ऋतुराज की रचनाएँ

कभी इतनी धनवान मत बनना

कभी इतनी धनवान मत बनना कि लूट ली जाओ

सस्ते स्कर्ट की प्रकट भव्यता के कारण
हांग्जो की गुड़िया के पीछे वह आया होगा
चुपचाप बाईं जेब से केवल दो अंगुलियों की कलाकारी से
बटुआ पार कर लिया होगा

सुंदरता के बारे में उसका ज्ञान मात्र वित्तीय था
एक लड़की का स्पर्श क्या होता है वह बिलकुल भूल चुका था

एक नितांत अपरिचित जेब में अगर उसे जूड़े का पिन
या बुंदे जैसी स्वप्निल-सी वस्तुएं मिलतीं तो वह निराश हो जाता
और तब हांग्जो की लड़कियों के गालों की लालिमा भी
उसे पुनर्जीवित नहीं कर सकती थी

उस वक्त वह मात्र एक औजार था बाज़ार व्यवस्था का
खुले द्वार जैसी जेब में जिसे उसकी तेज निगाहों ने झांककर देखा था
कि एक भोली रूपसी की अलमस्त इच्छाएं उस बटुए में भरी थीं
कि बिना किसी हिंसा के उसने साबित कर दिया
सुंदर होने का मतलब लापरवाह होना नहीं है
कि अगर लक्ष्य तय हो तो कोई दूसरा आकर्षण तुम्हें डिगा नहीं सकता ।

लहर

द्वार के भीतर द्वार
द्वार और द्वार
और सबके अंत में एक नन्हीं मछली
जिसे हवा की ज़रूरत है
प्रत्येक द्वार
में अकेलापन भरा है
प्रत्येक द्वार में
प्रेम का एक चिह्न है
जिसे उल्टा पढ़ने पर मछली
मछली नहीं रहती है आँख हो जाती है
आँख
आँख नहीं रहती है
आँसू बनकर चल देती है बाहर
हवा की तलाश में

कन्यादान

कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक़्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूंजी हो

लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास होता था
लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों की

माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे में मत रीझाना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री-जीवन के

माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी मत दिखाई देना।

एक बार में सब कुछ 

कुछ भी छोड़कर मत जाओ इस संसार में
अपना नाम तक भी
वे अपने शोधार्थियों के साथ
कुछ ऐसा अनुचित करेंगे कि तुम्हारे नाम की संलिप्तता
उनमें नज़र आएगी

कुछ भी छोड़ना होता है जब परछाई को
या आत्मा जैसी हवा को तो वह एक सूखे पत्ते को
इस तरह उलट-पुलट कर देती है
जैसे वह ख़ुद यों ही हो गया हो

ऐसी जगह लौटने का तो सवाल ही नहीं है
क्योंकि तुम्हारे बाद तुम्हारी तस्वीर के फ़्रेम में
किसी कुत्ते की फोटो लगी होगी
माना कि तुमने एक कुत्ता-ज़िन्दगी जी है
लेकिन कुछ कुत्तों ने तुमसे लाख दर्जे अच्छे दिन देखें हैं

ऐसी जगह न तो छोड़ना ही है कुछ और न लौटना ही है कभी
पुनर्प्राप्ति की आशा में
ज़िन्दगी की ऊबड़-खाबड़ स्लेट पर लिखीं सभी महत्वाकाँक्षाएँ
मिट जाएँगी पानी फिर जाएगा दुनियादारी से अर्जित किए
विश्वासों पर और पानी नहीं तो धूल ही ढक लेगी उन्हें
क्योंकि तुम्हारे साथ और तुमसे पीछे चलने वाले
बहुत दूर निकल चुके हैं
अब तो फूलमालाएँ उनके पीछे-पीछे आती हैं
और वे अस्वीकार करने के स्वाभिमान और दर्प का
प्रदर्शन करने में लगे हैं ।

तुम्हारे पास त्यागने के लिए कुछ भी नहीं हैं
सिवाय इस शरीर के
उन्हें शायद पता है कि यह वैज्ञानिक परीक्षण के लिए
सर्वथा अनुपयुक्त है क्योंकि इसके कई अंग
गायब हो चुके हैं ।

सामान

वह ट्रेन में चढ़ गया था
उसे उतार लिया गया

उसका सामान दूसरे डिब्बे में था
वह डिब्बा किसी अनजाने स्टेशन पर
कट गया

वह शख़्स कहीं और था
उसका सामान कहीं और

उससे कहा गया
घर बैठे
उतनी ही मज़दूरी देंगे
और पीने को दारू
बस, मतदान के दिन पहुँच कर
वोट पंजे पर देना है

लौटे नहीं
बालाघाट के मज़दूर
दीवाली पहले जो गए थे
हर बरस इसी तरह
होने चाहिए चुनाव

सामान क्या था?
ओढ़ने-बिछाने की एक सदरी
कुछ टाट-टप्पड़
और दो धोतियाँ, दो-तीन कमीज़ें
पायज़ामा और एक पतीली
जिसमें ठूँस-ठूँस कर भर दिए
सत्तू, चावल, प्याज

चलो, भाई, चलो
तुम्हें ही देते हैं वोट
ठेकेदार को, तो देख लेंगे बाद में
जाना तो पड़ेगा, लेकिन जितनी गरज हमारी है, उसकी भी तो उतनी ही है

शरीर

सारे रहस्य का उद्घाटन हो चुका और
तुम में अब भी उतनी ही तीव्र वेदना है
आनंद के अंतिम उत्‍कर्ष की खोज के
समय की वेदना असफल चेतना के
निरवैयक्तिक स्पर्शों की वेदना आयु के
उदास निर्बल मुख की विवशता की वेदना

अभी उस प्रथम दिन के प्राण की स्मृति
शेष है और बीच के अंतराल में किए
पाप अप्रायश्चित ही पड़े हैं

लघु आनंद वृत्तों की गहरी झील में
बने रहने का स्वार्थ कैसे भुला दोगे
पृथ्वी से आदिजीव विभु जैसा प्यार
कैसे भुला दोगे अनवरत् सुंदरता की
स्तुति का स्वभाव कैसे भुला दोगे

अभी तो इतने वर्ष रूष्ट रहे इसका
उत्तर नहीं दिया अभी जगते हुए
अंधकार में निस्तब्धता की आशंकाओं का
समाधान नहीं किया है

यह सोचने की मशीन
यह पत्र लिखने की मशीन
यह मुस्कुराने की मशीन
यह पानी पीने के मशीन
इन भिन्न-भिन्न प्रकारों की
मशीनों का चलना रूका नहीं है अभी
तुम्हारी मुक्ति नहीं है

किशोरी अमोनकर

न जाने किस बात पर
हँस रहे थे लोग
प्रेक्षागृह खचाखच भरा था
जनसंख्या-बहुल देश में
यह कोई अनहोनी घटना नहीं थी

प्रतीक्षा थी विलंबित
आलाप की तरह
कब शुरू होगा स्थायी
और कब अंतरा
कब भूप की सवारी
निकालेंगी किशोरी जी
शुद्ध गंधार समय की पीठ चीरकर
अंतरिक्ष में विलीन हो जाएगा
फिर लौटेगा किसी पहाड़ से धैवत
किसी पंचम को हलके से छूता हुआ
रिखब को जाएगा

किशोरी जी हमेशा इसी तरह
सुरों की वेदना के शीर्ष पर
पहुँचती हैं, लौटती हैं
पर वे अभी तक आईं क्यों नहीं?
स्वर काँपने और सरपट दौड़ने के लिए
बेचैन हैं…

लो वे आ ही गईं
हलकी-सी खाँसी और तुनकमिजाजी का जुकाम है
डाँटकर बोलीं
यह क्या हँसने का समय है?

ज्ञानीजन 

ज्ञान के आतंक में
मेरे घर का अन्धेरा
बाहर निकलने से डरता है

ज्ञानीजन हँसते हैं
बन्द खिड़कियाँ देखकर
उधड़े पलस्तर पर बने
अकारण भुतैले चेहरों पर
और सीलन से बजबजाती
सीढ़ियों की रपटन पर

ज्ञान के साथ
जिनके पास आई है अकूत सम्पदा
और जो कृपण हैं
मुझ जैसे दूसरों पर दृष्टिपात करने तक
वे अब दर्प से मारते हैं
लात मेरे जंग खाए गिराऊ दरवाज़े पर

तुम गधे के गधे ही रहे
जिस तरह कपड़े के जूतों
और नीले बन्द गले के रुई भरे कोटों में
माओ के अनुयायी…

सर्वज्ञ, अगुआ
ज्ञान-भण्डार के भट्टारक, महा-प्रज्ञ
कटाक्ष करते हैं :

ख़ुद तो ऐसे ही रहा दीन-हीन
लेकिन इसकी स्त्री ने कौनसा अपराध किया
कि मुरझाई नीम चढ़ी गिलोय को
दो बून्द पानी भी नसीब नहीं हुआ ।

राजधानी में

अचानक सब कुछ हिलता हुआ थम गया है
भव्य अश्वमेघ के संस्कार में
घोड़ा ही बैठ गया पसरकर
अब कहीं जाने से क्या लाभ ?

तुम धरती स्वीकार करते हो
विजित करते हो जनपद पर जनपद
लेकिन अज्ञान,निर्धनता और बीमारी के ही तो राजा हो

लौट रही हैं सुहागिन स्त्रियाँ
गीत नहीं कोई किस्सा मज़ाक सुना रही हैं-
राजा थक गए हैं
उनका घोड़ा बूढा दार्शनिक हो चला अब
उन्हें सिर्फ़ राजधानी के परकोटे में ही
अपना चाबुक फटकारते हुए घूमना चाहिए

राजधानी में सब कुछ उपलब्ध है
बुढापे में सुंदरियाँ
होटलों की अंतर्महाद्वीपीय परोसदारियाँ

राजधानी में खानसामे तक सुनाते हैं
रसोई में महायुद्धों की चटपटी

छात्रावास में कविता-पाठ 

कोई पच्चीस युवा थे वहाँ
सीटी बजी और सबके सब
एकत्रित हो गए

कौन कहता है कि वे
कुछ भी सुनना-समझना नहीं चाहते
वे चाहते हैं दुरुस्त करना
समय की पीछे चलती घड़ी को
धक्का देना चाहते हैं
लिप्साओं के पहाड़ पर चढ़े
सत्तासीनों को नीचे

कहाँ हुई हिंसा?
किसने विद्रोह किया झूठ से?
भ्रम टूटे मोहभंग हुए और प्रकाश के
अनूठे पारदर्शीपन में
उन्होंने सुनी कविताएँ और नए
आत्मविश्वास से आलोकित हो गए
उनके चेहरे

क्या वे अपना रास्ता खुद खोजेंगे?
क्या इससे पहले ही
उन्हें खींचकर ले जाएँगे
राजनीति के गिद्ध?

नहीं, कविताएँ इतनी तो
असफल नहीं हो सकतीं
उनमें से कोई तो उठेगा और कहेगा
हमें बदल देना चाहिए यह सब…

रास्ता 

बहुत बरस पहले चलना शुरू किया
लेकिन अभी तक घर क्यों नहीं पहुँचा ?

शुरू में माँ के सामने
या इससे भी पहले
उसकी उँगली अपनी नन्ही
हथेली में भींचे
चलता था
लद्द से गिर पड़ता था

वैसे हरेक शुरूआत
इसी तरह होती है
लेकिन तबसे लेकर अब तक
यानी सत्तर बरस तक
पता नहीं कौनसी दिशा थी
कि चलता रहा चलता रहा
कभी नहीं पहुँचा वहाँ
जहाँ पहुँचना था

लोग ऐलानिया तौर पर कहते हैं
कि उन्होंने ख़ुद के लिए
और दूसरों के लिए
सही रास्ता ढूँढ़ लिया है

कुछ बरसों तक
बहुत जोश और उम्मीद में
चलते हुए दिखाई देते हैं
फिर अचानक
किसी लुभावने केन्द्र की तरफ़
मुड़ जाते हैं

कहते हैं, ऐसी मूर्खता में
क्या रखा है ? सुरक्षा पहले,
फिर मुकाम तक पहुँचेंगे

समस्या रास्तों द्वारा छले जाने की है
उन भटकावों की है
जो कहीं पहुँचने नहीं देते

माँ, घर से चला हुआ
मैं कभी बहुत दूर निकल जाता था
लौटने का रास्ते भूल जाता था
भटकता रहता था
बहुत डरता था
लेकिन अब इतनी पकी उम्र में
तर्क करता हूँ,
कि सही दिशा वो नहीं
यह है जिस तरफ भौतिक
व्यवहारवाद, आत्मरक्षा
और निष्कण्टक भविष्य
मुझे बुलाते हैं

जानबूझ कर भूल रहा हूँ
वह पुराना रास्ता
जो घर को जाता तो है
लेकिन वहाँ घर नहीं होता

दर्शन

आदमी के बनाए हुए दर्शन में
दिपदिपाते हैं सर्वशक्तिमान
उनकी साँवली बड़ी आँखों में
कुछ प्रेम, कुछ उदारता, कुछ गर्वीलापन है

भव्य वह भी कम नही है
जो इंजीनियर है
इस विराट वास्तुशिल्प का

दलित की दृष्टि में कौतुक है
दोनों पक्षों कि लिए
यानी प्रभु की सत्ता और
बुर्जुआ के उदात्त के लिए
एक अवाक् जिज्ञासा है कि
ऐसा कैसे हुआ
ऐसा कैसे हुआ ! ! !

जब हम नहीं रहेंगे

सड़क का कर्ज था शिरीषों पर
निर्जन पगडंडी के बजाए
साफ-सुथरा रास्ता सब के लिए
और लो, जो तुम बीच में
अड़े हो
अपना सर्वस्व दे दो
दूसरों के लिए

इससे पहले कि धड़ अलग होंगे
फूटने दो फलियाँ फैलने दो बीज
कि चारों तरफ शिरीष-संतति रहे
भले ही हम न हों
न हो हमारा कर्ज उनके माथे

सब कोई आए अपना धन माँगने
ब्याज में फूल परागण
गंध देने से नहीं चला काम
कोयलों की कूक बुलबुलों के गान
तितलियों के नाच
सब व्यर्थ गए

सूदखोरों ने कहा ‘सिर्फ अधूरे ब्याज से
नहीं चलेगा काम
सिर्फ छायाएँ नहीं होतीं विश्राम
सिर्फ सुगंध से नहीं होती
मूलधन की वापसी
जन्म लेने से पहले तुम्हें सोचना था
कि भविष्य जीवन-मृत्यु का
संघर्ष होगा’

‘अन्नदाता, हम इस संसार से
चले जाते हैं
पर तब भी क्या
हमारे परिवार को काटेंगे पीटेंगे’

‘नहीं, तब नहीं
जब तुम्हारा कोई जमानती नहीं होगा’
नहीं, नहीं, नहीं
सड़क पर
घूमता था रोडरोलर
वे शिरीष जो अब नहीं रहे
कोई उनसे क्या कहेगा

पाँवों के निशान 

अदृश्य मनुष्यों के पाँव छपे हैं
कँक्रीट की सड़क पर

जब सीमेण्ट-रोड़ी डाली होंगी
वे नंगे पाँव अपार फुर्ती से
दौड़े होंगे यहाँ

एक तरफ़ सात-आठ निशान हैं
तो उल्टी तरफ़ तीन-चार

पता चलता है कि
कुछ लोग सबसे पहले चले हैं
इस सड़क पर
वे आए हैं, गए हैं, मुकम्मिल तौर पर

लेकिन जहाँ गए वहाँ अभी तक
ज़िन्दा हैं या मर गए
किसे मालूम ?
हल्का-सा गड्ढा बनाते ये निशान,
बरसात में पानी से भर जाते हैं
और चिड़ियाँ चली आती हैं
सड़क पर पड़े इन पड़हलों की तरफ़

ये वो निशान हैं
जो सड़क के इतिहास में
श्रमिकों की जीवन-गाथा का बखान करते हैं

एक निशान, हल्का उभरा, कम गहरा है
शायद किसी कुली स्त्री का
जो सावधानी से चलती हुई
ठेकेदार की झिड़की से डरी, गई होगी

ऐन सचिव के बंगले के सामने
खुदे ये निशान,
घर की महिलाओं को चौंकाते हैं —

आख़िर, इतने ही निशान क्यों
और बंगले तक आकर
क्यों गायब हैं ??

इतनी सारी गाड़ियों की भागमभाग हैं
लेकिन ये जस-के-तस हैं

क्या रात में इनकी संख्या बढ़ जाती है ?

सुबह उठकर गिनती है
सचिव की पत्नी —
वो ही ग्यारह के ग्यारह निशान
और उनमें से एक, कतार से छिटका हुआ

फिर गिनती है अपने लॉन पर
घर के लोगों के पाँवों के निशान

माँ का दुख 

कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को कहते वक़्त जिसे मानो
उसने अपनी अंतिम पूंजी भी दे दी

लड़की अभी सयानी थी
इतनी भोली सरल कि उसे सुख का
आभास तो होता था
पर नहीं जानती थी दुख बाँचना
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश में
कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों की

माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती है
जलने के लिए नहीं
वस्त्राभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं जीवन के

माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसा दिखाई मत देना।

नागार्जुन सराय

महानता के आश्रयस्थल
यदि होते हों तो इसी तरह
विनम्र और खामोश रहकर
प्रतिमाएँ अपना स्नेह
प्रकट करती रहेंगी

देखो न, यह पूँछ-उठौनी
नन्हीं चिड़िया
किस बेफिक्री से
बैठी है नागार्जुन के सिर पर

अरी, तू जानती है इन्हें?
कब तेरा इनसे परिचय हुआ?
बाबा तो हैं पर क्या
तेरी पूँछ को पता है
स्पर्श करते ही सिर के भीतर
ठुँसी कविताएँ बोलने लगेंगीं

नागार्जुन उर्फ वैद्यनाथ मिश्र
‘यात्री’ यानी सतत भगोड़े
परिव्राजक
न जाने आदमी थे या घोड़ा
ये दरभंगा जिले के तरौनी
गाँव की पैदाइश थे
अभी जीवित होते तो मसखरी में
तुझे अपने झोले में डालकर चल देते
‘ला, कोई किताब दे’
भले ही संस्कृत, बांग्ला, मैथिल, हिंदी
किसी भी भाषा में हो
छंद अछंद
अगर अभी अकाल पड़े तो कहेंगे
‘सूखे में ठिठकी है पूँछ – उठौनी की पूँछ’

फिर भी थे बड़े मस्तमौला
कटहल पके तो नाचेंगे
कनटोपे से झाँकेंगे
आधी आँख आधी फांक

मंत्र जाप की फूँ फा से
उड़ा नहीं पा रहे अपने सिर पर
बैठी पूँछ-उठौनी चिड़िया
समझ नहीं पा रहे
कैसा समय आया यह
कि हर एैरा-गैरा चढ़ रहा
कवि के सिर पर
लेकिन कह नहीं रहा
राजनीति से बिखरते देश की बात

नागार्जुन ने बदला तो नहीं कुछ
लेकिन राजनीति से
रोमांस तो किया ही भरपूर
यानी विद्रोह भी और स्वीकार भी
धिक्कार भी प्यार भी
कविता भी नारा भी
विद्रूप भी सौंदर्य भी

‘यह क्या मैं तेरी हिलती
पूँछ जैसा भी-भी कहे जा रहा हूँ!!’

बाबा के सिर पर
मुकुट है
मटमैली भूरी-लाल उठौनी का
भाल पर तिलक नहीं
निरंतर फहराती हुई
कलँगी है ऊपर

लौटना

जीवन के अंतिम दशक में
कोई क्यों नहीं लौटना चाहेगा
परिचित लोगों की परिचित धरती पर

निराशा और थकान ने कहा
जो कुछ इस समय सहजता से उपलब्ध है
उसे स्वीकार करो

बापू ने एक पोस्टकार्ड लिखा,
जमनालालजी को,
आश्वस्त करते हुए कि लौटूँगा ज़रूर
व्यर्थ नहीं जाएगा तुम्हारा स्नेह, तुम्हारा श्रम

पर लौटना कभी-कभी अपने हाथ में नहीं होता

मनुष्य कोई परिन्दे नहीं हैं
न हैं समुद्र का ज्वार,
न सूर्य न चन्द्रमा हैं

बुढ़ापे में बसन्त तो बिल्कुल नहीं हैं
भले ही सुन्दर पतझर लौटता हो
पर है तो पतझर ही

तुमने क्यों कहा कि लौटो अपने प्रेम के कोटर में

नष्ट-नीड़ था जो
बार बार बनाया हुआ

अस्तित्व के टटपूँजिएपन में
दूसरों की देखा-देखी बहुत-सी
चीज़ें जुटाई गईं
उनकी ही तरह बिजली, पानी
तेल, शक्कर आदि के अभाव झेले गए

रास्ते निकाले गए भग्न आशाओं
स्वप्नों, प्रतीक्षाओं में से

कम बोला गया

उनकी ही तरह,
सब छोड़ दिया गया
समय के कम्पन और उलट-फेर पर

प्रतिरोध नहीं किया गया
बल्कि देशाटन से सन्तोष किया

क्या कहीं गया हुआ मनुष्य
लौटने पर वही होता है ?
क्या जाने और लौटने का समय
एक जैसा होता है ?

फिर भी, कसी हुई बैल्ट
और जूते और पसीने से तरबतर
बनियान उतारते समय
कहता हूँ —
आख़िर, लौट ही आया ।

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