उषा यादव की रचनाएँ

तू सो जा, मेरी लाडली

तू सो जा, हां सो जा, मेरी लाडली,
मेरे घर की बगिया की नन्ही कली!
सपनों की दुनिया पुकारे तुझे,
वो दुनिया बड़ी ही सुहानी-भली।
परियों के बच्चों के संग खेलना,
तू भी उनके जैसी है नाजों-पली।
नयन मूंद झट से, न अब बात कर,
सोया शहर, सोई है हर गली!

सुनते-सुनते लोरी 

चांदनी ने चांदी की
चादर बिछा दी,
पेड़-पौधे सोए, हुई
रात की मुनादी।
पलकों को मूंद, तू भी
सो जा मेरी लाडली।
नाजों से पली हुई
घर की बगिया की कली!
ना, ना, बुरी बात है
कहना न मानना,
चाव से झुलाए तुझे
आज बुआ पालना।
कमरे में उतर आई
चांदनिया गोरी,
तूने भी पलकें मूंदीं,
सुनते-सुनते लोरी।

सो जाओ अब

आसमान की छत पर देखो,
तारों की बरसात हो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।
चूं-चूं करती चिड़िया सोई
दानों के सपनों में खोई
ऊंघ रहे बरगद दादा भी
पत्ता हिल न रहा है कोई।
कब तक जागोगी तुम गुड़िया,
यह तो गंदी बात हो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।
खाली करके अपना प्याला,
देखो सोया टॉमी काला,
पूसी की दो आंखों में भी
सुख-सपनों ने डेरा डाला।
टुकुर-टुकुर क्यों ताक रहीं तुम,
जब पेड़ों की पांत सो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।
हौले-हौले आई निंदिया
बस पलकों पे छाई निंदिया,
सपनों का अनमोल खजाना
मुट्ठी में भर लाई निंदिया।
परीलोक की सैर, तुम्हारे
लिए बड़ी सौगात हो गई।
सो जाओ अब, रात हो गई।

चंदन का पालना 

चंदन का पालना, रेशम की डोर,
मोतियन की झालर, गोटे की कोर।
पालने पे नाचे, सतरंगा मोर,
सो जा रे लालना, मत कर शोर।

गुस्सा हैं हम 

बिल्कुल नहीं आज मानेंगे,
चाहे लाख मनाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

हर इतवार हमें चिड़ियाघर,
चलने का लालच देंगे।
और उसी दिन दुनिया भर के
कामों को फैला लेंगे।
बुद्धू हमें समझ रखा है,
चाकलेट से बहलाते!
टूटी आस लिए यों ही हम
खड़े टापते रह जाते।
नहीं खाएँगे, नहीं खाएँगे,
टाफी लाख खिलाओ जी।

झूठ अगर बच्चे बोलें तो,
खूब डाँट वे खाते हैं।
यही काम पापा जी करते,
और साफ बच जाते हैं।
मम्मी साथ हमारे मिलकर
इनको डाँट लगाओ तुम।

वरना तुम से भी कुट्टी है,
दूर यहाँ से जाओ तुम।
मुँह फूला ही रखेंगे अब,
चाहे लाख हँसाओ जी।

नखरेबाजी

अरे-अरे, क्या करते जी,
खाने में नखरेबाजी?
सब्जी रोटी सरकाई
दाल भी तुमको न भाई,
छोड़ रहे मूली ताजी
यह कैसी नखरेबाजी?

बुरी बात मुँह बिचकाना
शुरू करो चावल खाना,
माँगो जल्दी से भाजी
बहुत हुई नखरेबाजी!
खाओ खुश होकर खिचड़ी
यह भी तो स्वादिष्ट बड़ी,
अरे दही से नाराजी
छोड़ो भी नखरेबाजी।
ठंडा शरबत पी करके
आइसक्रीम पर जी करके,
हारोगे जीती बाजी!
दुख देगी नखरेबाजी!

-साभार: नंदन, मार्च 2000, 20

भारी बस्ता

माँ तेरी छोटी-सी गुड़िया,
इसको उठा-उठा हारी है,
उफ, बस्ता कितना भारी है।

कैसे करूँ किताबें कम कुछ,
सब विषयों को पढ़ना होगा,
पैंसिल बॉक्स छूट न जाए,
इसे ध्यान से धरना होगा।

अपनी सारी चीजें गिनकर
ले जाना होशियारी है।

ढेर किताबें, ढेर कापियाँ,
लंच बॉक्स भी बड़ा जरूरी,
टॉफी की रंगीन पन्नियाँ,
ले जाना भी है मजबूरी।

राधा की गुड़िया की शादी-
की करनी तैयारी है!

आँखें खोलो 

पढ़ी किताबें तुमने इतनी,
पर सीखा है क्या, बोलो?
मुँह से कुछ कहने से पहले,
हृदय तराजू पर तोलो।

करवी बात न मुँह से निकले,
वाणी में मिसरी घोलो।
जालना कूढ़ना बुरी बात है,
मैल सभी मन का धोलो।

हँसता सूरज, खिलती कलियाँ,
तुम भी चहको, खुश हो लो।
दुनिया ही परिवार दिखेगी,
बस, मन की आँखे खोलो।

कितना मजा आए

कितना मजा आए
यदि हम भी
शटल यान पा जाएँ।
अंतरिक्ष पर जाकर अपनी
दुनिया एक बसाएँ।
धमा-चौकड़ी,
कूड़ा-फाँदी,
वहाँ मौज-मस्ती हो।
चाकलेट पेड़ों से तोड़े
आइसक्रीम सस्ती हो।

कितना मजा आए
जब मम्मी-पापा
ढूँढ़ न पाएँ।
होमवर्क की चिंता से भी
हम बच्चे बच जाएँ।

सारे दोस्त
वहाँ पर मिलकर
छेड़े नया तराना।
घर के लिए रोएगा छोटू
इसको मत ले जाना।

मम्मी की साड़ी

मम्मी चली गई स्कूल।
साड़ी गई दरी पर भूल।
लौटेगी वह चार बजे।
तब तक मुनिया क्यों न सजे।

पहुँच गई शीशे के पास।
चेहरे पर छलका उल्लास।
साड़ी पहनी तह को खोल।
बन गई पूरी गोल-मटोल।

तभी पास पापा को देख।
झटपट माँ की साड़ी फेंक।
रंगे हाथ पकड़े जाकर।
मुनिया भागी शरमाकर।

खिचड़ी के यार

चिड़िया लेकर आई चावल,
और कबूतर दाल।
बंदर मामा बैठे-बैठे
बंदर रहे थे गाल।
चिड़िया और कबूतर बोले-
मामा, लाओ घी।
खिचड़ी में हिस्सा चाहो तो
ढूंढ़ो कहीं दही।
पहले से हमने ला रखे ,
पापड़ और अचार।
यही चार तो होते हैं जी
इस खिचड़ी के यार।

आसमान में 

चिड़ियाँ उड़तीं आसमान में।
तोते उड़ते आसमान में।
मम्मी, कितने सारे पक्षी,
दिन-भर उड़ते आसमान में।

उन सबके उड़ने की फर-फर,
ध्वनि पर देऊँ अगर ध्यान मैं।
कितनी ही कोशिश कर लूँ, पर
स्वर वह आता नहीं कान में।

लेकिन वायुयान जब उड़ता,
ऊँचे-नीले आसमान में।
घड़-घड़ की आवाजों का क्यों,
पड़ने लगता शोर कान में।

यही अनोखा उड़ता है क्या,
ऊँचे –नीले आसमान में।
धमकाता होगा जरूर ही,
यह चिड़ियों को आसमान में।

बया का घर 

बोलो किस चिड़िया का घर?
लटक रहा है डाली पर।

ढेरों तिनके ला –लाकर।
चिड़िया बुनती अपना घर।

दरवाजा इसका नीचे।
सबकी नजरों को खींचे।

सचमुच कितना आकर्षक।
छेड़ो मत इसको नाहक।

घर में रहती जो चिड़िया।
खुश हो कहती वो चिड़िया।

मेरा नाम न जाने क्या?
मुझको कहते सभी बया।

गिलहरी

प्यारी–प्यारी एक गिलहरी।
मेरी दोस्त बन गई गहरी।

दौड़ लगाती शाखाओं पर।
उपर जाकर, नीचे आकर।

मैं खिड़की के पास अकेली।
खड़ी होऊँ ले खुली हथेली।

वह धीरे से आगे आए।
किशमिश के दाने चुन खाए।

बिना हिले मैं ठहरूँ जब तक।
किशमिश वह चुनती है तब तक।

लो, सब खाकर फौरन खिसकी।
अब वह दोस्त कहाँ, कब किसकी?

डरती है, छोड़ो, जाने दो।
किशमिश खाने ही आने दो।

और दोस्ती होगी गहरी।
मुझको देगी प्यार गिलहरी।

दुमछल्ला

दादाजी की गोदी चढ़कर,
खूब मचा हूँ मैं हल्ला।
लाड़ लड़ाते जाते हैं वे,
मुँह से कहते-‘बड़ा चिबिल्ला’।

दादा की रज़ाई में घुसकर,
रात बनाता हूँ घरबूला।
झूठ-मूठ का होता उसमें,
सोफ़ा अलमारी और झूला।

मम्मी की साड़ी उँगली पर,
रोज लपेटूँ, ज्यों हो छल्ला।
मम्मी कहती है तब हँसकर,
तू ही है मेरा दुमछल्ला।

चिड़िया का घर 

आस-पास मँडराती चिड़िया,
कटे पेड़ तक आती चिड़िया।
कहाँ घोंसला ढढूँ अपना,
मन मसोस, उड़ जाती चिड़िया।

रोज प्रभाती गाती चिड़िया।
दना चुगने जाती चिड़िया।
और लौटकर बच्चों के मुँह,
चुग्गा दे हरषाती चिड़िया।

किन्तु आज अकुलाती चिड़िया।
बस आँसू टपकाती चिड़िया।
काटा पेड़ देखे चुप होकर,
कुछ भी समझ न पाती चिड़िया।

किस दरवाजे जाए चिड़िया,
निज दुख किसे सुनाए चिड़िया।
कटते रहे पेड़ यदि यों ही,
तो घर कहाँ बनाए चिड़िया?

चाऊँ-माऊँ 

चाऊँ-माऊँ चाऊँ-माऊँ
लाल-लाल मैं गाजर खाऊँ।
खा गाजर तगड़ा हो जाऊँ।
हर दुश्मन को मार भगाऊँ।

चाऊँ-माऊँ चाऊँ-माऊँ।
दूध गटागट मैं पी जाऊँ।
ताकत पाऊँ, अकाल बढ़ाऊँ।
नाम देश का मैं चमकाऊँ।

चाऊँ-माऊँ चाऊँ-माऊँ।
करके कसरत बदन बनाऊँ।
तन में चुस्ती-फुर्ती लाऊँ।
ओलम्पिक में पदक कमाऊँ।

भूख लगी 

भूख लगी माँ रोटी दे।
प्यास लगी माँ पानी दे।
बस्ता ले स्कूल चली,
ला, थोड़ी गुदधानी दे,

जो नानी से है सीखी,
मुझको सीख सयानी दे।
दिन में खेल-खिलौने दे,
औ दिन ढले कहानी दे।

कर दो आजाद

डुग-डुग-डुग-डुग बाजी डुगडुगी
शुरू हुआ बंदर का नाच।
आओ बच्चो इसे देखने,
पैसे दे देना दस-पाँच।

सुनो मदारी बाबा तुमसे,
हम बच्चे करते फरियाद।
बंधन मुक्त रहें पशु सार
बंदर को कर दो आजाद।

रात हो गई

आसमान की छत पर देखो,
तारों की बरसात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई॥

चूँ-चूँ करती चिड़िया सोई,
दानों के सपनों में खोई।
ऊँघ रहे बरगद दादा भी,
पत्ता हिल न रहा है कोई।

कब तक टी.वी. देखोगे तुम,
यह तो गंदी बात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई॥

घड़ी देख लो, रक्खी आगे,
समय बहुत तेजी से भागे।
इतना छोटा बच्चा कोई,
क्या पड़ोस में अब तक जागे?

पर जो इसकी आदत डाले,
समझो उसकी मात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई॥

यही रीति यदि पड़ जाएगी,
नींद न जल्दी फिर आएगी।
उधर सुबह होते ही मम्मी,
बन अलार्म तुम जगाएगी।

बिगड़ा मूड, समझ लो दिन की
कूढ़न भारी शुरूआत हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई॥

आ पहुंचेगा रिक्शे वाला,
होगा फिर अच्छा घोटाला,
जब तक तुमने जूते ढूँढ़े,
खो जाएगा मोजा काला।

इसको पाया, उसको खोया,
यही रोज की बात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई॥

बस्ता लेकर तुम भागोगे,
सीढ़ी पर जब पहुँचे होगे।
अरे, टिफिन तों लिया नहीं है,
झुँझलाहट होगी, लौटोगे।

सोचो तो, गड़बड़झाले की,
यह पूरी बारात हो गई।
सो जाओ, अब रात हो गई॥

इम्तहान में होली

होली, तुमसे यही शिकायत
करते बच्चे हम।
इम्तहान के दिनों दौड़कर
आती क्यों छम-छम?

माँ कहतीं बस बहुत हो गया,
अब रख दो पिचकारी।
यदि बुखार आ गया कहीं
तो होगी मुश्किल भारी।
पर अपना मन रमे रंग में
क्या ज्यादा, क्या कम!
इम्तहान के दिनों दौड़कर
आती क्यों छम-छम?

गुब्बारे पानी वाले भी
हमको बहुत लुभाएँ।
सबके ऊपर उन्हें फेंककर
हम बच्चे हर्षाएँ।
लेकिन नल के पास पहुँचते
पड़े दाँत क्या कम!
इम्तहान के दिनों दौड़कर
आती क्यों छम-छम?

इम्तहान का भूत, पर्व का
मजा बिगाड़े आधा।
और उधर ढोलक की थापें
दें पढ़ने में बाधा।
खी-खी करके तुम हँसती हो
कुछ तो करो शरम!
इम्तहान के दिनों दौड़कर
आती क्यों छम-छम?

किसने सीख तुम्हें दी गंदी
इन्हीं दिनों आने की।
हम बच्चों के मौज-मजे को
फीका कर जाने की।
हल्ला-गुल्ला, धूम-धड़ाका
करें खूब फिर हम।
इम्तहान के बाद अगर
तुम आओ छम-छम-छम।

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