उर्मिलेश की रचनाएँ

बेवजह दिल पे कोई 

बेवजह दिल पे कोई बोझ न भारी रखिये
ज़िन्दगी जंग है इस जंग को जारी रखिये

अब कलम से न लिखा जाएगा इस दौर का हाल
अब तो हाथों में कोई तेज कटारी रखिये

कितने दिन ज़िन्दा रहे इसको न गिनिये साहिब
किस तरह ज़िन्दा रहे इसकी शुमारी रखिये

उसकी पूजा कहीं ईश्वर को न कर दे बदनाम
अब तो मंदिर में कोई और पुजारी रखिये

आपको आपसे बढ कर जो बताएं हरदम
ऐसे लोगों से ज़रा दूर की यारी रखिये

ज़िन्दगी भर के लिए हम न कहेंगे तुमसे
आज,बस आज ज़रा बात हमारी रखिये

आज है, कल हुई 

आज है, कल हुई, हुई, न हुई
छांव हर पल हुई, हुई, न हुई

एक पहेली है ज़िंदगी अपनी
क्या पता हल हुई, हुई, न हुई

देह का फ़लसफ़ा बताता है
कल ये संदल हुई, हुई, न हुई

जो नदी तुझमें – मुझमें बह्ती है
उसमें कलकल हुई, हुई, न हुई

ये नुमाइश तो चार दिन की है
फिर ये हलचल हुई, हुई, न हुई

मानकर घास रौंद मत इसको
कल ये मखमल हुई, हुई, न हुई

जितना जी चाहे उतनी पी ले तू
फिर ये बोतल हुई, हुई, न हुई

अब बुज़ुर्गों के

अब बुज़ुर्गों के फ़साने नहीं अच्छे लगते
मेरे बच्चों को ये ताने नहीं अच्छे लगते।।

बेटियाँ जबसे बड़ी होने लगी हैं मेरी।
मुझको इस दौर के गाने नहीं अच्छे लगते।।

उम्र कम दिखने के नुस्ख़े तो कई हैं लेकिन।
आइनों को ये बहाने नहीं अच्छे लगते।।

उसको तालीम मिली डैडी-ममी के युग में।
उसको माँ-बाप पुराने नहीं अच्छे लगते।।

अब वो महंगाई को फ़ैशन की तरह लेता है।
अब उसे सस्ते ज़माने नहीं अच्छे लगते।।

हमने अख़बार को पढ़कर ये कहावत यों कही।
‘दूर के ढोल सुहाने’ नहीं अच्छे लगते।।

दोस्तो, तुमने वो अख़लाक हमें बख्शा है।
अब हमें दोस्त बनाने नहीं अच्छे लगते।।

मौसम की चोट 

चोट मौसम ने दी कुछ इस तरह गहरी हमको।
अब तो हर सुबह भी लगती है दुपहरी हमको।।

काम करते नहीं बच्चे भी बिना रिश्वत के।
अपना घर लगने लगा अब तो कचहरी हमको।।

अब तो बहिनें भी ग़रीबी में हमें भूल गईं।
राखियाँ कौन भला भेजे सुनहरी हमको।।

हमने पढ़-लिखके फ़कत इतना हुनर सीखा है।
अपनी माँ भी नज़र आने लगी महरी हमको।।

होंठ अब उसके भी इंचों में हँसा करते हैं।
उसकी सोहबत न बना दे कहीं शहरी हमको।।

डिगरियाँ देखके अपने ही सगे भाई की।
ये व्यवस्था भी नज़र आती है बहरी हमको।।

धीरे-धीरे जो कुतरते हैं हमारे दिल को।
याद उन रिश्तों की लगती है गिलहरी हमको।।

उसकी चूड़ी 

उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चुनर से अलग।
मैं सफर में भी न हो पाया कभी घर से अलग।

गो कि मेरी ‘पास-बुक’ से भी बड़े थे उनके ख्वाब
फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग।

मुझसे वो अक्सर लड़ा करती है, मतलब साफ है
वो न भीतर से अलग है, वो न बाहर से अलग।

पत्रिकायें उसके पढ़ने की मैं लाया था कई
फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग।

सोच में उसके भरी हैं मेरी लापरवाहियाँ
यों वो सोने जा रही हैं मेरे बिस्तर से अलग।

उम्र ढलते ही बनेगा कौन मेरा आइना
हो न पाया मैं कभी उससे इसी डर से अलग।

दोस्तों, हर प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिल जायेगा
सोचना कुछ देर घर को अपने दफ्तर से अलग।

मेरी टाँगे मांग कर मेरे बराबर हो गये

मेरी टाँगे मांग कर मेरे बराबर हो गये,
यानी मेरे शेर पढ कर वो भी शायर हो गये

शेर मेरे, धुन किसी की और किसी की वाह वाह,
जब कई नदियां मिली तो वो भी सागर हो गये

डिग्रियाँ,फिर अर्ज़ियाँ,फिर गोलियां सलफास की
इस तरह कितने ही सपने गुम यहाँ पर हो गये

वो बड़ा अफ़सर था फिर भी सोच में वो पढ़ गया
जब सुना उसके पिता उसके रिटायर हो गए

जिनको खादी पहनकर आती थी भाषण की कला
उनके कच्चे रास्ते भी आज डामर हो गये

अब बुज़ुर्गों के फ़साने नहीं अच्छे लगते 

अब बुज़ुर्गों के फ़साने नहीं अच्छे लगते
मेरे बच्चों को ये ताने नहीं अच्छे लगते

बेटियाँ जब से बड़ी होने लगी हैं मेरी,
मुझको इस दौर के गाने नहीं अच्छे लगते

उम्र कम दिखने के नुस्खे तो कई हैं लेकिन,
आइनों को ये बहाने नहीं अच्छे लगते

उसको तालीम मिली ‘डैड’- ‘ममी’ के युग में,
उसको माँ बाप पुराने अच्छे नहीं लगते

अब वो मँहगाई को फैशन की तरह लेता है,
अब उसे सस्ते ज़माने नहीं अच्छे लगते

अपने ही शोर में डूबा हुआ हूँ मैं इतना
अब मुझे मीठे तराने नहीं अच्छे लगते

दोस्तों,तुमने जो अख़लाक़ मुझे बख़्शा है
अब मुझे दोस्त बनाने नहीं अच्छे लगते

हर निशा आपके बिन अमा सी लगे

हर निशा आपके बिन अमा सी लगे
आप जब साथ हों पूर्णमासी लगे

जाने क्या बात है आप के रूप में
आधुनिक दृष्टि भी आदिवासी लगे

कोई भी स्वर्ग कीअप्सरा क्यों न हो
आपके सामने देवदासी लगे

गोरे मुख पर यह काली लटें देख कर
चाँद फ़ीका लगे रात बासी लगे

आपका साथ जब से मिला है हमें
भोर मथुरा लगे साँझ काशी लगे

आपके बिन हमें जिंदगी यूँ लगी
जैसे पानी बिना मीन प्यासी लगे

रिश्तों की भीड़ में भी वो तन्हा खड़ा रहा

रिश्तों की भीड़ में भी वो तन्हा खड़ा रहा
नदियाँ थी उसके पास वो प्यासा खड़ा रहा

सब उसको देख देख के बाहर चले गए
वो आईना था घर में अकेला खड़ा रहा

इस दौर में उस शख्स की हिम्मत तो देखिये
अपनों के बीच रहके भी ज़िन्दा खड़ा रहा

मेरे पिता की उम्र से कम थी न उसकी उम्र
वो गिर रहा था और मैं हँसता खड़ा रहा

बारिश हुई तो लोग सभी घर में छुप गए
वो घर की छत था इसलिए भीगा खड़ा रहा

उस घर में पांच बेटे थे,सब थे अलग अलग
इक बाप बनके उनकी समस्या खड़ा रहा

दुनिया को उसने रोशनी बाँटी तमाम उम्र
लेकिन वो अपनी आग में जलता खड़ा रहा

वो जिसका तीर चुपके से जिगर के पास होता है 

वो जिसका तीर चुपके से जिगर के पास होता है
वो कोई ग़ैर क्या अपना ही रिश्तेदार होता है

किसी से अपने दिल की बात कहना तुम न भूले से
यहाँ ख़त भी ज़रा सी देर में अखबार होता है

हमारे सुख से दुःख उनको हमारे दुःख से सुख उनको
सही माने में अपनों का यही व्यवहार होता है

हमेशा हम जिन्हें सच बोलने की सीख देते हैं
उन्हीं के सामने सच बोलना दुश्वार होता है

किसी को दिल न देने की कसम हर बार खाई है
मगर मजबूर हैं हमसे यही हर बार होता है

पूरी हिम्मत के साथ बोलेंगे

पूरी हिम्मत के साथ बोलेंगे
जो सही है वो बात बोलेंगे

साहिबों,हम क़लम के बेटे हैं
कैसे हम दिन को रात बोलेंगे

पेड़ के पास आँधियाँ रख दो
पेड़ के पात पात बोलेंगे

‘ताज’को मेरी नज़र से देखो
जो कटे थे वो हाथ बोलेंगे

उनको कुर्सी पे बैठने तो दो
वो भी फिर वाहियात बोलेंगे

मुल्क के हाल-चाल कैसे हैं
ख़ुद -ब-ख़ुद वाक़यात बोलेंगे

शब्द को नाप तोलकर कहना
अर्थ भी उसके साथ बोलेंगे

तू इन बूढ़े दरख्तों की हवाएँ साथ रख लेना 

तू इन बूढ़े दरख्तों की हवाएँ साथ रख लेना
सफ़र में काम आयेंगी दुआएँ साथ रख लेना

हँसी बच्चो की, माँ का प्यार और मुस्कान बीबी की
तू घर से जब चले तो ये दवाएँ साथ रख लेना

सफ़र कितना भी मुश्किल हो वो फिर मुश्किल नहीं होगा
तू थोड़े हौसले बस दायें-बायें साथ रख लेना

बिछुड़ता देखकर तुझको जो घिरकर भी नहीं बरसीं
तू उन कजरारी आँखों की घटाएँ साथ रख लेना

कहीं भी तू रहे तेरे हमेशा काम आयेंगी
तू थोड़ी नेकियाँ, थोड़ी वफ़ाएँ साथ रख लेना

खताएँ दूसरों की जब कभी तू ढूढ़ने निकले
तू सबसे पेशकर अपनी खताएँ साथ रख लेना

मैं जब घर से चला, काँटो घिरो कुछ फूल यों बोले
ग़मों में मुस्कराने की अदाएँ साथ रख लेना

ये ख़बर भी छापिएगा आज के अख़बार के 

ये ख़बर भी छापिएगा आज के अख़बार के
रूह भी बिकने लगी है जिस्म के बाज़ार में

देख कर बच्चों के फैशन वो भी नंगा हो गया
ये इज़ाफ़ा भी हुआ इस दौर की रफ़्तार में

आज बस्ती में मचा कोहराम तो उसने कहा
मौत किसके घर हुई पढ़ लेंगे कल अखबार में

अब तो हर त्यौहार का हमको पता चलता है तब
जब पुलिस की गश्त बढ़ती शहर के बाज़ार में

अपनी शादी पे छपाए उसने अंग्रेज़ी में कार्ड
वो जो हिन्दी बोलता था रोज़ के व्यवहार में

वो तड़प.वो चिट्ठियां ,वो याद ,वो बेचैनियाँ
सब पुराने बाट हैं अब प्यार के व्यापार में

मेहमानों ,कुछ न कुछ लेकर ही जाना तुम वहाँ
दावतें अब ढल चुकी हैं पूरे कारोबार में

तेरी राह में क़ैदखाने पड़ेंगे 

तेरी राह में क़ैदखाने पड़ेंगे
मगर तुझ को ख़तरे उठाने पड़ेंगे

अभी ख़ून से शेर लिखने है तुझको
क़लम हड्डियों के बनाने पड़ेंगे

कहीं सो न जाए सुबह के मुसाफ़िर
तुझे रात भर गीत गाने पड़ेंगे

अगर तू ही चुप हो गया इस सदी में
हमें रोज़ आंसू बहाने पड़ेंगे

यह महफ़िल है इस का तकाज़ा यही है
तुझे दर्द अपने भुलाने पड़ेंगे

तू शायर है,मुफ़लिस है, ख़ुद्दार भी है
तुझे ग़म से रिश्ते निभाने पड़ेंगे

दियों से न मिट पायेगा यह अंधेरा
हमें दिल भी अपने जलाने पड़ेंग

जबकि स्कूलों की तालीमों में अंतर होंगे

जबकि स्कूलों की तालीमों में अंतर होंगे
कैसे इस मुल्क के सब लोग बराबर होंगे

आज तालीमघरों में भी दुकानें चलतीं
पैसे वाले ही यहाँ पढ़के कलक्टर होंगे

जब कि गुरुजन ही यहाँ करते रहेंगे ट्यूशन
कैसे पैदा यहाँ अर्जुन से धनुर्धर होंगे

इक सिपाही की जो इज्ज़त है,वो शिक्षक की नहीं
ऐसे माहौल में अपराध सरासर होंगे

वो जो स्कूल की बुनियाद भर रहा है यहाँ
उसके बच्चे ही कल स्कूल से बाहर होंगे

मान लो मुल्क के सब लोग अगर पढ़ जायें
कैसे फिर चोर – लुटेरे यहाँ लीडर होंगे

हाथ अपनी भूल पर कुछ तुम मलो,कुछ हम मलें

हाथ अपनी भूल पर कुछ तुम मलो,कुछ हम मलें
हर तपन मिट जायेगी कुछ तुम ढलो, कुछ हम ढलें

बेवजह बनकर चटानें क्या हमें हासिल हुआ
बर्फ़ की मानिंद अब कुछ तुम गलो,कुछ हम गलें

नफ़रतों के ये अँधेरे ख़ुद ब ख़ुद मिट जायेंगे
मोम धागे की तरह कुछ तुम जलो,कुछ हम जलें

वो जो होली-ईद पर मिल बैठ के चखते थे हम
चटपटे वो जायके कुछ तुम तलो,कुछ हम तलें

मानकर बाज़ार अब भी छल रहे हैं जो हमें
क्यों न उन छलियों को अब कुछ तुम छलो, कुछ हम छलें

जो विरासत में मिली वो राह ख़ुद गुमराह थी
अब तो नूतन राह पर कुछ तुम चलो,कुछ हम चलें

दो कंदीलें 

अक्सर इन रातों में
तिर आतीं आँखों में
दो जलते कंदीलें I
ठहर-ठहर कर अक्सर
लिख जातीं कुछ मन पर
वे दो नीली झीलें I
आंसू की तरह
गिरता है मोम पिघल
जैसे बिखरी खीलें I
भीगी हर कोर लिये
जुड़ आतीं शोर लिये
यादों की तहसीलें I

अन्दर का कर्फ़्यू 

बाहर से ज़्यादा डरावना
अन्दर का कर्फ़्यू होता है I

ख़तरे का सायरन बजे तो
सावधान हम हो सकते हैं,
कमरे की बत्तियाँ जलाकर
जग सकते हैं, सो सकते हैं;

लेकिन कैंसर के फोड़े-सा
फूट रहा है जो अपने अन्दर,
उस खतरे के मल-मवाद को
कौन भला आकर धोता है I

मन के सन्नाटों का मतलब
भाषा का जड़ हो जाना है,
अथवा ठहरी झीलों, अंधी
बाबड़ियों में खो जाना है;

दिनचर्या पर लिपटे भूतों
प्रेतों से हम लड़ सकते हैं,
लेकिन उसका क्या हो जो इस
मन के खंडहर में सोता है I

जेहनों में जब बस जाती हैं
चिन्ताओं की निलज चुड़ैलें,
दुविधा यही हुआ करती है
कितना सिकुड़ें कितना फैलें;

जिस घर की छत होती, उसकी
हमें क़ैद भी अच्छी लगती,
पर जिस घर में दीवारें हों
उसका दर्द कौन ढोता है I

स्वतंत्रता की आरती

देश के जवानियों
स्वतंत्रता सेनानियों
न और कोई कामना
यही है सिर्फ़ प्रार्थना

स्वतंत्रता कि आरती सँभालकर उतारना!

राष्ट्र चेतना के सब प्रयोग अब कहाँ गए
त्याग भावना के वे सुयोग अब कहाँ गए
धर्म जाति प्रान्त पर तो लड़ रहे सभी यहाँ
स्वदेश हेतु लड़ सकें वे लोग अब कहाँ गए

बड़ी हैं मुश्किलें अभी
हैं दूर मंज़िलें अभी

पंथियों! सगुन ज़रा सँभाल कर उतारना!

ज़िन्दगी को आज कर्म का नया सितार दो
सुप्त स्वर को शौर्य-स्वाभिमान की पुकार दो
भारती का भाल झुक सके कभी न इसलिए
देश प्रेम वाले गीत आज द्वार-द्वार दो

एक हाथ में क़लम लो
एक में लो अस्त्र तुम

गीतकारों! वेश चन्द का सदैव धारना!

हम रहें स्वतंत्र सर्वदा यही उम्मीद हो
देश में हमारे रोज़ होली और ईद हो
मातृभूमि पर पड़े जो दुश्मनी नज़र कभी
तो कामना है हम जवान देश पर शहीद हो

भले ही कर्म हो अलग
भले ही धर्म हो अलग

साथियों! अनेक शत्रु एक हो के मारना!

भारत के भामाशाह उठो

फिर से राणा के आन हेतु
रणचंडी के सम्मान हेतु
लेकर नवीन उत्साह उठो
भारत के भामाशाह उठो।
यदि देश नहीं बच पाया तो
इस धन को कहाँ सहेजोगे
यदि बिना मौत मर गए सभी
यह धन फिर किसको भेजोगे
इसलिए तिजोरी खोल खोल
चल दानवीर की राह चलो।
जो देश हेतु होता अर्पित
वह धन पवित्र हो जाता है
उस धन को देने वालों का
जीवन पवित्र हो जाता है
धन-वीरों देश-सुरक्षा की
तुम लेकर पावन चाह उठो।
ओ सौ करोड़ भारत-पुत्रो
सब मिलकर कुछ-कुछ दान करो
जो युद्ध लड़ रहे सीमा पर
उनकी राहें आसान करो।
अपने धन से हर दुश्मन को
तुम करके आज तबाह उठो।

उन्हें शत शत नमन मेरा

मिटा कर शत्रु को जो मिट गए खुद आन की खातिर
इन्हें शत-शत नमन मेरा, उन्हें शत-शत नमन मेरा।

जिन्होंने बर्फ में भी शौर्य की चिंगारियाँ बो दीं
पहाड़ी चोटियों पर भी अभय की क्यारियाँ बो दीं
भगा कर दूर सारे गीदड़ों को, सारे श्रृंगालों को
जिन्होंने सिंह वाली युद्ध में खुद्दारियाँ बो दीं।

अहर्निश जो बढ़े आगे विजय-अभियान की खातिर
उन्हें शत-शत नमन मेरा, उन्हें शत-शत नमन मेरा।

शुरू से आज तक इतिहास ये देता गवाही है
हमारी वीरता मृत्युंजयी है, शौर्य-ब्याही है
अलग से वह न पत्थर है, न लोहा है, न शोला है
सभी का सम्मिलित प्रारूप, भारत का सिपाही है।

लुटाते प्राण तक जो देश के अभिमान की खातिर
उन्हें शत-शत नमन मेरा, उन्हें शत-शत नमन मेरा।

शहीदों की चिताएँ तो वतन की आरती-सी हैं
उठीं लपटें किसी नागिन सदृश फुफकारती सी हैं
चिताओं की बुझी हर राख गंगा-रेणु-सी लगती
निहत्थी अस्थियाँ भी शस्त्र की छवि धारती-सी हैं।

जिन्होंने दे दिया बलिदान हिंदुस्तान की खातिर
उन्हें शत-शत नमन मेरा, उन्हें शत-शत नमन मेरा।

तुम्हें बरसना आ जाता 

मेरी आँखों से अगर दोस्ती कर लेते,
बादलों, ठीक से तुम्हें बरसना आ जाता I

तुम गरज-गरज कर अक्सर शोर मचाते हो,
मैं चुप होकर हर घुटन-त्रास सह लेता हूँ,
तुम हवा, उमस, गर्मी के हो अनुचर लेकिन,
मैं भरी भीड़ में एकाकी रह लेता हूँ,

तुम मेरे अनुगामी बनकर यदि चलते तो,
दुख में भी खुलकर तुम्हें विहँसना आ जाता I

प्यासी धरती जब तुम्हें निमंत्रण देती है,
तुम एक बरस में चार माह को आते हो,
इस छोर कभी, उस छोर स्वार्थ की वर्षा कर
नीले बिस्तर पर एकाकी सो जाते हो;

मेरे चरित्र को थोड़ा भी जी लेते तो,
प्यार की आग में तुम्हें झुलसना आ जाता I

तुम बिजली की टार्च से देखते धरा-रूप,
तुम दरस-परस का असली सुख कब जीते हो,
यों तो सब तुमको पानीदार समझते हैं,
लेकिन आँखों के पानी से तुम रीते हो;

तुम मेरी तरह बूँद भर अश्रु गिरा लेते,
तो यक्ष-दूत-सा तुम्हें हुलसना आ जाता I

खालीपन भर लें

सुनो, अगर फुरसत हो तो
हम कुछ ऐसा कर लें
बिना बात ही लड़ें
और ये खालीपन भर लें I

पैर पटककर चलें
अकड़ में मुंह फेरे हम बैठें,
छातों जैसे तनें
और फिर रस्सी जैसे ऐंठें;
रूठें
मनें
हँसें
रोयें
जीवित हो-हो मर लें I

जो भी बर्फ़ जमी है
अपने बीच उसे पिघलायें,
आग, हवा, पानी बन-बनकर
जलें
बहें
लहरायें
आँखों के प्रश्नों के हम
होंठों से उत्तर लें I
चुप्पी के विषधर
जो लिपटे हैं
अपनी संज्ञा पर,
असर न कर दें वे
अपने इस ह्रदय और प्रज्ञा पर;
इन्हें कीलने को
अभिमंत्रित
गीतों के स्वर दें I

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