उर्मिला माधव की रचनाएँ

वो जो रह-रहके चोट कर जाए

वो जो रह-रहके चोट कर जाए,
अपने अलफ़ाज़ से मुकर जाए,

आशिक़ी,इश्क एक फजीहत है,
जिसको रोना हो वो इधर जाए,

दर्द से दिल नहीं मुकाबिल हो,
खैरियत से ही अब गुज़र जाए,

मुझको हंसने को इक बहाना दे,
ज़िन्दगी जाने कब ठहर जाए,

जीस्त को जब भी ऐसी ख्वाहिश हो,
इतनी तौफीक़ दे कि मर जाए !

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं,
बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है

समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े,
ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं,

सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको,
जवां क्या हुए, बे-वफ़ा हो गए हैं,

मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ,
फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं

वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना,
किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं!

उम्र भर को जुड़ गए हैं,आपसे जज़्बात मेरे

 उम्र भर को जुड़ गए हैं, आपसे जज़्बात मेरे.
साथ बस देते नहीं हैं, आजकल हालात मेरे,

ख़ुश्क आँखों का वो मंज़र देख कर ऐसा हुआ
अश्क़ लानत दे गए हैं क्या कहूँ कल रात मेरे,

सोचती हूँ आख़िरश बाहर निकलकर क्या करूँ
दम-ब-दम जलती ज़मीं ऑ सर पै ये बरसात मेरे,

दोनों हाथों से उठा कर फेंकती रहती हूँ बाहर,
हो गई घर में ग़मों की रात-दिन इफरात मेरे,

भूल सी जाती हूँ मैं सब, मेरी दुनियां क्या हुई ?
वहशतें सी कह रही हैं कान में कुछ बात मेरे!

न तू देख इतने गुरूर से,के मैं लौट जाऊँगी दूर से

 न तू देख इतने गुरूर से, के मैं लौट जाऊँगी दूर से
ये पयाम तेरी नज़र को है, इसे जोड़ दिल के सुरूर से,

मेरे ग़म से तू भी है पुर असर, मेरा दावा है मैं ग़लत नहीं,
न यूँ ऐतकाफ़ से काम ले, आ बचाले खुद को कुसूर से

मेरे दिल का तू ही क़रार है, तुझे सोचती हूँ मैं रात दिन,
मेरी रात है तेरी जुस्तजू, है सहर भी तेरे ही नूर से,

मेरे दिल का कौन हफ़ीज़ है, तेरी दूरियां ही ज़वाल हैं,
ये बता के किससे गिला करें, जी मिले हैं दर्द गुरूर से,

ये बयान जो देना पड़ा मुझे तेरी जुस्तजू के सवाल पर
कभी ज़िन्दगी में विसाल हो, तो कहूँगी पूरे शऊर से

डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ

 डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ,
और अपनी छोड़ दे ये हुक्मरानी तो मैं जानूँ,

बादशाहत के नशे में चल रहा है झूम कर तू,
बिन नशे के जी ज़रा ये ज़िंदगानी तो मैं जानूँ,

हो गए गद्दीनशीं तो मार दी दुनियां को ठोकर,
सरहदों पर झोंक दे अपनी जवानी तो मैं जानूँ,

ग़ैर मुल्कों में उड़ी हैं धज्जियाँ अपने वतन की,
चिंदियों पर लिख कोई अच्छी कहानी तो मैं जानूँ,

ख़्वाब देना आसमां के, कौनसी खूबी है इसमें,
दे ज़रा अपने वतन को कुछ निशानी तो मैं जानूँ,

ख़ूब है हिंदी की गलियों का ये फेरा, एक दिन

 ख़ूब है हिंदी की गलियों का ये फेरा, एक दिन,
भित्तियों पर चित्र भी जा कर उकेरा, एक दिन,

हर कोई आतुर हुआ इंदौर जाने के लिए
देख लेंगे उस शहर का एक सवेरा, एक दिन,

देश के व्यवसायी जो अंग्रेज़ियत से चूर हैं,
वो भी जायेंगे जमाएंगे ही डेरा,एक दिन,

भारती चलचित्र की अभिव्यक्तियाँ हिंदी में हैं,
लिखके रोमन में पढ़ेंगे देश मेरा, एक दिन

क्या है वंदे मातरम्, ये पूछ कर देखो कभी,
कस के देखो बस ज़रा हिंदी का घेरा एक दिन

तोड़ कर भागेंगे रस्सा और कहेंगे माय गॉड,
भूल ही जाएंगे आख़िर तेरा-मेरा एक दिन

मेरे दिल की किताब रहने दे 

 मेरे दिल की किताब रहने दे,
चुप ही रह हर जवाब रहने दे,

चैन मिलना कोई ज़रूरी है ?
ऐसा कर ,इज़्तराब रहने दे,

आँख रोती हैं जा इन्हें ले जा,
मेरे नज़दीक ख्वाब रहने दे,

एक चिलमन बहुत है परदे को
आने-जाने को बाब रहने दे,

तुझको शम्स-ओ-क़मर से तौला था,
अपनी इज़्ज़त की ताब रहने दे,

तू है मजबूर अपनी आदत से
छोड़ बाक़ी हिसाब रहने दे,

ख़ार ख़ुशबू से ख़ूब बेहतर हैं,
ले जा अपने गुलाब रहने दे

तेरी खुशियां तुझे मुबारक हों,
मुझको ख़ाना ख़राब रहने दे!

राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं 

 राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं,
रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं,

पथ्थरों के आदमी हैं और दहर जलता हुआ,
चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं,

और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है,
तुम वही हो, हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं,

है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए,
साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं,

सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए,
बस यही रस्ता है जिसके दरमियाँ कोई नहीं!

अब ज़रूरी हो गया राहें बदलना

 अब ज़रूरी हो गया राहें बदलना,
ख़ुद खड़े रहना अकेले है संभलना,

राह को हमवार करना ख़ुद-ब-ख़ुद ही,
और ख़ुद ही वक़्त के साँचे में ढलना,

भीख में क्या माँगना, कोई मुहब्बत,
जिस तरह हो ख़ुद के ही पैरों से चलना,

दम बख़ुद आज़ाद हैं अपने जहां में,
दम बख़ुद छोड़ेंगे गैरों पै मचलना,

दूसरों के दिल पै क्यूँ पाबंदियां हों,
ख़ुद भी आँखों को नहीं रो के मसलना!

बात है दरअस्ल हम ख़ुद से खफा हैं

 बात है दरअस्ल हम ख़ुद से खफा हैं,
जो हुआ करते थे हम अब वो कहाँ हैं,

हम नहीं बोलेंगे ख़ुद से तब तलक अब,
जब तलक दिल में जहाँ के ग़म निहाँ हैं,

हमने अपने वास्ते सोचा न कुछ भी,
उस पे ये इल्ज़ाम हम पर,बदज़ुबां हैं,

देखते भी क्या कभी खुशियों की जानिब,
हम निशाने ही फ़क़त वक़्त-ए-गिराँ हैं,

टुकड़े टुकड़े ज़िन्दगी बिखरी रही बस,
अपनी किस्मत में लिखे ग़म के निशाँ हैं,

यक़-ब-यक़ हमको हुआ महसूस ऐसा
दिल अकेला है ग़मों के कारवां हैं !

गुफ्तगू के दरमियां कल इक अजब किस्सा हुआ

 गुफ्तगू के दरमियां कल इक अजब किस्सा हुआ,
नींव का पथ्थर लगा हमको बहुत खिसका हुआ,

कशमकश में घूमते हम रह गए दीवानावार,
रात भर हमने समेटा जब यकीं बिखरा हुआ,

ज़िन्दगी भर के तजुरबे हर नफ़स हावी हुए,
याद हम करते रहे तक़दीर का लिख्खा हुआ,

लफ़्ज़ कुछ उसने कहे अपनी जुबां से यक़-ब-यक़,
होश मइश्क़ें था ही कहां उसका ज़ेहन बहका हुआ,

अब यही बस देखना है, किस तरफ को रुख करें,
कह गया हमसे बहुत कुछ कारवां छूटा हुआ,

लौट कर हम आ गए अपने दर-ओ-दीवार में,
इश्क़ के बाज़ार में जब दिल बहुत सस्ता हुआ।।।

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