उषारानी राव की रचनाएँ

देखा है मैंने

श्वेत,शुभ्र बादलों का
समूह
अनेक आकृतियाँ
बनाता है
विलीन
हो जाता है
देखा है मैंने
शिल्पी को
जो
अहंकार शिला की
परत-दर -परत
उतार देता है
नई आकृति अभिन्न
हो जाती है
देखा है मैंने
गगनचुंबी
देवदारू को
जड़शक्ति के आकर्षण
को पराभूत कर
अर्थातीत
आनंद को पाता है
देखा है मैंने
‘अस्ति’ का
उद्धभासित होना
सांकृत्यायन के लिए
हिमालय
औ संस्कृत के लिए
कालिदास का
शक्ति-स्त्रोत होना
देखा है मैंने
हिमखण्डों को
अखंड
जो पिघलते नहीं,
ऐसे हिम हैं
हम
स्याह पड़ा हिमालय
बाहर नही
भीतर है
देखा है मैंने

भ्रम

सनसनाहट की आवाज़
के साथ
रोशनी बढ़ती गई
पंचलाइट की रेशमी थैली में !
और सामने आती गई
अंधेरे की अस्मिता !
अनबूझे आयाम
अज्ञान के
अंधविश्वास के
जात-पात के
वर्ग- बोध के
बत्ती के पास उड़ता कीड़ा
उसके साथ सटकर
झुलस गया था !
कहीं बद्धमौन था
कहीं अवसाद भी !
पीढ़ियों एवं समय के
बीच घटित संघर्ष
प्रकाश के घेरे में चुप!
सवाल किया मेरे अंतस ने !
आदमी की शक्ति या कमज़ोरी मानें इसे ?
भ्रम की सृष्टि कर रहें वो
जो बचा के दामन निकल
रहें हैं
तेज़ बिकने वाला एक सौदा है
भ्रम !

उस पार-1

दूरअनंत जलराशि के उस पार परदेश में
और ज्यादा पैसा होगा
सुविधाओं से
संपन्न जीवन
खाने-पहनने की
कोई कमी नही
खुशनुमा तस्वीरें उजागर होने लगतीं
गाँव की छाती पर
खड़े
कई नये
मकान
परदेस से कमाये गये पैसों से
वह जो परदेस से
लौट रहा होता
है अपनों की झलक
के लिए
गाँव की जमीन पर पाँव रखते
ही
बाबुल के घर -सा अहसास से
भर उठता है
यहाँ त्योहार में गाँव का गाँव
हुलस जाता
गाँव -डगर में उड़ती धूल
नाच -गाने में बजते ढोल
धान के खेत की महक
कितना मनभावन !
जाने कैसे ?सोचा होगा
परदेस में बसने का
अभी भी गरीब की
मिट्टी सूखी है
सपने नम हैंयहाँ
बाज़ारी तिलस्म में लूटेरे
हैं पहरेदार !
सत्ता की
नीतियों का अंदाज़
है हमलावर
लौटें तो क्या होगा हासिल ?
दो दिशाओं में खुलते हैं दरवाज़े
हमेशा
जितना अंदर जाने के लिए
उतना बाहर आने के
लिए

उस पार-2 

तस्वीरें आयीं हैं
पोते-पोतियों की
सुबह की डाक से
साल छः महीने में
पहुँच ही जाती हैं !
पर
वे नहीं आते
मन कातर हो उठा
दरवाज़े को अधखुला कर
खड़ी रही
सड़क के उस पार से आ रही
थी
हरसिंगार की महक !
धूल,धूआँ सबको दबाकर
दूर से
तस्वीरों की तरह उस पार से
तस्वीर न होगा तो न होगा
ह्दय !

परिहास 

मद्धिम उजाले में
जरा-जीर्ण पिता का चेहरा
उभरा
स्वर गूँजा
“स्त्रियाँ हीं संसार
में खातीं हैं धोखा !
बनतीं हैं शिकार
संवेदनहीनता की ”
उनकी भींगीं पलकें पृथ्वी को
धुँधला करने लगीं
घरेलु ज़द्दोज़हद में
होम करतीं
अपने युवा दिनों को
पीछे छोड़ आतीं
भाई-बहन सखी-सहेली
तालाबनाव
बगान के फूलों
औरझूलों कों
स्वतंत्र ईकाई का अहसास
तक नही!
सुरंग के भीतर के जैसा
एक जीवन
मारपीट,बलात्कार
जला दिया जाना
फँदे की विवशता
कर ले चाहे कितना
ही जतन !
ढलने लगी है साँझ चुप-चाप
एक टुकड़ा मेघ ने
चाँद को ढक रखा है
हा हा दारुण परिहास
फैल जाता

व्यथा

त्वरित गति से बहुत कुछ घटता चला गया
रूप हीन है निष्ठा
कोई स्वरुप नहीं
कोई अर्थ नहीं
वस्त्र वलय से आवरित
नेत्रों में अपने
क्षितिज का फैलाव
करते-करते
ओढ़ लिया
अंधापन गांधारी ने!
महासतीत्व के
सिंहासन पर बैठ
करने लगी अपने अहं की तुष्टि!
अदृश्य दीवारों में
स्वयं ही बंदी
ओढ़े हुए अंधत्व से विषवमन किया
अबोध सुयोधन में
अकारण नहीं था यह!
विवाह के छल का प्रतिरोध
या समर्पण पतिव्रता का
‘युद्धं देहि’ की कांक्षा बलवती हो उठी
प्रश्न था
सत्ता का,
अधिकार का
अंततः
टूटी जांघ भग्न देह लिए
किया प्रश्न
दुर्योधन ने
जन्म तो दिया तुमने
रचा नहीं पांडवों -सा चरित्र!
निरुत्तर संज्ञाहीन गांधारी
अभिमान भंग !

आंधी 

निस्वर आँखों में झाँकती
पीली दुपहरी
दूर-दूर तक
कोई नहीं
दरवाजों पर
दस्तक की
गूँज आज भी है
एक काली आँधी ने
पीछा किया
जो न हवा ,न मिट्टी ,न राख से
आकृत है
किसी प्रेत की तरह
परकाया
प्रवेश करती है
इंसानी समाज
औ सभ्यता की
संवेदना को रेगिस्तान के
रेत
की तरह सोख लेती है
यह घायल हिरनी की
करुण आँखों- सी
न मरी न जीवित !
अकेली बैठी कहाँ
रो रही है !

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