षधर हों या न हों।
वह अनपढ़ इसलिए थी
क्योंकि उसके माँ-बाप अनपढ़ थे
क्योंकि उसके गाँव में कोई स्कूल नहीं था
या फिर इसलिए भी कि
कोई पढ़ाने वाला न होने के कारण
बंद पड़ा था

उसके पड़ोसी गाँव का स्कूल भी
या शायद इसलिए कि
माँ-बाप के पास नहीं थी
उसके लिए बचपन में
कॉपी-किताबें खरीदने की ताकत भी।
उसके लकड़ियाँ बीनकर लाने पर ही
घर का चूल्हा जलता था
बीमार माँ के पास बैठकर
उसके चकिया पीसने पर ही
घर में रोटी का जुगाड़ होता था
घर के झाड़ू-बरतन से लेकर

गाँव के दूसरे छोर वाले कुएँ से
पानी लाने तक का सारा जिम्मा भी
उसी के सिर था
उसकी दिनचर्या में
पढ़ना भी शामिल हो
इसकी जरूरत तक
कभी महसूस नहीं की थी उसने
न ही किसी और ने कभी में थी इसका
कोई अहसास भी दिलाया था उसको
औरों की तो मौज ही इसी में थी कि
वह अनपढ़ ही बनी रहे सदा
उनकी सेवा-टहल के लिए सदैव सुलभ।
गाँव से शहर तो चली आई है वह
पति के पीछे-पीछे
पर अनपढ़ बने रहना
परिवार का पेट पालने की खातिर
सस्ते में चाकरी करना
नियति का खेल ही मान रखा है उसने
उसका पति भी नहीं चाहता कि
वह पढ़-लिखकर होशियार बन जाय
और करने लगे प्रश्न पर प्रश्न
उसकी मनमानी भरी बातों पर नित्य।

लेकिन अचानक ही अब
कचोटने लगा है उसको
अपना अनपढ़ होना
जब से लगाने पड़ रहे हैं उसे
थाने व कचेहरी के चक्कर
क्योंकि एक झूठे मामले में
दिल्ली की बेलगाम पुलिस ने
जेल भेज दिया है उसके पति को
कई गैर-जमानती आरोप लगाकर।

पति के केस के वे कागजात
जिन्हें पढ़वाने के लिए
नित्य तमाम तरह की जलालत झेलती है वह
और लगाती रहती है मौन
वकीलों और पुलिस वालों के चक्कर
उन्हें खुद न पढ़ पाने की पीड़ा
पसरी रहती है हमेशा उसके चेहरे पर
जैसी स्थायी रूप से समाई रहती है मलिनता
शहर की अनधिकृत झोपड़पट्टियों में।

बेबस निगाहों से कागजों को पलटती
जब भी मिलती है वह पति से
तिहाड़ जेल की सलाखों के बाहर से
उसे यही लगता है कि
यदि वह स्वयं पढ़ पाती उन कागजों को
तो शायद शीघ्र ही
वापस ले जा सकती थी अपने पति को
उन सलाखों के पीछे से निकालकर
स्वयं अपने ही बलबूते।

निराशा के भँवर में डूबती-उतराती
अंततोगत्वा पढ़ना सीख रही है वह आजकल
काले अक्षरों के बीच उजास तलाशती
अपनी निःस्वप्न आँखों में
अनपढ़ होने का सारा दर्द समेटे।

मैना 

हिम्मत न हारना मैना,
अभी तो तुम्हें बहुत कुछ गाना है
ढेर सारा नया-नया नई धुन में सुनाना है
अभी तो पिंजड़े से बाहर आकर तुम्हें
आजादी का जश्न भी मनाना है
अब कभी रोने या रुला देने वाले अंदाज में मत गाना मैना।
मैना, अब तुम बाज से कभी नहीं डरना

उसके खूनी पंजों के भय से
कहीं सींकचों में दुबककर नहीं मरना
मैना अभी तो तुम्हें बाज की चोंचों के
आघातों की पीड़ा का बयान करना है
मैना, अभी तो तुम्हें अपनी देह से टपकी एक-एक बूँद से
दुनिया में फैली नकली सफेदी को लाल करना है।

मैना, अभी तो तुम्हें बुलंद आवाज में भी कुछ सुनाना है
मैना, अभी तो तुम्हें शहादत के गीत गाना है
मैना, अभी तो तुम्हें अपनी पूरी कौम को
खुले आकाश में उड़ना सिखाना है
मैना अभी तो तुम्हें अपने हिस्से के दाना-पानी पर
अपना नैसर्गिक अधिकार जमाना है।

मैना, अभी तो बदलाव की शुरुआत भर हुई है
अभी तुम दुश्चिंताओं से घबराकर कहीं ठिठक मत जाना
अभी तो तुम्हें दुनिया में अपनी सुरीली जंग का लोहा मनवाना है
मैना, बस अब तुम्हें आज के बाद
अपनी मीठी तान में थोड़ी-सी
पंखों की प्रतिरोध-भरी फड़फड़ाहट की
संगत भी मिलाना है।
हिम्मत न हारना, मैना,
अभी तो यहाँ तुम्हें बहुत कुछ गाना है।

शिकारी

अभी-अभी मिली है
एक अबोध बच्ची की क्षत-विक्षत लाश
मोहल्ले के नुक्कड़ पर रखे कचरे के डंपर के पास
अभी-अभी फेंकी गई है एक युवती की लहू-लुहान देह
किसी लंबी-ऊँची दौड़ती कार से सड़क के किनारे
अभी-अभी तेजाब फेंककर जला दिया गया है
भरे बाजार के बीच एक सुंदर लड़की के चेहरे को
अभी-अभी अस्पताल ले जाया गया है एक नवागत बहू का
रसोई में सिर से पाँव तक झुलस गया शरीर
अभी अभी गन्ने के खेतों में खाल छिलवाते हुए भागी है
दरिदों के चंगुल से बचकर एक अपहृत स्त्री
अभी-अभी सरसों के खेत के बीच बेसुध पड़ी मिली है
अतिशय रक्त-स्राव से पीली पड़ी हरिजन-बस्ती की एक औरत
अभी-अभी मानों हर संभव बर्बरता टूट पड़ी है
देश भर में नारी जाति के ऊपर
क्या यह वही भारत देश है?
जहाँ कुँवारी कन्याओं की पूजा कर
उन्हें जिमाया जाता है हर पर्व-त्योहार पर
और स्त्री को संग लेकर बैठे बिना
पूरा नहीं होता कोई भी अनुष्ठान-यज्ञ।

काँपते नहीं तुम्हारे हाथ क्या?
लड़खड़ाते नहीं तुम्हारे पैर भी?
धिक्कारता नहीं विवेक भी किंचित?
यह कैसी कामांधता है?
जो सारे संस्कारों, सामाजिक मान्यताओं को ताख पर रखकर
विवश कर देती है तुम्हें करने को बलात्कार
वीभत्सता की पराकाष्ठा के साथ
नवयौवनाएँ ही नहीं
किशोरियाँ और मासूम बच्चियाँ तक बनती हैं तुम्हारा शिकार
इतनी निर्ममता और क्रूरता
कहाँ से आकर समा जाती है
तुम्हारी आँखों में शिकारी!

जरूर बह रहा होगा तुम्हारी धमनियों में
रक्त-शिराओं से पलटकर बहा गंदा खून
जरूर भरा होगा तुम्हारे मस्तिष्क में
अतीत में सँजोए गए तमाम कुत्सित विचारों का मलबा
जरूर तुम्हारे फेफड़ों ने घोली होगी रक्त में वह प्राणवायु
जो समेटी होगी तुमने अपनी साँसों में
किसी विषाक्त फलों वाले वृक्ष के नीचे बैठ-बैठकर
जरूर तुम्हारे गुर्दे बंद कर चुके होंगे
देह में प्रवाहित हो रही मलिनता को उत्सर्जित करना
जरूर तुम्हारे भीतर कहीं न कहीं संरक्षित होगी अभी भी
मनुष्य के विकास-क्रम की लंबी परंपरा की
कोई न कोई आदिम प्रवृत्ति
इसीलिए तुम उद्यत रहते हो हर वक्त
करने को पशुवत आचरण
और नहीं बाँधना चाहते अपने पुंसत्व को
मानवीय मान्यताओं के अनुरूप
समाज में स्थापित हुए रिश्तों की डोर से
तुम्हारी भूखी देह और विकृत दिमाग के लिए
किसी भी उम्र की कैसी भी स्त्री की देह बस एक शिकार है
और तुम उसे एकांत में देखते ही टूट पड़ते हो उस पर
नरभक्षी शेर से भी ज्यादा खतरनाक तरीके से।

कल तक वक्त तुम्हारे साथ रहा होगा शिकारी
लेकिन वक्त हमेशा किसी के साथ नहीं होता
आज हवाओं का रुख तुम्हारे विरुद्ध है
आज तक गुलाब के फूलों ने ही बिठाए थे
अपने चारों तरफ नुकीले काँटों जैसे पहरेदार
किंतु आज बगीचों में नाजुक नैस्टर्शियम के फूल भी लाल-पीले होकर
अपने शरीर पर काँटों का कवच धारण करने की तैयारी में हैं।

अब गलत इरादे से बढ़े तुम्हारे हर हाथ को
हजारों तीखे दंश झेलने ही पड़ेंगे चारों तरफ से
अब तुम्हारे किसी भी बहके हुए कदम को
आतंक के पद-चिह्न छोड़ने के लिए नहीं मिलेगा एक भी ठौर
अब पूरी निशानदेही होगी तुम्हारी चप्पे-चप्पे पर
और हर गली-कूचे में कड़ी निगरानी होगी तुम्हारी हिस्ट्री-शीटरों की तरह।

शिकारी, क्या मेरे भीतर ही छिपे हो तुम?
इसीलिए मेरे लिए तुम्हें अलग से पहचानना हो रहा है मुश्किल
और तुम्हारा खात्मा आत्महत्या करने जैसा ही कठिन
लेकिन आजकल अँधेरे में खूब जलने लगी हैं मोमबत्तियाँ
तुम्हें अब किसी भी अँधेरे कोने में छिपने नहीं दिया जाएगा बस्ती में
शिकारी, अब तुम्हारी अरथी के बाँस कट चुके हैं
और तुम्हारी चिता की लकड़ियाँ भी इकट्ठा की जा चुकी हैं श्मशान में।

शीला भयाक्रांत है

शीला झारखंड से दिल्ली आई है
वहाँ पलामू के एक वन्य गाँव में
उसका छोटा-सा घर है
घर में माँ-बाप हैं
भाई है, बहने हैं
घर की दीवारों पर

शीला के द्वारा माँ के साथ मिलकर बनाई गई
जनजातीय कलाकृतियाँ हैं
बाहर वन में उन्मुक्त विचरण करता
उसका बचपन है
और भी बहुत कुछ है
उसको प्यारा लगने वाला वहाँ
लेकिन सरकारी व्यवस्थाओं में जकड़ा जंगल
रोटी नहीं देता उन्हें अब
इसीलिए अपने परिवार का
एक नया भविष्य तलाशने
झारखंड से दिल्ली चली आई है शीला।

शीला को नहीं पता था कि
अपने बचपन को पीछे गाँव में छोड़
जिस तरुणाई को सहेजकर
वह दिल्ली ले आई है
उसकी कैसी लूट होती है यहाँ
उसके गाँव का रहने वाला वह एजेंट भी
जो लेकर आया था उसे यहाँ
माँ-बाप को अच्छे प्लेसमेंट के
ढेरों भरोसे दिलाकर
नहीं निकला था बिल्कुल भी भरोसेमंद।

दिल्ली के इस जंगल में
अब अकेले भटक रही है शीला
किसी अच्छी मालकिन की तलाश में
जिसके घर के झाड़ू-बरतन में पूरी हो सकें
उसके माँ-बाप की अपेक्षाएँ
और पा सके वह भी
दिल्ली में अमूमन न मिलने वाला
एक ऐसा ठौर
जहाँ महफूज रख सके वह अपनी तरुणाई
जहाँ न देनी पड़े उसे पुलिस को
अपने साथ हुए बलात्कार की वह तहरीरें
जिन पर अँगूठे तो उसके जैसे अनपढ़ों के होते हैं
पर शब्द किसी और के
जहाँ न देनी पड़े सफाई उसे
बलात्कारियों द्वारा लगाए गए
चोरी के झूठे प्रत्यारोपों की।

शीला को डर लगता है
उन कचेहरियों में जाने से
जहाँ पुलिस अक्सर ले जाती है
बलात्कार की शिकार हुई
दिल्ली की दूसरी झारखंडी लड़कियों को
उसे डर लगता है
कोर्ट के अहलमदों व वकीलों की चुभती नजरों से
सबसे ज्यादा तो उस नारी-निकेतन के वार्डन से
जहाँ भेज देती है अदालत
उन पीड़ित व बेसहारा लड़कियों को
अपनी पीड़ा के अहसास से छुटकारा पाने के लिए,
ताजा पीड़ा के आगे
पहले की पीड़ाएँ भूल जो जाता है इनसान।

शीला यह भी नहीं चाहती कि
माँ-बाप का सारा विश्वास ही भंग हो जाए
उसकी इस दिल्ली के प्रति
और वे आकर ले जाएँ उसे
दूसरी पीड़ित लड़कियों की तरह
वापस अपने गाँव
रात-दिन ताने सुन-सुनकर जीने के लिए।

शीला भयाक्रांत है
दिल्ली के इस बियाबान में
क्योंकि वह अपनी तरुणाई लुटाकर नहीं भरना चाहती
अपना और अपने परिवार का पेट
पर शीला को नहीं मालूम कि
कब तक सुरक्षित रह सकेगी वह
दिल्ली के इन दरिंदों के बीच।

लक्ष्मण-रेखाएँ 

जो हमेशा अपनी हद में रहता है
वह प्रायः सुरक्षित बना रहता है
लेकिन इतिहास का पन्ना नहीं बन पाता कभी भी
जो हदें पार करने को तत्पर रहता है
उसी के लिए खींची जाती हैं लक्ष्मण-रेखाएँ
जो वर्जना को दरकिनार कर लाँघता है ये रेखाएँ
वही पाता है जगह प्रायः इतिहास के पन्नों पर।

इस देश में ऐसे महापुरुषों की कमी नहीं
जो नारियों को मानकर अबला
रोज खींचते हैं उनके चारों ओर लक्ष्मण-रेखाएँ
लेकिन फिर भी कुछ सीताएँ हैं कि मानती ही नहीं
युगों पुरानी त्रासदी को भूल
किसी भी वेश में आए रावण की परवाह किए बिना
वे लाँघती ही रहती हैं निर्भयता से
पुरुष-खचित इन रेखाओं को
और इतिहास के पन्नों में दर्ज होती रहती हैं
मीराँबाई, अहिल्याबाई, लक्ष्मीबाई
या फिर यूसुफजाई मलाला और दामिनी बनकर।

बिटिया बड़ी हो रही है

बिटिया बड़ी हो रही है
माँ को दिन-रात यही चिंता खाए जा रही है कि

बिटिया शादी के लिए हाँ क्यों नहीं करती
और कितना पढ़ेगी अब
ज्यादा पढ़ लिख कर करेगी भी क्या
कमासुत पति मिलेगा तो
जिंदगी भर सुखी रहेगी
इतनी उमर में तो इसको जनम भी दे दिया था मैंने

माँ की खीझ का शिकार नित्य ही होती है बिटिया।
बिटिया जैसे-जैसे बड़ी हो रही है
दिन-रात आशंकाओं में जीती है माँ
जाने कब, कहाँ, कुछ ऊँच-नीच हो जाय
सड़कों पर आए दिन
लड़कियों को सरेआम उठा लिए जाने की घटनाओं से
बेहद चिंतित होती है माँ
स्वार्थी युवकों के प्रेम-जाल में फँस कर
घर से बेघर हुई तमाम लड़कियों के हाल सुन-सुन
नित्य बेहाल होती है माँ।
माँ चौबीसों घंटे नजर रखती है बिटिया पर
उसका पहनावा,
साज-श्रृंगार,
मोबाइल पर बतियाना,
बाथरूम में गुनगुनाना,
सब पर निरंतर टिका रहता है माँ का ध्यान
जैसे बगुला ताकता रहता है निर्निमेष मछली की चाल,

माँ जैसे झपट कर निगल जाना चाहती है
बिटिया की हर एक आपदा।
बिटिया बचना चाहती है
माँ की आँखों के स्कैनर से
वह चहचहाना चाहती है
बाहर आम के पेड़ पर बैठी चिड़िया की तरह
वह आसमान में उड़ कर छू लेना चाहती है
अपनी कल्पनाओं के क्षितिज को
इसीलिए शायद बिटिया नहीं करना चाहती
शादी के लिए हाँ
पर उसकी समझ में नहीं आता कि
चारों तरफ पसरी अनिश्चितताओं के बीच
वह कैसे निश्चिंत करे अपनी माँ को
और आश्वस्त करे उसे अपने भविष्य के प्रति।

बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया से गुजरती लड़की 

बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया में
कैसे-कैसे मानसिक झंझावातों से
गुजरती है लड़की।

अपनों से एकाएक कटकर अलग होती,
कटने की उस तीखी पीड़ा को
दाम्पत्य-बंधन के अनुष्ठानों में संलग्न हो
शिव के गरल-पान से भी ज्यादा सहजता से
आत्मसात करने का प्रयत्न करती,
लड़की वैसे ही विदा होती है
मां-बाप की ड्योढ़ी से
जैसे आकाश का कोई उन्मुक्त पंछी
उड़कर समाने जा रहा हो किसी अपरिचित पिंजड़े में
अपने नवेले जीवन-साथी के पंख से पंख मिलाता
किसी नूतन स्वप्नालोक की तलाश में।

अपने बचपन की समस्त स्वाभाविकता
अपने किशोरपन की सारी चंचलता
अपने परिवेश में संचित समूची भावुकता
सबको एकाएक भुलाकर
अपने नए परिवार में एकाकार होती लड़की
हर दम बाहर से हंसती और अंदर से रोती है।

लड़की का पहनावा, बोल-चाल, हाव-भाव,
सब कुछ नित्य नए परिजनों के स्कैनर पर होता है
मां-बाप के घर से मिले संस्कार, कुसंस्कार,
कपड़े-लत्ते, गहने, सामान,
सब पर उनका अपना-अपना दृष्टिकोण होता है,
जिनका लड़की के कानों तक पहुंचाया जाना
अनिवार्यता होती है, और
उन पार्श्व-वक्तव्यों की अन्तर्ध्वनि तक को
पचा जाना लड़की का कर्तव्य।

अपने नए परिवार की परंपराओं के साथ ताल-मेल बिठाती,
अपने नए जीवन-सहचर के साथ
दाम्पत्य की अभिनव यात्रा पर निकल पड़ी लड़की
हमेशा सशंकित रहती है,
चिन्तित होती है,
फिर भी वह निरन्तर आशावान बनी रहती है
अपने भविष्य के प्रति।
बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया से गुजरती लड़की
अपने प्रियतम की आँखों में आँखें डालकर
परिवर्तन के अथाह सागर को पार कर जाती है,
किन्तु कभी-कभी दुर्भाग्यशाली भी होती है
ऐसी ही एक बेटी
जिसे उन आँखों में नहीं मिल पाती
अपने भविष्य के उजाले की कोई भी किरण।

मैं चोर नहीं 

आम की सूखी लकड़ियों पर
अभी-अभी रखी थी परिजनों ने कंधों से उतारकर
माँ की अंतिम स्नान से भीगी देह,
वर्षों के संचित स्नेहाश्रुओं से भिगोया आँचल
हमेशा ममता बरसाता रहा चेहरा
निरन्तर मार्ग दर्शाती रही आँखें
वात्सल्य का सतत ठिकाना रही गोद
प्रसव की पीड़ा सही कोख
कर्म को सदा परिभाषित करते रहे हाथ-पाँव,
सब कुछ जलाकर खत्म कर देने के लिए ही
जुटाई गई थीं आम की ये लकड़ियाँ
इन लकड़ियों के जलने के साथ ही
अग्नि में विलीन हो जाना था
माँ से जुड़ा सारा का सारा स्मृति संसार।

माँ की देह से भी ज्यादा
ताक रहा था मैं चिता की लकड़ियों को
क्योंकि उनके ऊपर ही टिका हुआ था अब
माँ की देह का इस संसार में होना, न होना
दुःख मेरे भीतर सघन हो जम चुका था
शीत में हिमालयी झील की सतह के जल सा
पिघलकर तिरोभूत होने के लिए प्रतीक्षा करता
लकड़ियों के धू-धूकर जलने की।

सहज ही ध्यान गया था मेरा
उन दो काँपते-मटमैले
अधेड़ उम्र की औरत के हाथों पर
जिन्होंने चिता की परिक्रमा कर रहे
परिजनों के पैरों के बीच में से
खिसका ली थीं किनारे की कुछ लकड़ियाँ
बिना किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किए,
लगभग छुपाती हुई सी
अपनी अधफटी धोती के आँचल में
ले गई थी उन्हें वह सबकी नज़रें बचाती
श्मशान के एक कोने में ही छिपाकर रखने,
और फिर लौट आई थी वह
धूमकेतु सी मंडराती हुई
माँ की चिता के पास।

मेरा दुःख सहसा तप्त तरल बन
क्रोधाग्नि में खौलने लगा था –
जरूर इसी तरह दिन भर चुराती होगी वह
चिताओं से थोड़ी-थोड़ी लकड़ियाँ
बेंच देती होगी उन्हें वह हर शाम
बाहर लकड़ी के स्टॉल पर
जैसे बेंच देते हैं कुछ पुजारी
मंदिरों का चढ़ावा बाहर के दूकानदारों को
वापस थमा दिए जाने के लिए भक्तों को
या बेंच देते हैं बाज़ार की फार्मेसियों को
कुछ अस्पतालों के डाक्टर
मरीजों के नाम पर तीमारदारों से जमा कराई गई
बची हुई दवाएं व सर्जरी के उपकरण,
मन किया, कह दूँ उस कुलटा से –
“तू चिता की चुराई हुई लकड़ियों के सहारे पेट पालने से डर,
नहीं तो सत्यानाश हो जाएगा कुल का तेरे!”

अपलक घूरते देख मुझे
सकपका गई थी वह अचानक
भाँप लिया था क्रोध मेरा उसने
लपक कर जकड़ लिए थे पैर मेरे
डबडबाई आँखें ऊपर उठाकर
मौन विनती सी की उसने,
“क्षमा कर दो मुझ अभागन को साहब!”
झिझक कर रुक गया था मैं सहसा
कहने से उसे कुछ भी भला-बुरा।

अचानक उठ कर उसने
हिम्मत से पकड़ लिया एक हाथ मेरा
खींचने लगी उस तरफ मुझको
जिधर छिपा आई थी वह
चिता से चुराई हुई वे लकड़ियाँ,
मैं खिंचता चला गया बरबस, उत्सुक,
जानने को रहस्य जैसे उसकी व्यग्रता का,
श्मशान के उस कोने में
जमा कर रखी थीं उसने और भी कुछ लकड़ियाँ
पास ही रखी थी
उसकी पुरानी धोती में लिपटी
एक छोटी सी गठरी –
“मैं चोर नहीं हूँ साहब!
इसका प्रमाण यह गठरी है!”
कहकर, जाते ही लिपट गई वह उससे
फूट-फूटकर रोना उसका विचलित करने लगा था मुझे।

“साहब! यह मेरी दो साल की छौनी है,
कलेजे का टुकड़ा है,
कल रात दिमागी बुखार निगल गया इसको
कहीं दूर ले जाकर इलाज़ कराने का ठिकाना न था
यहाँ के सरकारी अस्पताल में
रोज मरते हैं तमाम बच्चे-बूढ़े
इस बुखार का काल-ग्रास बन कर
छीन लिया था इसी ने मेरा पति भी वर्षों पहले
तीन बरस पहले बेटे को भी
बीती बरखा बहा ले गई
गाँव से मेरी झोपड़ी भी
ऊपर से अब यह बज्रपात
नहीं बचा अब कुछ भी मेरे पास
जिससे खरीद सकूँ मैं
इस गठरी में बँधी अपनी बेटी की
अन्त्येष्टि के लिए आवश्यक आम की लकड़ियाँ,
इसकी आत्मा की मुक्ति का साधन बन सकती हैं बस
चोरी की ये लकड़ियाँ ही,
आप इन्हें बेशक ले जाओ
किन्तु चोरी की सजा देते हुए
गला भी घोंट दो अब मेरा
ताकि न मिले मुझसे यह शिकायत करने का मौका
इस बेटी की आत्मा को आज कि
माँ ने उसकी अन्त्येष्टि भी नहीं की।”

मैं अवाक देखता रह गया उसे
माँ के अंत की पीड़ा का जो उभार
उपजा था मेरे भीतर
वह गाँव के बाहर पसरे
सदियों पुरानी बस्ती के उजाड़ टीले की तरह,
सिमट चुका था समूचा कहीं
उसके दुःख के पहाड़ के भीतर सत्वर,
धधक उठी थी माँ की चिता उधर
लकड़ियों की आग में चिड़-चिड़ कर
जलने लगी थी देह उनकी,
देख रहा था मैं इधर
विपन्नता की आग में जलते हुए
एक जीती-जागती माँ के तन को, मन को
बेटी की अन्त्येष्टि न कर पाने की पीड़ा हृदय में समेटे
लकड़ियों की चोरी की अभियुक्त बनी,
उसका वेदना से नहाया चेहरा देख
याद आ रहा था मुझे
काशी के घाट पर अभिशप्त चाकरी करते
र्राजा हरिश्चन्द्र का असहाय चेहरा।

अनायास ही मैंने
बाहर के स्टॉल से यथेष्ट लकड़ियाँ ला
लगवा दिया एक और ढेर,
अब माँ की चिता के बगल में ही जलने जा रही थी
उसकी दो साल की बच्ची की चिता भी
परिक्रमा कर रही थी वह औरत अब संतुष्टि के साथ
अपनी लाडली की नहला कर लिटाई गई देह की
आँसुओं से आचमन करती उसका
कनखियों से देती धन्यवाद हमें,
उसके चेहरे पर फैली तुष्टि में
नज़र आ रही थी मुझे अब
अपनी माँ की तुष्ट आत्मा की झलक।

लाचारी 

पैदा हुए थे तुम
बड़े ही अनाम कुल में
शीश पर बस
एक टुकड़ा आकाश लेकर,
नसीब नहीं थी तुम्हें
एक बीघा भी धरती
जिसके सहारे पाल सकते तुम पेट अपना,
जाति भी ऐसी कि
आज भी छूना मना है तुम्हारे लिए
समूच्रे गाँव में
बरतन और कुँए का पानी,
छू सकते हो तुम
भूतपूर्व जमींदारों के खेतों की
सारी की सारी फसल
सारा का सारा अन्न
क्योंकि छुए बिना काम ही नहीं चलना है,
आखिर तुम्हें ही तो जोतना-बोना है
काटना-मांड़ना और ढोना है
उसे बुखारियों में भरना भी है,
किन्तु इसी अन्न से बना
उनका भोजन छूना क्षम्य नहीं है तुम्हारे लिए,
भोजन ही क्यों,
उसके पात्रों का छूना तक निषिद्ध है।

तुम पैदा ही हुए हो, लछिमन!
तमाम निषिद्ध कामों की पट्टिका
अपने गले में लटका कर
और जीते रहे हो इस दुनिया में
जन्म से लेकर आज तक
इस चौखट से उस चौखट तक भटकते हुए
लाचारी का एक जीता जागता पर्याय बन कर।

किसी बैल जैसे ही
कांधे पर हल लादे
रोज बैलों के पीछे-पीछे
मुँह-अँधेरे ही जाते रहे तुम
खेतों की ओर,
सहते रहे जाड़ा-घाम
मालिक के खेतों को जोतते-गोड़ते,
कभी भी उफ़ नहीं
कभी इनकार नहीं,
हमेशा तैयार रहे तुम
ढोने को बड़े से बड़ा बोझ।

बस एक अँगोछा ही
सदा सच्चा साथी रहा तुम्हारा!
जो बोझा ढोते समय
बन जाता शीश की पगड़ी,
कुशन की तरह रक्षक बन
चिपक जाता खोपड़ी पर,
जाड़ों में कानों के चारों तरफ लिपटकर
यही बन जाता गरम मफ़लर,
गरमी भर इसी से पोछते रहते तुम
लगातार अपना पसीना,
पता नहीं मुझे,
शायद इसी से पोछते रहे होगे तुम
अपने आँसू भी,
जब भी निकलते होंगे वे
तुम्हारी आँखों से
अकेले में कभी
खेतों की मेड़ पर बैठ कर
गुड़-चना खा कर सुस्ताते समय।

लछिमन! यह अँगोछा ही
शायद तुम्हारा गांडीव रहा है
जिसके सहारे लड़ते रहे हो तुम आज तक
अपनी जिन्दगी की यह लंबी महाभारत।

वह जो एक टुकड़ा आकाश उम्मीदों का
थाम कर पैदा हुए थे तुम शीश पर
गायब हो चुका है अब दृष्टि-पटल से,
समय के साथ गहराती गई निराशा
जम गई है अब दीदों पर
माड़े की मोटी परत जैसी,
अनाम कुलोद्भव की पीड़ा है कि
मिटती ही नहीं,
जाने किन लोगों के खातों में चले गए हैं
सारे संवैधानिक संरक्षणों के लाभ,
जाने किन लोगों को मिली है
जिन्दगी जीने के लिए एक समतल जमीन,
तुम तो हमेशा ही जूझते रहे हो
इस ऊबड़-खाबड़ धरातल पर पाँव जमाकर
एक सीधी-साधी चाल चलने की जद्दोज़हद में।

लछिमन! तुम्हारी आँखों ने
कभी नहीं पाया
किसी भी रात
चाँद को उतना रूमानी
जितना पाया सदा उसे औरों ने
तुम्हारे ही कांधों पर उचक-उचक कर,
तुम्हें हमेशा ही कुछ ज्यादा चुभने वाली लगी है
जेठ की चिलचिलाती हुई धूप
और कुछ कम ही राहत देने वाली लगी है
जाड़े की खिलखिलाती हुई दोपहरी,
तुम्हें कभी भी आश्वस्त होने का
नहीं मिला कोई भी बहाना
अपने बेटे-बेटियों के भविष्य के प्रति,
हुक्मरानों के आदेशों के खोखलेपन को
अच्छी तरह जानते रहे हो तुम
और यह भी कि
शायद कभी नहीं चूकेंगे वे लोग
चौराहे पर तुम्हारे नंगेपन का फायदा उठाने से
जिनके रहमो-करम पर आज तक जीते रहे हो तुम।

तुम्हें हमेशा ही लगता रहा है कि
तुम आसमान में तैरता गैस का वह गुब्बारा हो
जिसे सदा हवा के बहाव की दिशा में ही उड़ना है
और समय के साथ धीरे-धीरे रिस कर
सिकुड़ कर विलुप्त हो जाना है
इस धरती के किसी गुमनाम कोने में,
तुम किसी उल्का-पिंड की तरह थोड़े ही गिर सकते हो
अपने स्थान से छिटक कर इस धरती पर
कि जिसकी आशंका से ही
कंपकंपाने लगे धरती के लोगों का सीना
और जब तुम वाकई में गिरो तो
एक विनाशकारी महाभूचाल सा आ जाय इस धरती पर।

(कविता-संग्रह ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ से)

सपने

सच तो साबित वे सपने ही होते हैं
जिन्हें हम सच्चा मान बैठते हैं
नींद के टूटने के बाद भी
और एकदम ही झूठे होते हैं वे सपने
जिनके बारे में हमें कुछ भी याद नहीं रहता
अपनी आँखें खोल लेने के बाद ।

वैसे सपने तो खुली आँखों से भी देख सकते हैं हम
लेकिन बड़ा मुश्किल होता है
इन दिवास्वप्नों का सच साबित होना
क्योंकि हमारी खुली आँखों के सामने जो कुछ भी घटित हो रहा होता है
उसमें प्रायः कुछ भी तो काल्पनिक नहीं होता
और वास्तविकता को काल्पनिक मानकर बुना गया कोई भी सपना
कभी वापस हक़ीक़त में बदल ही नहीं सकता,
दोस्तो ! खुली आँखों से हम सपने नहीं
बस सच की तस्वीर ही देख सकते हैं ।

अपनी आँखें खुल जाने पर ही तो हम गढ़ते हैं वे औज़ार
और भरते हैं अपने भीतर वह अटूट इच्छा-शक्ति
जिसके सहारे ही जुट सकते हैं हम
सोते समय देखे गए अपने तमाम सपनों को सच साबित करने में ।

शब्द 

शब्दों का क्या?
शब्द तो ढेरों थे,
अर्थ भरे और निरर्थक भी,
जिसकी जैसी ज़ुबान,
उसके पास वैसे ही थे शब्द,

कुछ के शब्दों पर भरोसा ही नहीं था,
किसी को भी,
इसीलिये रखे थे उन्होंने अपने पास बोलने के लिए,
कुछ उधार लिए गए शब्द भी,
कभी टिके नहीं रह सकते थे ऐसे लोग,
अपने कहे गए शब्दों पर,
ऐसे लोगो की वज़ह से ही,
बन चुके हैं कुछ लोग शब्दों के कारोबारी भी,

शब्द उछाले जा रहे हैं सरेआम,
तरह-तरह की ज़ुबानों से,
डराने-धमकाने-गरियाने-बरगलाने के लिए,
अख़बार के पन्नों से भी गायब हो रहे हैं वे शब्द,
जिन पर किया जा सके अब कुछ भरोसा,

शब्दों का क्या ?
शब्द तो पत्थरों की तरह बेज़ान हो चले हैं आजकल,
उनका इस्तेमाल किया जा रहा है बस,
किसी न किसी का माथा फोड़ने के लिए ।

जिन्हें डर नहीं लगता

जिन्हें तैरना नहीं आता
उन्हीं के लिए ही डालनी पड़ती हैं
नदी में नावें और
बनाने पड़ते हैं उन पर पुल
ताकि पार कर सकें वे नदी को
बिना डूब जाने के भय के,

बूढ़े और अशक्त हों तो
अलग होती है बात
किन्तु सक्षम होते हुए भी
जो नहीं सीखते तैरना
या तैरना जानते हुए भी
तैयार नहीं होते जो
पानी में धँसने को,
उनके लिए हम प्रायः पीठ झुका कर
क्यों तैयार हो जाते हैं
नाव या पुल बनने के लिए?

जिन्हें डर नहीं लगता
उन्हें,
तैरना सहज आ जाता है
हिम्मत के साथ
पानी में कूद जाने पर
किन्तु कभी नहीं सीखा जा सकता तैरना
केवल किताबें पढ़-पढ़ कर
अथवा चिन्तन-मनन करके ।

बाढ़ की विभीषिका में
जब पलट जाती हैं नावें
बह जाते हैं पुल
तब भी बचे रहते हैं
नदी की लहरों में
वे लोग जीवित
जिन्हें तैरना आता है,

ऐसे लोगों को
नदी की लहरों से
डर नहीं लगता
वे हमेशा तत्पर रहते हैं
स्वीकारने को
लहरों का हर एक निमंत्रण् ।

लहरों के निमंत्रण को ठुकराकर
तीर पर ठिठुककर तो
वही रुके रहते हैं
जिन्हें तैरना नहीं आता ।

नई नस्ल के कबूतर 

उन्हीं के हाथों में कबूतर थे
उन्हीं की जेबों में दाने थे
उन्होंने सारे दड़बों के दरवाज़े खुले छोड़ रखे थे
ताकि कह सकें वे
ये कबूतर ख़ुद-ब-ख़ुद उनके हाथों में आए थे
अन्यथा वे कहीं भी जाने तथा दाने खोजने के लिये स्वतंत्र थे ।

उन्हें ऐसी नस्ल के कबूतर पसंद नहीं थे
जो बिना उनके हाथों का सहारा लिए
बिना उनकी जेबों से दाने बिखराए जाने की प्रतीक्षा किए
दड़बों से दानों की खोज में निकल पड़ना चाहते हों
भले ही दाने न पाकर ऐसे कबूतर
हताशा से भरकर ही लौटते हों अपने दड़बों में ।

सचमुच में कुछ ऐसी नस्ल के कबूतर भी थे वहाँ
जो हवा में कलाबाज़ियाँ खाते
उनकी जेबों में भरे दानों की परवाह किए बिना
कभी उनके हाथों की गिरफ़्त में नहीं आते थे ।

उन्होंने ही बनाए थे कबूतरों के दड़बे
बन्धन नहीं, आश्रय देने का ढ़िंढ़ोरा पीटकर
कबूतरों की ज़रूरतों का ध्यान रखने के
कथित उद्देश्य से ही भर रखे थे उन्होंने
अपनी जेबों में दाने

कबूतरों की जरूरतों का ध्यान रखने के बहाने ही
नियन्त्रित कर रखा था उन्होंने
दानों का बिखराव
उनका मानना था
उनके ही हाथों में सुरक्षित था कबूतरों का भविष्य
वे कबूतरों को दड़बों में पालने से भी बेहतर समझते थे
उन्हें अपनी जेबों में ही डालकर दाने चुगाते रहना ।

तमाम प्रयासों के बावजूद
कुछ नई नस्ल के कबूतर
उनके दड़बों की ओर रुख करने के लिए तैयार नहीं थे
ऐसे कबूतर पिचके पेटों के बावजूद
लोहे की चोंचों वाले हो चले थे

वे आसमान में पंख पसार
नई संभावनाओं वाले नीड़ तलाशते
उड़कर बढ़े चले जा रहे थे
दूर सुनहरे क्षितिज की ओर ।

बौने क़द के लोगों में 

बौने क़द के लोगों में
एक अकेला था वह
लंबा-सा इनसान
दूर देश से आया था ।

हुए इकट्ठे सारे बौने और तय किया
काटो इसके पैर
कि छोटा हो बेचारा
गए पास राजा के बोले
इसके पैर बहुत लंबे हैं
चाल बहुत ही तेज़ कि
छीने राज्य तुम्हारा ।

राजा बोला बहुत सही है
बड़े पते की बात कही है
मैं हूँ राजा इन बौनों का
पैर काटकर इस लंबे के बौना कर दो
और नहीं तो इसे देश से बाहर कर दो ।

फिर क्या था
आरियाँ निकालीं
पकड़ीं टाँगें परदेसी की
परदेसी भी बड़ा गज़ब का
झटक रहा था, पटक रहा था
सहज नहीं था पैर काटना
आरी में भी धार नहीं थी ।

कट न सके जब पैर तो सोचा
देश निकालो
घेरो इसको सभी तरफ़ से
लेकिन कुछ ऐसी भी विधि थी
घेर न पाए ।

लिये खरोंचें पूरे तन पर
वह लंबा इनसान
न्याय की प्रत्याशा में
यहाँ-वहाँ तक रहा दौड़ता
लंबे छल के उन बौनों से
बच जाए बस इस आशा में
शहर-बदर की अभिलाषा में ।

अजूबा रंग-मंच

बड़ा अजूबा रंग-मंच है,
बदला-बदला सबका वेश
कोई धरे मुखौटा चोखा
देता हर दर्शक को धोखा
कोई लंबे बाल संवारे
कोई है मुंडवाए केश

कोई बोले रटी-रटाई
कोई कहे ज़िगर की खाई
कोई दुमुही जैसा बोले
कोई बोले केवल श्लेष

कोई डुबो-डुबो कर खाए
कोई झूठी आस बंधाए
कोई भर घड़ियाली आँसू
हमदर्दी से आए पेश

कोई दौलत पर इतराए
कोई सत्ता पा बौराए
कोई सब्ज़-बाग दिखलाता
बेंचे लेता सारा देश

नारियल की देह

सुघड़ चिकने पय भरे फल,
वक्ष पर ताने खड़ा,
नवयौवना-सा,
झूमता है नारियल तरु,
मेघ से रिमझिम बरसते,
नीर का संगीत सुनता,
गुनगुनाता साथ में कुछ,

थरथराते पात भीगे,
शीश पर लटके लटों से,
भर रही आवेश उनमें,
छुवन बूंदों की निरन्तर,
पवन का झोंका अचानक,
खींच लाता उसे मुझ तक,
खुली खिड़की की डगर,
भींच कर के स्निग्धता उसकी समूची,
बाहुओं के पाश में निज,

मैं चरम पर हूँ,
परम उत्तेजना के,
निरत इस आनन्द में ही,
उड़ गया कब संग पवन के,
यह नहीं मालूम मुझको,
झूमता अब मैं वहाँ,
उस तरु-शिखर पर,
भीगता लिपटा हुआ,
उस नारियल की देह से ।

दाना चुगते मुरगे

कुछ मुरगे दाना चुगने निकले
सामने बिखरे दाने
बाँट लिये उन्होंने अपनी-अपनी सुविधानुसार
और चुगने लगे जी भरकर
जैसे उन्हें सर्वाधिकार मिल गया था
मनचाहे तरीके से दाने चुगने का
मुझे अपना देश याद आया ।

थोड़ी देर में एक मुरगे को लगा
जो दाने वह चुग रहा है
वे शायद घटिया हैं
दूसरे दानों के मुकाबले
उसने शोर मचाया कि उसे भी
कुछ अच्छे दाने मिलने चाहिए
सबको चुपचाप अच्छे दाने मिलते रहें
इसलिए समझौता हुआ
उसे भी दे दिए गए कुछ अच्छे दाने चुगने के लिए
मुझे अपने देश की राजनीति याद आई ।

चुगते-चुगते एक मुरगे ने
दूसरे मुरगे के सामने का दाना खा लिया
फिर क्या था
लड़ने लगे दोनों मुरगे
अपने-अपने क्षेत्राधिकार को लेकर
अंत में उनके मुखिया ने निष्कर्ष निकाला
ग़लती शायद दाने की ही थी
उसे नहीं पता था कि
किस मुरगे के सामने उसे होना चाहिए था
और फिर शांति से चुगने लगे मुरगे अपने-अपने दाने
मुझे याद आई साझा सरकारों की ।

दाने कम होते देखकर
और दानों की माँग की मुरगों ने
पेट भरा था उनका
फिर भी दानों का लालच विवश किए था
यह जानकर कि शायद और दाने न मिल सकें
सब चुग लेना चाहते थे अधिकाधिक बचे-खुचे दाने ।
दानों की कमी संघर्ष का कारण बनने लगी
कुछ मुरगों के सामने बचे थे बस ख़राब ही दाने ।
अच्छे दानों पर एकाधिकार जमाने के लिए
चोंचों से वार होने लगे
एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो चले थे मुरगे
मुझे याद आई लखनऊ, पटना, दिल्ली की ।

कुछ मुरगे होशियार निकले
दाने चुगने का मज़ा ले चुके हैं वे
समझ चुके हैं कि दाने तो फ़सल से ही मिलते हैं ।
फिर फ़सल ही खाने का मज़ा क्यों न लिया जाए
ऐसे मुरगे खेतों की तरफ़ बढ़ चुके हैं
फ़सलों को खाने में रम चुके हैं ।
उन्हें इसकी चिंता भी नहीं
कि अब उनके साथियों को दाने कैसे मिलेंगे
और अंततोगत्वा उन्हें भी फ़सलें कैसे मिलेंगी

फ़सलें ख़त्म होती जा रही हैं ।
मुरगे फिर लड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं
मुझे अपने देश के भविष्य की चिंता हो रही है ।

युद्ध और बच्चे

एक माँ बुरका ओढ़े
अपने दुधमुँहें बच्चे को छाती से चिपकाए
बसरा से बाहर चली जा रही है
अनजान डगर पर
किसी इनसानी बस्ती की तलाश में
अपने अधटूटे घर को पलट-पलटकर निहारती
अपने बचपन व जवानी से बावस्ता गलियों को
आँसुओं से भिगोकर तर-बतर करती ।

बच्चा गोद से टुकुर-टुकुर आसमान की ओर ताकता है
जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो
ऊपर उड़ते बमवर्षक विमानों की गड़गड़ाहट
चारों तरफ फटती मिसाइलों के धमाकों-
फौजियों की बंदूकों की तड़तड़ाहट-
इन सबसे उसका क्या रिश्ता है
वह नहीं जानता कि उसका बाप
‘अल्लाहो अकबर’ के नारे लगाता कहाँ गुम हो गया है ।

बच्चा नहीं जानता कि क्यों जल रहे हैं–
चारों तरफ कीमती तेल के कुएँ
और लोग क्यों बेहाल हैं भूखे-प्यासे
बच्चा अपनी माँ की बदहवासी ज़रूर पहचानता है
और जानता है कि
उससे बिछुड़कर जी नहीं सकता वह
धूल और धुएँ के गुबार में कहीं भी ।

उधर कश्मीर में मार दिए गए पंडितों के परिवार का
जीवित बच गया छोटा बच्चा भी
नहीं जानता कि ‘हे राम’ कहकर कराहते
गोलियों से छलनी उसके माँ-बाप कहाँ चले गए हैं
वह नहीं जानता कि उस दिन गाँव में आए
बंदूकधारियों के चेहरों पर
क्यों फैली थी वहशत
और क्या हासिल करना चाहते थे
वे तड़ातड़ गोलियाँ बरसाकर ?

वहाँ फ्लोरिडा में माँ की गोद में दुबककर बैठा
मासूम बच्चा
अपने फौजी बाप को एयरबेस पर
अलविदा कहकर लौटा है
वह भी नहीं जानता कि क्यों और कहाँ
लड़ने जा रहा है उसका बाप
और क्यों दिखते हैं टेलीविजन पर
बख़्तरबंद टैकों में बैठे अमेरिकी जवान
रेतीले रास्तों में भटकते
‘इन द नेम ऑफ गॉड’
आग का दरिया बहाते
नख़लिस्तानों पर निशाना साधते ।

दुनिया का कोई भी बच्चा
नहीं जानता कि लोग क्यों करते हैं युद्ध ?
जबकि इस दुनिया में
कल बड़ों को नहीं, इन्हीं बच्चों को जीना है ।

युद्ध होता है तो
बच्चे ही अनाथ होते हैं
और आणविक युद्ध का प्रभाव तो
गर्भस्थ बच्चे तक झेलते हैं ।

बच्चे यह नहीं जानते कि
क्यों शामिल किया जाता है उन्हें युद्ध में
किंतु वे ही असली भागीदार बनते हैं
युद्ध के परिणामों के ।

काश ! दुनिया की हर कौम
युद्धों को इन तमाम बच्चों के हवाले कर देती
और चारों ओर फैले रिश्तों के
बारुदी कसैलेपन को
मुसकराहटों की बेशुमार ख़ुशियों में
हमेशा-हमेशा के लिए भुला देती ।

क्यों नहीं होता

शाम तक प्रतीक्षा थी
बादल छोड़ देंगे सूरज को
अपनी गिरफ्त से
भले ही थोड़ी देर के लिए और
नहला देगा वह हमें अपनी रोशनी से,
पर पता ही न चला
कब डूब गया सूरज
क्षितिज पर गहराए बादलों के पीछे
जिंदगी का सच ही यही है
नहीं हो पाता इसमें
सब कुछ पूरा
हमारी अपनी चाहत के अनुरूप।
पर कभी-कभी हो भी जाता है
बहुत कुछ यहाँ
हमारी अपनी इच्छाशक्ति के अनुरूप,
मसलन,
मोहनदास करमचन्द गाँधी का राष्ट्रपिता बनना
लाल बहादुर शास्त्री का देश का प्रधानमंत्री बनना,
भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे देश में
श्रीधरन का हर प्रोजेक्ट समय से पहले पूरा होना
चन्द्रयान का चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित होना,
आदि।
क्यों नहीं होता आख़िर
इस देश में लोगों का समय से दफ़्तरो में पहुँचना
तय समय तक कुरसी पर बैठ
अपना काम पूरा करना
बच्चों की पढ़ाई के लिए
कोचिंग की ज़रूरत न पड़ना,
कर्णधारों का संयत बोलना
लोगों का नियम तोड़ते रहने से बचना
देश का पेट पालने वाले किसानों का
खाली पेट सोना आदि ।
शायद हमारी इच्छाशक्ति के अभाव में ही
नहीं होता सब कुछ यहाँ
हमारे देश का सूरज
यूँ ही डूबता रहता है असमय
हमारे द्वारा ही सृजित कुहासे में
अचानक चमक उठने की नित्याशा के बीच ।

पत्थर 

पता नहीं कैसे
हो जाते हैं कुछ लोग
पत्थरों पर सिर पटकने की शौकीन
उद्यत हो उठते हैं करने को
आत्महत्यापरक चेष्टाएँ,
कुछ लोग निरन्तर करते रहते हैं प्रयास
पत्थर पर लकीरें खींचने का
भले ही उनसे वे
न बना पाएँ कोई / अर्थपूर्ण आकृति
तथा बैठे रहें बस
पत्थर पर एक बेतरतीब सी खुरचन छोड़कर ।

कुछ लोगों को नहीं भाती
मिट्टी की ख़ुशबू
उसकी उर्वरता का आधार ,नमी
उसमें पनपती हरियाली का एक भी कतरा
ऐसे ही कुछ लोग आजकल
ढकने में जुटे हुए हैं
पत्थरों से
एक-एक इंच भूमि को
हरियाली के तिनके -तिनके को उखाड़कर
पाटे जा रहे हैं चौराहों-नुक्कड़ों को
पत्थर की मूर्तियों से
चुनते जा रहे हैं / पत्थरों की दीवारें
पार्को मैदानों के चारों तरफ़
ताकि न देख सके कोई भी राहगीर
कहीं भी हरियाली का एक टुकड़ा

सत्तासीन पत्थर-प्रेमी
निरन्तर जुटाए जा रहे हैं
भाँति-भाँति के तराशे हुए पत्थर
पूरे के पूरे लोक-राजस्व को
निजी सम्पति जैसा मानते हुए
पत्थरों में समाया जा रहा हे राज-कोष
लुटती जा रही है लगातार
हमारी आँखों की बची-खुची तरलता
क्या होगा जब सूख जाएँगी
इन आँखों से सदा-सिंचित होती रही परधाराऐं !

क्या हम सब बाध्य हो जाएँगे
पत्थरों पर अपना सिर पटकने के लिए
उस दिन का / जब भरेगा अपने आप
इन पत्थर-दिल लोगों के पाप का घड़ा
जैसा सदियों से होता आया है
पत्थर के महलों में रहने वालों के साथ ।

हद अभी पार नहीं 

रात अभी बीती नहीं है
पर रात तो बीतेगी ही
सुबह अभी हुई नहीं है
पर सुबह तो होगी ही
सूरज अभी निकला नहीं है
पर सूरज तो निकलेगा ही
रोशनी अभी फैली नहीं है
पर रोशनी तो फैलेगी ही
पतझड़ में पात झरे हैं अभी
पर कोंपलें तो कल सजेगीं ही

लेकिन ज़रूरी नहीं
यह मान ही लिया जाय कि
जब जो होना है, वह होगा ही
पानी फिर बरसेगा ही
बड़वानल शीध्र बुझेगा ही
कई बार ऐसा होता ही है
राख के ढेर से भी भड़क उठती है चिंगारी
यहाँ बहुत कुछ तभी होगा
जब मैं कुछ करूँगा
या आप कुछ करेंगे,
या काफ़ी कुछ तभी होगा
जब हम सब मिलकर कुछ करेंगे
हम सब कुछ करेंगे ही
इसकी हद अभी पार नहीं हुई शायद ।

विकल्प की तलाश 

वह आई
हथेलियाँ पसारे
गड़ा दी आँखें उसने
कार के डार्क शीशे पर
याचना में होंठ काँपे
‘पेट भूखा है, सर !’

एक मन किया
दे दूँ दो-चार रूपए
हाथ ख़ुद ब ख़ुद सरक गया जेब की तरफ़
तभी दूसरा विवेक जागा,
मत दो कुछ भी
नही तो भीख माँगते ही गुज़ारेगी सारी ज़िन्दगी ।

मन किया पूछ लूँ
‘कुछ काम क्यों नहीं करती ?
चलेगी मेरे साथ ?’
पर मुँह से न निकल सकी यह बात
क्योंकि डर था कि
उसमें छिपी हो सकती है
किन्हीं अनर्थों की सौगात !
अचानक ग्रीन-सिगनल होते ही
छिटक गई वह फुटपाथ की तरफ़
उसके पास विकल्पों की तलाश का
इतना ही समय था

चौराहे पर लाल सिगनल के ग्रीन होने तक
मेरे पास भी उसके लिए सोचने का
इतना ही समय था शायद,
उसके सामने कोई विकल्प रखने से पहले ही
रोज़ वहाँ से बढ़ जाता था मैं आगे ।

घर की बेटी की तरह
बड़ी हो रही थी वह भी सड़क पर
बढ़ रही थीं उसकी ज़रूरतें भी
पर सिकुड़ते जा रहे थे दिन-ब-दिन उसके विकल्प

उसके आस-पास ही देख रखे थे मैंने
उसकी माँ व दादी की भी उम्र के चेहरे
भिक्षाटत ही उनके पास एकमात्र विकल्प था
क्योंकि इस देश के पास उनके लिए
कोई अन्य विकल्प तलाशने की फ़ुरसत ही न थी ।

दिल्ली के आसमान की धूल

धूल बहुत है
दिल्ली क आसमान में
पारा भी काफ़ी ऊपर
मौसम वैज्ञानिक बताते हैं
राजस्थान के रेगिस्तानों से आती है यह धूल तथा
सूरज के कर्क रेखा की ओर बढ़ने पर
चढ़ता है दिल्ली का पारा
पर मेरे गाँव का नवबढ़ा नेता
औतरवा कहता है
देश के लाखों गरीबों के
उसके जैसे गरीबों के
पैरों के नीचे से
खिसक रही है जो ज़मीन
वही उड़-उड़ कर छाने लगी है अब
दिल्ली के आसमान में
उन्हीं की उच्छ्वासों की
समेकित उष्मा से ही
चढ़ रहा है दिल्ली का पारा

दिल्ली वाले मानें या न मानें
पर औतरवा मानता है कि
शीघ्र ही फैल जाएगी यह धूल और गर्मी
न्यूयार्क, ब्रुसेल्स और टोकियो तक भी
अगर नहीं रूकता गरीबों के पैरों के नीचे से
ज़मीन का लगातार खिसकना
भले ही कितनी चर्चाएँ हो
जेनेवा, जी-8, व जी-20 के मंचेां पर ।
औतरवा का मानना है कि
उसके जैसों के उठकर चल पड़ने से ही
उड़ रही यह धूल
अब रोज़ दिल्ली वालों की
चमचमाती गाड़ियों पर
एक परत तो जमेगी ही जमेगी
दिन पर दिन मोटी भी होगी
भले ही दिल्ली वाले इसे
कितना भी झाड़ें -पोछें
यह सिलसिला अब
तब तक बंद नहीं होगा
जब तक दिल्ली वाले
देश के लाखों गाँवों
के लोगों के पैरों तले से
ज़मीन का खिसकना बन्द नहीं करा देते ।

करमजीते चक दे

क्या नाम है तुम्हारा?
करमजीत कौर, सर !

चौंक पड़ा था सहसा
न्यूयार्क के भारतीय मिशन द्वारा
इस बार मेरे साथ ड्यूटी पर तैनात की गई
महिला कार-चालक को देखकर ।

मैं ही नहीं
न्यू जर्सी में रहने वाले मित्र के घर
जब पहुँचा था देर शाम खाने पर
वह भी चौंक पड़ा था सपत्नीक
क्योंकि अमेरिका की आधुनिकता के बीच भी
महिला टैक्सी-चालकों की संख्या नगण्य ही थी,
उस पर एक भारतीय मूल की महिला
सुन्दर, सौम्य, निर्भीक,
देर रात तक ड्यू्टी करने को तत्पर,
मित्र के घर पर गाड़ी से उतरते समय
मुझे यह जरूर लगा कि उसकी पत्नी
इतनी रात को मेरे साथ
एक सुन्दर महिला कार-चालक होने के प्रति
पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रही थी।

न्यूयार्क से न्यू जर्सी की
एक घंटे की यात्रा में
रोक नहीं सका था अपनी जिज्ञासा
पूछ ही बैठा था उससे,
“अजीब लग रहा है तुम्हारे साथ चलना
कुछ न कुछ प्रश्नाकुलता जगाता है
तुम्हारा न्यूयार्क की सड़कों पर
टैक्सी के रूप में अपनी कार दौड़ाना
लिखना चाहूँगा कुछ
तुम्हारे निजी अनुभवों के बारे में
अगर एतराज़ न हो तुम्हें
अपनी निजता का भागीदार बनाने में मुझे ।“

सहसा जैसे लंबा हो गया था हाइ-वे
थोड़ी संकरी हो गई थी हडसन की टनल
सड़क के दोनों तरफ़ अंकित स्पीड लिमिट से
काफी धीमे चलने लगी थी कार जैसे
शहर से बाहर निकलते ही
उसके स्मृति-पटल पर तिरने लगी थी
बीते बीस सालों की दास्तान,
दोनों तरफ के जंगल जैसे सिमट आए थे झुककर
कार की विंड-स्क्रीन पर ।

बड़े आत्मविश्वास से बताया था उसने,
“एन.आर.आई. से शादी का बड़ा क्रेज होता है
पंजाब की लड़कियों में,
घर में किसी तरह की कमी न थी
शौकिया बी.ए. कर रही थी मैं
सहेली की शादी एक कनाडा वाले से हुई तो
मेरा भी मन ललचा उठा
माँ-बाप की सलाह की परवाह किए बिना
दीवानी हो गई मैं एक अमेरिकी देशी की

ब्याह रचाकर फटाफट बस गई आकर यहाँ न्यूयार्क में
सोचा सहेली से एक सीढ़ी ऊपर ही चढ़ी हूँ मैं
दस बरस बीत भी गए हँसी-खुशी
दो बेटियों व एक बेटे की माँ भी बन गई मैं
लेकिन फिर वही हुआ
जिसकी सदा आशंका थी पिता को

लगभग दस बरस पहले फुर्र से उड़ गया
मेरा वह बेवफ़ा देशी पति
किसी गोरी मेम को बाँहों में लिपटाकर
मुझे हताश व बेबस बिलखता छोड़कर
चंडीगढ़ में पिता भी सदमे में अलविदा कह गए हमको
बर्दाश्त न हुआ उनसे
मेरे जीवन की कटी पतंग सी डगमगाती चाल देखना ।“

मुझे लगा,
यादों की गहरी धुंध में
बिना देखे ही
आदतन मोड़ दी थी कार उसने
जान्स्टन स्ट्रीट के एक्ज़िट की ओर
उसकी आँखों में बार-बार
उमड़ने को व्याकुल हो रहे थे वे आँसू
जो कभी नहीं सूख पाए शायद
उन बीते दस बरसों में ।

“मेरे सामने तीन बच्चों का भविष्य था
अपने लड़खड़ाते जीवन को पटरी पर लाने का दायित्व था
चंडीगढ़ वापस जाने का विकल्प भी नहीं बचा था
पिता के न रहने पर
भाई की आँख का पानी मर चुका था
मेरे हिस्से की संपत्ति भी हथिया ली थी उसने

अपने अमेरिकी बच्चों को
अमेरिका की ही धरती पर
पढ़ाना, लिखाना, उन्हें सफल होते देखना
सपना बन चुका था मेरा,
इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थी मैं
अपने बाकी सारे सपने
जाड़ों में सड़क पर जमने वाली बर्फ की तरह
पिघला दिए मैंने

अपने वाष्पित आँसुओं का अवशेष खारापन छिड़क कर,
जुनून सवार हो गया था मुझ पर
उस पुरुष के अहं को नीचा दिखाने का
जिसने दस बरस तक भोग कर मेरे यौवन को
अकेली छोड़ दिया था मुझे
परदेश के महासमुद्र में,

धोखे से ले लिए थे उसने
तलाक़ के काग़ज़ों पर मेरे हस्ताक्षर भी
उन काग़ज़ों के सहारे
बड़ी आसानी से मिल गई थी उसे
विवाह-बन्धन से मुक्ति
अमेरिकी कानून की उदार व्यवस्था के तहत,
भारत जैसे मज़बूत नहीं होते
अमेरिकी समाज मे रिश्ते-नाते ।“

“पूरा विश्वास था उसे
निश्चित ही डू्ब जाऊँगी मैं
ऊँची-नीची लहरों के बीच,
उस वंचक की आँखों में
कभी नहीं दिखा मुझे
आत्मग्लानि अथवा सहानुभूति का कोई भी भाव,

संकल्प कर लिया था मैंने
महासमुद्र को तैर कर पार कर जाने का,
चंडीगढ़ से विदा होते वक़्त
पिता ने कहा था मुझसे,
औरतों की तरह कमज़ोर बनकर नहीं
आदमी की तरह मज़बूत बनकर जीना परदेश में,
पिता की वह सीख
हमेशा सहारा देती रही है मुझे
संघर्ष के इस पूरे दौर में,

आधुनिकता के इस दौर में भी
ऐसा नहीं है कि अमेरिकी समाज में
औरतें जी सकती हैं अपनी इच्छानुरूप
दकियानूसी वर्जनाओं से पूर्ण मुक्त होकर,
ऐसी वर्जनाओं की कोई परवाह नहीं मुझे
पुरुषोचित माने गए सारे काम सहजता से करती हूँ मैं ।“

न्यू जर्सी की सुनसान सड़क पर
दोनों किनारों के लैम्प-पोस्टों का प्रकाश
कार के फ्रंट-ग्लास को पार कर
यदा-कदा नहला रहा था उसके चेहरे को
जैसे स्टेच्यू आफ लिबर्टी चमक रही हो अँधेरी रात में
मैनहाटन के लाइट-हाउस की रोशनी में रह-रह कर
मुझे लगा, शनैः-शनैः सुर्ख़ होता जा रहा था उसका चेहरा,
निश्चित ही यह उस सुनसान रात में
सड़क पर अकेले मेरे साथ होने की सुर्ख़ी नहीं थी ।

कुछ ही देर पहले
सीधी सड़क आने पर
स्टियरिंग से हाथ छोड़
बालों को लपेट कर
पीछे जूड़ा बना लिया था उसने,
हैंड-बैग से निकाल कर
एक सिल्की दुपट्टा भी डाल लिया था गले में,
मुझे लगा पूरी तरह आश्वस्त व सहज होकर ही
करना चाहती थी वह
अपनी सारी आप बीती का बयान,
मैं तल्लीनता से
उसकी ज़िन्दगी के एक-एक पृष्ठ पर
फैली हुई इबारत को पढ़ लेना चाहता था
पता नहीं पहले किसी ने पढ़ी भी थी यह इबारत या नहीं ।

“शुरुआत तो की थी
पति की तर्ज़ पर
रियल इस्टेट के काम से
लेकिन मंदी के दौर से गुजर रहे अमेरिका में
इससे कुछ भी हासिल होना न था,

केवल बी.ए. पास औरत को
अच्छी नौकरी मिलने का कोई ठिकाना भी न था
स्त्रियोचित अन्य कामों में भी काफ़ी प्रतिस्पर्धा थी
केवल पैसा कमाने में जुटी
गुरुद्वारों, मंदिरों की समितियाँ भी
मेरी मदद करने को तैयार न थीं

पिता के निधन के बाद मुझे अकेली देख
चंडीगढ़ छोड़कर मेरे पास आ गई थी माँ
उनके आ जाने बच्चों को बड़ा सहारा मिल गया था
मुझे भी बाहर निकल कर काम करने की पूरी आज़ादी ।“

“न्यू यार्क के पंजाबी मित्रों ने
अपने सारे गुर सिखा डाले थे मुझे
बस, ट्रक, लीमोसीन,
सब कुछ चलाने के लाइसेंस बनवा डाले थे मैंने
जब जो हाथ में आया
उसी काम में जुट गई मैं
बच्चों का पेट पालना,
उन्हें बेहतर से बेहतर शिक्षा दिलाना,
इसी संकल्प में खपा देना चाहती थी मैं
अपने जीवन की बची-खुची ऊर्जा

न्यूयार्क वालों ने पहली बार देखा
एक पंजाबी औरत को ट्रक चलाते हुए,
हडसन की टनल पार कर
दूर जंगलों तक लीमोसीन दौड़ाते हुए
यह करमजीत का कठिन कर्तव्य-पथ था, सर !
मैंने उन सब कामों को कभी विधि का विधान नहीं माना ।“

“यह सब करते हुए
तुम्हें डर नहीं लगता था करमजीत ?”

“डर तो बहुत लगता था, सर !
पीड़ा भी कम नहीं होती थी,
घनघोर बरसात में टैक्सी दौड़ाना
जाड़ों में बर्फ़ से ढंकी सड़कों के बीच
अनजान रास्तों में घंटों भटक जाना
देर रात नशे में धुत्त अमेरिकियों को
न्यूयार्क से दूर सब-अर्बन कस्बों में
रास्ते पूछ-पूछ कर
उनके घरों तक पहुँचाना,
जैसे बकरी ले जा रही हो भेड़ियों को
अपने बाड़े से वापस घने जंगलों तक छोड़ने
अपना पेट न चीरे जाने का धन्यवाद देती हुई,

वापसी की यात्राओं में
सुनसान सड़कों पर आधी रात
अचानक किनारे लगाकर लीमोसीन
फफ़क-फफ़क कर रो पड़ती थी मैं
पिता को याद कर,
जीवन के संघर्षों की पीड़ा को याद कर
फिर तभी रुकते थे आँसू
जब घृणा के पुट में भड़क उठते थे
आँसुओं की जगह आँखों में शोले
याद कर उस धोखेबाज़ पुरुष की प्रवंचना को,
तत्क्षण दुपट्टे से आँसू पोंछ
लपेट कर बाँध लेती थी उसे कमर पर मैं
लीमोसीन को रात के अँधेरे में
फिर से दौड़ा कर
बच्चों के पास वापस लौटने की व्याकुलता में ।“

“दस बरस बीत गए हैं यूँ ही
अब तो आँसुओं को गिनने की इच्छा भी नहीं होती,
बाहर की दुनिया में जब से
अपने से भी ज़्यादा दुखियारे लोग देख लिए हैं मैंने
भीतर ही भीतर बहुत मज़बूत हो गई हूँ मैं,
बस, ट्रक, लीमोसीन भी छूट ही गई हैं अब
इंडियाना में बसे दूसरे भाई की मदद से
अपना ख़ुद का घर तैयार होने को है वहाँ,
अब यह अपनी निसान (कार) है
इसी को ख़ुद की मर्ज़ी के अनुरूप
किराए पर चलाने लगी हूँ मैं

ज़रूरत भर की कमाई हो ही जाती है
तिनका-तिनका जोड़ कर बुन रही हूँ
बया जैसा एक मज़बूत घोंसला
मुझे महसूस होने लगा है कि अब
मेरे सपनों की कलियों के
प्रस्फुटित होने में ज़्यादा देर नहीं

बड़ी बेटी बारहवें में है
अपने जैसा नहीं बनने देना चाहती उसे
भारतीयों जैसा लाड़ नहीं देती उसको
ख़ूब पढ़-लिख कर
अपने पैरों पर मज़बूती से खड़ी हो वह
यही सिखाती हूँ दिन-रात उसे

बच्चे खूब समझते हैं मेरा भोलापन
मुझको देखते-देखते
वे मुझसे भी ज्यादा समझने लगे हैं
इस कुटिल दुनिया के काइएंपन को ।“

“चंडीगढ़ की याद नहीं आती ?”

“क्यों नहीं आती ?
खूब आती है,
मुझे भी, बच्चों को भी,
हर साल छुट्टियों में ले जाती हूँ उन्हें वहाँ
बच्चों को वहीं ज़्यादा अच्छा लगता है
मेरे संघर्षों के सतत साक्षी बने वे
अभी तक अमेरिकी नहीं बन पाए हैं मन से

बड़ी तो भारत में ही पढ़ना चाहती है डाक्टरी
पंजाब की शादियों की रौनक के आगे
डिस्नीलैण्ड नहीं भाता उनको
देख कर उनकी मेधा की प्रखरता
स्कूलों में जलते हैं उनसे
काले, गोरे, सारे बच्चे,
भले ही ऊपर से सिद्ध करना चाहता है हर अमेरिकी
अपने नस्ल-भेद विरोधी होने की बात,

दिल कचोटता रहता है
बच्चों को लेकर भारत में रहने के लिए
लेकिन विवश हूँ अपने ही भाई की
अनीति व अधिकार-वंचना के दब कर ।”

लगा जैसे कहना चाहती हो वह,
“कहीं अंत नहीं है धरती पर
अबला की पीड़ा का
फिर परदेश में ही क्यों न भोग लिया जाय उसे
निर्मोही पति को उसी की मांद में शिकस्त देकर
सँवार दिया जाय बच्चों का भविष्य
उसी निर्लज्ज की छाती पर सफलता का खूँटा गाड़।“

“तुसी चक दित्ता करमजीत!”
खाने के बाद न्यू जर्सी से लौटते समय
कह ही बैठा था मैं उससे,
उसने ‘चक दे’ फिल्म नहीं देखी थी
फिर भी अपनी अँगुलियों से बार-बार माथे की लटें सँभालती
टाइम स्क्वायर की चका-चौंध को पीछे छोड़
एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग से भी ऊँची
इच्छा-शक्ति की उमंगें मन में सँजोए
‘चक दे’ की हीरोइन के अंदाज में ही
बढ़ती चली जा रही थी वह मेरे होटल की तरफ़
स्टियरिंग को हथेलियों के बीच
ऐसे थपथपा कर घुमाती हुई
जैसे लगातार गाए जा रही हो
“चक दे! करमजीते चक दे!

इंडिया दी जनानी,
तू अमेरिका बिच चक दे !”

प्रेम के शिला लेख

दिल पर पत्थर रख लेने से
पत्थर नहीं हो जाता दिल!

पल पल की व्याकुलता
छिपालेने से
शांत झील तो नहीं बन जाता
भीतर घुमड़ता सागर!

लम्बी दूरियाँ
समय के लम्बे अन्तराल
क्षण भर भी तो नहीं रोक सकते
स्मृतियों के आवेग को

सभी दिशाओ से
हर मौसम
हमेशा जकड़े रखता
है मुझे
तुम्हारी यादों के घेरे में!

मौन पढ़ता रहता हूँ मैं
निरन्तर अपने प्रेम के शिला लेख

साँसों की डोर 

सारे सन्दर्भो के बीच
सबसे निराला है
तुम्हारा संदर्भ

सारे संसर्गों के बीच
सबसे प्यारा है
तुम्हारा संसर्ग

सारी स्मृतियों के बीच
सबसे घनीभूत है
तम्हारी स्मृति

तुम्हारी चन्द्रिम अजास में
समा जाता है
खुले आकाश के
अनगिनत सितारां का उजाला

तुमसे मिलने की
आस ही तो बाँधे है
टूटकर बिखर जाने को आकुल
मेरे जीवन की साँसों की डोर को!

बौनों ने आकाश छुआ है 

नई सुबह है मस्त हवा है
गुणाभाग सब पस्त हुआ है
बदली बदली जनता सारी
बदला सा हर एक युबा है

परिवर्तन की बाट जोहती
दुनिया सारी अब लगती है
सोच नई है जोश नया है
बदल रहा अंदाजे बयाँ है

गढ़ने को नूतन परिभाषा
र्ध्म कर्म नैतिकता सबकी
बूढ़ा पीपल कुंचियाया है
डाल डाल प्रस्फोट हुआ है

घ में कीचड़ बाहर कीचड़
कीचड़ मलने की आदत से
छुटकारा पाने को व्याकुल
थोथेपन का दुर्ग ढहा है

अब स्वीकार नहीं हे बिघटन
भाव विभेद व्यर्थ का सारा
कठिन काल में अभिनव पथ का
अर्थ बोध आसान हुआ है

ग्रहण मिटा है नव किरणों की
आषा में उम्मीद जगी है
पराभूत करने की पीड़न को
बौनों ने आकाश छुआ है

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